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साल 2020 में आश्वस्ति भरा स्त्री पत्रकार और पत्रकारिता का दयार
भारत की स्त्री पत्रकार... गूगल के सर्च बार में यह कीवर्ड डालते ही कई आर्टिकल के लिंक के साथ कुछ तस्वीरें भी दिखती हैं. नाम खुलते हैं और यह ख़याल आता है, क्या इनमें से सारे नामों को पत्रकार कहा जा सकता है.
2020 एक साल जो अनगिनत अनिश्चितताओं से भरा रहा, कोविड ही नहीं, तमाम तरह के प्रतिरोध जिस साल का निर्माण कर रहे थे, उस साल स्त्री पत्रकार क्या भूमिका निभा रही थीं? स्मृतियों का एक पूरा ज़खीरा खुलता है और मैं अपने आपको ट्विटर पर पाती हूं. यह वाशिंगटन पोस्ट की भारतीय कोरेस्पोंडेंट निहा मसीह की ट्विटर प्रोफाइल है. जो पहली ट्वीट मुझे नज़र आती है, वह 13 जनवरी 2020 को लिखी गयी थी.
अग्रेंजी में दर्ज इस ट्वीट का हिंदी अनुवाद होगा, ‘जब मेरी बेटी बड़ी होगी और मुझसे सवाल करेगी कि मैं इस वक़्त क्या कर रही थी, मेरे पास एक जवाब होगा.’ शाहीन बाग़ की सबसे छोटी प्रदर्शनकारी पर मेरी रपट.
साल का आगाज़ यह था. इस रपट में दर्ज स्वर एक स्त्री का था जिसे एक दूसरी स्त्री ने बुलंदगी दी थी. अपने पत्रकारीय कौशल का इस्तेमाल करते हुए इस आवाज़ को दुनिया भर में पहुंचाया था निहा ने. इस ट्वीट को पढ़ते हुए मैं निहा मसीह के बाक़ी ट्वीट्स देखने लग जाती हूं. मन में एक ग़ज़ब का संतोष उभरता है... इस वक़्त में जब पत्रकारिता की आवाज़ कुंद होने लगी है, निहा जैसी लड़कियां हैं जो निडर पत्रकारिता के आयाम गढ़ रही हैं.
निहा के बारे में सोचते हुए मैं और नाम सोचने लगती हूं. क्या और भी लोग/लड़कियां हैं? मुझे याद आते हैं पंद्रह साल पहले के वे दिन जब फियरलेस पत्रकारिता करने की तमन्ना रखने वाली लड़कियों को ताना दिया जाता था, लक्ष्य की प्रीती जिंटा मत बनो.
आज सोचती हूं, लक्ष्य फिल्म की प्रीती ने बहुत सारे वे काम नहीं किये जो आज की लड़कियां कर रही हैं. वे अपना स्पष्ट विरोध सापेक्ष में रख रही हैं और पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने के लिए तमाम सुविधाओं को छोड़कर आगे बढ़ रही हैं. लॉकडाउन के दिनों में जब मज़दूर सड़कों पर थे और बाक़ी दुनिया किवाड़ों के पीछे बंद, कई स्त्री पत्रकार देश के सुदूर कोनों के दौरों पर थीं. हाशिये के लोगों की समस्याओं को दर्ज करते हुए, उनके बारे में पूरे अवगत कराते हुए.
लॉकडाउन के तुरंत बाद ही तो पूर्वोत्तर और बिहार के ज़िले बाढ़ में डूब गए थे. बाढ़ की रिपोर्टिंग हमेशा से बेहद मुश्किल मानी जाती रही है पर बीबीसी की संवाददाता प्रियंका दुबे के लिए नहीं. उन दिनों में जब घर के अंदर बैठे लोग मानसून की बातें कर रहे थे और इंद्रधनुष के रंग गिन रहे थे, प्रियंका बिहार के दूरस्थ इलाकों में बाढ़-प्रभावित लोगों का हाल लिख रही थीं.
