<rss version="2.0" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"><channel><title>Newslaundry</title><link>https://www.newslaundry.com</link><description>We have finally migrated our website to better architecture! While the fancy new website will be up in a few months, we have fixed issues related to payment and login in the meantime. You will need to log in anew. If you have forgotten your password, you can generate one by clicking on the forgot password link (it works!). 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+0000</pubDate><atom:updated>2026-06-22T12:27:07.046Z</atom:updated><atom:author><atom:name>प्रांतिक अली</atom:name><atom:uri>/api/author/2519537</atom:uri></atom:author><description></description><media:keywords>hate crime,Hate Music,H Pop</media:keywords><media:content height="628" url="https://cf-images.assettype.com/newslaundry/2026-06-22/nwiehizt/Copy-of-FI-Kit-97.jpg" width="1116"><media:title type="html"></media:title><media:description type="html"></media:description></media:content><media:thumbnail url="https://cf-images.assettype.com/newslaundry/2026-06-22/nwiehizt/Copy-of-FI-Kit-97.jpg?w=280" width="280"></media:thumbnail><category>Report</category><category>Newslaundry Hindi</category><content:encoded><![CDATA[ <p>सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट (सीएसओएच) ने 15 जून 2026 को एक <ins><a href="https://www.csohate.org/2026/06/15/profiting-from-hate-music/">रिपोर्ट</a></ins> प्रकाशित की है. रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म किस तरह नफरत फैलाने वाले संगीत की पहुंच को बढ़ावा दे रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ये प्लेटफॉर्म अपने ही कंटेंट नियमों का उल्लंघन करने वाली ऐसी सामग्री को न केवल फलने-फूलने का मौका दे रहे हैं, बल्कि उसके अनियंत्रित प्रसार से आर्थिक लाभ भी कमा रहे हैं.</p><p><ins><a href="https://www.csohate.org/wp-content/uploads/2026/06/profiting_from_hate_music_csoh-1.pdf">‘प्रॉफिटिंग फ्रॉम हेट म्यूजिक’</a></ins> शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में जिस संगीत शैली का अध्ययन किया गया है, वह हिंदू राष्ट्रवादी या हिंदुत्व विचारधारा के दायरे में संचालित होती है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस संगीत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों और ईसाइयों, के खिलाफ अमानवीय और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है. रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि इन गीतों में लक्षित समुदायों के खिलाफ हिंसा के लिए खुले तौर पर उकसाने वाली सामग्री मौजूद है.</p><p>इस संगीत शैली के लिए ‘हिंदुत्व-पॉप’ या ‘एच-पॉप’ (‘एच-पॉप’) शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले पत्रकार और लेखक कुणाल पुरोहित ने अपनी 2023 में प्रकाशित पुस्तक <ins><a href="https://www.amazon.in/H-Pop-Secretive-World-Hindutva-Stars/dp/9356995826?s=bazaar">‘एच-पॉप: द सीक्रेटिव वर्ल्ड ऑफ हिंदुत्वा पॉप स्टार्स’</a></ins> में किया था. इस पुस्तक में उन्होंने विश्लेषण किया है कि किस प्रकार हिंदुत्व-पॉप, व्यापक लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बनकर, हिंदू बहुसंख्यकवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ावा देने के सबसे प्रभावी माध्यमों में से एक बन गया है.