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समय-समय पर संघ को वैधता दिलाने वाले कौन हैं?
90 के दशक में जब सचिन तेंदुलकर चोटी की तरफ बढ़ रहे थे तब उनकी तुलना क्रिकेट के सर्वकालिक श्रेष्ठ बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया के डॉन ब्रेडमैन से की जाने लगी थी. जैसा कि होना ही था भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर सचिन, डॉन ब्रेडमैन से मिलने गए. जब सचिन ब्रेडमैन से मिलकर निकले तो ब्रेडमैन की पत्नी ने पूछा कि तुम कैसा क्रिकेट खेलते थे कि आज भी उसकी इतनी चर्चा होती है! इस पर ब्रेडमैन ने अपनी पत्नी को जवाब दिया- “मैं कैसा खेलता था अगर यह जानना हो तो तुम सचिन को क्रिकेट खेलते हुए देख लेना, मैं लगभग वैसा ही खेलता था.”
पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन इसे भारत के लगभग सभी अखबारों ने उस समय छापा था. यह संदर्भ इसलिए है कि अगर उस समय की कांग्रेस को देखना चाहें या कल्पना करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वो आज की बीजेपी की तरह है. अंतर बस यह है कि कांग्रेस दक्षिण भारत में भी मौजूद थी और बीजेपी अपने सफलतम दौर में भी दक्षिण में नदारद है. लेकिन इसके उलट भी कहा जा सकता है कि आज जिस ताकत के साथ बीजेपी उत्तर और मध्य भारत में मौजूद है, उतनी ताकत कांग्रेस की कभी नहीं रही.
चूंकि बीजेपी इतनी बड़ी हो गई है इसलिए पिछले कुछ वर्षों में यह बहस काफी तेज़ हुई है कि जयप्रकाश नारायण (जेपी) वो अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने आरएसएस को देश की मुख्यधारा में वैधता दिलाने, ‘गांधी के हत्यारे’ की छवि से बाहर निकालने में सबसे अहम भूमिका निभाई. अगर इस तथ्य को समझने की कोशिश करें तो हम पाएंगे कि यह बात सच है लेकिन एक हद तक. यह सच है कि गांधीजी की हत्या के बाद संघ देश में तब तक लगभग अछूत बना रहा जब तक कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की अति नहीं कर दी.
लेकिन आरएसएस को वैधता देने के लिए सिर्फ एक व्यक्ति की तरफ उंगली उठाना न्यायोचित नहीं है. इसके लिए कई नेता जिम्मेदार हैं, जो आजादी से लेकर आज तक समय समय पर खिलते और मुरझाते रहे. आजादी के बाद आरएसएस ने गांधी के खिलाफ जिस तरह पूरे देश में घृणा का माहौल बनाया उसकी परिणति गांधी हत्या के रूप में हुई. हत्या की जांच में कई तार आरएसएस से जुड़े हुए पाए गए. लेकिन यह भी सही है कि आरएसएस के किसी बड़े नेता को इसके लिए सज़ा नहीं हुई. लेकिन यह भी उतनी ही बड़ी सच्चाई है कि उसके कई नेताओं से पूछताछ हुई और उनकी संदिग्ध गतिविधियों को देखकर ही तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध आयद किया था.
इस पूरी बहस में हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आरएसएस की पहुंच और वैधता वणिक (वैश्य) समाज में शुरू से ही थी. यानि आरएसएस के प्रचारकों को सामाजिक रूप से जगह बनाने में, अपनी बात कहने में भले ही दिक्कत हुई हो लेकिन आर्थिक संसाधनों का संकट उनके सामने कभी नहीं रहा. उस दौर के सामाजिक आंदोलनों और संगठनों में कांग्रेस के बाद सबसे अधिक आर्थिक संसाधन आरएसएस के पास ही था. आरएसएस के पास किस रूप में कितना आर्थिक संसाधन था इसका आंकड़ों के साथ कोई जिक्र इसलिए संभव नहीं है (और आज भी नहीं है) क्योंकि उसके संसाधनों और स्रोत का कोई ऑडिट आदि कभी नहीं हुआ, ना ही ये किसी सरकारी कायदे-कानून के तहत आता है.
