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साबरमती नदी की कोख में पल रहे इन जैविक बगों की तरफ किसी का ध्यान नहीं
वृत्तासुर नाम के राक्षस के आतंक से देवता भयभीत थे. उन भयभीतों में सबसे ज्यादा सिहरे हुए थे देवराज इंद्र. काहे कि उनको सबसे अधिक फिक्र अपनी गद्दी की होती थी. किसी बड़े देवता ने उन्हें राय दी कि ऋषि दधीचि की हड्डियों से बने अस्त्र से अगर वृत्तासुर पर प्रहार किया जाए तो वह मारा जाएगा. देवताओं ने ऋषि से उनकी अस्थियां मांग लीं और गजब यह, कि दधीचि ने सर्वोच्च त्याग करते हुए अपनी देह दान कर दी. फिर वज्र वगैरह बना और युद्ध इत्यादि हुआ. उनके इस त्याग पर शिव बहुत क्षुब्ध हुए. आज के आदिवासी हों या पुराने जमाने के शिव और दधीचि, कथित विकास के नाम पर त्याग तो भोले-भाले लोगों को ही करना होता है.
अस्तु, उन्हीं ऋषि दधीचि के आश्रम को पवित्र करने भगवान शिव देवी गंगा को लेकर गुजरात आए थे, और इससे ही जन्म हुआ था काश्यपी गंगा का जिसको आज हम साबरमती नदी कहते हैं. कुछ सदी पहले इसका नाम भोगवा था. भोगवा का नाम बदला तो इसके साथ नये नाम भी जुड़े.
गुजरात की वाणिज्यिक और राजनीतिक राजधानियां; अहमदाबाद और गांधीनगर, साबरमती नदी के तट पर ही बसायी गयी थीं.
साबरमती नदी से जुड़ी एक कथा यह भी है कि गुजरात सल्तनत के सुल्तान अहमद शाह ने एक बार साबरमती के तट पर आराम फरमाते वक्त एक खरगोश को एक कुत्ते का पीछा करते हुए देखा. उस खरगोश के साहस से प्रेरित होकर ही 1411 में शाह ने अहमदाबाद की स्थापना की थी. बाद में, पिछली सदी में साबरमती नदी गांधीवादियों और देशवासियों का पवित्र तीर्थ बनी क्योंकि महात्मा गांधी ने इसी नदी के तट पर साबरमती आश्रम की स्थापना की.
पिछले कुछ दशकों में यह परिदृश्य भी बदल गया है.
साबरमती अब दूसरी वजहों से खबरों में आती है. पहली खबर तो यही है, और बुरी है, कि साबरमती का पेटा सूख गया है और अब इस नदी में इसका नहीं, नर्मदा का पानी बहता है. दूसरी खबर, गुजरात सरकार ने इसके किनारे रिवरफ्रंट बनाया है. अब इस नदी के किनारे अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव से लेकर न जाने कितने आयोजन होते हैं. चीन के मालिक शी जिनपिंग को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहीं झूला झुलाया था. 2017 में विधानसभा चुनाव के वक्त यहीं रिवरफ्रंट पर, नदी में मोदी जी सी-प्लेन से उतरे थे.
बहरहाल, अगर आप कभी अहमदाबाद गये हों तो खूबसूरत दिखने वाले रिवरफ्रंट पर भी जरूर गये होंगे. क्या पता आपने नदी के पानी पर गौर किया या नहीं. जानकार कहते हैं कि साबरमती में बहने वाला पानी अत्यधिक प्रदूषित है. इस बारे में एनजीओ पर्यावरण सुरक्षा समिति और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी) ने एक संयुक्त अध्ययन किया है. इस अध्ययन में साबरमती में गिरने वाले उद्योगों के अपशिष्ट और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से गिरने वाले पानी से जुड़े तथ्य खंगाले गये.
पिछले साल की शुरुआत में आयी ‘डिजास्टरस कंडीशन ऑफ साबरमती रिवर’ नाम की इस रिपोर्ट में कई खतरनाक संदेश छुपे हैं.
रिपोर्ट कहती है कि अहमदाबाद के वासणा बैराज के आगे बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, जिसकी क्षमता 160 मिलियन लीटर रोजाना (एमएलडी) है, उसमें से गिरने वाले पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 139 मिग्रा प्रति लीटर है, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) 337 मिग्रा प्रति लीटर है और टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 732 मिग्रा प्रति लीटर है.
