Newslaundry Hindi
सबकुछ काफी ठीक है लेकिन…
जून में निर्यात का आंकड़ा 41 महीनों में सबसे कम रहा है. आयात भी 9 प्रतिशत कम हो गया है. जो कि 34 महीने में सबसे कम है. सरकार मानती है कि दुनिया भर में व्यापारिक टकरावों के कारण ऐसा हुआ है.
सरकार ने 2018-19 और 2019-20 के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों पर सरचार्ज लगाकर 17000 करोड़ वसूले हैं. बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि सरकार इस पैसे का दूसरे मद में इस्तेमाल करेगी. जिन चीज़ों के लिए सरजार्च लिया गया था उसमें नहीं. कायदे से यह पैसा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को जाना चाहिए था, खासकर एक ऐसे समय में जब हाईवे के लिए पैसे की तंगी हो रही है. अपना पैसा कहीं और खपा कर परिवहन मंत्रालय निजी आपरेटरों की तलाश में लगा है.
सरकार संप्रभु बॉन्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ उठाने की तैयारी में है. बजट में घोषणा हुई है. बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि सरकार धीरे-धीरे कर्ज़ लेने की दिशा में कदम उठाएगी. हांगकांग, न्यूयार्क, सिंगापुर और लंदन में ये बान्ड लांच होंगे. 20 साल के लिए यह बान्ड जारी होगा. शुरूआती चरण में सरकार 3-4 अरब डॉलर का कर्ज़ उठाने की कोशिश करेगी. भारत जीडीपी का मात्र 5 प्रतिशत संप्रभु बान्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ लेता है. जो कि कम है. भारत सरकार अपने बजट को पूरा करने के लिए सात लाख करोड़ का कर्ज़ लेगी. इसे लेकर बिजनेस अख़बारों में बहस चल रही है कि ठीक है या नहीं. उम्मीद है हिन्दी के कूड़ा और चमचा अख़बार और चैनल आप दर्शक और पाठकों को इस महत्वपूर्ण विषय के बारे में जानकारी दे रहे होंगे.
ऑटोमोबाइल सेक्टर में उत्पादन ठप्प होने और बिक्री काफी घट जाने के कारण कितनों की नौकरियां गईं हैं, इसकी ठोस जानकारी नहीं है. कभी किसी अखबार में 25,000 छपता है तो कभी 30,000. इस तिमाही में बिक्री की हालत पिछले दस साल में सबसे बदतर है. पंतनगर में अशोक लेलैंड ने अपनी फैक्ट्री 9 दिनों के लिए बंद कर दी है क्योंकि मांग ही नहीं है. पिछले महीने भी एक हफ्ते के लिए प्लांट बंद था. इसका असर स्टील निर्माताओं पर भी पड़ रहा है. मांग कम होने के कारण हालत खराब है. टाटा स्टील के टी वी नरेंद्ररन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा है कि ओला और ऊबर के कारण युवा पीढ़ी कम कारें खरीदेगी. इसके कारण भी मांग घट रही है.
HIS Markit India ने एक बिजनेस सर्वे कराया है. इस सर्वे मे यह निकल कर आया है कि बिजनेस सेंटीमेंट तीन साल में सबसे कम है. प्राइवेट कंपनियों ने अपना आउट पुट ग्रोथ अब 18 प्रतिशत की जगह 15 प्रतिशत ही देख रही हैं. डॉलर के सामने रुपया कमज़ोर हो रहा है इसलिए आयात महंगा होता जा रहा है. मांग कम होने के कारण सरकार की नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं.
कर्ज़ न मिलने के कारण रियल स्टेट सेक्टर की भी हालत ख़राब है. 20 प्रतिशत ब्याज़ पर लोन लेने पड़ रहे हैं.
कॉर्पोरेट की कमाई घट गई है. भारत की चोटी की कंपनियों ने बताया है कि कर्ज़ का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भी हालत खराब है. जिस अनुपात में कर्ज़ बढ़ रहे हैं उस अनुपात में शेयरधारकों की कमाई नहीं हो रही है. जिसके कारण उनका बैलेंसशीट कमज़ोर हो गया है.
महेश व्यास ने लिखा है कि 2017-18 मे कंपनियों में रोज़गार वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत ही रही. 2016-17 में 2.6 प्रतिशत थी. जबकि यह बेहतर आंकड़ा है पिछले वर्षों की तुलना में. रोज़गार घटा है. लेकिन मज़दूरी थोड़ी बढ़ी है. महेश लिखते हैं कि मात्र 46 प्रतिशत कंपनियों ने ही रोज़गार वृद्धि दर्ज की है. 41 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार घटे हैं. 13 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
महेश व्यास लिखते हैं कि नौकरी मिलने और सैलरी बढ़ने का स्वर्ण युग 2003-04 से 2008-09 ही था. 2013-14 तक कॉर्पोरेट सेक्टर में रोज़गार बढ़ता रहा. जब भी जीडीपी 7 प्रतिशत थी. मज़दूरी 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी और रोज़गार 3.5 प्रतिशत की दर से. यानि 7 प्रतिशत जीडीपी का असर दिखता था. इसकी तुलना मौजूदा सरकार की 7 प्रतिशत जीडीपी दौर में ऐसा नहीं लगता है. रोज़गार घट रहा है और मज़दूरी काफी कम बढ़ रही है. महेश व्यास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है.
इसके अलावा भारत में सब ठीक है. जियो का भी गांवों में ग्रोथ सबसे अधिक है. वोटाफोन और एयरटेल ने लाखों उपभोक्ता बढ़ा दिए हैं. ठीक होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है.
2019 का चुनाव दुनिया का लैंडमार्क चुनाव था. 45 साल में सबसे अधिक बेरोज़गारी का मुद्दा पिट गया. बेरोज़गारों ने बेरोज़गारी के सवाल को ही ख़ारिज कर दिया. उन्हें बेरोज़गार रहना पसंद था मगर मोदी का हारना नहीं. बीजेपी को शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि युवा उनसे नौकरी नहीं मांगते हैं. ऐसी किस्मत दुनिया में किसी भी पार्टी को नसीब नहीं हुई है. सारे गठबंधन हवा में उड़ गए. बेरोज़गारी मज़ाक का मुद्दा है. ऐसा सिर्फ नरेद्र मोदी की प्रचंड लोकप्रियता और उनके नेतृत्व में गहरी आस्था के कारण हो सका.
Also Read
-
Anatomy of a ‘conspiracy’: How UP cops turned a wage protest into a national security case
-
A Delhi SIR mystery: 728 of 729 voters deleted in booth, poll official says their homes ‘unauthorised’
-
Nepal flash floods: When disaster becomes content
-
‘Once they see the money, they keep building’: Inside Delhi’s PG ecosystem built on a hostel shortage
-
एनएल चर्चा 440: ब्रिक्स के मंच पर वैश्विक नेता, मणिपुरी संगीतकार चांगथम विक्रम की हत्या और दिल्ली में दर्दनाक पीजी हादसा