</p><p><ins><a href="https://www.csohate.org/about/">सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट</a></ins> (सीएसओएच) अमेरिका स्थित एक गैर-लाभकारी थिंक टैंक है, जो नफरत, हिंसा, उग्रवाद, कट्टरपंथ और ऑनलाइन होने वाले नुकसान से जुड़े मुद्दों पर साक्ष्य-आधारित शोध करता है. संगठन की पिछली रिपोर्टों में धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता, जाति, जातीयता, लिंग, दिव्यांगता और यौन अभिरुचि जैसे आधारों पर अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ नफरत भरे भाषण और भेदभावपूर्ण रुझानों का विस्तृत विश्लेषण शामिल रहा है. संगठन मूल रूप से नफरत को एक संगठित सामाजिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में अध्ययन करता है.</p><p>अपनी वेबसाइट पर सीएसओएच खुद को एक ऐसे संस्थान के रूप में प्रस्तुत करता है, जो विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थाओं और मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर काम करता है और कठोर शोध को नीतिगत समाधान में बदलने का प्रयास करता है. पिछले वर्ष ऑल्ट न्यूज़ ने भी भारत में नफरत भरे भाषण से जुड़ी घटनाओं पर सीएसओएच की वार्षिक रिपोर्ट का विश्लेषण <ins><a href="https://www.altnews.in/4-hate-speech-events-per-day-in-2025-88-in-bjp-ruled-places-csoh-report-confirms-indias-slide-into-hate-politics/">प्रकाशित</a></ins> किया था.</p><p>इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने चार डिजिटल प्लेटफॉर्म- यूट्यूब, स्पॉटिफाई, एप्पल म्यूजिक और मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी को चुना था. रिपोर्ट के मुताबिक, इन प्लेटफॉर्मों पर कुल 523 ऐसे गाने चिन्हित किए गए, जो संबंधित प्लेटफॉर्मों की अपनी कंटेंट नीतियों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हैं. इनमें यूट्यूब पर 210, स्पॉटिफाई पर 109, मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी में 103 और एप्पल म्यूजिक पर 101 गाने शामिल हैं.</p><p>रिपोर्ट में ऐसे कई उदाहरणों की पहचान की गई है, जहां यह नफरत सीधे तौर पर हिंसा या शारीरिक नुकसान पहुंचाने के खुले आह्वान का रूप ले लेती है. अध्ययन में चिन्हित किए गए नियम-उल्लंघन करने वाले 523 गीतों में से हर दो में से एक गीत में स्पष्ट रूप से हिंसा का आह्वान करता पाया गया यानी अध्ययन किए गए लगभग 50 प्रतिशत गीतों में वास्तविक दुनिया में हिंसा को प्रेरित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. रिपोर्ट के अनुसार, इन गीतों में मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंदुओं और हिंदुत्व के लिए एक कथित खतरे के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनके खिलाफ हत्या या हिंसा की अपील की गई है.</p><p>रिपोर्ट यह भी बताती है कि वीडियो (यूट्यूब) और ऑडियो (स्पॉटिफाई, एप्पल म्यूजिक और मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी) दोनों प्रारूपों में इस तरह के संगीत का निर्बाध प्रसार किस प्रकार के सामाजिक प्रभाव पैदा कर सकता है. अध्ययन में इन प्लेटफॉर्मों की संबंधित सामुदायिक नीतियों का उल्लेख किया गया है और उन गीतों के विषयों तथा उनसे जुड़े एंगेजमेंट मेट्रिक्स का दस्तावेजीकरण किया गया है, जिन्हें इन नीतियों का उल्लंघन करने वाला पाया गया.