कैंब्रिज एनालिटिका के भारतीय बोन्साई संस्करणों के बारे में क्या कहना है प्रशांत किशोर का
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कैंब्रिज एनालिटिका के भारतीय बोन्साई संस्करणों के बारे में क्या कहना है प्रशांत किशोर का

राजनीति और लोकतंत्र को गोडसे से गांधी की ओर ले जाने से पहले उसे आनलाइन डाटा का जो विषाणु दे दिया गया है उसे सुधारना होगा.

By प्रकाश के रे

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चुनावी रणनीतिकार के रूप में विभिन्न राजनीतिक दलों को सेवा दे रहे प्रशांत किशोर ने अंततः बिहार की राजनीति में प्रवेश की घोषणा कर दी है. हालांकि वे औपचारिक रूप से सितंबर, 2018 में नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हुए थे और जल्दी ही पार्टी के उपाध्यक्ष बना दिए गए थे, किंतु जदयू के नेताओं ने शायद उन्हें जमने नहीं दिया और वे पिछले साल लोकसभा चुनाव में बिहार में जदयू-भाजपा गठबंधन की बहुत बड़ी जीत के बावजूद हाशिये पर ही रहे.

यह अपने आप में एक शोध का विषय है कि केंद्रीय गृहमंत्री व पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दो बार कहने पर जदयू में शामिल कराए गए प्रशांत किशोर नीतीश कुमार से निकटता के बाद भी पार्टी में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाए. उन्हें जब नीतीश कुमार ने उपाध्यक्ष बनाया था, तब यह भी कहा जाने लगा था कि बिहार के मुख्यमंत्री ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी तय कर दिया है.

जदयू में आने से पहले 2017 में नीतीश कुमार ने किशोर को अपना सलाहकार नियुक्त कर कैबिनेट मंत्री के बराबर दर्जा दे रखा था. उस ज़िम्मेदारी का क्या हुआ, यह भी किसी को नहीं पता. यह भी दिलचस्प है कि जिन अमित शाह के कहने पर वे पार्टी में लाए गए थे, उन्हीं अमित शाह की आलोचना के लिए उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. ख़ैर, ये सब बातें लंबे समय तक अटकलों की मोहताज रहेंगी और यह भी कुछ देर बाद ही पता चल सकेगा कि प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में क्या गुल खिलाते हैं.

कैंब्रिज एनालिटिका के भारतीय बोन्साई संस्करणों के बारे में क्या कहना है प्रशांत किशोर का

फ़िलहाल प्रशांत किशोर की रणनीतियों के अतीत तथा भारत समेत दुनियाभर में तकनीक व डेटा के सहारे लोकतंत्र को संकट में धकेलने वाली भूमिका पर कुछ चर्चा करना ज़रूरी है. इस चर्चा से निकले सवालों के जवाब भी प्रशांत किशोर को देना चाहिए ताकि वे जो ‘बात बिहार की' करना चाहते हैं, उस पर लोगों का भरोसा बने.

लोकतंत्र पर कैंब्रिज एनालिटिका का ग्रहण

इसी साल पहली जनवरी को एक ट्वीटर हैंडल (हाइंडसाइटफ़ाइल्स) ने कुछ ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ों का ख़ुलासा किया, जिनमें बताया गया था कि ब्रिटिश कंपनी स्ट्रेटेजिक कम्यूनिकेशन लेबोरेटरीज़ (एससीएल) ने अनेक देशों के चुनाव में दख़ल दिया था. कुख्यात कैंब्रिज़ एनालिटिका इसी ग्रुप की सहयोगी कंपनी थी. इन दोनों कंपनियों से जुड़े कई लोगों ने एक नयी कंपनी- एमेरडेटा लिमिटेड- बनायी है, जिसने पूर्ववर्ती कंपनियों का बचा-खुचा सामान समेट लिया है. उन कंपनियों के क़ानूनी पचड़ों के ख़र्च भी अब यही कंपनी चुकाती है.

लंदन के उसी भवन में इसका भी दफ़्तर है, जहां से कभी कैंब्रिज़ एनालिटिका का कामकाज चलता था. पूर्व कर्मचारियों ने एक और कंपनी- डेटा प्रॉपरिया- भी बनायी है, जो इस साल होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में डोनल्ड ट्रंप के अभियान में सहयोग कर रही है.

