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कितना ज़रूरी है समाज में एक फ्रॉड का होना
हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष राजेंद्र यादव ने एक दफा कहा था कि आने वाला वक़्त कहानियों का होगा. यह बात एक हद तक सच है. लेकिन यह बात भी सच है कि सत्तर साल पहले से ही मंटो की कहानियों की मांग और पढ़ने की ललक लगातार बनी ही रही है. उस दौर के कृश्न चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, अहमद नदीम क़ासमी, इस्मत चुग़ताई और ख्वाज़ा अहमद अब्बास जैसे बेहतरीन लेखकों के होने के बावजूद सआदत हसन मंटो अकेले नज़र आते हैं, जिनकी कहानियां उर्दू ही नहीं, हिंदी के साथ ही कई भारतीय भाषाओं में छपती रही हैं. मकबूलियत के ऐतबार से देखें तो मंटो आज चेखव, ओ हेनरी और मोपासां जैसे विश्वविख्यात कहानीकारों की कतार में खड़े नज़र आते हैं और पूरे दक्षिण एशिया में फैज़ अहमद फैज़ के साथ ही मंटो भी सबसे ज़्यादा पढ़े जाते हैं. मंटो की मकबूलियत यूं नहीं थी, उनकी कहानियां सीने में किसी नश्तर की तरह उतर जाती थीं. वे कहते थे कि उन्होंने कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि कहानियों ने उन्हें लिखा था.
मंटो का दौर कहानियां लिखने के लिहाज़ से एक अच्छा दौर था. सामाजिक विभीषिकाएं जब मानसिक संवेदनाओं को झिंझोड़ देती हैं, हर तरफ इंसानियत जब कत्लो-गारत हो रही होती है, तब उससे महसूस हुए दर्द को कागज़ पर उकेरना पड़ता है. जब देश में बंटवारे का माहौल बन रहा था, तब मंटो की आंखें बंटवारे के बाद होनेवाली विभीषिका को देख रही थीं. यही था मंटो का होना और यह मंटोइयत ही मंटो को अपने दौर से कहीं बहुत साल आगे की विभीषिका को देख पाने वाला कहानीकार बनाती है. मंटो ने भांप लिया था कि सिर्फ़ बंटवारा ही नहीं होगा, बल्कि इंसानी एहसास-ओ-जज़्बात का भी बंटवारा होगा, जिस पर दंगे-फसादात, खून-खराबे और औरतों पर ज़ुल्म जैसी जघन्यता को अंजाम दिया जायेगा. अपने ज़माने से सौ साल आगे चलने वाले लेखक थे मंटो और उनके अफ़साने इस बात की पूरी तरह तस्दीक भी करते हैं.
मंटो नहीं चाहते थे कि दंगों के बाद कोई यह कहे कि हज़ारों हिंदू मारे गये या हज़ारों मुसलमान मारे गये. हज़ारों इंसान मारा जाना है और भी हज़ारों लोगों का बेवजह मारा जाना मंटो के लिए एक बड़ी त्रासदी है. इस सोच के ऐतबार से देखें, तो मंटो अपने वक़्त से कहीं बहुत आधुनिक थे. बतौर कहानीकार मंटो ने सच और कल्पना के बीच की खाई को अपनी रचनात्मक विलक्षणता से भर दिया है और वहां इंसान की पाश्विकता की हदें रख दी हैं, जिसे देख-पढ़कर हम मानवीय मूल्यों का पैमाना तैयार कर सकते हैं. एक उम्दा रचनाकार बिंबों की तलाश नहीं करता, बल्कि जड़ों की तलाश करता है. मंटो की कहानियों की जड़ में वह नंगा समाज था, जिसके कपड़े उतारने की मंटो ने कभी कोई ज़हमत ही नहीं की.
मंटो की कहानियों में सबसे ज़्यादा बंटवारे की कहानियां हैं. उस वक़्त देश के बंटवारे की बात थी और आज देश के भीतर लोगों के दिलों में खाई पैदा की जा रही है. मौजूदा माहौल बंटवारे की फिज़ा से कहीं ज़्यादा खतरनाक है और इसीलिए आज मंटो की प्रासंगिकता ज़्यादा है. उनकी कहानियां समाज की सड़ी-गली और बेहद गंदी व्यवस्था में मौजूद ज़िल्लतों की कहानियां हैं, जिनमें इंसानियत को तलाशने की जद्दोजहद है. आज जिस तरह से देश में फासीज़्म ने अपना रुख़ अख्तियार किया है, धार्मिक उन्माद ने अपना फन फैलाया है, सांप्रदायिक रंजिशें राज करने की नीति बन गयी हैं, बलात्कार के वीडियो वाइरल हो रहे हैं, ऐसे में मंटो का पुनर्पाठ ज़रूरी हो जाता है. आज समकालीन साहित्यकारों, लेखकों और कहानीकारों में न तो लेखन की ऐसी क्षमता दिखती है और न ही हिम्मत. और जिन कुछ लेखकों की ज़ुबान से विरोध के स्वर उठ भी रहे हैं, सत्ता उन्हें किसी न किसी तरह कुचल दे रही है.