प्रियंका और निहा... नामों की यह फेहरिश्त लम्बी है. इसी में एक नाम जुड़ता है न्यूज़लॉन्ड्री की मनीषा पांडे का. इस वक़्त जब सत्ता के फरमाबरदारों की भीड़ बढ़ती जा रही है, चाक़ू की नोक सरीखे तीखे व्यंग्य से विरोध का स्वर उठाना लगभग उतना ही बड़ा ख़तरा है जितना बड़ा देशद्रोह. ख़ासतौर पर उस वक़्त जब सत्ता ही देश का मानी बन चुका हो. मनीषा पांडे को सुनना पढ़ना, तीखे व्यंग्य के ज़रिये देश के मौजूदा हालात से रूबरू होना है.
इन निर्भीक स्वरों को साथ मिलता है दी वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी का. आरफा और राणा अयूब वे दो नाम हैं जिन्हें न केवल सशक्त स्त्री पत्रकार होने की कीमत चुकानी पड़ती है बल्कि स्त्री और अल्पसंख्यक समुदाय से होने का मूल्य भी उन्हें अदा करना पड़ता है. फिर भी न राणा अयूब चूकती हैं, न ही आरफा खानम शेरवानी पीछे हटती हैं. आरफा न केवल सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात रखती हैं बल्कि लगातार जनता के हक़ में, साम्प्रदायिकता और वैमनस्यता के खिलाफ अपनी पत्रकारिता करती रही हैं. इस वक़्त जब तथाकथित लव जिहाद कथित राष्ट्रवादियों का एकसूत्री मुद्दा बन गया है, आरफा का हालिया यूट्यूब विडियो न केवल प्रधानमंत्री को उनकी अलीगढ़ यात्रा के सन्दर्भ में आइना दिखाता है बल्कि सत्ता द्वारा पिछले छः सालों में स्थापित साम्प्रदायिक द्वेष की मानसिकता की बढ़िया पोस्टमार्टम भी करता है.
इन सशक्त ध्वनियों में बेहद ज़रूरी आवाज़ निधि राजदान और फे डी’सूज़ा की भी है. लगातार औरतों के लिए लिख रहीं इन महिला पत्रकारों ने उस अवधारणा को बल दिया है कि बोलती हुई सशक्त स्त्रियां केवल अपनी बेहतरी ही नहीं, पूरे समाज की बेहतरी की तैयारी में होती हैं. अन्यथा क्या पड़ी है कश्मीर की पत्रकार कुर्तुलैन रहबर को बाहर निकलने की, एक अनिशिचित आबोहवा में अपनी सुरक्षा को खतरे में डालने की और जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा किये जा रहे कथित विकास कार्यों से परेशान और बेघर हुए बकरवाल समुदाय के घुमक्कड़ों की पीड़ा लिखने की.
इसे शब्दशः सिद्ध किया तनुश्री पाण्डेय जैसी निडर महिला रिपोर्टरों ने. हाथरस की वह काली रात सबके ज़हन में लगभग ताज़ा ही होगी जब बलात्कार पीड़िता मनीषा बाल्मीकि की लाश को रातोरात जला दिया गया था. एक सवर्ण मुख्यमंत्री के प्रदेश में जहां स्त्रियों की पीड़ा की सुनवाई का बचा-खुचा माहौल भी समाप्ति की ओर अग्रसर था, तनुश्री एक पितृसत्तात्मक चक्रव्यूह का भेदन कर पूरे मुआमले को सामने लेकर आयी और साथ ही साथ उन्होंने यह यकीन भी पुख्ता किया कि स्त्रियां स्त्रियों के लिए हमेशा आवाज़ उठायेंगी. निश्चित रूप से यह आसान नहीं रहा होगा तनुश्री के लिए. ख़ासतौर पर तब जब सत्ता सिंचित सांप्रदायिक और वैमनस्यकारी ख़बरिया चैनल और वेबसाइटें लगातार तनुश्री की ट्रोलिंग को हवा दे रहे थे. उनके स्वर को दबाने की कोशिश कर रहे थे.