एनालिटिका में अमेरिकी धनिक रॉबर्ट मर्सर का भी पैसा लगा था, जो लंबे समय से दक्षिणपंथी समूहों को वित्तीय मदद देते रहे हैं. एनालिटिका के जरिये मर्सर ने यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के अभियान- ब्रेक्ज़िट- तथा डोनल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान में मदद की थी. मर्सर ने ट्रंप अभियान के प्रमुख रहे स्टीव बैनन तथा धुर दक्षिणपंथी वेबसाइट ब्रीटबार्ट न्यूज़ में भी अपना पैसा लगाया था.

बैनन के एनालिटिका से बड़े गहरे रिश्ते रहे थे. मार्च, 2018 में यह ख़ुलासा हुआ कि एनालटिका ने अवैध रूप से फ़ेसबुक के करोड़ों लोगों के व्यक्तिगत डेटा को हासिल किया था और उसके आधार पर अभियानों की रूप-रेखा बनायी थी. इसके बाद एनालिटिका और एससीएल को अपनी दुकान बंद करनी पड़ी.

ब्रिटनी कैज़र और क्रिस्टोफ़र वायली जैसे एनालिटिका के पूर्व कर्मचारियों, कैरोल कैडवालाडर, हैन्स ग्रासेगर, मैटेथियस श्वार्टज़ जैसे पत्रकारों तथा प्रोफ़ेसर डेविड कैरोल जैसे जूझारू एकेडेमिक के कारण एनालिटिका और डेटा चोरी व उसके अवैध उपयोग का मामला सामने आ पाया.

हालांकि 2015 में ही ‘द गार्डियन’ के पत्रकार हैरी डेविस ने ख़ुलासा कर दिया था कि अमेरिकी सीनेटर टेड क़्रुज़ के अभियान के लिए एनालिटिका फ़ेसबुक से डेटा चुरा रहा था और बाद में कुछ यूरोपीय अख़बारों में ऐसी ख़बरें छपीं थी.लेकिन उस वक्त न तो एनालिटिका का कुछ हुआ और न ही फ़ेसबुक ने कोई कार्रवाई की. मार्च, 2018 के बाद ही इस मामले में कुछ कार्रवाई हो सकी.

बाद में पता चला कि एनालिटिका ने ऐमज़ॉन से भी डेटा चुराया था तथा कई देशों, ख़ासकर अफ़्रीकामें भारी शुल्क लेकर चुनावों को प्रभावित किया था. अक्सर उसकी सेवाओं का भुगतान अहम मदों से पैसे चुराकर या अन्य ग़लत तरीकों से किया गया. ब्रिटेन के चैनल 4 ने एनालिटिका के पूर्व प्रमुख समेत अनेक वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसी बातें करते हुए दिखाया था कि यह कंपनी दुनियाभर में उम्मीदवारों के लिए वोट जुटाने के लिए सेक्स वर्करों, घूस और झूठ का इस्तेमाल कर सकती है.

बहरहाल, जैसे ही यह खेल सामने आया, यह ख़बर भी आयी कि कैंब्रिज़ एनालिटिका की मुख्य कंपनी एससीएल ने भारत में काम करने के लिए ओवलेनो बिज़नेस इंटेलिजेंस के साथ साझेदारी की थी. एनालिटिका के पूर्व कर्मचारी और व्हिसल ब्लोवर क्रिस्टोफ़र वायली ने 28 मार्च, 2018 को एक ट्वीट करके एससीएल के भारत में कई सालों से काम करने की जानकारी दी थी और कुछ स्लाइड्स भी साझा किया था. इसमें कंपनी का भारत में कामकाजी पता भी शेयर किया गया था. ओवलेनो के मालिकों में से एक अमरीश त्यागी जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी के पुत्र हैं.

जब यह बात उजागर हुई थी तब केसी त्यागी ने बयान दिया था कि एनालिटिका का कोई भी कारोबारी संबंध उनकी पार्टी या उनके बेटे से नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि अमरीश त्यागी की कंपनी और एनालिटिका के बीच सिर्फ़ कामकाजी रिश्ता है और दोनों के बीच कोई वित्तीय लेन-देन नहीं है. उन्होंने यह भी साफ़ कहा था कि जदयू ने ओवलेनो या एनालिटिका से कोई भी सेवा नहीं ली है.

