इंडिया टुडे सर्वे: नेशन का मूड सर्वे में कुछ, ट्विटर पर कुछ और मेल टुडे में कुछ और

जिस समय में 'मेल टुडे' कोविड के चलते बंद हो रहा है, उसी समय में इंडिया टुडे का सर्वे अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश कर रहा है.

इंडिया टुडे सर्वे: नेशन का मूड सर्वे में कुछ, ट्विटर पर कुछ और मेल टुडे में कुछ और

सर्वे अमूमन सरकारों के कामकाज और तौर-तरीकों पर जनता की राय जाहिर करते हैं, लेकिन इंडिया टुडे का हालिया सर्वे सरकार के तौर-तरीकों के बजाय अपने सर्वे में पूछे गए सवालों और उसके जवाबों के फेर में घिर गया.

हाल ही में इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट ने “मूड ऑफ दनेशन 2020” (एमओटीएन) सर्वे जारी किया जिसके नतीजों पर अब सवाल उठ रहे हैं. इस सर्वे में देश की अर्थव्यवस्था और कोविड से निपटने के तरीकों की तारीफ की गई है. इस सर्वे की कलई इंडिया टुडे ग्रुप के ही ट्विटर पेज पर हुए एक पोल ने खोल दी.

इंडिया टुडे के मूड ऑफ द नेशन सर्वे के मुताबिक, इस सवाल के जवाब में कि “कोविड-19 से निपटने को लेकर पीएम मोदी के प्रदर्शन को आप कैसा मानते हैं” 12,021 लोगों पर किए गए सर्वे में 77 प्रतिशत लोगों ने मोदी के प्रदर्शन को “अच्छा” कहा. लेकिन जब इंडिया टुडे ग्रुप के हिंदी चैनल “आज तक” ने यही सवाल अपने ट्विटर अकाउंट से पोल कराया तो आश्चर्यजनक रूप से सिर्फ 20 प्रतिशत लोगों ने मोदी का कामकाज को संतोषजनक माना. इस ट्विटर पोल में 35,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था. यानि इंडिया टुके के सर्वे वाले सैंपल साइज़ से कई गुना बड़ा इस ट्विटर सर्वे का सैंपल साइज़ रहा.

अगर “खराब” प्रदर्शन की बात की जाए तो इंडिया टुडे के सर्वे के मुताबिक मोदी के कामकाज सिर्फ 5 प्रतिशत लोगों ने खराब कहा था, लेकिन उसके ट्विटर पोल में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत तक जा पहुंचा.

सर्वे को देश में कोरोना की वर्तमान परिस्थितियों और आंकड़ो के हिसाब से परख कर देखें तो भी इस सर्वे के नतीजों पर संदेह पैदा होता है. पूरी दुनिया में भारत कोरोना संक्रमण के मामले में अमेरिका और ब्राजील के बाद तीसरे पायदान पर है. साथ ही भारत, ब्राजील, रूस और पेरू जैसे उन देशों में शामिल है जहां, मरने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में कोविड संक्रमित लोगों का आंकड़ा रफ्तार से बढ़ते हुए 23 लाख को पार कर गई है. इन परिस्थितियों में इंडिया टुडे सर्वे के ये रिजल्ट वाकई हैरान करने वाले हैं. हर रोज 60,000 से अधिक केस देश में सामने आ रहे हैं जो देश ही नहीं दुनिया भर में एक रिकॉर्ड है.

सर्वे के तौर-तरीकों की बात करें तो इंडिया टुडे हर 6 महीने में इस तरह का सर्वे देशभर में कराता है जिसमें अलग-अलग राज्यों के लोगों से बातचीत कर देश के अलग-अलग विषयों पर उनकी राय ली जाती है. जैसे- अगर आज चुनाव हो जाए तो कौन सी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलेगी, किसकी सरकार बनेगी, प्रधानमंत्री बनने के लिए कौन सा नेता लोकप्रिय है, कौन मुख्यमंत्री देशभर में चर्चित है और भी इसी तरह के सवाल इस सर्वे में पूछे जाते हैं.

इंडिया टूडे “मूड ऑफ द नेशन” सर्वे पिछले कई सालों से अलग-अलग पोलिंग एजेंसियों के साथ करता रहा है. पहले यह सर्वे “एक्सिस माय इंडिया” नाम की एजेंसी करती थी. लेकिन इस बार यह “कार्वी इनसाइट” एजेंसी के साथ मिलकर किया गया है. इससे पहले भी कार्वी, इंडिया टुडे के साथ मिलकर ओपिनियन पोल, एक्जिट पोल और 2016 से लेकर अभी तक मूड ऑफ द नेशन सर्वे कर चुकी है.

वर्तमान ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे की बात करें तो यह सर्वे 15 जुलाई से 27 जुलाई के बीच किया गया. साथ ही इस बार यह सर्वे फेस टू फेस न कराकर फोन से किया गया है. जिसका कारण कोविड महामारी को बताया गया है.