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के अनुसार पानी में बीओडी की मात्रा का मानक अधिकतम 10 मिग्रा प्रति लीटर तक ही है. नदी के पानी में सल्फेट की मात्रा 108 मिग्रा प्रति लीटर और क्लोराइड की मात्रा 186 मिग्रा प्रति लीटर बतायी गयी है.
इसी तरह वासणा बैराज के आगे नदी में इंडस्ट्री के गिरने वाले पानी की जांच गयी तो सामने आया कि इसमें बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 536 मिग्रा प्रति लीटर है, केमिकल ऑक्सीकजन डिमांड (सीओडी) की मात्रा 1301 मिग्रा प्रति लीटर, टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 3135 मिग्रा प्रति लीटर है. सल्फेट की मात्रा 933 मिग्रा प्रति लीटर है, वहीं क्लोराइड की मात्रा 933 मिग्रा प्रति लीटर है.
खास बात है कि कारखानों का केमिकलयुक्त कितना पानी रोजाना साबरमती में गिर रहा है इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है.
साबरमती में अपशिष्ट जल के ट्रीटमेंट के लिए एसटीपी बनाए गए हैं पर इससे एक अलग ही समस्या खड़ी हो रही है. एक अध्ययन यह भी बता रहा है कि इन एसटीपी में ट्रीटमेंट के दौरान बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते हैं. जाहिर है, इससे एक बड़ी समस्या खड़ी होने वाली है.
पर्यावरण पर लिखने वाली वेबसाइट डाउन टु अर्थ की रिपोर्ट में आइआइटी गांधीनगर में अर्थ साइंसेज के प्रोफेसर मनीष कुमार ने कहा है कि प्रदूषण की वजह से सीवेज और जलाशयों में ई कोली बैक्टिरिया में मल्टी-ड्रग एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गई है जो इसे संभवतया सुपरबग में बदल देगी.
ई कोली के सुपरबग में बदलने का क्या असर होगा?
ई कोली की अधिकतर नस्लें बीमारियों के लिए उत्तरदायी नहीं हो लेकिन उनमें से कई डायरिया, न्यूमोनिया, मूत्राशय में संक्रमण, कोलकइटिस और नवजातों में मेनोजाइटिस पैदा कर सकती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह काम सीवेज ट्रीटमेंट में क्लोरीनेशन और अल्ट्रा-वायलेट रेडिएशन के दौरान बैक्टिरिया के जीन में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) से हुआ होगा. समस्या यह है कि अगर बैक्टिरिया से यह जीन ट्रांसफर किसी अलहदा और एकदम नयी प्रजाति को जन्म न दे दे. यह खतरनाक होगा. साबरमती नदी की कोख में पल रहे इन संभावित जैविक बगों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है.
भगवान शिव और गंगा की देन यह नदी अब नर्मदा से पानी उधार लेकर बह रही है. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि साबरमती में पानी नहर के जरिये भरा जा रहा है. रिवरफ्रंट जहां खत्म होता है वहां वासणा बैराज है, जिसके सभी फाटक बंद करके पानी को रोका गया है. ऐसे में रिवरफ्रंट के आगे नदी में पानी नहीं है और न उसके बाद नदी में पानी है. वासणा बैराज के बाद नदी में जो भी बह रहा है वो इंडस्ट्री और नाले का कचरा है. नदी में गिर रहा कचरा बेहद खतरनाक है और इस पानी का उपयोग करने वाले लोगों के लिए यह नुकसान ही करेगा.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अहमदाबाद के बाद अगले 120 किमी तक नदी में सिर्फ औद्योगिक अपशिष्ट सड़े हुए पानी की शक्ल में बहता है और यही जाकर अरब सागर में प्रवाहित होता है.
नर्मदा के खाते में भी कितना पानी बचा है जो वह इस तदर्थवाद के जरिये साबरमती को जिंदा रख पाएगा, यह भी देखने वाली बात होगी. इस वक्त प्रदूषण और सुपरबग को नजरअंदाज करने वाली जनता एक दिन दाधीचि की तरह विकास यज्ञ में अपनी अस्थियों की समिधा का दान देगी, अंदेशा यही है.