अब सच चाहे जो हो, इस संबंध में कुछ तथ्यों को रेखांकित करना ज़रूरी है. साल 2011 में कानपुर में एक कंपनी- एससीएल इंडिया- के नाम से पंजीकृत हुई थी, जिसके निदेशकों में अलेक्ज़ेंडर निक्स और अमरीश त्यागी भी थे. निक्स बाद में एनालिटिका के प्रमुख बने थे. इस कंपनी के एक अन्य निदेशक अवनीश राय ने कहा था कि एनालिटिका ने 2003 से 2012 के बीच किए गए उनके काम को अपना कहकर पेश करने की कोशिश की है.

यह बात ठीक हो सकती है और शायद यही स्लाइड्स में दिखता है. लेकिन इन सभी किरदारों के बीच कामकाजी और कारोबारी रिश्ता नहीं था, यह भी कह पाना मुश्किल है. तब की रिपोर्टों में ये बातें भी सामने आयी थी कि ओवलेनो ने भाजपा के पक्ष में 2014 के लोकसभा समेत अनेक चुनाव में काम किया था.

इस कंपनी के एक निदेशक हिमांशु शर्मा के लिंक्डइन प्रोफ़ाइल में भी ये दावा था और अवनीश राय ने भी यह कहा था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में जुटाए गए तथ्यों को ओवलेनो के माध्यम से भाजपा को दिया था. प्रशांत किशोर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुख्य रणनीतिकारों में से एक थे और पिछले कुछ सालों से गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और 2014 के बाद प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के नज़दीकी थे.

प्रशांत किशोर को इस प्रकरण पर से पर्दा उठाना चाहिए कि क्या उस चुनाव में या फिर 2015 के बिहार चुनाव में (तब वे नीतीश कुमार के बेहद क़रीबी व जदयू-राजद गठबंधन के प्रचार अभियान के प्रमुखों में थे) कैंब्रिज़ एनालिटिका की परोक्ष या प्रत्यक्ष कोई भूमिका थी या नहीं. कुछ अपुष्ट जानकारियों के मुताबिक बिहार चुनाव में अमरीश त्यागी ने भी योगदान दिया था. तब यह भी कहा गया था कि एलेक्ज़ेंडर निक्स ने 2017 में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं से 2019 के चुनाव की रणनीति के बारे में बात की थी.

प्रशांत किशोर कांग्रेस के साथ भी काम कर चुके हैं. वे इस पहलू पर भी रौशनी डाल सकते हैं. जिन तीन पार्टियों- भाजपा, कांग्रेस और जदयू- पर एनालिटिका की सेवाएं लेने या सेवाएं चाहने का आरोप लगा है, उनके साथ काम करने के कारण प्रशांत किशोर से बेहतर कोई और नहीं हो सकता है, जो सही जानकारी दे सके.

एबीएम: गोपनीय चुनावी प्रोपेगैंडा मशीन

साल 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की बड़ी जीत का अच्छा-ख़ासा श्रेय प्रशांत किशोर को दिया गया था. उनके द्वारा दिए गए आकर्षक नारों व तकनीक के इस्तेमाल को बहुत सराहा गया था. लेकिन प्रचार अभियान इतना भर ही तो नहीं होता. पिछले साल अप्रैल में हफ़पोस्ट के समर्थ बंसल, गोपाल साठे, रचना खैरा और अमन सेठी ने बड़ी मेहनत से एक रिपोर्ट लिखी थी, जिसमें ‘द एसोसिएशन ऑफ़ बिलियन माइंड्स’ नामक संस्था की पूरी जन्मकुंडली निकाली गई थी.

उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त, 2013 में प्रशांत किशोर ने महिला सशक्तीकरण के लिए एक संस्था बनाने की सलाह दी थी, जिसे असल में परोक्ष रूप से चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाना था तथा ऐसा इंतज़ाम करना था कि भाजपा, मोदी या किशोर से इस एनजीओ का कोई संबंध न दिखे. घोषित तौर पर इसे तेज़ाब हमले की सर्वाइवर महिलाओं के लिए काम करना था. इसका पंजीकरण प्रशांत किशोर के साथ काम करनेवाले एक कर्मचारी के परिवार की दो महिलाओं के नाम पर किया गया था. लेकिन सर्वणी फ़ाउंडेशन नामक इस संस्था का कोई ख़ास उपयोग न हो सका, पर 2015 के बाद इसे फिर से सक्रिय किया गया.

तब तक प्रशांत किशोर भाजपा से अलग हो चुके थे और नीतीश कुमार के साथजुड़ गए थे. अब सर्वणी फ़ाउंडेशन का नया नाम था- द एसोसिएशन ऑफ़ बिलियन माइंड्स. यह संस्था- एबीएम- तब से भाजपा के पक्ष में लोगों के बीच में और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन, व्हाट्सएप आदि पर झूठ फैलाने, चर्चा कराने आदि के काम में जुटी हुई है.

मार्च, 2018 में भाजपा के आइटी सेल प्रमुख अमित मालवीय से ‘इंडिया टूडे’ के एक कार्यक्रम में जब इस संस्था से भाजपा के संबंध के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था कि वे ऐसी किसी संस्था को नहीं जानते हैं. रिपोर्ट में विस्तार से एबीएम की कहानी बताते हुए कहा गया है कि एबीएम का संचालन शीर्ष स्तर से होता है. इस संस्था द्वारा चलाए जा रहे कई फ़ेसबुक पेजों में एक- नेशन विद नमो- है, जिसका इतिहास भी दिलचस्प है. हफ़पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, यह पेज सबसे पहले इंडियाकैग नाम से 11 जून, 2013 को बनाया गया था. फिर हफ़्ते भर बाद इसे बदलकर सिटिज़न फ़ॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस कर दिया गया. यह एकाउंट तब मोदी के प्रचार प्रबंधक प्रशांत किशोर के दिमाग़ की पैदाइश था. पहले वे इसे छुपाकर चला रहे थे, फिर बाद में इसे उन्होंने अपनी संस्था ही बना लिया. यह संस्था 2014 में भंग कर दी गयी, जब मोदी ने चुनाव जीत लिया. साल 2016 में जब सर्वणी फ़ाउंडेशन नये अवतार- एबीएम- के रूप में आया, तो सीएजी का फ़ेसबुक पेज भी उनके हाथ लगा. इस पेज का नाम जनवरी, 2018 में बदलकर सिटिज़ेंस फ़ॉर मोदी गवर्नमेंट कर दिया गया, फिर दो फ़रवरी को नेशन विथ मोदी किया गया. फिर 14 फ़रवरी को इसे एक बार और बदलते हुए नेशन विथ नमो कर दिया गया.

ऐसी ही कहानी ‘नमो टीवी’ की भी है. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 31 मार्च को यह चैनल सभी बड़े डीटीएच प्लेटफ़ॉर्म और केबल ऑपरेटरों के जरिये देशभर में अचानक से प्रसारित होने लगा, और मतदान ख़त्म होते ही ग़ायब हो गया था. न तो इसका कोई पंजीकरण था और न ही कोई इसका मालिक. हां, पहले दिन भाजपा ने सोशल मीडिया पर इसका ख़ूब प्रचार ज़रूर किया था. इसका नेटवर्क भाजपा के केंद्रीय दफ़्तर के नाम पर पंजीकृत ‘नमो एप’ पर भी था.

अप्रैल, 2019 में ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ के साई मनीष की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पुराने मालिकों ने साफ़ कह दिया था कि उन्हें इसके बारे में कुछ नहीं पता और उनका इस चैनल से कोई लेना-देना नहीं है. यह चैनल 2012 में अहमदाबाद के एक कारोबारी संजय शाह और एक होम्योपैथिक डॉक्टर सुजय मेहता द्वारा शुरू किया गया था और इसका पता भी उनका क्लीनिक था.