तनुश्री अकेली नहीं हैं जिन्हें इस तरह की अश्लील-अनुचित हरकतों का सामना करना पड़ा है. शिलॉन्ग टाइम्स की संपादक और उत्तर-पूर्व की मुखर पत्रकार पैट्रिशिया मुखीम की स्वतंत्र आवाज़ को भी कई बार दबाने की कोशिश की गयी है. फिर भी ये स्त्रियां लिख रहीं हैं, बोल रहीं और और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दे रही हैं.
इन सभी महिला पत्रकारों के बारे में सोचते हुए मुझे अनायास ही ‘महिला पत्रकारों’ के विषय में जानकारी इकट्ठा करते हुए कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उभर आये कुछ और चेहरे याद हो आये. स्मिता प्रकाश, रुबिका लियाक़त, श्वेता सिंह और अंजना ओम कश्यप... टीवी पर मेकअप से लकदक चेहरे. शोर मचाती हुई उनकी आवाज़ कि मापना पड़ जाए, इस आवाज़ की आवृत्ति मनुष्यों द्वारा सुने जा सकने वाले डेसिबल के अन्दर ही है अथवा उससे बाहर है. मुझे ये चेहरे लुभाते हैं. चेहरों से अधिक उनका और उनके स्वरों का भोलापन.
बड़ी प्रचलित उक्ति है, ‘रोम जब जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था.’ मुझे हमेशा लगता रहा है, यह कहानी आधी ही है. रोम जब जल रहा था, नीरो अकेला बांसुरी नहीं बजा रहा होगा. उसके साथ ज़रूर होगी दरबारियों की फ़ौज. मैं एक नज़र अपने देश के हालात पर डालती हूं और दूसरी नज़र टीवी के इन लकदक चेहरों पर. मैं नीरो के दरबारियों के चेहरों का खाका तैयार करने लग जाती हूं.
बात यहीं रुकती, अरमां यहीं नहीं संभलते... मैं थोड़ा और आगे बढ़ती हूं. श्वेता सिंह का ट्विटर अकाउंट चेक करती हूं. पिन किये हुए ट्वीट में उनकी मोहक तस्वीर को क्षण भर निहारते हुए आगे बढ़ती हूं. अगला ट्वीट देखती हूं और बिहार के शहर बख्तियारपुर पर उनकी इतिहासपरक ग्राउंड रिपोर्ट का ज़िक्र देखती हूं. मुझे लगता है पत्रकारिता को बस यहीं से यू टर्न ले लेना चाहिए. खैर, हिम्मत को एक और बूस्टर देते हुए मैं रुबिका लियाक़त के ट्वीटर प्रोफाइल तक पहुंचती हूं. उनकी सुन्दर, आग से लपलपाती हुई विडियो देखकर ख़बरदार होशियार हो जाती हूं. मैं आगे किसी भी अन्य प्रोफाइल पर जाने का इरादा त्याग देती हूं. टीवी पर ख़बर देखना तो जाने कब का छोड़ दिया है. इन बातों के मद्देनजर मैं सोचती हूं भारतीय पत्रकारिता को सींचने वाले शुरूआती लोग फिलवक्त होते तो इस दूसरी तरह की पत्रकारिता को देखकर क्या कहते?
क्या यह पत्रकारिता है? क्या पत्रकारिता की परिभाषा केवल सरकार की हां में हां मिलाना रह गयी है और अफवाह का बाज़ार गर्म करना भर? इस भाषा के पत्रकारों की ख़ातिर सब है, सत्ता का साथ और शोर भी. सरोकार की पत्रकारिता करने वाली तनु श्री, फाये डी’सूजा, पैट्रिशिया मुखीम, आरफा सरीखी लड़कियों की ख़ातिर बची है धमकी और डिजिटल ट्रोलिंग...
