मानवाधिकारों पर फेसबुक का रवैया दिखावे से अधिक कुछ नहीं है

म्यांमार से फिलीपींस तक, इंटरनेट के इस महाकाय का नफ़रती संवाद और हिंसा को रोकने का रिकॉर्ड बहुत खराब है.

मानवाधिकारों पर फेसबुक का रवैया दिखावे से अधिक कुछ नहीं है
Anubhooti Gupta
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स्पष्टीकरण: फेसबुक, न्यूज़लॉन्ड्री और टीमवर्क्स आर्ट्स के सालाना कार्यक्रम द मीडिया रंबल के प्रायोजकों में से एक है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने फरवरी माह में एक भड़काऊ भाषण दिया था, जिसकी रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर जमकर साझा की गई. इस भाषण को उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों को उकसाने वाली घटना के तौर पर माना गया, जिसमें 53 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 200 के करीब घायल हुए.

जून में, फेसबुक के मालिक मार्क ज़करबर्ग ने अपनी कंपनी के 25,000 कर्मचारियों के साथ मीटिंग के दौरान इसी भाषण का सरसरी तौर पर ज़िक्र, सोशल मीडिया और हिंसा के बीच के रिश्ते को रेखांकित करते हुए किया. परंतु, जब तक फेसबुक ने इस भाषण की पोस्ट को हटाया था तब तक बहुत देर हो चुकी थी और इसे बड़ी संख्या में साझा किया जा चुका था, जिसके कुछ ही घंटे बाद दंगे शुरू हो गए.

फेसबुक, जो एक समय में बोलने की आज़ादी की पैरवी करने वालों के लिए एक उम्मीद बनकर आया था, आज नफ़रत फैलाने वाली आवाज़ों पर कोई कदम न उठाने के आरोपों से घिरा हुआ है. विश्व का सबसे बड़ा सोशल नेटवर्क भारत में दुश्मनी भरे विचारों के प्रति नरम रवैया रखने के कारण कड़े सवाल झेल रहा है.

रॉयटर्स ने 2 दिन पहले रिपोर्ट किया कि 11 फेसबुक कर्मचारियों ने अपने नेतृत्व को एक खुला पत्र लिखा. उन्होंने मांग की है कि, "कंपनी का नेतृत्व मुस्लिम विरोधी कट्टरपन की मौजूदगी को स्वीकार करते हुए उसकी निंदा करे, और अपनी नीति निर्धारण टीम में विविधता लाते हुए नीतियों को नियमितता दे. फेसबुक के अंदर मौजूद मुस्लिम तबका अपने नेतृत्व से इस विषय पर उनकी राय जानना चाहता है."

उसी दिन फेसबुक ने घोषणा की कि वह अपनी "खतरनाक व्यक्तियों और संगठनों की नीति" का दायरा बढ़ा रहा है जिससे कि "वे संगठन और आंदोलन जो आम जनता के लिए प्रत्यक्ष खतरा पैदा करते हैं", इस नीति के दायरे में आएं. फेसबुक ने बताया इस प्रक्रिया में उन्होंने अभी तक 790 से अधिक समूह, 100 पेज और QAnon के 1500 विज्ञापन हटाए हैं. QAnon एक मनगढ़ंत षड्यंत्र की रूपरेखा का नाम है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने खुद समर्थन दिया है. फेसबुक ने यह भी दावा किया कि उन्होंने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर 300 से अधिक हैशटैग प्रतिबंधित किए हैं, इसके साथ फेसबुक पर 1,950 समूहों, 440 पेज और इंस्टाग्राम पर 10,000 से अधिक खातों पर बंदिशें लागू की हैं.

फेसबुक ने 2017 में यह घोषणा की थी कि वह तथ्यों को जांचने और गलत जानकारी को फैलने से रोकने में भरसक प्रयास कर रहे हैं. पर पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका म्यांमार फिलीपींस और अब भारत में हुई सामाजिक हिंसा के तार, फेसबुक पर मौजूद उस सामग्री से जाकर जोड़ते हैं जिसे समय पर नहीं हटाया गया.