इसलिए आरएसएस पर जब बात हो तो इस बात को हमेशा केन्द्र में रखा जाना चाहिए कि सामाजिक रूप से उसे किसने, कितनी मदद की? जब कांग्रेस अपने शीर्ष पर थी तो कांग्रेस पार्टी के खिलाफ सबसे पहले डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की वो जमीन तैयार की थी जहां जनसंघ और समाजवादी भीतरखाने में तालमेल बिठा रहे थे. यही कारण था कि 1967 के चुनाव में जब सात राज्यों में कांग्रेस पार्टी का पतन हुआ और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी तो उसमें जनसंघ भी शामिल था. जनसंघ यानि वर्तमान बीजेपी का पूर्ववर्ती संस्करण. यह आरएसएस का ही राजनीतिक उपक्रम था.
इसलिए जब देश में आरएसएस को वैधता दिलाने की बात होती है तो डॉ. राम मनोहर लोहिया की भूमिका को नजरअंदाज करना कतई मुनासिब नहीं होगा. लोहिया के बाद दूसरे महत्वपूर्ण नेता जेपी हैं जिन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने के बाद संघ के सक्रिय सहयोग के साथ एक राजनीतिक मंच खड़ा किया जिसमें जनसंघ सबसे महत्वपूर्ण था. जब जॉर्ज फर्नान्डीज़ जैसे समाजवादी विचारधारा के नेताओं ने आरएसएस के सांप्रदायिक अतीत पर सवाल उठाया तो जेपी ने मशहूर बयान दियाः ‘अगर संघ सांप्रदायिक है जो जयप्रकाश नारायण को भी सांप्रदायिक मानिए.’
संघ को मुख्यधारा में वैधता दिलाने की कड़ी में तीसरा महत्वपूर्ण नाम जॉर्ज फर्नान्डीज़ का है. जॉर्ज की बड़ी हैसियत थी. मजदूर नेता के रूप में पूरे भारत में उन्हें लोग जानते थे. वे आरएसएस-बीजेपी के शुरू से विरोधी थे. लेकिन जब उनकी खुद की राजनीतिक ज़मीन कमजोर हुई और पार्टी पर पकड़ ढीली पड़ने लगी तो सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने बीजेपी से कुछ ‘शर्तों’ पर समझौता कर लिया. यह 90 का दशक था. मंदिर-मस्जिद के माहौल में बीजेपी की छवि पूरी तरह से सांप्रदायिक हो चुकी थी. संघ और बीजेपी आजादी के बाद दूसरे बड़े संकट से जूझ रहे थे. बाबरी मस्जिद गिराने के चलते बीजेपी के दामन पर ऐसा दाग लगा था कि देश में अमन चाहने वाले मान चुके थे कि बीजेपी सचमुच मुसलमानों की विरोधी है. लेकिन जॉर्ज ने इसके बावजूद बीजेपी से राजनीतिक समझौता किया.
बीजेपी की सांप्रदायिक पहचान को दरकिनार कर उससे हाथ मिलाने वालों में चौथा बड़ा नाम समाजवादी और सामाजिक न्याय के खिलाड़ी नीतीश कुमार का है. जिस बीजेपी को 1990 से पहले सांप्रदायिक, मुस्लिम विरोधी माना जाता था, मंडल आयोग की सिफारिशों का विरोध करने के बाद उस पर पिछड़ा व दलित विरोधी ठप्पा भी लग चुका था.
माना जाता है कि मंडल की काट में ही बीजेपी संघ ने कमंडल का दांव चला था. बीजेपी उस दौर में खुले तौर पर मंडल आयोग का विरोध नहीं कर पा रही थी लेकिन उके शीर्ष नेतृत्व में पिछड़ा-दलित वर्ग के नेताओं की गैरमौजूदगी इस छवि को पुख्ता करती थी. एक कल्याण सिंह को छोड़कर बीजेपी के नेतृत्व में तब तक एक भी पिछड़ा लीडर शामिल नहीं था. नीतीश कुमार की समता पार्टी ने 1996 में जब बीजेपी के साथ हाथ मिलाया तो इससे बीजेपी की सांप्रदायिक और सवर्णवादी पहचान में थोड़ी कमी आई.
