संघ समर्पित कुलपति की नियुक्ति से छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार में खलबली
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संघ समर्पित कुलपति की नियुक्ति से छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार में खलबली

राज्य सरकार के सुझाव को नजरअंदाज कर राज्यपाल द्वारा बलदेव शर्मा को कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त करने से पैदा हुआ टकराव.

By बसंत कुमार

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नया कुलपति प्रोफेसर बलदेव भाई शर्मा को बनाया गया है. इसके बाद से छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार में खलबली मच गई है. यह पद पिछले साल मार्च से ही खाली था. अब राज्यपाल अनुसुइया उइके ने शर्मा की नियुक्त को हरी झंडी दे दी है.

बलदेव शर्मा भारतीय जनता पार्टी के करीबी और आरएसएस से जुड़े रहे हैं. लंबे समय तक वो आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक रहे हैं.

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की शुरुआत साल 2005 में बीजेपी की रमन सिंह सरकार ने की थी. इसी वजह से इस यूनिवर्सिटी का नाम बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे के ऊपर रखा गया.

लगातार 15 सालों तक छत्तीसगढ़ की सत्ता में बीजेपी रही. इस दौरान संघ और बीजेपी से संबद्ध लोग कुलपति बनते रहते लेकिन जब छतीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई तो कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव करते हुए नया नियम बनाया गया कि उसी शख्स को कुलपति बनाया जाएगा जिसने बतौर पत्रकार 20 सालों तक पत्रकारिता की हो.

जानकार बताते हैं कि नियम में बदलाव करने के पीछे कांग्रेस की कोशिश यह थी कि पत्रकारिता संस्थान में जो कुलपति बने वह पत्रकारिता क्षेत्र से आए.

बलदेव शर्मा पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं उन्होंने आरएसएस के पूर्व प्रमुख केएस सुदर्शन की जीवनी ‘हमारे सुदर्शन जी’ नाम से लिखी हैं जो प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी. साल 2017 में जब लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में इस किताब का लोकार्पण हुआ था तब उसमें अमित शाह, योगी आदित्यनाथ समेत कई बीजेपी के नेता मौजूद थे.

संघ समर्पित कुलपति की नियुक्ति से छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार में खलबली

शर्मा की नियुक्ति ने भूपेश बघेल सरकार को शीर्ष स्तर तक हिला दिया है. राज्य के कई अकादमिक और सियासी तबकों से ये आवाज़ उठने लगी है कि कांग्रेस के राज्य में किसी प्रगतिशील व्यक्ति की बजाय एक संघ कार्यकर्ता को कुलपति क्यों बनने दिया गया.

राज्यपाल ने राज्य सरकार के सुझाव को किया नजरअंदाज

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति राज्य सरकार के सुझाव के आधार पर राज्यपाल द्वारा की जाती है. सरकार से जुड़े लोगों का इस पर तर्क है कि राज्यपाल अनुसुइया उइके ने सरकार के सुझाव को नजरअंदाज किया. ऐसा सिर्फ कुशाभाऊ ठाकरे यूनिवर्सिटी में ही राज्यपाल ने नहीं किया बल्कि पंडित सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति में भी राज्य सरकार की सलाह को नजरअंदाज किया गया है.

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वर्तमान में छत्तीसगढ़ सरकार की कुलपति नियुक्त करने की जो प्रक्रिया है उसके अनुसार कुलपति की नियुक्ति उपधारा (2) या उपधारा (6) के अधीन गठित समिति द्वारा सिफारिश किए गए पत्रकारिता से जुड़े, कम से कम तीन व्यक्तियों में से कुलाधिपति (राज्यपाल) ‘under the doctrine of pleasure’ यानी 'प्रसाद के सिद्धांत' के तहत करेंगे. इस मामले में राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार से सुझाव तो लिया गया लेकिन उसे लागू नहीं किया और अपने मनपसंद के व्यक्ति (बलदेव शर्मा) को कुलपति नियुक्त कर दिया गया.