ऐसा नहीं है की फेसबुक को इस "घोर मानवाधिकार हनन" में अपनी भूमिका का बोध नहीं है, इसका उदाहरण 2018 में श्रीलंका में हुई हिंसा है. फेसबुक ने कई मौकों पर अपने ऑफलाइन अपराधों को स्वीकारा है, पर हाल ही में हुए खुलासों से पता चलता है कि फेसबुक की मंद प्रतिक्रिया के पीछे कोई मानवीय भूल नहीं बल्कि सोचे समझे कदम थे, जो राजनीतिक रूप से शक्तिशाली व्यक्तियों की जवाबदेही को रोकने के लिए उठाए गए थे.

आइए देखते हैं कि 3 देशों में फेसबुक के हिंसा भड़काने भूमिका से क्या निष्कर्ष निकलता है.

म्यांमार

2016 और 17 के दौरान, ऐसा कहा जाता है कि म्यांमार की सेना और हथियारधारी बौद्धों ने अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों पर यंत्रणा, बलात्कार, नरसंहार और गांव के गांव जला देने जैसे अत्याचार किए. इसके फलस्वरूप 8 लाख से अधिक रोहिंग्या मुस्लिम पड़ोसी देश बांग्लादेश भागने को मजबूर हुए. बीते नवंबर में गांबिया, म्यांमार को रोहिंग्या समाज के खिलाफ नस्लभेदी नरसंहार के आरोप में अंतरराष्ट्रीय न्याय पालिका में ले गया. जनवरी 2020 में अदालत ने म्यांमार को रोहिंग्या समाज के लिए और शारीरिक-मानसिक नुकसान को रोकने के लिए "अपनी क्षमता के अनुसार सारे कदम" उठाने का आदेश दिया, जिसमें सेना भी शामिल है. इसके साथ यह भी निर्देश दिया गया कि नरसंहार के आरोपों से जुड़े सबूतों को संरक्षित किया जाए.

इसमें फेसबुक की भूमिका कहां है?
मार्च 2018 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा था कि म्यांमार में हिंसा फैलने में फेसबुक की "निर्णायक भूमिका" थी. उसी वर्ष नवंबर में फेसबुक ने माना कि उनके नज़र से परे, इसका इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया गया और वे "समाज में भेद व असली हिंसा" रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे. कंपनी ने यह संकल्प लिया कि वह म्यांमार में मानव अधिकारों के हनन से जुड़ी सारी जानकारी खोजकर्ताओं को देंगे. फेसबुक ने बताया कि इसके लिए वे सारी जानकारी संरक्षित करेंगे जिसमें अगस्त और अक्टूबर 2018 में हटाए गए पेज और खातों की जानकारी भी शामिल होगी.

इसी वर्ष जून में गांबिया ने अमेरिका के संघीय अदालत में एक अर्जी दाखिल की, जिसमें उन्होंने फेसबुक से इन संरक्षित खातों और पृष्ठों में मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों और सेना के अंगों की जानकारी की मांग की. गंभीर ने ऐसी ही अर्जी मई में ट्विटर के खिलाफ भी दायर की थी पर उसे वापस ले लिया गया क्योंकि टाइम पत्रिका के अनुसार "संभवतः ट्विटर ने सहयोग करने के लिए हामी भर दी."

परंतु फेसबुक ने इन मांगों को "असाधारण रूप से विस्तृत" और "अनुचित दख़ल और बोझिल" कहकर खारिज कर दिया. टाइम पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार फेसबुक ने यह भी दावा किया कि इस जानकारी को सौंपना अमेरिका के संघीय कानून (stored communication act) का उल्लंघन होगा जिसमें "सोशल मीडिया कंपनियों को किसी के यूं ही मांगने पर किसी अन्य व्यक्ति से जुड़ी संपर्क और जानकारी देना मना है."

