विश्विद्यालयों, कॉलेजों और शोध संस्थानों के लिए एक स्वायत्त नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन के मायने

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एनआरएफ के निर्माण के लिए अगली पंचवर्षी में 50,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रस्ताव दिया है.

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परिणामस्वरूप, 2017 में भारत में प्रति दस लाख लोगों में सिर्फ 255 शोधकर्ता थे. जबकि कई अन्य देशों में यह संख्या काफी बेहतर थी. उदाहरण के लिए, इज़राइल में 8,342, स्वीडन में 7,597 और दक्षिण कोरिया में 7,498 जो की भारत के मुकाबले काफी छोटे देश हैं. विश्वविद्यालय-आधारित शोधकर्ताओं की पीढ़ी अपने से बेहतर वित्त पोषित सहयोगियों को प्रदान किए गए संसाधनों के साथ एक सामान स्तर पर पहुंचना चाहती है, और इससे पहले भी एनआरएफ जैसी एजेंसी बनाने के बारे में सरकारों ने चर्चा की है. यह महत्वाकांक्षा अब कुछ-कुछ साकार होती दिख रही है. और इस सपने को पुलकित करवाने में जीवविज्ञानी एवं भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार कृष्णास्वामी विजयराघवन की दूरदर्शिता और कूटनीतिक कौशल का एक बड़ा योगदान माना जा रहा है. विजयराघवन ने कहा कि गरीबी को खत्म करने और स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, गुणवत्ता वाली शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए "सामाजिक विज्ञान एवम मानविकी और राष्ट्र के विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों" की गहरी समझ की आवश्यकता होगी. सरकार ने अभी तक एनआरएफ की पूर्ण कार्यप्रणाली का विवरण प्रदान नहीं किया है कि एनआरएफ देश के सार्वजनिक प्रशासन, नौकरशाही और कार्यपालिका में कहां फिट बैठेगा.

इसे एक सरकारी मंत्रालय के साथ जोड़ा जा सकता है. जैसा कि यूनाइटेड किंगडम के सबसे बड़े विज्ञान-निधि निकाय मंत्रालय के साथ जुड़े हुए हैं. या यह संसद को सीधा रिपोर्ट कर सकता है, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसा. भारत सरकार ने प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है कि एनआरएफ स्वायत्त रूप से काम करेगा, इसका कोई असर नहीं होगा कि यह नौकरशाही और कार्यपालिका के किस खांचे में बैठे. विजयराघवन और उनके सहयोगियों को यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार के साथ काम करने की आवश्यकता है कि अनुदान प्राप्तकर्ता और एजेंसी चलाने वाले दोनों ही निर्णय लेने में सक्षम हों. जैसे कि बिना सरकारी अधिकारियों के हस्तक्षेप के कर्मचारियों या सहकर्मी विशेषज्ञ समीक्षकों की नियुक्ति करना. बिलकुल ऐसे ही तमाम अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान-वित्त नीति एजेंसियां स्वायत्त तरीके से काम करती हैं.

भारत के शोधकर्ता पिछले कुछ समय से सरकार के द्वारा अनुसंधान स्वायत्तता को कम करने पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं. 2017 में, 40 शहरों में विज्ञान के लिए मार्च में लगभग 12,000 शोधकर्ताओं ने भाग लिया था. 2019 में, 100 से अधिक अर्थशास्त्रियों ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को पात्र लिखा था, जिसमे आधिकारिक आंकड़ों- विशेष रूप से आर्थिक आंकड़ों पर राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करने का आग्रह किया गया था. अभी पिछले महीने, शिक्षा मंत्रालय ने विश्वविद्यालयों को एक पत्र जारी करके कहा था- "उन्हें अंतर्राष्ट्रीय वक्ताओं के साथ ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी. सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था हमेशा से चली आ रही व्यवस्था से अलग नहीं है, जिसमे जब ऑफलाइन कार्यक्रमों के लिए अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों को भारत आने के लिए आमंत्रित करने की अनुमति लेनी होती है, लेकिन शोधकर्ताओं ने ऑनलाइन कार्यक्रमों के लिए ऐसी व्यवस्था को अनावश्यक बताया है."

वे कहते हैं, "इस तरह से एक और लालफीताशाही वाली बाधा को बढ़ा देने से भारत में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन कार्यक्रमों के आयोजन ही कम हो जायेंगे. एनआरएफ जैसी एजेंसी का भारत में उद्भव होने में काफी समय लग गया, हलांकि यह देर आये, दुरुस्त आये को चरितार्थ करेगा और भविष्य में इसकी स्थापना महान दूरदर्शिता का परिणाम साबित होगी. अपनी क्षमता का एहसास करने के लिए विद्वानों की नई पीढ़ियों को सक्षम करना देश के लिए इसकी महत्वपूर्ण विरासत होगी. लेकिन इसे एक पक्की नींव के साथ शुरू करने की ज़रूरत है."

इसका मतलब यह है कि, इस एजेंसी को अनुचित प्रभावों मुक्त रख कर केवल वैज्ञानिक उत्कृष्टता के विकास पर ही केंद्रित रखना होगा. इसको किसी भी तरह के राजनैतिक प्रभावों से मुक्त रखना होगा, न केवल वर्तमान सरकार से, बल्कि भविष्य में आने वाले सरकारी उत्तराधिकारियों से भी.

(लेखक बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्विद्यालय, लखनऊ, में बायोटेक्नोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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