मजदूरों की घर वापसी से बिहार में शुरू हो सकता है ज़मीन का ख़ूनी संघर्ष

बिहार में बड़ी संख्या में वापस लौट रहे भूमिहीन मजदूरों के चलते एक बार फिर से ज़मीन का मुद्दा विवाद के केंद्र में आ सकता है.

मजदूरों की घर वापसी से बिहार में शुरू हो सकता है ज़मीन का ख़ूनी संघर्ष
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जून 2019 की एक दोपहर बिहार के बांका जिले के चांदपुर गांव की रहने वाली 25 वर्षीय पूनम दिल्ली के प्रेस क्लब में अपनी दो साल की बेटी को लेकर खड़ी थीं. बेटी के शरीर पर कई दाग निकले हुए थे. उस दिन बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने वाले एक स्वयंसेवी संगठन की प्रेस कांफ्रेंस थी. पूनम खुद एक बंधुआ मजदूर थी, लेकिन मजदूरों को वहां से निकालने में उनकी बड़ी भूमिका रही थी. जब पूनम बोलने के लिए खड़ी हुई तो बहुत बोल नहीं पाई. वो धीरे-धीरे बोल रही थीं जो साफ़ सुनाई नहीं दे रहा था.

बिहार के बांका और शेखपुरा जिले के रहने वाले 22 परिवारों के 80 बंधुआ मज़दूरों को हरियाणा के कुरुक्षेत्र से मुक्त कराया गया था. ये सभी महादलित समुदाय से थे.

प्रेस कांफ्रेंस के बाद न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए पूनम ने कहा था, ‘‘वहां खाने के बदले मार मिलता था. हरी सब्जी तो खाए कई महीने हो गए, मांस-मछली तो छोड़ ही दीजिए. रात-दिन काम कराते थे. बच्चा होने के दो-तीन दिन बाद काम पर लगा देते थे. जैसे-तैसे हम वहां से निकले. अगर नहीं निकलते तो हम में से कईयों की लाश आती वहां से.’’

पूनम को उसी शाम उनके घर भेजा जा रहा था. बातचीत में पूनम ने कहा, ‘‘बिहार जा तो रहे हैं लेकिन खायेंगे क्या? भट्टा मालिक के यहां जो काम किए थे उसका हिसाब नहीं हुआ. सरकार की तरफ से मुआवजा कब तक मिलेगा पता नहीं. गांव में तो रहने भर की जमीन भी नहीं है. तालाब के किनारे झुग्गी डालकर रहते हैं. वहीं पैदा हुए. अपना घर नहीं है. इसीलिए तो हम बाहर ही रहते हैं ज्यादातर समय.’’

अपनी बेटी के साथ पूनम

अपनी बेटी के साथ पूनम

तब लॉकडाउन नहीं था, कोरोना का प्रकोप नहीं था, चीजें आज की तुलना में बेहतर थीं, लेकिन ये लोग अपने घर जाने से कतरा रहे थे. इन्हें डर था कि बिहार में इनको भुखमरी का शिकार होना पड़ सकता है. इनके पास राशन कार्ड तक नहीं था. लेकिन आज बिहार समेत दुनिया भर में कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए लगे लॉकडाउन की वजह से पूरी अर्थव्यवस्था बेपटरी हो गई है. भारत में लॉकडाउन के दो महीने बाद भी पैदल अपने घरों को लौटने का सिलसिला जारी है. इस दौरान कई लोगों की मौत तक हो गई. फिर भी लोग लौट रहे हैं.

बिहार की एक बड़ी आबादी भूमिहीन है. बड़ी आबादी है जिसके पास घर के अलावा ज़मीन नहीं है तो बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास घर के लिए भी जमीन नहीं है. ऐसे तमाम परिवारों के लोग दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में मजदूरी आदि कर रहे थे. लेकिन लॉकडाउन में सब ठप पड़ गया तो सब वापस लौट रहे हैं. इससे जमीन एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.

बिहार में जहां सरकार को अनुमान है कि करीब 30 लाख तक प्रवासी अपने घर को लौट रहे हैं, लेकिन भाकपा माले के वरिष्ट नेता धीरेंद्र झा का मानना है की यह संख्या एक करोड़ के आस-पास है. एन सिन्हा सामाजिक संस्थान के प्रोफेसर डीएम दिवाकर भी धीरेंद्र झा से सहमति जताते हुए कहते हैं कि बिहार सरकार खुद वापस आए लोगों की संख्या 29-30 लाख मान रही है. मेरा मानना है कि कामगारों और उनके परिजनों की संख्या एक करोड़ के करीब है.

