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एसिड अटैक सर्वाइवर्स बनाम सिस्टम: कानून है, न्याय कब मिलेगा?
देश मे एसिड एटैक जैसी घटनाएं गाहे-बगाहे हमारे सामने आ ही जाती है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत मे साल 2023 में एसिड अटैक के कुल 207 मामले दर्ज किए गए. जबकि 2022 में 202 मामले दर्ज किए गए थे. वहीं अगर 2017 से लेकर 2023 के बीच बात करें तो कुल 1470 मामले दर्ज किए गए. लेकिन इनमें से ज्यादातर में अभी भी कोर्ट में ट्रायल चल रहा है.
ताजा मामला एसिड अटैक सरवाइवर शाहीन मलिक का है. शाहीन पर साल 2009 में हरियाणा के पानीपत में एसिड अटैक किया गया. इस मामले में अभी अदालत में सुनवाई चल रही है. यानी शाहीन पिछले 16 सालों से न्याय का इंतजार कर रही है.
दिसंबर की शुरुआत में शाहीन मलिक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में देरी और निचली अदालतों के रवैये को देखते हुए इसे ‘सिस्टम का मजाक’ कह कर संबोधित किया. साथ ही चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया सूर्यकांत ने देश के सभी हाईकोर्ट्स को यह निर्देश दिया कि वह चार हफ्तों के भीतर एसिड अटैक के सभी मामलों की जानकारी साझा करें.
न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए शाहीन मलिक कहती हैं, “सुप्रीम कोर्ट के रवैये को देखते हुए 16 साल बाद उन्हें न्याय की उम्मीद नजर आ रही है.”
बातचीत में वह बीते 16 सालों के संघर्षों को याद करते हुए भावुक हो जाती है. वह सवाल करती हैं कि 16 साल बाद अगर मुझे न्याय मिल भी जाता है क्या वो काफी होगा? क्या उनके 16 साल के अपमान, सामाजिक तिरस्कार और कठिनाइयों की भरपाई हो पाएगी?
एसिड अटैक सिर्फ एक हमला नहीं बल्कि यह एक महिला की पहचान, सम्मान और उसके आत्मविश्वास पर हमला है.
सख्त कानून होने के बावजूद देश में लगातार हो रहे एसिड अटैक के मामलों के पीछे एडवोकेट सिजा नायर न्यायालय की सख्ती और संवेदनशीलता को एक बड़ी वजह बताती है. वह कहती हैं कि जब भी किसी महिला पर एसिड से अटैक होता है तो समाज उसका साथ छोड़ देता है. कई मामले में तो परिवार भी महिला के साथ खड़ा नहीं होता. ऐसे में सरकार और सिस्टम की जिम्मेदारी बनती है कि वह पीड़ित के साथ खड़ी हो लेकिन पुलिस, सरकार और न्यायालय से पीड़िता को सपोर्ट मिलने के बजाय ढुलमुल रवैया ही देखने को मिलता है. जिसकी वजह से हमलावरों के हौसले बुलंद होते हैं.
शाहीन मलिक फिलहाल दिल्ली में ‘ब्रेव सोल्स फाउंडेशन’ नाम से एक एनजीओ चलाती हैं. जहां वह एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद करती हैं. हालांकि, इस काम में भी उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
वह बताती हैं कि जब हम सरवाइवर्स के लिए मकान ढूंढते हैं तो हमें कोई अपना मकान किराए पर नहीं देना चाहता. उन्हें हमारे चेहरे डिस्टर्बिंग लगते हैं. यह समाज आरोपियों को तो स्वीकार कर लेता है लेकिन पीड़ितों को धिक्कार की नजर से देखता है.
एसिड अटैक पीड़िताओं की कहानी और सिस्टम की सुस्ती पर देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट.
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