इस कड़ी में एक नाम कांशीराम का भी है. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद कांशीराम ने सपा-बसपा गठबंधन की रूपरेखा तय की. नतीजे में मुलायम सिंह प्रचंड जीत के साथ मुख्यमंत्री बने. यह 1993 की बात है. इसे दलित-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की राजनीति का सबसे मजबूत राजनीतिक सहयोग के रूप में देखा जाने लगा. लेकिन कुछ ही महीनों के बाद जब मायावती के साथ सपा के मतभेद उभरे तो बसपा प्रमुख कांशीराम ने बीजेपी के साथ मिलकर मायावती के नेतृत्व में सरकार बनवाने को अपनी सहमति दी.
सवर्णों की राजनीति कर रही बीजेपी का यह सबसे कामयाब रणनीतिक कदम था क्योंकि इससे बीजेपी दलितों के बीच यह संदेश देने में सफल रही कि वह उनके खिलाफ नहीं है. इस प्रकार बीजेपी को जातीय आधार पर अछूत मानने वाले दलितों के मन में अब बीजेपी को लेकर इतनी नफरत नहीं रह गई. मायावती के नेतृत्व में बसपा ने बीजेपी के साथ तीन बार गठबंधन किया. हद तो यहां तक हुई कि गुजरात दंगे के ठीक बाद मायावती उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात में नरेन्द्र मोदी का चुनाव प्रचार करने भी गईं. कहने का अर्थ है कि कांशीराम के एक गलत कदम से बीजेपी को कई कदम आगे छलांग लगाने में मदद मिली. बीजेपी ने अपने ऊपर से सांप्रदायिकता और जातिवादी होने का ठप्पा हटा दिया.
आरएसएस-बीजेपी को समाज में स्वीकृति दिलाने के मामले में बिहार के दो बड़े नेताओं का जिक्र हुए बिना ये सूची अधूरी रह जाएगी. शरद यादव और रामविलास पासवान. वीपी सिंह की सरकार में मंडल आयोग की अनुशंसा लागू होने के बाद इसका पूरा श्रेय सरकार में शामिल शरद यादव और रामविलास पासवान ने आपस में बांटना चाहा. दोनों नेता मंडल आयोग के लागू होने के बाद उस दौर में बीजेपी को सवर्णों की पार्टी के रूप में चिन्हित करते थे. लेकिन जैसे ही उनकी अपनी हैसियत जनता दल में कमजोर हुई, दोनों उसी ‘ब्राह्मणवादी’ बीजेपी से जा मिले. अब बीजेपी उनके लिए पिछड़ों-दलितों का हक़ मारने वाली पार्टी नहीं रही. शरद यादव और रामविलास पासवान का बीजेपी नेतृत्व की छत्रछाया में आ जाना सामाजिक न्याय की धारा की तरफ से यह मान लेना था कि आरएसएस या बीजेपी सचमुच दलित-पिछड़ा विरोधी नहीं है अन्यथा वीपी सिंह के बाद मंडल आयोग के दो सबसे बड़े ‘मसीहा’ कैसे बीजेपी के साथ होते? इस तरह बीजेपी की दलितों और पिछड़ों में स्वीकार्यता गहरी हो गई.
ये सभी नेता अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए पहले जनसंघ से मिले, फिर बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और आरएसएस को अपनी ज़मीन मजबूत करने में योगदान दिया. वास्तव में राममनोहर लोहिया पहले राजनेता थे जो इस खतरे को सबसे अच्छी तरह जानते थे फिर भी उन्होंने यह गलती की थी. लोहिया पहले समाजवादी नेता थे जो सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए लड़ रहे थे. अगर लोहिया कुछ दिन और जिंदा रहते तो यकीनी तौर पर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ होता.
राममनोहर लोहिया ने वर्षों पहले भारत पाकिस्तान के बंटबारे को लेकर एक किताब लिखी थी- ‘भारत विभाजन के गुनाहगार.’ बिना नाम लिए उन्होंने बताया था कि गुनाहगार कौन हैं. मेरा अनुमान है कि अगर आज लोहिया जिंदा रहते तो शायद उनकी किताब का नाम होता- ‘आरएसएस को वैधता दिए जाने के गुनाहगार.’
जो साफगोई और ईमानदारी डॉ. लोहिया में थी, वे बिना झिझक यह लिखते कि कैसे उन्होंने अकेले आरएसएस को ‘गांधी हत्या’ के पाप से मुक्त किया है. लेकिन मंडल के दोनों खिलाड़ी- शरद यादव और रामविलास पासवान आज भी अपने लिए बीजेपी के तंबू में बड़ा अवसर तलाश रहे हैं!
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