वापस आए लोगों की पूरी संख्या कितनी है, इसका कोई ठीक-ठीक अनुमान तो नहीं है, लेकिन जिस तरह से मजदूर वापस लौट रहे हैं, उसके बाद कई तरह के विवाद पैदा होने की आशंका है. अगर बात बिहार की करें तो ज़मीन एक बड़ी समस्या है. इसके पीछे बिहार की बड़ी आबादी का भूमिहीन होना है.

बिहार में भूमिहीनों की बड़ी संख्या

पटना स्थिति टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के प्रमुख पुष्पेन्द्र की माने तो एक समय में बिहार में 42 प्रतिशत घर वाले (जिनके पास अपना घर था) भूमिहीन थे. इस संख्या में इजाफा ही हुआ होगा, कमी तो नहीं आई होगी.

तहलका के दिसम्बर 2014 अंक में छपे लेख के अनुसार बिहार में छह लाख लोगों के पास घर बनाने के लिए भी जमीन नहीं थी. यहां 17 लाख लोग भूमिहीन थे.

साल 2008 में बंदोपाध्याय की अध्यक्षता वाली आयोग ने बिहार में भूमिहीनों की भायवह तस्वीर सामने रखी थी. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि बिहार में 67 प्रतिशत ग्रामीण साल 1993-1994 में भूमिहीन या भूमिहीनता के करीब थे. यह साल 1999-2000 में बढ़कर 75 प्रतिशत तक हो गया था.

बिहार में रोजगार के अवसर बेहद कम होने के कारण ज्यादातर भूमिहीन लोग बटाई में खेत लेकर खेती करते हैं या शहर की तरफ पलायन कर जाते हैं.

13 मई को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपने घर सीतामढ़ी जाने के लिए पहुंचे संतोष कुमार ऐसे ही लोगों में से एक हैं. तीन भाइयों में दूसरे नम्बर वाले संतोष के पिताजी के पास कुल मिलकार छह कठ्ठा जमीन है. दिल्ली के अलग-अलग सप्ताहिक मार्केट में चप्पल बेचने वाले संतोष कहते हैं, ‘‘दो भाइयों की शादी हो गई है. तीसरी की भी उम्र हो गई है, लेकिन इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि उसकी पत्नी को रखने के लिए कमरा नहीं है. सोचे थे कि इस बार कमाकर बना लेंगे लेकिन लॉकडाउन ने सब बर्बाद कर दिया. जो कुछ बचा था वो खत्म हो गया है. अब यहां मरने के लिए तो रह नहीं सकते हैं. गांव जा रहे हैं.’’

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर घर जाने के लिए खड़े लोग

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर घर जाने के लिए खड़े लोग

गांव में कैसे गुजर बसर करेंगे, इस सवाल के जवाब में संतोष कहते हैं, ‘‘खेत नहीं है. दूसरों के खेतों में मजदूरी कर लेंगे. बिना कमाए खायेंगे कैसे. जैसे हालात ठीक हुआ वापस लौट आएंगे. शहर लौटे बिना हमारा काम नहीं चल सकता है.’’

एकतरफ जहां भूख से मौत के डर के चलते शहर से गांवों की तरफ जैसे तैसे भाग रहे मजदूर कहते हैं कि वे कभी वापस नहीं आएंगे, लेकिन संतोष कहते हैं कि हालात बेहतर होने पर वे वापस लौट आएंगे.

बीते दिनों इलाहाबाद से अपने घर वैशाली लौटने के दौरान रास्ते में ही विलास महतों की मौत हो गई. उनकी पत्नी मंजू देवी न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए बताती है, ‘‘उनकी कमाई ही सहारा था. तीन बेटे और दो बेटियां हैं. हमारे पास खेत है नहीं की जोत कर खा लेंगे. अब मेरे बेटे को भी मेहनत-मजूरी करनी होगी. ठेकेदार हो या सरकार हमें किसी ने कोई आर्थिक मदद नहीं दिया.’’

बंदोपाध्याय कमेटी सालों से अधर में

कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने 24 मार्च से देशभर में लॉकडाउन की घोषणा की, जो बढ़ते-बढ़ते 31 मई तक आ गई है. जिस तरह कोरोना के मामले देश भर में बढ़ रहे हैं वैसे में लॉकडाउन में छूट कब तक मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है.