</p><p>रिपोर्ट के मुताबिक, यूट्यूब के भारत में अनुमानित 50 करोड़ उपयोगकर्ता (यूजर) हैं, जो अमेरिका की तुलना में लगभग दोगुने हैं. इस वजह से भारत, ऑनलाइन कट्टरपंथी और नफरत भरी सामग्री के प्रसार के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील बाजारों में से एक बन जाता है. हालांकि, यूट्यूब की ‘हेट स्पीच पॉलिसी’ स्पष्ट रूप से कहती है कि प्लेटफॉर्म पर हिंसा या नफरत को बढ़ावा देने वाली सामग्री की अनुमति नहीं है, इसके बावजूद सीएसओएच ने अकेले यूट्यूब पर ही ऐसे 210 गीतों की पहचान की, जो कुल डाटासेट का लगभग 40 प्रतिशत हैं. ये गीत ऐसे चैनलों पर मौजूद थे, जिनके संयुक्त सब्सक्राइबरों की संख्या 7 करोड़ से अधिक है.</p><p>इन 210 यूट्यूब गीतों में से 106 गीतों में मुसलमानों को हिंदुओं के अस्तित्व के लिए खतरे के रूप में चित्रित किया गया और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने के लिए ‘लव जिहाद’ जैसी साजिश संबंधी थ्योरी को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया.</p><p>भारत की सबसे बड़ी पेड ऑडियो स्ट्रीमिंग सेवा स्पॉटिफाई पर सीएसओएच ने 109 ऐसे एच-पॉप (‘एच-पॉप’) गीतों की पहचान की, जो प्लेटफॉर्म की नफरतपूर्ण सामग्री और आचरण से संबंधित नीतियों का उल्लंघन करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें कुछ गीतों में मुसलमानों को ‘काले सांप’ कहकर देश से बाहर निकालने की बात की गई है, कुछ में उनकी तुलना ‘राक्षसों’ से की गई है, जबकि कुछ अन्य गीतों में ‘देशद्रोहियों’ को गोली मार देने की अपील की गई है.</p><p>रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टाग्राम के भीतर उपलब्ध मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी, जो व्यक्तिगत और गैर-व्यावसायिक उपयोग के लिए एक ऑडियो बैंक के रूप में काम करती है, भारत में 41 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं तक पहुंच रखती है. अध्ययन के मुताबिक, यह मंच एच-पॉप संगीत के प्रसार का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है, क्योंकि इन गीतों का इस्तेमाल अक्सर उन इंस्टाग्राम रील्स में किया जाता है, जिनमें उग्रवादी दृश्य सामग्री भी शामिल होती है.</p><p>रिपोर्ट में कहा गया है कि रील्स का यह इकोसिस्टम किसी गीत की पहुंच को उसके मूल दर्शकों से कहीं आगे तक बढ़ा देता है और यह दिखाता है कि बड़ी टेक कंपनियों के प्लेटफॉर्म किस प्रकार एक-दूसरे को मजबूत करने वाली प्रणालियों के रूप में काम करते हैं. इस अध्ययन में मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी पर ऐसे 103 गीतों की पहचान की गई, जो प्लेटफॉर्म के सामुदायिक मानकों का उल्लंघन करते हैं. इनमें से 57 गीत मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देने वाले पाए गए, जबकि शेष 46 गीतों में हिंसा के लिए सक्रिय रूप से उकसाने वाली सामग्री मौजूद थी. रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 तक रिपोर्ट किए गए 41 गीतों में से 37 अब भी इस प्लेटफॉर्म पर सक्रिय थे.</p><p>वहीं, अन्य तीन प्लेटफॉर्मों के विपरीत, एप्पल म्यूजिक अपनी नीतियों में सामग्री को लेकर स्पष्ट निषेधों की सूची नहीं देता. प्लेटफॉर्म केवल यह कहता है कि उपलब्ध सामग्री उस देश के ‘स्थानीय कानूनों और सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं’ के अनुरूप होनी चाहिए, जहां से उसे एक्सेस किया जा रहा है. अध्ययन के अनुसार, एप्पल म्यूजिक पर 101 ऐसे गीत पाए गए, जो भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं. भारतीय कानून धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी और वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर रोक लगाते हैं.