क्यों ज़रूरी है बोलना?

रवीश कुमार को प्रतिष्ठित रमोन मैग्सायसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, इस मौके पर उनकी पुस्तक बोलना ही है से एक अंश.

क्यों ज़रूरी है बोलना?
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“एक जज की मौत होती है. उनका बेटा और पत्नी बोलने का साहस नहीं जुटा पाते हैं तो क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश को उन्हें सुरक्षा का भरोसा नहीं देना चाहिए, उन्हें बोलने का हौसला नहीं देना चाहिए? आखिर जब एक नागरिक डर के कारण जीने का, बोलने का हौसला छोड़ देगा तो कौन हौसला देगा? संविधान के संरक्षक के तौर पर अगर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या देश के प्रधानमंत्री हौसला नहीं देंगे तो कौन देगा? क्या सत्ता को हमने डर का चादर बना लिया है कि वह डराती रहेगी और हम उस चादर को तान कर सोते रहेंगे, उसके नीचे डर से कांपते रहेंगे? एक आम नागरिक के लिए भी जवाब ज़रूरी है, वरना सबको लगेगा कि जब एक जज के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर किसी के साथ भी ऐसा हो सकता है.

मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं. इस खबर को पढ़कर मुझे भी डर लगा था, लेकिन इस पर प्राइम टाइम इसलिए किया ताकि अनुराधा बियानी को यह न लगे कि उसके जज भाई को किसी ने मार दिया और बोलने वाला कोई नहीं था. जज लोया के बेटे को यह न लगे कि उसके बाप को किसी ने मार दिया और उसके लिए इस देश में बोलने वाला कोई नहीं है. ऐसा नहीं है, हम भी डरते हैं; मगर इस डर से मुक्ति का रास्ता था कि इस स्टोरी को लेकर सबके सामने हाज़िर हो जाया जाए. अब जो होना हो वो हो जाए.

‘अब जो होना हो, वो हो जाए’ प्राइम टाइम शो की यह आख़िरी पंक्ति दर्शकों के लिए नहीं थी, ख़ुद के लिए थी. दो दिनों से मुझे जिस डर ने घेर रखा था, उससे निकलने का एलान था. प्राइम टाइम के दौरान लग रहा था, जैसे एक-एक शब्द मुझे रोक रहे हों. कह रहे हों कि ‘अब बस करो, आगे मत बढ़ो. रुक जाओ. तुम अपने डर से मुक्त होने के लिए ख़ुद को ख़तरे में नहीं डाल सकते. बोल देने से डर समाप्त नहीं होता है. बोलने के बाद दूसरे तरह के कई डर घेरा बनाकर इंतज़ार कर रहे होते हैं.’

लेकिन मैं बोला, और मैं मुक्त हुआ.

……

23 नवंबर 2017, अर्चना कांप्लेक्स, ग्रेटर कैलाश. एनडीटीवी के दफ्तर से निकलते हुए प्राइम टाइम का पूरा शो शरीर के भीतर गूंज रहा था. शो के दौरान बोले गए एक-एक शब्द मुझे ही चुभ रहे थे. दरअसल, शो के लिए स्टुडियो की तरफ बढ़ते वक्त मैं उस चुप्पी से लड़ रहा था जो एक जज की कथित मौत की ख़बर के बाद भी पसरी हुई थी. कारवां पत्रिका ने कथित रूप से सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में सुनवाई कर रहे सीबीआई के जज बृजगोपाल हरिकिशन लोया की मौत पर सवाल उठाती हुई एक रिपोर्ट छापी थी. इस मामले में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बरी हो गए थे. इस स्टोरी के छपे कई हफ्ते बीत जाने के बाद तक जज लोया की पत्नी और बेटे की तरफ से कोई बयान नहीं आया. क्या किसी डर की वजह से दोनों अपनी बात नहीं कह पाए? क्या कोई इतना डर सकता है कि अपने पति या अपने पिता की मौत पर सवाल नहीं उठा सकता है? मैं दोनों के भीतर के डर को अपने भीतर जीने लगा. मैं कारवां की उस स्टोरी को बार-बार पढ़ रहा था. जितनी बार पढ़ रहा था उसके सही होने की ज़रा-सी भी आशंका मेरे भीतर सिहरन पैदा कर रही थी. ग़लत होने की संभावना इस स्टोरी को टीवी पर पेश करने से रोक रही थी. लेकिन इससे कहीं ज़्यादा स्टोरी के आस-पास बने चुप्पी और डर के माहौल ने मुझे बेचैन कर दिया. हर बात को लोगों की निगाह में सही या ग़लत होते देखना ख़ुद को ऐसी सूली पर चढ़ा देना है जहां ज़िंदगी और मौत का फ़ासला एक नज़र के बदल जाने से तय होता है. आपके ही लिखे या बोले हुए एक-एक शब्द शरीर को भीतर से कुरेदने लगते हैं. जैसे कोई छेनी से पत्थर की दीवार तोड़ रहा हो. आशंकाएं आपको जर्जर बनाती हैं.