(फोटो क्रेडिट- हार्दिक जडेजा)
(साभार- जनपथ)
Also Read: नर्मदा की कहानी सहयात्री के शब्द
वृत्तासुर नाम के राक्षस के आतंक से देवता भयभीत थे. उन भयभीतों में सबसे ज्यादा सिहरे हुए थे देवराज इंद्र. काहे कि उनको सबसे अधिक फिक्र अपनी गद्दी की होती थी. किसी बड़े देवता ने उन्हें राय दी कि ऋषि दधीचि की हड्डियों से बने अस्त्र से अगर वृत्तासुर पर प्रहार किया जाए तो वह मारा जाएगा. देवताओं ने ऋषि से उनकी अस्थियां मांग लीं और गजब यह, कि दधीचि ने सर्वोच्च त्याग करते हुए अपनी देह दान कर दी. फिर वज्र वगैरह बना और युद्ध इत्यादि हुआ. उनके इस त्याग पर शिव बहुत क्षुब्ध हुए. आज के आदिवासी हों या पुराने जमाने के शिव और दधीचि, कथित विकास के नाम पर त्याग तो भोले-भाले लोगों को ही करना होता है.
अस्तु, उन्हीं ऋषि दधीचि के आश्रम को पवित्र करने भगवान शिव देवी गंगा को लेकर गुजरात आए थे, और इससे ही जन्म हुआ था काश्यपी गंगा का जिसको आज हम साबरमती नदी कहते हैं. कुछ सदी पहले इसका नाम भोगवा था. भोगवा का नाम बदला तो इसके साथ नये नाम भी जुड़े.
गुजरात की वाणिज्यिक और राजनीतिक राजधानियां; अहमदाबाद और गांधीनगर, साबरमती नदी के तट पर ही बसायी गयी थीं.
साबरमती नदी से जुड़ी एक कथा यह भी है कि गुजरात सल्तनत के सुल्तान अहमद शाह ने एक बार साबरमती के तट पर आराम फरमाते वक्त एक खरगोश को एक कुत्ते का पीछा करते हुए देखा. उस खरगोश के साहस से प्रेरित होकर ही 1411 में शाह ने अहमदाबाद की स्थापना की थी. बाद में, पिछली सदी में साबरमती नदी गांधीवादियों और देशवासियों का पवित्र तीर्थ बनी क्योंकि महात्मा गांधी ने इसी नदी के तट पर साबरमती आश्रम की स्थापना की.
पिछले कुछ दशकों में यह परिदृश्य भी बदल गया है.
साबरमती अब दूसरी वजहों से खबरों में आती है. पहली खबर तो यही है, और बुरी है, कि साबरमती का पेटा सूख गया है और अब इस नदी में इसका नहीं, नर्मदा का पानी बहता है. दूसरी खबर, गुजरात सरकार ने इसके किनारे रिवरफ्रंट बनाया है. अब इस नदी के किनारे अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव से लेकर न जाने कितने आयोजन होते हैं. चीन के मालिक शी जिनपिंग को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहीं झूला झुलाया था. 2017 में विधानसभा चुनाव के वक्त यहीं रिवरफ्रंट पर, नदी में मोदी जी सी-प्लेन से उतरे थे.
बहरहाल, अगर आप कभी अहमदाबाद गये हों तो खूबसूरत दिखने वाले रिवरफ्रंट पर भी जरूर गये होंगे. क्या पता आपने नदी के पानी पर गौर किया या नहीं. जानकार कहते हैं कि साबरमती में बहने वाला पानी अत्यधिक प्रदूषित है. इस बारे में एनजीओ पर्यावरण सुरक्षा समिति और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी) ने एक संयुक्त अध्ययन किया है. इस अध्ययन में साबरमती में गिरने वाले उद्योगों के अपशिष्ट और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से गिरने वाले पानी से जुड़े तथ्य खंगाले गये.
पिछले साल की शुरुआत में आयी ‘डिजास्टरस कंडीशन ऑफ साबरमती रिवर’ नाम की इस रिपोर्ट में कई खतरनाक संदेश छुपे हैं.
रिपोर्ट कहती है कि अहमदाबाद के वासणा बैराज के आगे बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, जिसकी क्षमता 160 मिलियन लीटर रोजाना (एमएलडी) है, उसमें से गिरने वाले पानी में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 139 मिग्रा प्रति लीटर है, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) 337 मिग्रा प्रति लीटर है और टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 732 मिग्रा प्रति लीटर है.