</p><p>इस शोध में जिन गीतों का अध्ययन किया गया, उनमें ‘लव जिहाद’ के जरिए हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने के आरोप, भारत की जनसांख्यिकी पर कब्जा करने की कथित इस्लामी साजिश, मंदिरों को तोड़ने और लूटने के एक कथित ‘इतिहास’ जैसे दावे प्रमुख रूप से सामने आए. रिपोर्ट के अनुसार, मुसलमानों के लिए ‘गद्दार’, ‘आतंकवादी’ और ‘दुश्मन’ जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल किया गया, जिससे पूरे समुदाय को राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने वाला या पाकिस्तान के इशारों पर चलने वाला बताया गया.</p><p>ऑल्ट न्यूज़ से बातचीत में पत्रकार और लेखक कुणाल पुरोहित ने कहा कि उनकी पुस्तक के प्रकाशन के बाद एच-पॉप (‘एच-पॉप’) ने वर्ग और भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक पार कर लिया है. उनके अनुसार, यह संगीत अब केवल उत्तर भारत के ग्रामीण श्रोताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के शहरी उच्चवर्ग और प्रवासी भारतीय समुदायों के सांस्कृतिक परिदृश्य में भी अपनी जगह बना चुका है. इतना ही नहीं, यह कई जगहों पर हिंदू त्योहारों और धार्मिक जुलूसों का भी हिस्सा बन गया है.</p><p>पुरोहित ने यह भी रेखांकित किया कि संकट और तनाव के दौर में एच-पॉप किस प्रकार धार्मिक कट्टरता के विचारों को मजबूत करने का एक उपकरण बन जाता है. उदाहरण के तौर पर, अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद, जब देश अभी इस घटना के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा था, तब प्रसिद्ध एच-पॉप गायक कवी सिंह ने घटना के एक दिन के भीतर ही एक गीत जारी किया, जिसमें मुसलमानों को दोषी ठहराया गया और उन्हें देश से बाहर करने की बात कही गई.</p><p>पुरोहित के शब्दों में, “यह संगीत ऐसे संवेदनशील और तनावपूर्ण क्षणों को अपने भीतर समाहित कर लेता है और फिर उन्हें इस तरह हथियार बना देता है, जो हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप भी होता है और उसके समर्थकों को आकर्षित भी करता है.”</p><p>कुणाल पुरोहित ने कहा, “इसे समझने के लिए यह देखना होगा कि बड़ी टेक कंपनियों ने एच-पॉप (‘एच-पॉप’) को केवल फैलाने का काम ही नहीं किया, बल्कि उससे मुनाफा भी कमाया और उस कमाई का एक हिस्सा इसके रचनाकारों के साथ भी साझा किया. एक तरह से ये कंपनियां ऐसे संगीत के निर्माण को वित्तीय सहायता देने के साथ-साथ अधिक लोगों को इस तरह की सामग्री बनाने के लिए प्रोत्साहित भी कर रही हैं.”</p><p><strong>नफरत भरे संगीत का कारोबार कैसे होता है?</strong></p><p>रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूट्यूब, स्पॉटिफाई, एप्पल म्यूजिक और मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी- ये चारों प्लेटफॉर्म हिंदुत्व-पॉप इकोसिस्टम को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आर्थिक आधार प्रदान कर रहे हैं. अध्ययन के अनुसार, ये प्लेटफॉर्म नफरत फैलाने वाली सामग्री पर विज्ञापन चलाकर उससे राजस्व अर्जित करते हैं और इस प्रक्रिया में उस सामग्री के निर्माताओं को भी आर्थिक लाभ पहुंचाते हैं.</p><p>रिपोर्ट का कहना है कि इस मॉडल के कारण नफरत भरे गीत करोड़ों इंटरनेट उपयोगकर्ताओं तक पहुंचते हैं. अध्ययन के अनुसार, इस तरह की सामग्री न केवल व्यापक स्तर पर प्रसारित होती है बल्कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ शत्रुता और हिंसक भावनाओं को भड़काने की क्षमता भी रखती है.</p><p>रिपोर्ट के अनुसार, ये प्लेटफॉर्म कंटेंट निर्माताओं को अपनी सामग्री से कमाई करने की सुविधा भी देते हैं. कुछ मामलों में, विज्ञापनों से होने वाली आय का एक हिस्सा पात्र क्रिएटर्स के साथ साझा किया जाता है. इसके अलावा, कई प्लेटफॉर्म ऐसे फीचर भी उपलब्ध कराते हैं, जिनके माध्यम से निर्माता अपने दर्शकों से सीधे आर्थिक सहयोग प्राप्त कर सकते हैं या प्रोडक्ट प्लेसमेंट के जरिए आय अर्जित कर सकते हैं.