लॉकडाउन की शुरुआत से ही मजदूरों का पलायन जारी हो गया. 3 मई तक लगातार मजदूर पैदल हजारों किलोमीटर का सफर करके अपने घर जाते रहे. इस दौरान कई लोगों की मौत भी हुई. 3 मई से केंद्र सरकार ने श्रमिक एक्सप्रेस चलाने की घोषणा की जिसके बाद मजदूरों का अपने घरों की तरफ ट्रेन से जाना जारी रहा. ट्रेन चलने के बावजूद मजदूरों का पैदल घरों की तरफ वापस लौटना जारी है.

बिहार सरकार नहीं चाहती थी कि मजदूर घर आएं लेकिन उनका पैदल जाना जारी रहा. जब दबाव बढ़ा तो ट्रेन के जरिए सरकार अपने मजदूरों को बुलाने को राजी हुई. अब लगातार मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं ऐसे में कुछ लोगों को अंदेशा है की यहां जमीन को लेकर नई उथल पुथल न शुरू हो जाए. जमीन को लेकर बिहार कई हिंसक, खूनी आंदोलन हो चुके है, लेकिन अभी अगर यह संकट गहराता है तो राज्य सरकार के लिए बड़ी परेशानी होगी.

पैदल अपने घरों को जाते मजदूर

पैदल अपने घरों को जाते मजदूर

अगर ऐसी स्थिति बनती है तो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बिहार सरकार ही होगी.

सालों के संघर्ष के बाद नीतीश कुमार जब 2005 में सत्ता में आए तो उन्होंने कई ऐसे काम किए जिससे लोगों को उम्मीद बंधी की बिहार बदलाव की राह पर है. इन्हीं कामों में से एक था, साल 2006 में बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन करना, जिसका मकसद भूमि सुधार था. इस आयोग ने दो साल की मेहनत के बाद साल 2008 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी, लेकिन तब से उसपर कोई काम नहीं हुआ. काम नहीं हुआ कहने से बेहतर होगा कि इसपर काम नहीं करने दिया गया.

इस आयोग ने भूमिहीनों की संख्या बताने के अलावा अपनी रिपोर्ट में कुछ सिफारिशें भी की हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है कि सरकार की जमीन को भूमिहीनों में बांटा जाए. रिपोर्ट के अनुसार यह जमीन 18 लाख एकड़ है. जो सरकार के पास, भूदान समिति के पास है या उस पर लोगों का जबरदस्ती कब्जा है. इस जमीन को भूमिहीनों में बांटा जाए.

बंदोपाध्याय कमेटी के साथ भी ऐसा ही हुआ. आज रिपोर्ट जमा हुए बारह साल हो गए, इस दौरान सरकार एक बार कुछ दिनों के लिए बदली जरुर लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे फिर भी इस पर कोई काम नहीं हुआ है.

इसके कारणों का जिक्र करते हुए, धीरेन्द्र झा कहते हैं, ‘‘नीतीश जी ने अपने पहले कार्यकाल में सक्रियता दिखाते हुए भूमि सुधार की जमकर बात की. उन्होंने बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया लेकिन बाद में इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. दरअसल ये रिपोर्ट आने के साथ ही जमींदार, दबंग और भू-माफियाओं ने एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाया और नीतीश कुमार ने श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में एक कार्यक्रम में बयान दिया कि हम वादा करते हैं कि इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है.’’

धीरेन्द्र झा कहते हैं कि बिहार में भूमिहीनों में जमीन का बंटवारा करना बड़ा टेढ़ा काम रहा है. जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे तो वे एक किताब के विमोचन में पहुंचे थे. वहां उनसे भूमि सुधार की तरफ काम करने के लिए कहा गया तो उन्होंने साफ कहा कि ‘बिरनी के खोता में’ मैं हाथ नहीं डालूंगा.