भारत की स्त्री पत्रकार... गूगल के सर्च बार में यह कीवर्ड डालते ही कई आर्टिकल के लिंक के साथ कुछ तस्वीरें भी दिखती हैं. नाम खुलते हैं और यह ख़याल आता है, क्या इनमें से सारे नामों को पत्रकार कहा जा सकता है.
2020 एक साल जो अनगिनत अनिश्चितताओं से भरा रहा, कोविड ही नहीं, तमाम तरह के प्रतिरोध जिस साल का निर्माण कर रहे थे, उस साल स्त्री पत्रकार क्या भूमिका निभा रही थीं? स्मृतियों का एक पूरा ज़खीरा खुलता है और मैं अपने आपको ट्विटर पर पाती हूं. यह वाशिंगटन पोस्ट की भारतीय कोरेस्पोंडेंट निहा मसीह की ट्विटर प्रोफाइल है. जो पहली ट्वीट मुझे नज़र आती है, वह 13 जनवरी 2020 को लिखी गयी थी.
अग्रेंजी में दर्ज इस ट्वीट का हिंदी अनुवाद होगा, ‘जब मेरी बेटी बड़ी होगी और मुझसे सवाल करेगी कि मैं इस वक़्त क्या कर रही थी, मेरे पास एक जवाब होगा.’ शाहीन बाग़ की सबसे छोटी प्रदर्शनकारी पर मेरी रपट.
साल का आगाज़ यह था. इस रपट में दर्ज स्वर एक स्त्री का था जिसे एक दूसरी स्त्री ने बुलंदगी दी थी. अपने पत्रकारीय कौशल का इस्तेमाल करते हुए इस आवाज़ को दुनिया भर में पहुंचाया था निहा ने. इस ट्वीट को पढ़ते हुए मैं निहा मसीह के बाक़ी ट्वीट्स देखने लग जाती हूं. मन में एक ग़ज़ब का संतोष उभरता है... इस वक़्त में जब पत्रकारिता की आवाज़ कुंद होने लगी है, निहा जैसी लड़कियां हैं जो निडर पत्रकारिता के आयाम गढ़ रही हैं.
निहा के बारे में सोचते हुए मैं और नाम सोचने लगती हूं. क्या और भी लोग/लड़कियां हैं? मुझे याद आते हैं पंद्रह साल पहले के वे दिन जब फियरलेस पत्रकारिता करने की तमन्ना रखने वाली लड़कियों को ताना दिया जाता था, लक्ष्य की प्रीती जिंटा मत बनो.
आज सोचती हूं, लक्ष्य फिल्म की प्रीती ने बहुत सारे वे काम नहीं किये जो आज की लड़कियां कर रही हैं. वे अपना स्पष्ट विरोध सापेक्ष में रख रही हैं और पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने के लिए तमाम सुविधाओं को छोड़कर आगे बढ़ रही हैं. लॉकडाउन के दिनों में जब मज़दूर सड़कों पर थे और बाक़ी दुनिया किवाड़ों के पीछे बंद, कई स्त्री पत्रकार देश के सुदूर कोनों के दौरों पर थीं. हाशिये के लोगों की समस्याओं को दर्ज करते हुए, उनके बारे में पूरे अवगत कराते हुए.
लॉकडाउन के तुरंत बाद ही तो पूर्वोत्तर और बिहार के ज़िले बाढ़ में डूब गए थे. बाढ़ की रिपोर्टिंग हमेशा से बेहद मुश्किल मानी जाती रही है पर बीबीसी की संवाददाता प्रियंका दुबे के लिए नहीं. उन दिनों में जब घर के अंदर बैठे लोग मानसून की बातें कर रहे थे और इंद्रधनुष के रंग गिन रहे थे, प्रियंका बिहार के दूरस्थ इलाकों में बाढ़-प्रभावित लोगों का हाल लिख रही थीं.
