बीएचयू: डॉ फ़िरोज़ खान के इस्तीफे के बाद दलित प्रोफेसर से मारपीट
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बीएचयू: डॉ फ़िरोज़ खान के इस्तीफे के बाद दलित प्रोफेसर से मारपीट

नफरत के सामने बीएचयू हर रोज झुक रहा है और भारत का संविधान हर रोज हार रहा है

By शांतनु सिंह गौर

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लम्बे समय से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की संस्कृत फैकल्टी पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है. इस विभाग में फिरोज़ खान को असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद बीएचयू के छात्रों का एक गुट धरने पर बैठ गया था. 9 दिसंबर को इसी संकाय के एक दलित प्रोफेसर डॉ शांति लाल साल्वी पर कुछ अज्ञात छात्रों ने ये कहते हुए जानलेवा हमला किया कि डॉ साल्वी फिरोज़ खान का समर्थऩ कर रहे थे.

पिछले एक माह से ज्यादा समय से छात्र बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और संकाय में सभी तरह की शिक्षण गतिविधियों को बंद करके रखा था. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े इन छात्रों ने प्रो फ़िरोज़ खान को इतना डरा दिया कि आखिरकार उन्होंने संस्कृत संकाय से इस्तीफ़ा दे दिया. छात्रों के विरोध के दबाव में उन्होंने अब बीएचयू कला संकाय में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर ज्वाइन कर लिया है. फ़िरोज़ खान ने बीएचयू के तीन संकाय- संस्कृत, कला, और आयुर्वेद- में संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए आवेदन किया था और अपनी काबिलियत के दम पर तीनों में टॉप किया.

छात्रों ने संस्कृत संकाय में भाषा पढ़ाने के विषय को धर्म के साथ छेड़छाड़ का विषय बना दिया और एक मुस्लिम की नियुक्ति के खिलाफ धरने पर बैठ गए. छात्रों के इस प्रदर्शन में संत और स्वामी भी शामिल हुए और फिरोज़ खान की नियुक्ति को हिन्दू धर्म के खिलाफ साजिश बताया जबकि बीएचयू प्रशासन बार बार कह रहा था कि नियुक्ति यूजीसी नियमों के तहत हुई है.

संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में ब्राह्मणवादी और मनुवादी लोगों का कब्जा इस हद तक प्रभावशाली है कि बीएचयू प्रशासन सब कुछ करके भी उनके विरोध को खत्म करने में नाकाम रहा और अंतत: घुटने टेकते हुए फिरोज खन का इस्तीफा ले लिया. यहां मसला सिर्फ धर्म का नहीं है बल्कि लैंगिक भेदभाव और जातिगत भेदभाव का भी है.

50 के दशक में एक छात्रा कल्याणी ने बीएचयू में वेद की पढ़ाई करने के लिए आवेदन किया था. उसने प्रवेश भी ले लिया परन्तु मठाधीश प्रोफेसर और छात्रों ने विरोध में कहा-सनातन धर्म में महिलाएं वेद नहीं पढ़ सकती. अंत में छात्रा का प्रवेश रद्द कर दिया गया और दबाव में संकाय प्रमुख को भी इस्तीफ़ा देना पड़ा. संकाय में दलित-आदिवासी समुदाय के लोगों की संख्या न के बराबर है.

डॉ शांति लाल साल्वी पर हमले के पीछे चर्चा है कि संकाय के एक प्रोफेसर की कथित तौर पर भूमिका है. डॉ साल्वी ने 3 लोगों के खिलाफ नामज़द और एक अज्ञात के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323, 352, 504 और एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराया है.

प्रोफेसर साल्वी ने न्यूजलॉन्ड्री से बातचीत में कहा, “सोमवार की दोपहर करीब 12 बजे मैं संकाय में अपने कक्ष में बैठा था. तभी कुछ छात्र पहुंचे और संकाय बंद कराने की बात कहते हुए मुझे बाहर जाने के लिए कहा. फिर मेरे खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपशब्द कहने लगे. छात्रों को अनसुना कर जब मैं निकलने लगा तो कुछ छात्रों ने मारो-मारो कहकर दौड़ा लिया. एक छात्र ने पत्थर फेंककर भी हमला किया हालांकि पत्थर मुझे नहीं लगा. एक बाइक सवार से लिफ्ट लेकर किसी तरह मैं सेंट्रल आफिस पहुंचा और बीएचयू प्रशासन को घटना के बारे में सूचित किया.वीसी ने कमेटी गठित कर जांच कराने का आश्वासन दिया है.”

साल्वी आगे कहते हैं, “मैंने एफआईआर दर्ज़ करा दी है और मैं इस लड़ाई को अंत तक लड़ूंगा. मैं आठ साल से इस संकाय में हूं कभी किसी छात्र ने अभद्र बर्ताव नहीं किया लेकिन प्रोफेसर कौशलेन्द्र पांडेय ने पिछले 2 हफ़्तों में छात्रों को मेरे खिलाफ भड़काया, नफ़रत फैलाई और यहां तक झूठ बोला कि मेरी पत्नी मुसलमान है इसलिए फ़िरोज़ का समर्थन कर रहा हूं.”

बीएचयू में प्रोफेसरों का एक बहुत मजबूत धड़ा है जो कैंपस में प्रगतिशील विचारों की राह में रोड़ा है. ये लोग कैंपस को अपने निजी स्वार्थ के लिए मठ के रूप में चलाना चाहते हैं. बीएचयू परिवारवाद और जातिवाद की जीती-जागती मिसाल है, नियुक्ति से लेकर पीएचडी एडमिशन तक सब पर जुगाड़ भारी पड़ता है. कई विभागों में तीन पीढ़ियों से एक ही परिवार के लोग नियुक्ति पा रहे हैं, बीएचयू में 16 संकाय हैं जिसमे 15 के संकाय प्रमुख ब्राह्मण या क्षत्रिय हैं. इस पूरे चक्र में लॉबी बार-बार सुनिश्चित करती है कि कोई बाहरी इनके ईको-सिस्टम में न घुस पाए. पीएचडी प्रवेश में छात्र पहले जुगाड़ लगाते हैं उसके बाद फॉर्म भरते हैं. कई डिपार्टमेंट में छात्र इसलिए फॉर्म नहीं भरते क्यूंकि पीएचडी सीट पर उनके लिए कोई उम्मीद नहीं होती. दलित, आदिवासी और महिलाओं के लिए प्रवेश और मुश्किल है.

पीएचडी समिति में शामिल कई प्रोफेसर खुलेआम कहते हैं कि वो महिलाओं को रिसर्च नहीं कराते या फिर दलित-आदिवासी शोध करके क्या करेंगे. बीएचयू में दलित-आदिवासी और पिछड़े समाज के गिने चुने प्रोफेसर हैं. आरक्षित वर्ग की सैकड़ों सीटें खाली हैं क्यूंकि सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में आरक्षित समाज की सीट को “नॉट फाउंड सुइटेबल” मार्क करके खाली छोड़ दिया जाता है.

डॉ साल्वी पर हमला हो या फिर फ़िरोज़ खान का इस्तीफा हो सबमें बस एक ही बात है, नफरत के सामने बीएचयू हर रोज झुक रहा है और भारत का संविधान हर रोज हार रहा है.

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