11 मई, 1912 को पंजाब के समराला में जन्मे सआदत हसन मंटो का उर्दू कहानियों में आज भी कोई शानी नहीं है. वह एक जीवट रचनाकार थे. मंटो के बगैर उर्दू कहानी पर कोई बात करना बेमानी है. यह बात अलग है कि मंटो ने दो बार फेल होकर इंटरमीडिएट का इम्तहान थर्ड डिवीजन से पास किया था और मजे की बात यह कि उसमें भी उर्दू के पेपर में नाकाम रहा था. मंटो ने पहली कहानी ‘तमाशा’ नाम से लिखी थी, लेकिन वह किसी और नाम से छपी थी. ज़ाहिर है, उन्हें इस बात का अंदाज़ा था कि उस पर विवाद होगा. ख़ुद को ‘फ्रॉड’ कहने वाले मंटो शब्दों के पीछे ऐसे भागते थे, जैसे कोई तितली पकड़ने भागता हो. नाकाबिले-बरदाश्त ज़माने से वह इतना नाराज़ थे कि वह बात-बात पर नाराज़ हो जाते थे. उनकी नाराज़गी कागज पर उतरती थी, तो समाज नंगा हो जाता था. उनकी कहानियों को पढ़कर यही लगता है कि धर्म-जाति के उन्माद में लिपटे हमारे जैसे संकीर्ण समाज में मंटो जैसे फ्रॉड का होना आज कितना ज़रूरी है.
मंटो हमेशा अपनी कहानियों में या तो एक किरदार बनकर नज़र आते हैं, या फिर दूर से खड़ा कोई गवाह बनकर. वह चाहे ‘टोबाटेक सिंह’ हो या फिर ‘मोज़ेल’ या कोई भी. ‘ठंडा गोश्त’, ‘काली सलवार’, ‘बू’, ‘ब्लाउज’, ‘खोल दो’ और ‘धुआं’ जैसी कहानियों ने तो समाज को झिंझोड़कर रख दिया और मंटो पर अश्लील होने के इल्ज़ाम बढ़ने लगे. समय-समय पर इन कहानियों पर पाबंदियों की मांग भी उठी और उन्हें अदालत तक में घसीटा गया. मंटो छह बार अदालत गये, तीन बार आज़ादी से पहले और तीन बार पाकिस्तान बनने के बाद, लेकिन कोई भी मामला साबित नहीं हो सका. ‘ठंडा गोश्त’, ‘काली सलवार’ और ‘बू’, ये मंटो की तीन ऐसी कहानियां हैं, जिन पर पाबंदियां भी लगीं. इन पाबंदियों से उनकी कहानियां और भी दूर-दूर तक पहुंची. मंटो पर लगे आरोपों और पाबंदियों पर मंटो की रिश्तेदार और इतिहासकार आयशा जलाल कहती हैं- मंटो के लिखे हुए अल्फाज़ इतिहास में दर्ज़ होने की कुव्वत रखते हैं.
मंटो पर बेशुमार इल्ज़ाम हैं. अश्लील कहानियां लिखने से लेकर बंटवारे का विरोध करते हुए भी भारत से पाकिस्तान चले जाने तक. मंटो उर्दू अदब के अकेले अफसानानिगार होंगे, जिनकी शोहरत को लेकर उनकी बदनामी को वजह बताया गया. यह सही बात नहीं है. उनकी कहानियों में सच्चाई इतनी कड़वी होती है कि इंसानी किरदार नंगे नज़र आते हैं. ज़ाहिर है, एक नंगा समाज ही मंटो पर अश्लील लिखने का आरोप लगा सकता है. आज के समाज में अगर मंटो होते तो गौरी लंकेश या कलबुर्गी की तरह मार दिये जाते. तो क्या हमारा वर्तमान एक त्रासद से भरे समय के बोझ तले दबा हुआ नहीं है?
जहां तक उनके पाकिस्तान चले जाने की बात है, तो यह आरोप लगाने से पहले उस वक़्त के हालात को देखना चाहिए. बंटवारे के बाद सांप्रदायिकता की आग चारों तरफ फैली हुई थी, जिसका शिकार ख़ुद मंटो जैसे लेखक को भी होना था, हुआ भी. मंटो के परिवार की आर्थिक तंगी बढ़ती जा रही थी, तो एक दिन उनकी बीवी ने कहा- ‘जो लोग आपके हाथ से एक गिलास पानी नहीं पी सकते, वे आपको रोटी कैसे दे सकते हैं? आपको आपका बुनियादी हक कैसे दे सकते हैं?’ यह सांप्रदायिकता का दंश ही था, जिसका मंटो पर असर हुआ और वे दुखी मन से हिंदुस्तान को अपने दिल में लेकर पाकिस्तान चले गये और लाहौर में बस गये. उनके पाकिस्तान जाने के बाद एक पाकिस्तानी नक्काद हसन असगरी ने पूरी कोशिश की कि मंटो जैसे अवामी लेखक को पाकिस्तानी बना दिया जाये. इसी का नतीज़ा था कि लोग मंटो पर पाकिस्तानी होने के आरोप लगाने लगे.
18 जनवरी, 1955 को उर्दू के महान कहानीकार सआदत हसन इस दुनिया को अलविदा कह गये, लेकिन हमेशा के लिए ‘मंटो’ यहीं को छोड़ गये, जिसे न तब किसी से डर था, न अब किसी से डर है. महज 42 साल की छोटी-सी ज़िंदगी में मंटो ने 300 से ज़्यादा कहानियां लिखीं. इसके अलावा भी मंटो ने रेडियो और फिल्मों के लिए लिखा और अनगिनत लेख भी लिखे. लेकिन, यह सोचकर बेहद हैरत होती है कि इतने लिख्खाड़ आदमी ने कभी कोई नॉवेल नहीं लिखा. खैर, अपनी कहानियों में मंटो आज भी ज़िंदा है और अब फिर कोई मंटो नहीं पैदा होगा.
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