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क्या पीएम किसान सम्मान निधि सिर्फ लोकसभा चुनाव जीतने का हथकंडा था
पंजाब के मानसा जिले के झंडा खुर्द गांव के रहने वाले किसान लालचंद के मोबाइल पर एक मैसेज आता है. मैसज अंग्रेजी में था, इसलिए वे पढ़ नहीं सकते. पड़ोसी को मैसेज दिखाने लालचंद उसके घर जाते हैं. यह मैसेज एम किसान के नाम से आया. उसमें लिखा था कि उन्हें पीएम किसान योजना की तीसरी किस्त नहीं मिल सकती क्योंकि उनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में गलत है. झुंझलाए लालचंद कहते हैं, “मैंने अपने कागज़ पूरे दिए, उसमें नाम भी सही है. मुझे इससे पहले की दो किस्तें भी मिल चुकी हैं. अगर नाम की गलती थी तो फिर पहली दो किस्तें कैसे उन्हें मिल गईं?” लेकिन लालचंद अकेले ऐसे किसान नहीं हैं जिन्हें यह मोबाइल मैसेज आया है. कुछ इस तरह के मैसेज पूरे देश के किसानों के मोबाइल में घूम रहे हैं.
सरकार की वेबसाइट पीएम किसान के अनुसार, पूरे देश में पहली किस्त लगभग साढ़े सात करोड़ लोगों को मिली थी. दूसरी किस्त में एक करोड़ लोग सीधे बाहर कर दिए गए. लिहाजा यह संख्या घटकर लगभग 6 करोड़ रह गई थी. मौजूदा तीसरी किस्त में पहली किस्त के मुक़ाबले 50 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट की गई है. लिहाजा अब इसके लाभार्थियों की संख्या 3 करोड़ 46 लाख 16 हज़ार रह गई है. अचानक से 4 करोड़ किसानों को इस योजना से बाहर कर देना कई तरह के सवाल खड़े करता है. सरकार की मंशा पर उंगलियां उठ रही हैं. आखिर किसान का ‘सम्मान’ निरंतर घट क्यों रहा है? अचानक से करोड़ों किसानों का सूची से बाहर क्यों कर दिया गया? अगर पंजीयन में कोई समस्या थी तो फिर पहली दो किस्त क्यों दी गई? क्या यह सिर्फ लोकसभा चुनाव जीतने का हथकंडा था?
कुछ किसानों इस तर्क से सहमत हैं कि सरकार को चुनाव के समय वोट लेना था इसलिए ये पूरी योजना चलाई गई. अब वोट मिल चुके हैं तो हमें पैसा देने या ना देने से सरकार को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. लोकसभा चुनाव के समय लोगों का पंजीयन आनन फ़ानन में कर दिया गया. लेकिन चुनाव हो जाने के बाद अब उन किसानों को एसएमएस के जरिए बताया जा रहा है कि आपका पंजीयन रद्द किया जा रहा है और आपको किसान सम्मान निधि योजना के तहत राशि नहीं मिलेगी.
उल्लेखनीय है कि पीएम किसान सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के आखिरी साल में चुनावों से ठीक पहले शुरू की थी. इसका पूरा अनुदान केंद्र सरकार के बजट से आता है. इस साल फ़रवरी में अंतरिम केंद्रीय बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने इस महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की थी. इसके तहत 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों को सालाना 6000 रुपये मिलने थे जिसे 2000 रूपये की तीन क़िस्तों में देने का प्रावधान किया गया था. पैसे सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में जमा होने थे और इसकी पहली किस्त दिसंबर 2018 से मिलनी शुरू हो चुकी है.
‘बिज़नस स्टैंडर्ड’ में 5 नवंबर को छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘पीएम किसान योजना’ का पैसा अब ‘मनरेगा’ के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. सरकार ने ‘पीएम किसान’ योजना के लिए चालू वित्त वर्ष में 75,000 करोड़ रुपए आवंटित किए थे जिसमें से 25,000 करोड़ रुपए बच जाने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसलिए सरकार इस बचे हुए पैसे के कुछ हिस्से का इस्तेमाल अब मनरेगा में करने की योजना बना रही है. सरकार बहुतेरे किसानों के इसलिए पैसे नहीं भेज रही है क्योंकि उनका पंजीयन नहीं हुआ है. किसान कह रहे हैं कि हम पंजीयन करवाना चाहते हैं, लेकिन सरकारी दफ्तरों में उनकी कोई सुनता नहीं है या बेमतलब के कारण बताकर उन्हें चलता कर दिया जाता है.
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के किसान प्रेमशंकर ने बताया, “चुनाव से ठीक पहले मुझे विज्ञापन के माध्यम से सूचना मिली कि सरकार किसानों के लिए ‘पीएम किसान’ स्कीम शुरू कर रही है. मैंने भी अपना नाम रजिस्टर करवाया. सभी जरूरी कागज़ात भी जमा कर दिए. लेकिन नौ महीने बीतने के बाद अभी तक कोई पैसा नहीं आया है. दफ़्तर के चक्कर काटने के बाद अब पता चला है कि उन्होंने मेरा अकाउंट नंबर ग़लत भर दिया है.”