उस साल गुजरात विधानसभा चुनाव से कुछ माह पहले इसका प्रसारण शुरू हुआ था. कांग्रेस की शिकायत पर चुनाव आयोग ने इसे एक दिन के लिए रोका था, पर यह फिर शुरू हो गया था. जैसे 2019 में आयोग कुछ नहीं कर सका, वैसे ही 2012 में भी चुनाव भर चैनल चलता रहा था.

मनीष की रिपोर्ट में बताया गया है कि एक लाख रुपए की पूंजी से शुरू हुए इस नमो चैनल ने पहले ही साल साढ़े तीन करोड़ की आमदनी कमाई और लगभग 65 लाख का मुनाफ़ा कमाया था. उस विधानसभा चुनाव में भी प्रशांत किशोर मोदी अभियान के हिस्सा थे. इस चैनल के बारे में उन्हें ज़रूर पता होगा और उन्हें इसके बारे में बताना चाहिए.

लोकतंत्र की गुणवत्ता पर मीडिया के असर का अध्ययन बहुत कम हुआ है और अब सोशल मीडिया और न्यू मीडिया का ज़ोर भी बढ़ता जा रहा है. धुर दक्षिणपंथ के वैश्विक उभार और उदारवादी लोकतंत्र के संकटग्रस्त होने के इस दौर में ऐसे अध्ययनों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है.

हम फ़ेसबुक, गूगल व ट्विटर जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियों से उम्मीद नहीं रखा सकते हैं, हमें ही चौकस व जागरूक होना होगा. जिस दिन कैंब्रिज़ एनालिटिका का भांडा फूटा था, उसी दिन ‘द गार्डियन’ में जूलिया कैरी वोंग ने लिखा था कि डेटा के ऐसे उपयोग ने दुनिया को तो बदल दिया, लेकिन फ़ेसबुक नहीं बदला है और उसके प्रमुख मार्क ज़करबर्ग़ ने सुधार करने के अपने वादे को पूरा नहीं किया है.

पिछले साल जनवरी में जब जायर बोलसोनारो ब्राज़ील के राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे थे, तो उनकी समर्थक भीड़ फ़ेसबुक और व्हाट्सएप के नारे लगाकर उन्हें धन्यवाद दे रही थी. वर्ष 2018 के इटली के राष्ट्रीय चुनाव में बड़ी सफलता पाने के बाद धुर दक्षिणपंथी नेता मैतियो साल्विनी ने इंटरनेट, सोशल मीडिया और फ़ेसबुक देने के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया था.

डेटा के खेल में यह भी याद रखना होगा कि सोशल मीडिया से कहीं अधिक डेटा आधार संख्या और उससे जुड़ी सेवाओं के जरिए उपलब्ध है. उसकी सुरक्षा को लेकर कोई भी पुख़्ता दावा नहीं किया जा सकता है. आधार ऑथोरिटी के अलावा इस काम में लगे कुछ अन्य (विदेशी भी शामिल हैं) एजेंसियों के पास आधार का डेटा है. रोड पर और गली-मोहल्लों में आधार बनाते और विभिन्न कंपनियों के लिए आधार लिंक कराते ठेले-खोमचे भी डेटा से लैस हैं. हद लापरवाही की यह है कि देश के अटॉर्नी जनरल सर्वोच्च न्यायालय में कह देते हैं कि आधार कार्यालय की दीवार ऊंची और मोटी है, इसलिए डेटा को कोई ख़तरा नहीं है. डेटा का एक बड़ा अवैध बाजार विकसित हो चुका है.

जंक न्यूज़ और फ़ेक न्यूज़ का क़हर दुनिया के अन्य कई देशों की तरह भारत भी भुगत रहा है. प्रशांत किशोर की यह बात सराहनीय है कि गांधी और गोडसे कीविचारधारा एक साथ नहीं चल सकती है. पर उन्हें यह याद रखना चाहिए कि मीडिया व सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा झूठ, नफ़रत और छलावा ही गोडसे की विचारधारा को आगे ले जा रहे हैं. रवीश कुमार कहते हैं कि आइटी सेल एक मानसिकता बन चुका है. मैं कहता हूं कि इस मानसिकता के विषाणुओं के पनपने के पहले चरण की सबसे अच्छी जानकारी प्रशांत किशोर दे सकते हैं. उससे ही उपचार की राह निकलेगी.

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