इंडिया टुडे के मुताबिक, सर्वे 19 राज्यों की 97 लोकसभा और 194 विधानसभाओं में किया गया जिसमें कुल 12,021 लोगों ने भाग लिया. इसमें भाग लेने वालों में 67 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्र और 33 प्रतिशत शहरी क्षेत्र से थे. जिनकी फोन पर दी गई राय के आधार पर यह नतीजे आए.

वेबसाइट पर दी गई मेथडोलॉजी के मुताबिक सर्वे में4 8 प्रतिशत महिला और 52 फीसदी पुरूषों ने भाग लिया. तो वहीं 86 प्रतिशत हिंदू और 9 प्रतिशत मुस्लिम थे, जिनमें 30 प्रतिशत जनरल, 44 प्रतिशत मुस्लिम-ओबीसी और 25 प्रतिशत एससी-एसटी वर्ग से थे.

इस सर्वे के नतीजों में कोविड से निपटने की सरकार की तैयारी के अलावा, सर्वे का एक अन्य सवाल, अर्थव्यवस्था को लेकर पूछा गया था जो चर्चा में रहा, जिस पर सवाल उठाए गए. जिसके नतीजे पर हैरानी के साथ ही सवाल खड़े हो रहे हैं.

सर्वे में लोगों से पूछा गया था कि “मोदी सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था संभालने के तौर तरीके को आप किस तरह से देखते हैं.” सर्वे के मुताबिक 72 प्रतिशत लोगों ने मोदी के तौर-तरीकों का समर्थन किया. सिर्फ 6 प्रतिशत लोगों ने माना कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकाम रही है.

इस रिजल्ट पर काफी सवाल उठे. इंडिया टुडे के ही कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने अपने शो में कहा था कि 72 प्रतिशत लोग प्रधानमंत्री के अर्थव्यवस्था को संभालने के तरीके से खुश हैं, वर्तमान में यह काफी चौंकाने वाले नतीजे हैं.

इस सर्वे पर वरिष्ठ पत्रकार और “द प्रिंट” के एडिटर इन चीफ शेखर गुप्ता ने भी अपने शो ‘कट द क्लटर’ शो में सवाल उठाए. शेखर कहते हैं, “78 प्रतिशत लोगों द्वारा खुश होना, कहीं ना कहीं मोदी सरकार के प्रति भक्ति दिखाता है. इस दौरान वह भक्ति को ब्राजील, तुर्की, अमेरिका से जोड़ हुए कहते हैं कि कैसे इन देशों में भक्ति ने सरकार की सभी नाकामियों पर पर्दा डाल दिया है.”

आंकड़ों में देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमराई हुई है. करोड़ों लोगों की नौकरियां कोरोना की वजह से जा चुकी हैं.रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी स्वीकार करते हुए कहा था कि कोरोना का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर हुआ है. इसके चलते साल की पहली छमाही में जीडीपी विकास दर निगेटिव जोन में रहने के आसार हैंइसके अलावा आईएमएफ भी देश की जीडीपी में 4.5 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जाहिर किया है.

कोविड से पैदा हुए संकट का शिकार खुद इंडिया टुडे ग्रुप भी है. हाल ही में ग्रुप ने 13 साल बाद अपने टैबलॉयड अखबार मेल टुडे के प्रिटं संस्करण को बंद करने का ऐलान किया है. कंपनी ने अपने पाठकों को लिखे पत्र में इसका कारण कोरोना के चलते पतली हुई अर्थव्यवस्था की हालत को बताया है.

मेल टूडे का पत्र.

मेल टूडे का पत्र.

इस तथ्य के मद्देनजर इंडिया टुडे समूह द्वारा कराए गए सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले हैं.

कार्वी का ट्रैक रिकार्ड

‘कार्वी इनसाइट’ कार्वी ग्रुप की एक सहायक कंपनी है. कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, यह मार्केट रिसर्च और डाटा कलेक्शन का काम करती है और समय-समय पर अलग-अलग चैनलों के साथ मिलकर ओपिनियन पोल, प्री पोल और एक्जिट पोल करती है. इससे पहले कंपनी ने 2019 में आउटलुक मैगज़ीन के साथ मिलकर भी एक सर्वे किया था. और साल 2019 में लोकसभा चुनावों के समय भी इंडिया टूडे के साथ मिलकर मूूड ऑफ द नेशन पोल किया था, जो पूरी तरह सही साबित नहीं हो पाया था.

साथ ही 2018 कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कंपनी ने सर्वे किया था. इसमें उन्होंने ओपिनियन पोल में त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की थी जो एकदम सटीक तो नहीं लेकिन सही साबित हुई थी. क्योंकि रिजल्ट में ज्यादा अंतर नहीं था.

सर्वे की पारदर्शिता, सैंपलिंग मेथड सहित अन्य विषयों पर न्यूज़लॉन्ड्री ने कार्वी इनसाइट के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट देवाशीष चटर्जी से विस्तार से बातचीत की.

