Campus Politik
महिला दिवस: सस्ती शिक्षा के लिए लड़ रही डीयू छात्राओं की तस्वीर गायब
8 मार्च को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस था. देश भर में इसे लेकर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए. सोशल मीडिया पर आम इंसान से लेकर प्रधानमंत्री तक ने इस पर ट्वीट किया. डिजिटल दुनिया में इस दिन माहौल कुछ ऐसा बनता है जिसे देखकर लगने लगता है कि सब कुछ बहुत अच्छा-अच्छा हो रहा है. लेकिन महिला दिवस के दिन भी कई जगहों पर महिलाओं ने अपने हक के लिए प्रतिरोध की आवाज़ उठाई जिसकी चर्चा कहीं नहीं सुनाई दी.
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं पिछले 27 फरवरी से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठी हैं. मुखर्जीनगर में स्थित गर्ल्स हॉस्टल कॉम्प्लेक्स (जिसमें 5 छात्रावास हैं) की छात्राएं छात्रावास शुल्क को वहनयोग्य बनाने, कर्फ़्यू टाइमिंग खत्म करने, छात्रावास आवंटन के दौरान आरक्षण ठीक ढंग से लागू करने सहित और भी कई मांगों को लेकर दिन रात धरने पर बैठी हुई हैं. आज उनके इस अनिश्चितकालीन धरने का 12 वां दिन है.
छात्राएं क्यों कर रही हैं प्रदर्शन?
महंगी फ़ीस के ख़िलाफ़ कई विश्वविद्यालय और कॉलेजों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है. जेएनयू, आईआईटी और आईआईएमसी जैसे संस्थानों के बाद अब दिल्ली विश्वविद्यालय भी इस कड़ी में जुड़ गया है. डीयू के महिला छात्रावासों में एक साल की फ़ीस 51 हज़ार 900 रु है. मेस की फीस 30 हज़ार 375 रु सालाना अलग से. यानी हॉस्टल और मेस को मिलाकर कुल फीस यहां सालाना 80 हज़ार से भी ऊपर चली जाती है.
इन महिला छात्रावासों में रात दस बजे के बाद बाहर आने-जाने की मनाही है. कैंपसों में इसे कर्फ़्यू टाइमिंग का नाम दिया गया है जिसमें प्रशासन अपने नियम कानून से छात्र-छात्राओं को कैद करने की कोशिश करता है. जब छात्राएं यहां देर से आती हैं तो उन्हें नोटिस के साथ-साथ आर्थिक जुर्माना भी भरना पड़ता है. हर छोटी-छोटी बातों पर यहां आर्थिक जुर्माना लिया जाता है.
दिल्ली विश्वविद्यालय में 24×7 लाइब्रेरी की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन छात्राओं को रात 8:30 तक हॉस्टल में लौट जाना होता था जिसे अब बढ़ाकर रात 10 तक कर दिया गया है.
किरोड़ीमल कॉलेज से मास्टर्स कर रहीं और प्रदर्शन में शामिल पल्लवी कहती हैं कि “यूजीसी के 2015 का गाइडलाइन है जिसमें असुरक्षा के नाम पर प्रशासन द्वारा कोई भी मनमानी फैसला छात्राओं पर नहीं थोपा जा सकता".
छात्राएं ये भी कहती हैं कि छात्रावास आवंटन के दौरान आरक्षण को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता. इसके साथ बीस और बिंदुओं में इनकी मांग है जिसको लेकर 12 दिनों से ये लगातार धरने पर बैठी हुई हैं.
छात्राओं ने प्रशासन पर लगाए कई गंभीर आरोप
प्रदर्शन कर रहीं छात्राओं ने विश्वविद्यालय और हॉस्टल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं. छात्राएं बताती हैं कि अपने हक के लिए आवाज़ उठाने के कारण उन्हें हास्टल प्रशासन के मोरल पुलिसिंग का सामना करना पड़ रहा है जो की बिल्कुल मानसिक उत्पीड़न के बराबर है.
लॉ फैकल्टी की छात्रा अमिशा बताती हैं, “अंबेडकर गांगुली हॉस्टल की वार्डन एक छात्रा को ये कहती हैं कि एक लड़की की बॉडी मिस्ट्री होती है, और अगर वो ढंकी हुई न हो तो मिस्ट्री रिवील हो जाती है".