अक्सर इन बेचैनियों को साझा करने के लिए आस-पास कोई नहीं होता है. डर बाहर से आता है और हौसला भीतर से. जब डर लगे तो ख़ुद के भीतर झांका कीजिए. मैं अक्सर ऐसे वक्त में झांकता हूं. कई बार मुझे अंधेरे गहरे कुएं में गिरता हुए एक एंकर दिखता है जो चीख रहा होता है. जिसकी चीख सुनने वाला कोई नहीं है. उसके पास ख़ुद को बचाने के लिए आवाज़ ही है, जिसे वह ऊंचे स्वर में लोगों तक पहुंचा देता है. डर के ऐसे लम्हों में टीवी के पर्दे के सामने मैं एक-एक शब्द पर सीढ़ी की तरह चढ़ता चला जाता हूं और अपने डर की गहराई से बाहर आने लगता हूं.

प्राइम टाइम शो के बाद अब दूसरों का डर मेरा इंतज़ार करने लगता है. जज लोया की मौत से जुड़े सवालों को लेकर प्राइम टाइम के बाद मेरा फोन घनघनाने लगा. दूसरी तरफ से आती हर आवाज़ ठंडी लग रही थी. लग रहा था कि सिर्फ देख लेने से ही कोई डर गया है. दर्शक मेरे लिए डर गए थे या ख़ुद के लिए? ऐसा लगा कि मैं घर तक भी नहीं पहुंच पाऊंगा. बातचीत में तरह-तरह के अनिष्ट की आशंकाओं ने जगह ले ली. मैं अकेला महसूस करने लगा. ऐसा लगा कि हर कोई अंतिम चेतावनी देकर दिल्ली से जा चुका है. एक आशंका बची है जो मेरा हिसाब लेने आ रही है. जज लोया की मौत पर प्राइम टाइम कर क्या मैंने कोई नई सीमा पार कर दी? वह सीमा क्या हो सकती थी? क्यों बाकी एंकरों ने अपनी सीमा में रहना पसंद किया? क्या बात इतनी ही थी कि वे स्टोरी से सहमत नहीं थे या फिर कुछ और था? इसका जवाब कभी भी कोई ऑन रिकार्ड नहीं जान पाएगा. तो क्या लोग वाकई उस इंसान से इतना डरते हैं जिसकी दहलीज़ तक जज लोया की मौत की कहानी पहुंच रही थी? उसने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था.

डर वास्तविक भी होता है और काल्पनिक भी लेकिन सच यही है कि काल्पनिक डर के तार भी वास्तविक डर से जुड़े होते हैं. बोलना सिर्फ साहस का काम नहीं है. आप जब बोलते हैं तो सबसे पहले ख़ुद को चुनौती देते हैं. ख़ुद से लड़े बिना कोई बोल नहीं सकता. झूठ बोल सकता है मगर सत्य के करीब नहीं पहुंच सकता. आपने फिनिशिंग लाइन पर पहुंच कर उसैन बोल्ट को आगे की तरफ शरीर को झुकाते हुए देखा होगा. उस वक्त बोल्ट अपने शरीर से लड़ रहे होते हैं. उसके ख़िलाफ़ जाकर आगे की तरफ झुक रहे होते हैं. बोलते हुए आप जितना अधिक ख़ुद से लड़ेंगे, उतना ही अधिक आप फिनिशिंग लाइन की तरफ झुकेंगे. उतना ही अधिक आप सत्य के करीब होंगे. सत्य का मतलब सिर्फ तथ्य नहीं होता. सत्य का मतलब समय, उस समय का माहौल और उसके भीतर मौजूद संस्थाओं का तंत्र भी होता है. जिसके सामने खड़े होकर आप बोल रहे होते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि बोल्ट के लिए फिनिशिंग लाइन पर एक रस्सी होती है, हमारे जैसों के सामने कंक्रीट की दीवार होती है. आप उस लाइन पर पहुंच कर एक दीवार से टकरा जाते हैं. आपकी नौकरी, आपका जीवन सब कुछ दांव पर लगा होता है.