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भले ही यूनिवर्सिटी में कुलपति की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल के पास है, लेकिन यह नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति के आधार पर ही की जा सकती है. जानकर बताते हैं कि अगर राज्य सरकार किसी नाम पर सहमत नहीं है तो कायदा यह कहता है कि राज्यपाल द्वारा किसी के नाम की घोषणा करने से पहले राज्य सरकार की सहमति की प्रक्रिया पूरी कर ली जाय. इस मामले में राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया.

समिति ने पांच नाम दिए थे

कुलपति के चयन के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति का गठन किया गया था. इस समिति में केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के कुलपति कुलदीप चंद अग्निहोत्री थे. अग्निहोत्री यूजीसी के प्रतिनिधि के रूप में इससे जुड़े थे. इसके अलावा राज्य सरकार की तरफ से पूर्व अधिकारी डॉक्टर के सुब्रमण्यम और वरिष्ठ पत्रकार और हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी थे. इस समिति ने कुलपति के सामने पांच नामों की सूची भेजी थी.

छत्तीसगढ़ सरकार से जुड़े एक सूत्र ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि समिति में शामिल कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने बलदेव भाई शर्मा का नाम सुझाया था. दिलचस्प जानकारी यह है कि अब तक बलदेव शर्मा अग्निहोत्री के मातहत ही हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे.

अग्निहोत्री भी आरएसएस और बीजेपी के करीबी रहे हैं. इसकी तस्दीक पिछले साल प्रकाशित उनकी किताब 'भारतबोध का संघर्ष, 2019 का महासमर' से किया जा सकता है. जागरण की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुणगान में लिखी गई पुस्तक में कांग्रेस को भला-बुरा भी कहा गया है.

पिछले साल लोकसभा चुनाव के बीच इस किताब का विमोचन धर्मशाला पुस्तक मेले में किया गया तो चुनाव आयोग ने इसे आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए जांच का आदेश दिया था.

बघेल सरकार का क्या है रुख

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी एक नेता बताते हैं, ‘‘इस नियुक्ति के बारे में मुख्यमंत्री को भी जानकारी नहीं थी. राज्यपाल ने अपनी मर्जी से बलदेव शर्मा को नियुक्त किया है. भूपेश बघेल नहीं चाहते थे कि ऐसा कोई शख्स कुलपति बने.’’

मुख्यमंत्री कार्यलय से जुड़े एक सीनियर अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘‘भूपेश बघेल सरकार ने कुलपति के रूप में बलदेव भाई शर्मा की जगह एक अन्य सीनियर पत्रकार के नाम का सुझाव दिया था लेकिन राज्यपाल ने नियमों की मनमुताबिक व्याख्या करते हुए अपने करीबी शर्मा को कुलपति नियुक्त कर दिया.’’

इस पूरे विवाद पर छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बयान जारी किया है कि कानून बना हुआ है कि राज्य सरकार की सहमति से राज्यपाल कुलपति की नियुक्ति करेंगे. हमारी सहमति इस नाम पर नहीं थी. उन्होंने (राज्यपाल) एकतरफा नियुक्ति की है. उनका जो अधिकार है उन्होंने वो किया है और अब जो हमारे अधिकार में होगा हम करेंगे.

अब सरकार क्या कर सकती है?

अब जब राज्यपाल ने बलदेव शर्मा की नियुक्ति कर दी है, उसके बाद सरकार के पास क्या विकल्प बचते हैं? इस सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़े एक करीबी अधिकारी न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘अभी जो कानून है उसके अनुसार कुलपति की नियुक्ति राज्यपाल ही करते हैं, लेकिन सरकार की सलाह और सहमति से. अब जो राज्यपाल ने किया है उसके बाद मुख्यमंत्री विधानसभा में कानून में बदलाव का प्रस्ताव ला सकते हैं."

वो आगे बताते हैं कि इस समय विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है. संभव है कि कानून बदलाव करके उसे फिर से राज्यपाल के पास संस्तुति के लिए भेजा जाए. राज्यपाल दूसरी बार विधानसभा द्वारा भेजे गए किसी प्रस्ताव को नामंजूर या वापस नहीं भेज सकते हैं.

बलदेव शर्मा की नियुक्ति ने एक तरफ राज्यपाल अनुसुइया उइके द्वारा चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण की नुमाइश की है वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए एक राजनीतिक शर्मिंदगी की स्थिति पैदा कर दी है.

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