अमिशा ने मौरिसनगर थाने के सब इंस्पेक्टर रोहित के ख़िलाफ़ भी जबरन धक्कामुक्की करनी की शिकायत दर्ज कराई है लेकिन अबतक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई. अमिशा ने कहा कि सब इंस्पेक्टर ने कैंपस के भीतर एक रैली में छात्राओं के साथ हाथापाई और दुर्व्यवहार किया था.
मिरांडा हाउस में पढ़ाई कर रहीं और अंडरग्रेजुएट हॉस्टल की छात्रा अदिति बताती हैं “सुविधा के नाम पर स्थिति बहुत ही बदतर है. छात्राओं को पीने का पानी भी बाहर से मंगवाना पड़ता है. जब हम इस बारे में बात करते हैं तो कहा जाता है कि अगर कोई भी सुविधा बढ़ाई जाएगी तो फीस भी उसके अनुरूप बढ़ेगी."
अदिति कहती हैं कि एक पब्लिक फंडेड इंस्टिट्यूशन में हमें बार-बार कहा जाता है कि यहां सबकुछ सेल्फ़ फाइनेंस है.
नॉर्थ ईस्टर्न छात्रावास की पल्लवी राज को प्रोवोस्ट द्वारा एक नोटिस जारी किया गया जिसमें प्रदर्शन को शर्मिंदगी बताया गया. जब छात्रा ने पत्र लिखकर यह पूछा कि यह नोटिस परामर्श है या कारण बताओ नोटिस तो अबतक उन्हें इसका कोई जवाब नहीं मिला.
छात्रावास में रह रही अन्य छात्राएं कहती हैं कि इसके जड़ में पितृसत्तात्मक सोच है जिसके ख़िलाफ़ उन्हें लड़ना पड़ रहा है. प्रशासन पर उनका आरोप है कि जब वो अपने अधिकारों और जायज़ मांगों के लिए यहाँ बैठी हैं तो उनपर आपत्तिजनक टिप्पणी करके उनका मोरल पुलिसिंग किया जाता है.
प्रदर्शन के दो सप्ताह लेकिन कोई आश्वासन नहीं
छात्राएं भले ही पिछले 12 दिनों से यहां बैठी हुई हैं लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहा. छात्राओं का आरोप है कि प्रशासन उनकी मांगों पर विचार करने की बजाय बस धैर्य की परीक्षा ले रहा है.
अमिशा प्रशासन पर आरोप लगाती हैं कि “जब भी हम वार्डन या प्रोवोस्ट के पास अपनी समस्याओं को लेकर जाते हैं, तो वो ये कहती हैं कि वो अब वार्डन प्रोवोस्ट नहीं हैं क्योंकि उनका कार्यकाल पूरा हो गया है. जवाबदेही तय करने के समय वो खुद को कुछ भी नहीं बताती हैं, लेकिन आवास की सुविधा उठाने और नोटिस जारी करने समय वो इस पद पर पुनः वापस आ जाती हैं."
पल्लवी कहती हैं कि उन्होंने इस बारे में कुलपति और प्रॉक्टर को कई पत्र लिखे हैं लेकिन कुछ भी सकारात्मक निकलकर नहीं आ रहा. उनका ये आरोप है कि “विश्वविद्यालय और हॉस्टल दोनों प्रशासन अपनी जवाबदेही से भाग रहे हैं. वार्डन की ओर से यह कहा जाता है कि छात्राओं की मांग को लागू करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है. वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन कहता है कि ये सारी चीज़ें वार्डन के अधिकार क्षेत्र के अंदर आता है."
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला सुरक्षा
दिल्ली विश्वविद्यालय की इन छात्राओं को जब आप सुनेंगे तो ये 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला सुरक्षा' दोनों बस एक जुमला मात्र लगेगा. सवाल उठता है कि क्या बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का आइडिया इस बात से पूरा होगा जब एक सार्वजनिक वित्तपोषित संस्थान में छात्राओं को सिर्फ़ रहने के लिए महीने का 5-6 हज़ार रुपए चुकाना पड़े? क्या देशभर और दिल्ली में महिला सुरक्षा पर बहुत बेहतर कार्य किये गए हैं ये इससे साबित होगा कि लड़कियों को उनके कमरे में बंद कर दिया जाए? इस प्रदर्शन और छात्राओं की मांगों से ये दो बहुत लाज़िम सवाल उठ रहे हैं. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के कुल फंड में से 65-91 प्रतिशत तक सिर्फ़ इसके विज्ञापन पर खर्च कर दिया गया और ज़मीन पर दिख रहा है सस्ती शिक्षा के लिए बेटियों का प्रदर्शन. महिला सुरक्षा के नाम पर दिल्ली में सरकार बन गई लेकिन असुरक्षा की बात कहकर आज भी महिलाओं को कमरे में बंद किया जा रहा है.