देवाशीष बताते हैं, “इस सर्वे में रैन्डम सैंपलिंग मैथड इस्तेमाल किया गया है. रैन्डम कलेक्ट किए गए नंबर पर टेलीफोन कॉल्स के जरिए यह डाटा एकत्र किया गया है. जैसा अमूमन फेस टू फेस में किया जाता है.”

कोविड-19 के सवाल पर किए गए टेलीफोनिक और ट्विटर सर्वे में अंतर के सवाल पर देवाशीष कहते हैं, “हमें पहले तो इन दोनों पोल को एक साथ नहीं देखना चाहिए, क्योंकि ट्विटर पर शहरी, पढ़-लिखे और सोशल मीडिया यूज करने वाले युवा ज्यादा हैं. वहीं अगर आप एमओटीएन का सैंपल देखेंगे तो उसमें 67 प्रतिशत लोग ग्रामीण हैं. सैंपल का यही सवाल शो में प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार बोर्ड की पूर्व सदस्य शमिका रवि ने भी उठाया था. उन्होंने कहा था कि अगर इसमें ग्रामीण मतदाता ज्यादा हैं तो यह सर्वे सही है. इसलिए मुझे लगता हैं कि दोनों पोल के सैंपल की तुलना करना ठीक नहीं होगा.”

सर्वे की पारदर्शिता पर देवाशीष कहते है, “ग्राउंड सैंपलिग में हम फेस टू फेस बातचीत करते है और इसमें हम टेलीफोन पर, लेकिन पारदर्शिता तो दोनों जगह है.”

भारत में लोग अभी टेलीफोन पर जवाब देने में संकोच करते हैं इसलिए जो टेलीफोन सर्वे का परिणाम होता है वह थोड़ा सत्तापक्ष के हक़ में होता है. इस पर देवाशीष कहते हैं, “ऐसा नहीं है. इस समय मार्केट में कई सर्वे हैं और ज्यादातर में आप देखेंगे की लोग सरकार से उतना नाखुश नहीं है इसलिए सभी के परिणाम कुछ हद तक एक जैसे हैं. इसलिए यह कहना की फोन से इकट्ठा किया गया डाटा सहीं नहीं है, यह गलत है.”

इंडिया टुडे के इस सर्वे पर हमने प्रसिद्ध सेफोलॉजिस्ट (चुनाव विश्लेषक) योगेंद्र यादव से भी बात की.

टेलीफोनिक सर्वे की पारदर्शिता पर योगेंद्र यादव कहते है, “भारत में टेलीफोनिक सर्वे सबसे अच्छी चीज नहीं है. इस तरह के सर्वे में पारदर्शिता की समस्या नहीं है. समस्या यह है कि इस तरह के सर्वे में देश की आबादी के सबसे निचले15 प्रतिशत लोग अपने आप बाहर हो जाते हैं. दूसरा, हमारे लोग अभी भी फोन पर उत्तर देने में सहज नहीं है और जब वह फोन पर उत्तर देते हैं तो सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में उनका झुकाव थोड़ा ज्यादा होता है. इसलिए भारत में आज भी गोल्ड स्टैंडर्ड का सर्वे फेस टू फेस को माना जाता है. जिसका सबसे अच्छा उदाहरण आप सीएसडीएस के सर्वे को देख सकते है.”

इंडिया टुडे के पोल और ट्विटर पोल में दिख रहे विरोधाभास पर योगेंद्र यादव ने कहा, “यह बेकार बात है, हमें ऐसी बातों को हवा नहीं देनी चाहिए. जमीन पर किया गया पोल सही होता है. क्योंकि उसमें फेस टू फेस सवाल जवाब होता है. इसलिए उसकी सत्यता अधिक होती है. लेकिन जो ट्वीटर पर किया जाता हैं वह मजाक किया जाता है उसे पोल नहीं कहा जा सकता. काफी समय से बीजेपी और कांग्रेस दोनों अपने ट्रोल्स को भेजकर पोल्स को प्रभावित करवाते हैं. इसलिए मैं इस तरह के पोल्स पर विश्वास नहीं करता.”

सर्वे के सैंपलिग मेथड के सवाल पर योगेंद्र कहते हैं, “कार्वी एजेंसी के सर्वे में यह नहीं बताया गया है कि उन्होंने किस सैंपलिग मैथड का उपयोग किया है. लेकिन सर्वे, रैन्डम सैंपलिंग के द्वारा किया जा सकता है. अमूमन कई एजेसियां हर हफ्ते सर्वे करती हैं, इस दौरान वह डाटा इकट्ठा करते समय घरों से सवाल पूछने के दौरान उनका नंबर भी ले लेते हैं. अगर रैन्डम सैंपलिंग के द्वारा इकट्ठा किए गए फोन नंबर से टेलीफोनिक सर्वे किया जाता है तो वह सही होता है. लेकिन उम्मीद कि सैंपल को टेलीफ़ोन डायरेक्टरी से नहीं उठाया होगा. और अगर ऐसा किया गया है तो यह भारत के संदर्भ में बहुत ही वाहियात चीज है.”

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