प्रियंका और निहा... नामों की यह फेहरिश्त लम्बी है. इसी में एक नाम जुड़ता है न्यूज़लॉन्ड्री की मनीषा पांडे का. इस वक़्त जब सत्ता के फरमाबरदारों की भीड़ बढ़ती जा रही है, चाक़ू की नोक सरीखे तीखे व्यंग्य से विरोध का स्वर उठाना लगभग उतना ही बड़ा ख़तरा है जितना बड़ा देशद्रोह. ख़ासतौर पर उस वक़्त जब सत्ता ही देश का मानी बन चुका हो. मनीषा पांडे को सुनना पढ़ना, तीखे व्यंग्य के ज़रिये देश के मौजूदा हालात से रूबरू होना है.
इन निर्भीक स्वरों को साथ मिलता है दी वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी का. आरफा और राणा अयूब वे दो नाम हैं जिन्हें न केवल सशक्त स्त्री पत्रकार होने की कीमत चुकानी पड़ती है बल्कि स्त्री और अल्पसंख्यक समुदाय से होने का मूल्य भी उन्हें अदा करना पड़ता है. फिर भी न राणा अयूब चूकती हैं, न ही आरफा खानम शेरवानी पीछे हटती हैं. आरफा न केवल सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात रखती हैं बल्कि लगातार जनता के हक़ में, साम्प्रदायिकता और वैमनस्यता के खिलाफ अपनी पत्रकारिता करती रही हैं. इस वक़्त जब तथाकथित लव जिहाद कथित राष्ट्रवादियों का एकसूत्री मुद्दा बन गया है, आरफा का हालिया यूट्यूब विडियो न केवल प्रधानमंत्री को उनकी अलीगढ़ यात्रा के सन्दर्भ में आइना दिखाता है बल्कि सत्ता द्वारा पिछले छः सालों में स्थापित साम्प्रदायिक द्वेष की मानसिकता की बढ़िया पोस्टमार्टम भी करता है.
इन सशक्त ध्वनियों में बेहद ज़रूरी आवाज़ निधि राजदान और फे डी’सूज़ा की भी है. लगातार औरतों के लिए लिख रहीं इन महिला पत्रकारों ने उस अवधारणा को बल दिया है कि बोलती हुई सशक्त स्त्रियां केवल अपनी बेहतरी ही नहीं, पूरे समाज की बेहतरी की तैयारी में होती हैं. अन्यथा क्या पड़ी है कश्मीर की पत्रकार कुर्तुलैन रहबर को बाहर निकलने की, एक अनिशिचित आबोहवा में अपनी सुरक्षा को खतरे में डालने की और जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा किये जा रहे कथित विकास कार्यों से परेशान और बेघर हुए बकरवाल समुदाय के घुमक्कड़ों की पीड़ा लिखने की.
इसे शब्दशः सिद्ध किया तनुश्री पाण्डेय जैसी निडर महिला रिपोर्टरों ने. हाथरस की वह काली रात सबके ज़हन में लगभग ताज़ा ही होगी जब बलात्कार पीड़िता मनीषा बाल्मीकि की लाश को रातोरात जला दिया गया था. एक सवर्ण मुख्यमंत्री के प्रदेश में जहां स्त्रियों की पीड़ा की सुनवाई का बचा-खुचा माहौल भी समाप्ति की ओर अग्रसर था, तनुश्री एक पितृसत्तात्मक चक्रव्यूह का भेदन कर पूरे मुआमले को सामने लेकर आयी और साथ ही साथ उन्होंने यह यकीन भी पुख्ता किया कि स्त्रियां स्त्रियों के लिए हमेशा आवाज़ उठायेंगी. निश्चित रूप से यह आसान नहीं रहा होगा तनुश्री के लिए. ख़ासतौर पर तब जब सत्ता सिंचित सांप्रदायिक और वैमनस्यकारी ख़बरिया चैनल और वेबसाइटें लगातार तनुश्री की ट्रोलिंग को हवा दे रहे थे. उनके स्वर को दबाने की कोशिश कर रहे थे.