</p><p>म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कलाकारों को रॉयल्टी का भुगतान भी करते हैं. इसमें मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी भी शामिल है, जहां अन्य उपयोगकर्ताओं द्वारा वीडियो में इस्तेमाल किए गए किसी गीत के अधिकारधारी को विज्ञापन से प्राप्त आय का एक हिस्सा मिलता है.</p><p>रिपोर्ट के मुताबिक, यूट्यूब पर एच-पॉप (‘एच-पॉप’) गीतों के साथ विज्ञापन दिखाने वाले विज्ञापनदाताओं की सूची में कुल 103 ब्रांड और सेवाएं शामिल थीं. इनमें ओपनएआई का चैटजीपीटी, गूगल का नोटबुकएलएम, अमेज़न प्राइम, कैनवा, ओपेरा ब्राउज़र और एडोबी जैसी सेवाएं भी शामिल थीं.</p><p>इसके अलावा, मोटरोला, डेल, हायर, केलॉग्स, ओरियो, निविया और पॉन्ड्स जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के विज्ञापन भी मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले नफरतपूर्ण गीतों के साथ दिखाई दिए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई प्रमुख भारतीय कंपनियों के विज्ञापन भी ऐसे गीतों के साथ प्रदर्शित हुए, जिन्हें अध्ययन ने अमानवीय और घृणा फैलाने वाला बताया है. इनमें गोदरेज, जेके सीमेंट, अर्बन कंपनी, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा, आईटीसी होटल्स, इंडिगो एयरलाइंस, अकासा एयर, रिलायंस ज्वेल्स, तनिष्क, आईसीआईसीआई बैंक और कोटक लाइफ जैसी कंपनियां शामिल हैं.</p><p>हालांकि, रिपोर्ट में इन ब्रांडों के विज्ञापनों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संबंधित कंपनियां इन विशेष वीडियो या गीतों की प्रकृति से अवगत थीं या नहीं, क्योंकि डिजिटल विज्ञापन प्रायः स्वचालित विज्ञापन प्रणालियों (प्रोग्रामेटिक एडवरटाइजिंग) के माध्यम से भी प्रदर्शित किए जाते हैं.</p><p><strong>प्लेटफॉर्म मॉडरेशन: विफलता या सुनियोजित खामी?</strong></p><p>सीएसओएच रिपोर्ट के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि नफरत फैलाने वाले संगीत के खिलाफ प्लेटफॉर्मों की कार्रवाई बेहद सीमित रही है, जबकि ऐसी सामग्री उनकी अपनी कंटेंट नीतियों का उल्लंघन करती है. रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर और नवंबर 2025 के बीच अध्ययन में शामिल 523 गीतों में से 225 (करीब 43 प्रतिशत) गीतों की शिकायत संबंधित प्लेटफॉर्मों से उनकी हेट स्पीच नीतियों के उल्लंघन के आधार पर की गई थी. इसके बावजूद अप्रैल 2026 के अंत तक केवल 18 गीत ही हटाए गए थे. यानी हटाए जाने की दर मात्र 8 प्रतिशत रही, जबकि शेष 207 गीत शिकायत दर्ज होने के बाद भी प्लेटफॉर्मों पर उपलब्ध रहे.</p><p>यूट्यूब के मामले में, अक्टूबर 2025 के मध्य में रिपोर्ट किए गए 91 गीतों में से मई 2026 तक केवल 13 गीत ही प्लेटफॉर्म से हटाए गए. इसका अर्थ है कि 78 गीत ऐसे थे जो यूट्यूब की सामुदायिक नीतियों के उल्लंघन की औपचारिक शिकायत के बावजूद सक्रिय बने रहे.</p><p>स्पॉटिफाई पर भी स्थिति कुछ ऐसी ही पाई गई. रिपोर्ट के अनुसार, प्लेटफॉर्म की हेट कंटेंट नीतियों का उल्लंघन करने वाले 109 गीतों की पहचान की गई थी. इनमें से 59 गीतों को यादृच्छिक रूप से चुनकर स्पॉटिफाई के ऑनलाइन रिपोर्टिंग सिस्टम के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई गई. लेकिन मई 2026 तक प्लेटफॉर्म ने इन गीतों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी.</p><p>रिपोर्ट स्पॉटिफाई की रिपोर्टिंग व्यवस्था की भी आलोचना करती है. इसमें कहा गया है कि शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया न तो पर्याप्त रूप से स्पष्ट है और न ही उपयोगकर्ता के अनुकूल. साथ ही, शिकायत की स्थिति जानने या उस पर हुई कार्रवाई की निगरानी करने के लिए कोई सीधा और पारदर्शी तंत्र उपलब्ध नहीं है, जिससे जवाबदेही और प्रभावी मॉडरेशन दोनों पर सवाल खड़े होते हैं.</p><p>एप्पल म्यूजिक की कंटेंट नीतियों को लेकर रिपोर्ट विशेष रूप से आलोचनात्मक है. अध्ययन के अनुसार, प्लेटफॉर्म के नियम इतने अस्पष्ट हैं कि स्थानीय कानूनों के तहत नफरत भरे भाषण और हिंसा के लिए उकसाने वाली सामग्री को चुनौती देने की गुंजाइश बेहद सीमित रह जाती है. नवंबर 2025 की शुरुआत में ऐसे 34 गीतों की शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन वर्तमान में इनमें से 33 गीत अब भी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं. सीएसओएच का कहना है कि शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया इतनी जटिल और श्रमसाध्य है कि अधिकांश उपयोगकर्ता इसे पूरा करने से ही हतोत्साहित हो सकते हैं.</p><p>मेटा की म्यूजिक लाइब्रेरी के मामले में रिपोर्ट बताती है कि जिन 103 गीतों को सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाला पाया गया, उनका इस्तेमाल 59 लाख से अधिक इंस्टाग्राम रील्स में किया गया था. इनमें से लगभग 14 लाख रील्स ऐसी थीं, जिनमें मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का आह्वान करने वाली सामग्री मौजूद थी. अक्टूबर 2025 में ऐसे 41 रील्स की शिकायत की गई थी, जिनमें सामुदायिक मानकों का उल्लंघन करने वाले गीतों का इस्तेमाल किया गया था.</p><p>रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि अध्ययन में पहचाने गए 523 गीत कुछ अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि नफरत के एक ‘संगठित और फलते-फूलते इकोसिस्टम’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. अध्ययन का निष्कर्ष है कि ये प्लेटफॉर्म अपनी ही नीतियों और दिशानिर्देशों के उल्लंघन के बावजूद इस इकोसिस्टम को फलने-फूलने का अवसर दे रहे हैं. साथ ही, इस सामग्री के मुद्रीकरण (मॉनेटाइजेशन) से यह भी संकेत मिलता है कि विज्ञापनदाताओं और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के बीच एक ऐसा तंत्र विकसित हो गया है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस उग्रवादी संगीत संस्कृति को आर्थिक आधार प्रदान करता है.</p><p>रिपोर्ट के अनुसार, यदि इस तरह की नफरत को डिजिटल दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में हिंसा और सामाजिक तनाव का कारण बनने से रोकना है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्मों, कंटेंट नियामकों और नागरिक समाज, तीनों को मिलकर तत्काल और समन्वित जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी.</p><p><em>यह लेख ऑल्ट न्यूज़ की अनुमति से पुनर्प्रकाशित किया गया है. मूल रूप से अंग्रेजी में यह लेख ऑल्ट न्यूज़ की <ins><a href="https://www.altnews.in/">वेबसाइट</a></ins> पर उपलब्ध है.</em></p><aside><a href="https://hindi.newslaundry.com/2026/02/27/this-road-is-not-for-muslims-a-brazen-display-of-religious-hatred-in-saharanpur">‘यह रोड मुसलमानों के लिए नहीं’: सहारनपुर में खुलेआम मजहबी नफरत का प्रदर्शन</a></aside><aside><a href="https://hindi.newslaundry.com/2025/08/26/iit-delhi-professor-vk-tripathi-movement-against-hate-politics-from-bhagalpur-to-gaza">नफरत के खिलाफ 30 साल का संघर्ष, गाज़ा से राजघाट तक प्रोफेसर वीके त्रिपाठी की कहानी</a></aside>]]></content:encoded></item></channel></rss>