धीरेन्द्र झा आगे कहते हैं, “अब उल्टा हो रहा है. जो नीतीश कुमार भूमि सुधार कर भूमिहीनों को जमीन देने की बात कर रहे थे उनके ही शासन में अब बड़े स्तर पर जमीनों पर से बेदखली चल रही है. बिहार में कई बड़े भूमि आंदोलन हुए. इस दौरान कई जगहों पर भूमिहीनों ने जमींदारों की जमीनों पर कब्जा किया. उसपर सालों से वे खेती करते आ रहे थे, लेकिन उनके पास इस जमीन का कोई कागज तो है नहीं ऐसे में चम्पारण, गया, दरभंगा, पूर्णिया और मधुबनी जैसे जिलों में बड़े स्तर पर जमीनें छीनी जा रही है. जो पहले भूमिहीन थे उन्हें फिर से दोबारा भूमिहीन किया जा रहा है.’’

नीतीश कुमार ने जताया था अफ़सोस

बिहार में पिछले पन्द्रह साल से सत्ता की चाभी अपने हाथ में लेकर चल रहे नीतीश कुमार ने भूमि सुधार करके भूमिहीनों को जमीन देकर उनकी स्थिति बेहतर करने के लिए बंदोपाध्याय कमेटी का गठन तो कर दिया लेकिन उस पर अमल नहीं कर पाए. आगे चलकर उन्हें कमेटी बनाने पर ही अफ़सोस हुआ.

इस बारे में एन सिन्हा सामाजिक संस्थान के प्रोफेसर डीएम दिवाकर बताते हैं, ‘‘पटना में ही एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने साफ़-साफ शब्दों में बोला था कि उनसे दो बड़ी गलती हुई है, पहली बंदोपाध्याय कमेटी का गठन और दूसरा कॉमन स्कूल सिस्टम को लागू करने के लिए मुकुंद दुबे कमेटी बनाना. यह बात उन्होंने जनता के सामने कही थी.’’

डीएम दिवाकर आगे कहते हैं, ‘‘जमीन के मामले पर सिर्फ नीतीश कुमार ही नहीं पीछे हटे बल्कि लालू प्रसाद यादव और उससे पहले कर्पूरी ठाकुर भी इस मामले पर चुप ही रहे. कुछ किया नहीं. क्योंकि गठबंधन की सरकार की अपनी एक मज़बूरी होती है. किसी भी राजनीतिक दल को पॉवर में बने रहना पहली प्राथमिकता होती है. वो क्रांति करके लौटने के लिए सत्ता में नहीं आता है.’’

सुशील मोदी और नीतीश कुमार

सुशील मोदी और नीतीश कुमार

एक तरफ जहां भूमिहीनों और भूमि सुधार के लिए लड़ाई लड़ने वालों को उम्मीद थी कि इस आयोग के गठन से स्थिति बेहतर होगी लेकिन दिवाकर को इससे बनने के समय से ही कोई उम्मीद नहीं थी. वे कहते हैं, ‘‘मुझे तो शुरू से ही इस कमेटी से कोई उम्मीद नहीं थी, न जाने क्यों लोगों ने उम्मीद पाल लिया था. मैंने कमेटी के गठन के समय ही कहा था कि इससे कुछ होगा नहीं क्योंकि ये जो सरकार है वो सामंतों की सरकार है. मजदूरों की या मजदूर आंदोलन से निकली हुई सरकार तो है नहीं. ऐसे में कमेटी भले ही बना ले, लेकिन इसे ये लागू नहीं कर पाएंगे. हुआ वही. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी लेकिन सामंतो ने इसे लागू ही नहीं होने दिया.’’

क्या बिहार में ज़मीन को लेकर फिर होगा हंगामा

राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं होने के कारण लाखों भूमिहीनों को ज़मीन नसीब नहीं हुआ और वे रोजगार की तलाश में दर-ब-दर भटकते रहे. अब भी बिहार में ऐसे-ऐसे लोग हैं जो गांव के किसी सामंत के रहमो-करम पर रह रहे हैं. उनकी गुलामी करते हैं. उनके खेतों में मजदूरी करते हैं. उनसे मार खाते हैं. वहीं बहुत सारे लोग शहरों की तरफ आ गए, लेकिन अब जब वे अपने घर लौट रहे हैं तो क्या बिहार में एक नया विवाद शुरू होने वाला है.