टाइम की रिपोर्ट यह भी कहती है कि असल में, "यह कानून प्रशासनिक गैरकानूनी कदमों की ढाल बनने के लिए नहीं बल्कि एक आम व्यक्ति की निजता के संरक्षण के लिए बना है." क्योंकि फेसबुक के द्वारा हटाए गए अधिकतर पेज या तो सार्वजनिक थे या उनकी जानकारी सार्वजनिक होने के लिए थी, इसीलिए उनके ऊपर यह कानून लागू नहीं होता.

श्रीलंका

मार्च 2018 की सिंहली में लिखी एक पोस्ट कहती थी: "सब मुस्लिमों को मार दो, छोटे बच्चों तक को मत छोड़ो. यह कुत्ते हैं." 6 दिन बाद, जब हिंसा में 2 लोग मारे जा चुके थे, 450 मुसलमानों के घर और दुकानें बर्बाद कर दी गईं और 60 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया, तब भी इस पोस्ट को देखा जा सकता था. गार्जियन कि रिपोर्ट को संज्ञान लेने के बावजूद के इस पोस्ट ने कंपनी के सारे सामाजिक नियमों की धज्जियां उड़ाई.

इस घटना के 2 साल बाद इस साल मई में फेसबुक ने माना कि उन्होंने श्रीलंका में अपने प्लेटफार्म पर हानिकारक सामग्री के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाया. फेसबुक ने वक्तव्य दिया, “इस देरी से पैदा हुए घोर मानवाधिकार हनन को हम पहचानते हैं, और उसके लिए माफी चाहते हैं." फेसबुक ने यह भी घोषणा की कि वह स्थानीय भाषा को जानने और समझने वाले मॉडरेटर्स को भी काम देगा और इसके साथ ही हानिकारक सामग्री को फैलने से रोकने के लिए कट्टरपंथी भाषा और सामग्री को पहचानने में तकनीक का सहारा लेगा. फेसबुक का दावा है कि उनके यहां अभी "35000 से अधिक लोग सुरक्षा और बचाव पर काम कर रहे हैं."

हाल ही में कंपनी ने यह भी घोषणा की थी कि इस साल अगस्त से हर तिमाही पर अपनी "सामुदायिक मूल्य प्रवर्तन रिपोर्ट" जारी करेंगे जिससे "वे अपने फेसबुक और इंस्टाग्राम को सुरक्षित और समावेशी बनाने के प्रयासों की प्रगति को दिखा सकें और उस पर नजर रख सकें."

परंतु 2019 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षा ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज से झूठी ख़बरें शेयर कीं, जो अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी AFP के द्वारा झूठा सिद्ध होने के बावजूद भी वायरल हुईं. गार्जियन के अनुसार, "श्रीलंका की सामाजिक संस्थाएं राष्ट्रपति चुनाव से पहले फेसबुक की नीतियों के बारे में चेतावनी दे रही हैं, की कंपनी का राजनेताओं को झूठी ख़बरें फैलाने की अनुमति देने का विवादित निर्णय 'सिरे से अनुचित और अपमानित' करने वाला है."

इसके बाद फेसबुक में गार्जियन को बताया कि उनके यहां "श्रीलंका के आने वाले चुनावों की सुरक्षा के लिए कई लोगों के दल हैं" और वे आशा करते हैं कि "फेसबुक जनतांत्रिक प्रक्रिया में एक सकारात्मक भूमिका निभायेगा."

एक रोचक तथ्य यह भी है, कि श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे, आंखी दास से जनवरी में "विभिन्न विषयों" की चर्चा करने के लिए मिले थे जिसमें "झूठी खबरों का बढ़ता दायरा" भी शामिल था. आंखी आज भारत में फेसबुक की पब्लिक पॉलिसी विभाग की सर्वोच्च अधिकारी हैं और इस महीने काफी चर्चा में भी रहीं, जब वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी "भारतीय राजनीति और फेसबुक के नफ़रती सामग्री रोकने के नियमों में टकराव" की रिपोर्ट में उन्हें नामजद किया.

