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एनएल टिप्पणी: संजय गांधी का मिशन अधूरा, एंकर एंकराएं करेंगे पूरा
खुले आसमान के नीचे बैठे किसानों और लटियन दिल्ली की आलीशान इमारतों की गर्माहट में बैठी सरकार के बीच बरफ जम गई है. कृषि कानूनों को लेकर प्रदर्शन कर रहे किसानों से किसी समझौते की सूरत बनती दिख नहीं रही है. देश में फैली टू मच डेमोक्रेसी शायद इसकी वजह है. इस बार की टिप्पणी इसी टू मच डेमोक्रेसी के इर्द-गिर्द. देश में लोकतंत्र ऐसा टू मच हुआ जा रहा है कि मोदी सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र ही स्थगित कर दिया है. टू मच डेमोक्रेसी में संसद सत्र की क्या जरूरत. आपको याद हो न हो इसी टू मच डेमोक्रेसी में पिछले मानसून सत्र में राज्यसभा में उपसभापति हरिवंशजी ने कृषि कानूनों को लाठी के जोर से पास करवा लिया था.
आलमे बदहवासी ये है कि प्रधानमंत्रीजी के आवास से महज 40 किलोमीटर दूर लाखों की संख्या में किसान बैठे हुए हैं लेकिन मोदीजी किसानों से एक अदद मन की बात करने के लिए चौदह सौ किलोमीटर दूर गुजरात के कच्छ चले गए. उन्हें सिंघु बॉर्डर जाने की फुरसत नहीं मिली. टू मच डेमोक्रेसी का प्रकोप है. ज्यादा नहीं सात-आठ महीने पहले खबरिया चैनलों पर तबलीगी जमात के खिलाफ फैला गदर आपने देखा था. तब हर एंकर और एंकरा ने तबलीगी जमात के लोगों को देश में कोरोना फैलने का जिम्मेदार ठहराया था. अब दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए इस मामले में आरोपित 36 विदेशियों को बरी कर दिया है. खबरिया चैनलों ने अदालत के इस फैसले पर शांति साध ली. टू मच डेमोक्रेसी का तकाजा है कि देश में शांति बनी रहे, देश में शांति बनी रहे इसके लिए जरूरी है कि चैनलों पर शांति बनी रहे.
किसानों के आंदोलन को लेकर खालिस्तान, नक्सलवादी, टुकड़े टुकड़े गैंग,माओवादी, पाकिस्तानी बताने वाले एंकरों को आपने देखा और सुना होगा. लेकिन ये दावा करने वाले तमाम एंकर एंकराएं क्या एक बार भी ग्राउंड ज़ीरो पर गए. हमने हर शाम प्राइम टाइम पर दुर्गंध फैलाने वाले तमाम एंकर-एंकराओं की किसान आंदोलन संबंधी ज़मीनी रिपोर्टिंग का एक जायजा इस बार की टिप्पणी में लिया है.
पिछले हफ्ते हमने आपको बताया था कि सरकार का सारा जोर किसानों की मांग सुनने या मानने से ज्यादा मीडिया की हेडलाइन मैनेज करने पर है. इस हफ्ते भी सरकार ने अपने कई मूर्धन्य नक्षत्रों को मीडिया हेडलाइन मैनेज करने के लिए मैदान में उतारा. इस बार बीजेपी नेताओं का एक गजब का तर्क सामने आया. दिस इज़ टू मच डेमोक्रेसी.
खुले आसमान के नीचे बैठे किसानों और लटियन दिल्ली की आलीशान इमारतों की गर्माहट में बैठी सरकार के बीच बरफ जम गई है. कृषि कानूनों को लेकर प्रदर्शन कर रहे किसानों से किसी समझौते की सूरत बनती दिख नहीं रही है. देश में फैली टू मच डेमोक्रेसी शायद इसकी वजह है. इस बार की टिप्पणी इसी टू मच डेमोक्रेसी के इर्द-गिर्द. देश में लोकतंत्र ऐसा टू मच हुआ जा रहा है कि मोदी सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र ही स्थगित कर दिया है. टू मच डेमोक्रेसी में संसद सत्र की क्या जरूरत. आपको याद हो न हो इसी टू मच डेमोक्रेसी में पिछले मानसून सत्र में राज्यसभा में उपसभापति हरिवंशजी ने कृषि कानूनों को लाठी के जोर से पास करवा लिया था.
आलमे बदहवासी ये है कि प्रधानमंत्रीजी के आवास से महज 40 किलोमीटर दूर लाखों की संख्या में किसान बैठे हुए हैं लेकिन मोदीजी किसानों से एक अदद मन की बात करने के लिए चौदह सौ किलोमीटर दूर गुजरात के कच्छ चले गए. उन्हें सिंघु बॉर्डर जाने की फुरसत नहीं मिली. टू मच डेमोक्रेसी का प्रकोप है. ज्यादा नहीं सात-आठ महीने पहले खबरिया चैनलों पर तबलीगी जमात के खिलाफ फैला गदर आपने देखा था. तब हर एंकर और एंकरा ने तबलीगी जमात के लोगों को देश में कोरोना फैलने का जिम्मेदार ठहराया था. अब दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए इस मामले में आरोपित 36 विदेशियों को बरी कर दिया है. खबरिया चैनलों ने अदालत के इस फैसले पर शांति साध ली. टू मच डेमोक्रेसी का तकाजा है कि देश में शांति बनी रहे, देश में शांति बनी रहे इसके लिए जरूरी है कि चैनलों पर शांति बनी रहे.
किसानों के आंदोलन को लेकर खालिस्तान, नक्सलवादी, टुकड़े टुकड़े गैंग,माओवादी, पाकिस्तानी बताने वाले एंकरों को आपने देखा और सुना होगा. लेकिन ये दावा करने वाले तमाम एंकर एंकराएं क्या एक बार भी ग्राउंड ज़ीरो पर गए. हमने हर शाम प्राइम टाइम पर दुर्गंध फैलाने वाले तमाम एंकर-एंकराओं की किसान आंदोलन संबंधी ज़मीनी रिपोर्टिंग का एक जायजा इस बार की टिप्पणी में लिया है.
पिछले हफ्ते हमने आपको बताया था कि सरकार का सारा जोर किसानों की मांग सुनने या मानने से ज्यादा मीडिया की हेडलाइन मैनेज करने पर है. इस हफ्ते भी सरकार ने अपने कई मूर्धन्य नक्षत्रों को मीडिया हेडलाइन मैनेज करने के लिए मैदान में उतारा. इस बार बीजेपी नेताओं का एक गजब का तर्क सामने आया. दिस इज़ टू मच डेमोक्रेसी.
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