प्रतीकों के इस्तेमाल की अति कर रहे हैं प्रधानमंत्री

क्या प्रधानमंत्री हर अवसर पर प्रतीकों और छवियों के इस्तेमाल की अति के दौर में पहुंच चुके हैं?

प्रतीकों के इस्तेमाल की अति कर रहे हैं प्रधानमंत्री
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मूल समस्या को छोड़ प्रतीकों के ज़रिए समस्या से ध्यान हटाने का फ़न कोई हमारे प्रधानमंत्री से सीखे. जब नोटबंदी के समय जनता लाइनों में दम तोड़ रही थी तब अपनी मां को लाइन में भेज दिया. मीडिया के ज़रिए समस्या से ध्यान हटा कर मां की ममता पर ध्यान शिफ़्ट करने के लिए. ऐसा हुआ भी. जब देश भर में सफ़ाईकर्मी सर पर मैला ढोने के लिए मजबूर हैं, गटर में मिथेन गैस से दम तोड़ते रहे हैं तब कुछ नहीं किया गया. लेकिन एक दिन अचानक से सफाईकर्मियों के पांव धोकर मीडिया में महान बन गए.

सभी राजनेता प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं. करना पड़ता है. इसके अनेक उदाहरण हैं. जब राहुल गांधी ने अनुसूचित जाति के लोगों के घर जाकर घर खाना खाया तो बीजेपी के नेताओं ने आलोचना की. फिर अमित शाह और बीजेपी के नेता बहुत दिनों तक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ताओं के घर लाइन लगाकर खाना खाते रहे. आज कल खाना बंद है.

कुछ समय पहले उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में समरसता स्नान का आइडिया चलाया गया. जिस कुंभ में स्नान सबके लिए होता है वहां अलग से समरसता स्नान का घाट बना. अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान दलित संत समाज के साथ स्नान करने गए. ख़ूब प्रचारित हुआ लेकिन जब साधु संतों ने ही इस विभाजन का विरोध किया तब शिवराज सिंह चौहान ने अपने ट्विट से दलित समाज डिलिट कर दिया. पहले ट्विट किया था कि दलित समाज के श्रद्धालुओं के साथ स्नान किया.

हमारे प्रधानमंत्री ने प्रतीकों और छवियों के इस्तेमाल की अति कर दी है. वे हर समय हेडलाइन की सोचते रहते हैं. समस्या का समाधान भले न हो लेकिन पांव धोकर हेडलाइन बन जाने की हसरत है. क्या सम्मान का ये तरीका होगा? क्या ये सम्मान की जगह सफाईकर्मियों का अपमान नहीं है? क्या उन्होंने भी इन्हें तुच्छ समझा कि पांव  धोकर सम्मान दे रहे हैं? क्या संविधान ने हमें सम्मान से जीने के लिए पांव धोने की व्यवस्था दी है?

क्या हम लोगों ने सामान्य बुद्धि से भी काम लेना बंद कर दिया है? हमें क्यों नहीं दिखाई नहीं देता कि चुनाव के समय मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए यह सब हो रहा है? क्या हम अब नौटंकियों को भी महानता मानने लगे हैं? मुझे नहीं पता था कि महानता नौटंकी हो जाएगी. मुझे डर है मीडिया में प्रधानमंत्री के चेले उन्हें कृष्ण न बता दें.

क्या किसी बेरोज़गार के घर समोसा खा लेने से बेरोज़गारों का सम्मान हो सकता है? उन्हें नौकरी चाहिए या प्रधानमंत्री के साथ समोसा खाने का मौक़ा? आपको सोचना होगा. एक प्रधानमंत्री का वक़्त बेहद क़ीमती होता है. अगर उनका सारा वक़्त इन्हीं सब नौटंकियों में जाएगा तो क्या होगा.

जगह-जगह सफ़ाईकर्मी संसाधनों और वेतनों की मांग को लेकर आंदोलन करते रहते हैं. इसी दिल्ली में ही कितनी बार प्रदर्शन हुए. ध्यान नहीं दिया. गटर साफ़ करने के दौरान कितने लोग जहरीली गैस से मर गए. बहुतों को मुआवज़ा तक नहीं मिलता. आज भी सर पर मैला ढोया जाता है. प्रधानमंत्री पांव धोने की चतुराई दिखा जाते हैं. उन्होंने सम्मान नहीं किया है बल्कि उनके सम्मान का अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया है. बेजवाड़ा विल्सन ने सवाल उठाया है कि क्या सफ़ाईकर्मी तुच्छ हैं कि उनका पांव धोकर सम्मान किया गया है? इससे किसका महिमामंडन हो रहा है? जिसका पांव धोया गया या जिसने पांव धोया है?

अगर पांव धोना ही सम्मान है तो फिर संविधान में संशोधन कर पांव धोने और धुलवाने का अधिकार जोड़ दिया जाना चाहिए. देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. क्या मुकेश अंबानी एंटिला में बुलाकर पांच ग़रीबों का पांव धो लेंगे तो ग़रीबों का सम्मान हो जाएगा? भारत से ग़रीबी मिट जाएगी? मेरी राय में मुकेश अंबानी को अमर होने का यह मौक़ा नहीं गंवाना चाहिए.

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Complaining about the media is easy and often justified. But hey, it’s the model that’s flawed.

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