यह आशंका इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि पूर्व में बिहार में कई बड़े भूमि आंदोलन हो चुके है. 1930 से ही बिहार में भूमि को लेकर हिंसक संघर्षों का इतिहास रहा है जो 1990 के दशक में अपने सबसे विकृत रूप में पहुंच गया था. पहले सरदानंद सरस्वती के नेतृत्व में यह चला, उसके बाद सीपीआई के नेतृत्व में और आखिरी में भाकपा माले के नेतृत्व में. इस दौरान कई बार आंदोलन हिंसक भी हुआ जिसमें लोगों की जान भी गई. इन आंदोलनों का सरकार पर भी असर हुआ और उसने भी कुछ जमीन भूमिहीनों के बीच बांटा. लेकिन 1990 के बाद इसमें कमी आई जिसका कारण था बिहार में लेफ्ट का कमजोर होना और दूसरी तरफ युवाओं का देश के दूसरे हिस्सों में पलायन.

मजदूरों की वापसी के बाद क्या भूमि को लेकर धीरेन्द्र झा कहते हैं, ‘‘मुझे तो लग रहा है कि बिहार में जमीन का मामला बढ़ेगा. रहने के लिए और खेती के लिए दोनों तरह के जमीन को लेकर संघर्ष तेज होगा. जिस तरह से मजदूर प्रताड़ित होकर आ रहे हैं. वे कह रहे हैं कि यह शहर हमारा नहीं है, शहर ने हमारे साथ धोखा किया है, सरकारों ने धोखा दिया है. यातना झेलकर मजदूरों गांव लौट रहे हैं. पहले हुआ ये था की गांव में सिर्फ बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह गए थे यानी नौजवान पीढ़ी नहीं थी. अब जब ये वापस आ रहे हैं तो जो जमीन का संघर्ष था वो बढ़ेगा.’’

डीएम दिवाकर जमीन को लेकर किसी भी तरह के संघर्ष होने की स्थिति से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘बिहार में जो मजदूरों बाहर गए थे आज जब वे वापस आ रहे है तो वे सिर्फ भूमिहीन होकर नहीं लौट रहे बल्कि उनके पास आज हुनर है. भले ही आज भूमि उनके पास नहीं है लेकिन हुनर उनके पास है. हम लोगों के आवाज़ उठाने के बाद नीतीश सरकार ने उनपर काम करना शुरू कर दिया है. इसके अंतर्गत की जो प्रवासी वापस लौट रहे हैं और जब उनका कोरोना को लेकर डिटेल लिखा जा रहा है तो उसके साथ ही उनका हुनर भी लिखा जा रहा है. जिसमें हुनर के साथ-साथ उनसे पूछा जा रहा है कि आप यहां क्या करना चाहेंगे. इसे करने में क्या परेशानी आएगी. आपको क्या मदद चाहिए. इससे मजदूरों को दो-तीन महीने बाद कुछ काम सरकार दे सकती है. बिहार में स्किल मजदूरों की संख्या बेहद कम है. इससे काम का अवसर मिलेगा.’’

राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज झा भी ज़मीन के संघर्ष से इनकार नहीं करते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए झा कहते हैं, ‘‘मैं ऐसे हजारों मजदूरों और कामगारों को जानता हूं जो बिहार में मरना पसंद करेंगे लेकिन कभी शहर वापस नहीं लौटने की बात कर रहे हैं. ऐसे में किसी संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. सरकार को एक्टिव और संवेदनशील होकर काम करने की ज़रूरत है. वो बंदोपाध्याय कमेटी की सिफारिशों की तरफ दोबारा लौटें. बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद यहां रोजगार की संभावना खत्म हो गई. ऐसे में जब आज हमारे लाखों मजदूर वापस लौट रहे हैं तो सरकार सक्रियता से रोजगार के इंतजाम करें. ऐसा करके वो एक त्रासदी को मौके में बदल सकती है.’’

पुष्पेन्द्र, मनोज झा से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ‘‘जमीन को लेकर बड़े स्तर पर कोई विवाद होने की संभावना नहीं हैं. ज्यादातर लोगों को काम करने की आदत लग गई है. लोगों को पता है की अब इसकी सीमाएं हैं. भाकपा (माले) या दूसरे लोग भी अब जमीन की लड़ाई को इस स्तर पर नहीं लड़ रहे हैं जैसा 80 के दशक में था. उनके भी एजेंडा में बदलाव आया है. ज़मीन को कब्जे में रखने की कोशिश अब ज्यादा मजबूत हो गई है. उस स्तर पर भूमि आंदोलन की अब संभावना नहीं है. अब बिना स्टेट की मदद के जमीन आंदोलन करना मुश्किल है. उसकी ना इच्छा है.’’

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