छात्राओं की मांगें
छात्राओं ने 20 बिंदुओं में अपने मांगपत्र तैयार किया है जिसमें हॉस्टल की फ़ीस, कर्फ़्यू टाइमिंग को खत्म करना, हर सत्र में रिएडमिशन और इंटरव्यू बंद करना और आरक्षण को सही ढंग से लागू करना मुख्य मांगें हैं.
बीए फर्स्ट ईयर की छात्रा अदिति कहती हैं, “दिल्ली यूनिवर्सिटी में देशभर से और हर तबके से लड़कियां पढ़ने आती हैं. इन्हें कम से कम फ़ीस में बेहतर सुविधाएं दी जानी चाहिए. शिक्षा एक ऐसी चीज़ है जो निशुल्क होनी चाहिए और हमें इतनी आज़ादी तो होनी ही चाहिये कि जब भी हमें बाहर जाने का मन करे तो हम बिना ये सोचे बाहर जा सकें कि हमारी सुरक्षा को कोई खतरा है. प्रशासन को हमारी सुरक्षा के उपाय करने चाहिये न कि कमरे में बंद करना देना सुरक्षा का विकल्प है".
मिरांडा हाउस में राजनीतिक विज्ञान से स्नात्क कर रहीं श्रेया कहती हैं, “जब हमें एक बार हॉस्टल अलॉट हो जाता है तो दूसरे सेशन में रिएडमिशन जायज़ नहीं है. इसमें हमें इंटरव्यू के दौर से गुजरना होता है और लड़कियों को ये स्वीकार कराया जाता है कि वो अथॉरिटी से कोई सवाल नहीं करेंगी और न ही किसी प्रदर्शन का हिस्सा होंगी. हम चाहते हैं कि इस तरह की मोरल पुलिसिंग बंद हो और कैंपस में हर गलत के ख़िलाफ़ रेसिस्टेंस और डिसेंट की आवाज़ उठती रहे."
छात्राओं ने कहा कि प्रशासन से अब भी उनकी उम्मीदें हैं कि वो आकर उनकी मांगों पर गौर करेंगे और जबतक उनकी पूरी मांगें नहीं मान ली जाती वो धरने पर बैठी रहेंगी.
स्टूडेंट्स यूनियन : फीस के मसले पर साथ लेकिन हॉस्टल कोई धर्मशाला नहीं
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष अक्षित दहिया का इस प्रदर्शन पर कहना है कि फीस के मसले पर वो छात्राओं के साथ खड़े हैं. उन्होंने कहा कि “दिल्ली विश्वविद्यालय में हर सामाजिक परिवेश से लोग पढ़ने आते हैं इसलिये प्रशासन को चाहिए कि कम से कम फीस रखी जाए जिससे सबके लिये यहां की शिक्षा सुलभ हो. मैं निजी तौर पर भी और एबीवीपी और डीयू छात्रसंघ दोनों की तरफ़ से इस मांग पर मैं उनके साथ खड़ा हूं."
कर्फ़्यू टाइमिंग पर अक्षत प्रदर्शन कर रहीं छात्राओं के साथ नहीं दिखे. उन्होंने हमसे बातचीत में कहा कि, “हॉस्टल, हॉस्टल होता है कोई धर्मशाला नहीं कि कोई कभी भी आता जाता रहे. हॉस्टल में एक टाइमिंग तो होनी ही चाहिये. हॉस्टल हमें अनुशासन भी सिखाता है और 24×7 कोई भी कहीं भी आता जाता रहे इसमें मैं न तो निजी तौर पर और न ही डीयू छात्रसंघ छात्राओं के साथ खड़ा है. हां, मैं ये मानता हूं कि कोई भेदभाव नहीं होनी चाहिए. लड़का हो या लड़की सबके लिए हॉस्टल में टाइमिंग होनी चाहिए. आधे-एक घंटे टाइमिंग बढ़ सकती है लेकिन 24×7 में छात्रसंघ इनके साथ खड़ा नहीं है".
प्रदर्शन कर रही छात्राओं ने अध्यक्ष पर आरोप लगाया कि कई कॉल्स के बाद भी वो उनका जवाब नहीं देते.
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