फिलीपींस

फिलीपींस, जहां जनता से अधिक स्मार्टफोन हैं, फेसबुक पर रोड्रिगो दुर्तेते की तानाशाही कार्यप्रणाली से हिंसा को बढ़ावा देने और जनता की आवाज़ को दबाने में सहयोग करने का आरोप भी लगा है. 2015 में फेसबुक ने फिलीपींस में जनता को कुछ इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह से मुफ्त प्रदान करने वाले ऐप internet.org (जिसमें फेसबुक की सभी सेवाएं शामिल हैं) को जारी किया. 2016 में दुर्तेते राष्ट्रपति चुने गए.

चुनाव से पहले फेसबुक ने दुर्तेते सहित अन्य उम्मीदवारों के साथ उनके प्लेटफार्म का बेहतर उपयोग करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार दुर्तेते की टीम ने "बाकी सब उम्मीदवारों से कहीं बेहतर सोशल मीडिया तंत्र खड़ा कर लिया था." झूठे बदनाम करने वाले आंदोलन और हिंसा की धमकियां इस तंत्र का हिस्सा थे, और इन्हें रोकने के बजाय फेसबुक ने दुर्तेते को "फेसबुक वार्तालाप का निर्विवाद सम्राट" घोषित किया.

कुछ समय पश्चात उसी साल दुर्तेते की "हत्यारी टोली" द्वारा की गई गैरकानूनी हत्याओं के ऊपर जांच शुरू करने वाली सेनेटर लीला डे लीमा को मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. इन मनगढ़ंत आरोप में गिरफ्तार किए जाने से पहले उनके ऊपर योजनाबद्ध तरीके से उनके कथित "उत्श्रृंखल यौन व्यवहार" को लेकर, फेसबुक पर पोस्ट और फोटो वायरल कर निशाना बनाया गया.

बज़फीड की रिपोर्ट के अनुसार यह दुर्तेते के रचे हुए षडयंत्र का एक हिस्सा था. फेसबुक ने बज़फीड से कबूल किया कि डे लीमा के फोटो "उनकी नीतियों का उल्लंघन करते थे और उन्हें हटाया गया था" साथ ही उन्होंने झूठी खबर फैलने से रोकने की कोशिश की थी, लेकिन यह सब लीला डे लीमा के गिरफ्तार होने के बाद हुआ.

मारिया रेसा, जो फिलीपींस की जानी-मानी पत्रकार हैं और दुर्तेते के प्रशासन का नशीले पदार्थों और भ्रष्टाचार को लेकर सामना कर रही हैं, उन्होंने भी फेसबुक की भरपूर निंदा की है. मारिया फेसबुक की निरंतर आलोचक रही हैं और उसे देश में नफरत और झूठी जानकारी फैलाने के लिए उत्तरदाई मानती हैं.

अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक अन्वेषण केंद्र (Centre for International Governance Innovation) को दिए गए इंटरव्यू में मारिया रेसा ने कहा कि उन्होंने फर्ज़ी फेसबुक खातों की जानकारी इकट्ठी की और वे उसे कंपनी के पास ले गईं, "मैंने उनसे कहा- इतनी बड़ी संख्या बहुत चिंताजनक है. जिन लोगों से मैं मिली वह आश्चर्यचकित थे और नहीं जानते थे कि क्या करें. मीटिंग के अंत में मैंने उनसे कहा कि आपको कुछ अवश्य करना होगा नहीं तो ट्रंप जीत सकते हैं. और हम सब हंस पड़े क्योंकि तब यह संभव नहीं लगा. और फिर नवंबर में, वो जीत गए."

मारिया अंत में कहती हैं, "फेसबुक ने दुनिया के बहुत से देशों में जनतंत्र को खोखला कर दिया है, इनमें मेरा देश भी शामिल है."

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Complaining about the media is easy and often justified. But hey, it’s the model that’s flawed.

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