इस ग़लती को सुधारने के लिए प्रेमशंकर ने दोबारा अपना नाम रजिस्टर करवाया, लेकिन इसके बाद भी उनकी समस्या हल नहीं हुई है. नोडल अधिकारी से बात करते हैं तो उन्हें कोई उचित जवाब नहीं मिलता.
किसान प्रेमशंकर रुआंसे होकर कहते हैं कि, “सोच रहा था कि अगर पैसा मिल जाता तो गेहूं की बुआई में काम आ जाता.” लेकिन लगता नहीं है कि अब उन्हें पैसा मिलेगा क्योंकि अधिकतर सरकारी योजनाओं की तरह पीएम किसान सम्मान निधि योजना भी चुनावी स्टंट की तरह ज़्यादा काम करती दिख रही है. ऐसा लगता है कि यह स्कीम किसानों को राहत पहुंचाने के बजाए वोट बटोरने के काम में लाई जा रही है. हैरानी की बात नहीं है कि हरियाणा और महाराष्ट्र के अनेकों किसानों को ठीक विधानसभा चुनाव से पहले ये पैसे मिले थे.
हरियाणा के सिरसा ज़िले के अनिल को 17 अक्तूबर को मैसेज आया कि उनकी तीसरी किस्त खाते में डाल दी गई है. इसलिए अनिल अब ख़ुश है कि उनको किस्त मिल गयी है. ऐसे में, सवाल उठता है कि चुनाव से चार दिन पहले अचानक से किसानों के खाते में पैसे डालकर उनके वोट को प्रभावित करने की कोशिश तो नहीं की गई? इसकी वजह यह है कि ऐसा सिर्फ़ उन्हीं राज्यों में हो रहा है जहां चुनाव होने हैं. महाराष्ट्र के आंकड़े भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं.
महाराष्ट्र में 14 अक्तूबर तक तीसरी किस्त सिर्फ 6.63 लाख किसानों तक पहुंची थी, जो चुनाव के आते-आते अचानक तीन गुना बढ़कर 20.50 लाख हो गई. अचानक से चुनाव के पहले लाभार्थी किसानों की संख्या तीन गुणा हो गई लेकिन ऐसी दयानतदारी अन्य राज्यों के किसानों के हिस्से में नहीं आई.
एक तरफ़ किसान पैसे ना मिलने से परेशान हैं और दूसरी तरफ फ़सल बुवाई का समय निकला जा रहा है. किसान संगठन ‘भूमि बचाओ संघर्ष समिति’ के प्रवक्ता शमशेर सिंह कहते हैं, “ये योजना जल्दबाज़ी में शुरू की गई है जिसका कोई महत्व नहीं है. पहली किश्त एक तरह की रिश्वत थी कि किसान भाजपा को ही वोट करें. अब तरह-तरह के बहाने बनाकर उन्हें बाकी किश्तों से वंचित रखा जा रहा है. इस योजना का मक़सद मात्र किसानों से वोट लेना था और सरकार उसमें सफल हो गई. इसलिए सरकार इस बचे हुए पैसे का इस्तेमाल अब मनरेगा में करे या कहीं और क्या फर्क पड़ता है. किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है.”
अब समस्या किसानों की है, उनके लिए कोई भी आगे नहीं आएगा. इससे पहले इसी से मिलती जुलती योजनाएं तमिलनाडु सहित पांच राज्यों में काफी सफल रही है. उन योजनाओं को लागू करने से पहले किसानों से राय-मशविरा किया गया था. किसान संगठनों से मिलकर योजना की रूपरेखा बनाई गई थी लेकिन यहां कोई इस तरह की मंशा नहीं दिखी. ऐसा कोई तंत्र तैयार नहीं किया गया जिससे तय हो सके कि किन किसानों को लाभ मिलेगा और उसका तरीका क्या होगा?
किसान नेता शमशेर सिंह सवाल उठाते हैं, “देश में करोड़ों किसान हैं जो बटाईदारी पर खेती करते हैं, अब उन किसानों को इस योजना का लाभ कैसे पहुंचाया जाए? मान लीजिए कोई व्यक्ति 5 एकड़ ज़मीन का मालिक है, लेकिन वो ख़ुद खेती ना करके अपनी ज़मीन पट्टे पर किसी और किसान को देता है. ऐसे में उस किसान को पैसा नहीं मिलेगा जो खेत में काम कर रहा है. पैसा उसको मिलेगा जिसकी ज़मीन है. ऐसे करोड़ों किसान हैं जो इस तरह से योजना से बाहर हो गये हैं. इसलिए हम शुरू से इसका विरोध कर रहे थे. अब आप देख लीजिए परिणाम भी वैसा ही है. अगर सरकार सच में किसानों के साथ है तो इसके लिए ज़रूरी है कि उन पांच राज्यों की कार्य शैली का अनुसरण करे.’’
लेकिन मोदी सरकार क्या इन किसानों की पीड़ा को समझेगी? क्या पीएम किसान सम्मान निधि का पैसा उन सभी साढ़े सात करोड़ किसानों को मिलेगा जिन्हें उसकी पहली या दूसरी क़िस्त मिली? या फिर यह योजना चुनाव के मद्देनजर बनायी गई थी?
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