तनुश्री अकेली नहीं हैं जिन्हें इस तरह की अश्लील-अनुचित हरकतों का सामना करना पड़ा है. शिलॉन्ग टाइम्स की संपादक और उत्तर-पूर्व की मुखर पत्रकार पैट्रिशिया मुखीम की स्वतंत्र आवाज़ को भी कई बार दबाने की कोशिश की गयी है. फिर भी ये स्त्रियां लिख रहीं हैं, बोल रहीं और और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दे रही हैं.
इन सभी महिला पत्रकारों के बारे में सोचते हुए मुझे अनायास ही ‘महिला पत्रकारों’ के विषय में जानकारी इकट्ठा करते हुए कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उभर आये कुछ और चेहरे याद हो आये. स्मिता प्रकाश, रुबिका लियाक़त, श्वेता सिंह और अंजना ओम कश्यप... टीवी पर मेकअप से लकदक चेहरे. शोर मचाती हुई उनकी आवाज़ कि मापना पड़ जाए, इस आवाज़ की आवृत्ति मनुष्यों द्वारा सुने जा सकने वाले डेसिबल के अन्दर ही है अथवा उससे बाहर है. मुझे ये चेहरे लुभाते हैं. चेहरों से अधिक उनका और उनके स्वरों का भोलापन.
बड़ी प्रचलित उक्ति है, ‘रोम जब जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था.’ मुझे हमेशा लगता रहा है, यह कहानी आधी ही है. रोम जब जल रहा था, नीरो अकेला बांसुरी नहीं बजा रहा होगा. उसके साथ ज़रूर होगी दरबारियों की फ़ौज. मैं एक नज़र अपने देश के हालात पर डालती हूं और दूसरी नज़र टीवी के इन लकदक चेहरों पर. मैं नीरो के दरबारियों के चेहरों का खाका तैयार करने लग जाती हूं.
बात यहीं रुकती, अरमां यहीं नहीं संभलते... मैं थोड़ा और आगे बढ़ती हूं. श्वेता सिंह का ट्विटर अकाउंट चेक करती हूं. पिन किये हुए ट्वीट में उनकी मोहक तस्वीर को क्षण भर निहारते हुए आगे बढ़ती हूं. अगला ट्वीट देखती हूं और बिहार के शहर बख्तियारपुर पर उनकी इतिहासपरक ग्राउंड रिपोर्ट का ज़िक्र देखती हूं. मुझे लगता है पत्रकारिता को बस यहीं से यू टर्न ले लेना चाहिए. खैर, हिम्मत को एक और बूस्टर देते हुए मैं रुबिका लियाक़त के ट्वीटर प्रोफाइल तक पहुंचती हूं. उनकी सुन्दर, आग से लपलपाती हुई विडियो देखकर ख़बरदार होशियार हो जाती हूं. मैं आगे किसी भी अन्य प्रोफाइल पर जाने का इरादा त्याग देती हूं. टीवी पर ख़बर देखना तो जाने कब का छोड़ दिया है. इन बातों के मद्देनजर मैं सोचती हूं भारतीय पत्रकारिता को सींचने वाले शुरूआती लोग फिलवक्त होते तो इस दूसरी तरह की पत्रकारिता को देखकर क्या कहते?
क्या यह पत्रकारिता है? क्या पत्रकारिता की परिभाषा केवल सरकार की हां में हां मिलाना रह गयी है और अफवाह का बाज़ार गर्म करना भर? इस भाषा के पत्रकारों की ख़ातिर सब है, सत्ता का साथ और शोर भी. सरोकार की पत्रकारिता करने वाली तनु श्री, फाये डी’सूजा, पैट्रिशिया मुखीम, आरफा सरीखी लड़कियों की ख़ातिर बची है धमकी और डिजिटल ट्रोलिंग...
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