आपका डर जहां से ख़त्म होता है, सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख़्स का काम वहां से शुरू होता है. आप एक डर से आज़ाद होते हैं, मगर वह दस और डर का जाल बिछा देता है. साहस कुछ और नहीं, डर के एक घेरे से निकल कर दूसरे घेरे से निकलने का संघर्ष है. इन दिनों जब भी कोई लेख लिखता हूं, कहीं कुछ बोल देता हूं, लोग नए-नए डर से मेरा परिचय कराने लगते हैं. आपको डर नहीं लगता है? कोई तो है जो बोल रहा है! मैं जब भी ऐसा सुनता हूं, बोलने वाले के चेहरे पर डर का संसार देखने लग जाता हूं. डर लगने या नहीं लगने से जुड़ी ऐसी चिंताएं आदमी को डरपोक बनाती हैं. ऐसी चिंताओं की आड़ में कई बार कुछ लोग “सम्भल कर बोलने” की नसीहत के बजाय “नहीं बोलने” की हिदायत दे रहे होते हैं.

***

आप जिस पत्रकार को सावधान रहने और अपनी सुरक्षा का ख्याल रखने को कहते हैंवो बचपन से लेकर जवानी के बड़े हिस्से तक एक डरपोक लड़का था. उसे आज भी डर लगता है. यही डर उसे बचाता  है. उसे लोगों की तकलीफ के करीब ले जाता है. उसे अपनी ग़लतियों से बहुत डर लगता है. वह रोज़ डर से साहस की तरफ़ सफ़र करता है. साहस की कोई अंतिम मंज़िल नहीं होती है. जो हमेशा के लिए उस मंज़िल पर पहुंच जाने का दावा करता है वह मनुष्य नहीं है. उसके भीतर शैतान रहता है. साहस कभी न पूरा होने वाला एक सफ़र है. आपके लिए जो साहस है मेरे लिए वह हर दिन की चुनौती है.

सत्ता को पता है कब किसे रास्ते से हटा देना है. आप यह जानते हैं फिर भी यह सफ़र तय करते हैं. डर और साहस के बीच इस यात्रा के रोमांच ने मेरी नींद भी उड़ाई है, गालियां भी खिलवाई हैं और तालियां भी बजवाई है. बोलने की कीमत अदा करनी पड़ती है. बीस-बीस साल जिन लोगों के साथ काम किया, उन्हें जब कंपनी से जाना पड़ रहा था, तब उनमें से कई मेरी तरफ देख रहे थे. उन निगाहों में काफी दूरी थी. उन्हें लगा कि मेरे इस बोलने के कारण सरकार ने कंपनी को सज़ा दी है.

उसी दौरान दफ्तर के बाथरूम में एक पूर्व सहयोगी ने मुझसे इतना ही कहा कि क्या हम अपनी लाइन नहीं बदल सकते थे? मैंने बस इतना कहा कि क्या हमें पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए थी? मेरे सवाल से उसे जवाब नहीं मिला, न ही उसके सवाल से मुझे जवाब मिला. नौकरी की छंटनी का अनुभव हर किसी के लिए बहुत तल्ख होता है. ऐसे वक्त में किसी की बात का बुरा नहीं मानना चाहिए. मैं उसके सामने किसी गुज़र चुके वक्त की तरह खड़ा रहा. चुपचाप उसे बाहर जाते देखता रहा. अपने भीतर अकेला होता रहा. एक छोर पर खड़ा भीतर ही भीतर टूटता रहा.

“क्या हम लाइन नहीं बदल सकते थे?”… यह लाइन मेरे भीतर धंस गई. क्या मुझे किसी भीड़ का हिस्सा हो जाना चाहिए था, जो किसी को चलती ट्रेन में मार कर आ रही थी, जो किसी को उसके घर में ही घेर कर मार दे रही थी? आपका बोलना आपको अकेला कर देता है. आपके पास आपके अलावा कुछ नहीं बचता है. मैं अकेला महसूस करता हूं. इस पेशे में मेरा कोई दोस्त नहीं है. जिससे भी बात करता हूं, चुप रहने की सलाह देता है. मैं चुप नहीं रह सकता.

(पुस्तक का अंश राजकमल प्रकाशन की अनुमति से प्रकाशित)

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