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के अनुसार पानी में बीओडी की मात्रा का मानक अधिकतम 10 मिग्रा प्रति लीटर तक ही है. नदी के पानी में सल्फेट की मात्रा 108 मिग्रा प्रति लीटर और क्लोराइड की मात्रा 186 मिग्रा प्रति लीटर बतायी गयी है.
इसी तरह वासणा बैराज के आगे नदी में इंडस्ट्री के गिरने वाले पानी की जांच गयी तो सामने आया कि इसमें बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा 536 मिग्रा प्रति लीटर है, केमिकल ऑक्सीकजन डिमांड (सीओडी) की मात्रा 1301 मिग्रा प्रति लीटर, टोटल डिजॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) की मात्रा 3135 मिग्रा प्रति लीटर है. सल्फेट की मात्रा 933 मिग्रा प्रति लीटर है, वहीं क्लोराइड की मात्रा 933 मिग्रा प्रति लीटर है.
खास बात है कि कारखानों का केमिकलयुक्त कितना पानी रोजाना साबरमती में गिर रहा है इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है.
साबरमती में अपशिष्ट जल के ट्रीटमेंट के लिए एसटीपी बनाए गए हैं पर इससे एक अलग ही समस्या खड़ी हो रही है. एक अध्ययन यह भी बता रहा है कि इन एसटीपी में ट्रीटमेंट के दौरान बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते हैं. जाहिर है, इससे एक बड़ी समस्या खड़ी होने वाली है.
पर्यावरण पर लिखने वाली वेबसाइट डाउन टु अर्थ की रिपोर्ट में आइआइटी गांधीनगर में अर्थ साइंसेज के प्रोफेसर मनीष कुमार ने कहा है कि प्रदूषण की वजह से सीवेज और जलाशयों में ई कोली बैक्टिरिया में मल्टी-ड्रग एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गई है जो इसे संभवतया सुपरबग में बदल देगी.
ई कोली के सुपरबग में बदलने का क्या असर होगा?
ई कोली की अधिकतर नस्लें बीमारियों के लिए उत्तरदायी नहीं हो लेकिन उनमें से कई डायरिया, न्यूमोनिया, मूत्राशय में संक्रमण, कोलकइटिस और नवजातों में मेनोजाइटिस पैदा कर सकती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह काम सीवेज ट्रीटमेंट में क्लोरीनेशन और अल्ट्रा-वायलेट रेडिएशन के दौरान बैक्टिरिया के जीन में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) से हुआ होगा. समस्या यह है कि अगर बैक्टिरिया से यह जीन ट्रांसफर किसी अलहदा और एकदम नयी प्रजाति को जन्म न दे दे. यह खतरनाक होगा. साबरमती नदी की कोख में पल रहे इन संभावित जैविक बगों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है.
भगवान शिव और गंगा की देन यह नदी अब नर्मदा से पानी उधार लेकर बह रही है. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि साबरमती में पानी नहर के जरिये भरा जा रहा है. रिवरफ्रंट जहां खत्म होता है वहां वासणा बैराज है, जिसके सभी फाटक बंद करके पानी को रोका गया है. ऐसे में रिवरफ्रंट के आगे नदी में पानी नहीं है और न उसके बाद नदी में पानी है. वासणा बैराज के बाद नदी में जो भी बह रहा है वो इंडस्ट्री और नाले का कचरा है. नदी में गिर रहा कचरा बेहद खतरनाक है और इस पानी का उपयोग करने वाले लोगों के लिए यह नुकसान ही करेगा.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अहमदाबाद के बाद अगले 120 किमी तक नदी में सिर्फ औद्योगिक अपशिष्ट सड़े हुए पानी की शक्ल में बहता है और यही जाकर अरब सागर में प्रवाहित होता है.
नर्मदा के खाते में भी कितना पानी बचा है जो वह इस तदर्थवाद के जरिये साबरमती को जिंदा रख पाएगा, यह भी देखने वाली बात होगी. इस वक्त प्रदूषण और सुपरबग को नजरअंदाज करने वाली जनता एक दिन दाधीचि की तरह विकास यज्ञ में अपनी अस्थियों की समिधा का दान देगी, अंदेशा यही है.
(फोटो क्रेडिट- हार्दिक जडेजा)
(साभार- जनपथ)
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