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मोदी के आंसुओं के तालाब में डुबकी लगाकर पवित्र हुए एंकर एंकराएं
इस एपिसोड में धृतराष्ट्र-संजय संवाद के जरिए बीते हफ्ते राजनीतिक गलियारों में घटे घटनाक्रम पर एक खट्टी-मीठी टिप्पणी. इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसका जिक्र टिप्पणी के अंदाज में देखिए, मसलन राज्यसभा में प्रधानमंत्री के आंसुओं ने भावनाओं का एक ऐसा तालाब निर्मित किया जिसमें तमाम एंकर एंकराओं ने डुबकी लगाकर तमाम सांसारिक भवबाधाओं, पापों, अपकर्मों, दुष्कर्मों से मुक्ति पायी. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री के आंसूओं ने एंकर एंकराओं का पक्षपातपूर्ण चेहरा भी उजागर किया. जिनसे आप नीर-क्षीर विवेकी हंस होने की कामना करते हैं वो बगुला भगत निकले.
रायता मोदीजी ने भी कम नहीं फैलाया. पहले तो संसद भवन में रो दिए फिर किसानों के आंदोलन को आंदोलनजीवी, परजीवियों की करतूत बता गए. ज्यादा रायता फैल गया तो लीपापोती की गरज से फिर बोले आंदोलन में पवित्र और अपवित्र दो हिस्से हैं. अब अगर प्रधानमंत्री ही इतना यू-टर्न मारेंगे तो उनके इशारे पर नागिन डांस को तैयार बैठे एंकर एंकराओं की क्या दशा होगी आप कल्पना कर सकते हैं.
दरअसल प्रधानमंत्री का इशारा भीमा कोरेगांव और तमाम अन्य आंदोलनों के मामलात में जेलों में बंद नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर था. आप समझिए देश का प्रधानमंत्री उन लोगों के आधार पर किसानों के एक पूरे आंदोलन को परजीवी और आंदोलनजीवी बता रहा है जिनके मामले अभी कोर्ट में लंबित हैं. एक मामले में सामने आया है कि रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक करके उसमें षडयंत्र के दस्तावेज प्लांट किए गए. सुधा भारद्वाज जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जिन्हें तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर जमानत जैसे मूलभूत अधिकार से महरूम किया जा रहा है. प्रधानमंत्री इन लंबित मामलों की बुनियाद पर लोकसभा में सीधे दावा कर देते हैं.
हिंदी पत्रकारिता का गुलशन कैसे बर्बाद हुआ है? तमाम चैनल सीधे सरकारों के इशारे पर, रटी-रटाई स्क्रिप्ट पर मंच सजाकर शो करते हैं. इसका नतीजा है कि कोई आपको प्राइम टाइम पर राजा बाबू दिखा रहा है तो कोई प्राइम टाइम पर प्रोटेस्ट के काल्पनिक विज्ञापन दिखा रहा है. यह इसी वजह से हो रहा है क्योंकि खबरों की दुनिया में आपकी कोई हिस्सेदारी नहीं है. इसको आसान शब्दों में इस तरह से समझिए कि पांच रुपए का जो अखबार आप पढ़ते हैं उसकी छपाई और कागज की लागत ही बीस रुपए आती है. इसके ऊपर खबरों के जुटाने के तमाम खर्चें और खतरे हैं. लेकिन आपको वो पांच रुपए में मिल रहा है. तो बाकी पैसा अखबार अपने घर से नहीं देता बल्कि सरकार और कारपोरेट के विज्ञापन से वसूलता है. लिहाजा सरकारें और कारपोरेशन जब चाहे मनमाने तरीके से खबरों का गला घोंट देती है और मीडिया संस्थान ऐसा करने के लिए खुशी खुशी तैयार रहते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री इस मॉडल के खिलाफ खड़ा होने का एक प्रयास है. ऐसा मीडिया जो आपके समर्थन से आपके खर्चे से चलता है. न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करके आज़ाद मीडिया का कंधा मजबूत कीजिए.
इस एपिसोड में धृतराष्ट्र-संजय संवाद के जरिए बीते हफ्ते राजनीतिक गलियारों में घटे घटनाक्रम पर एक खट्टी-मीठी टिप्पणी. इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसका जिक्र टिप्पणी के अंदाज में देखिए, मसलन राज्यसभा में प्रधानमंत्री के आंसुओं ने भावनाओं का एक ऐसा तालाब निर्मित किया जिसमें तमाम एंकर एंकराओं ने डुबकी लगाकर तमाम सांसारिक भवबाधाओं, पापों, अपकर्मों, दुष्कर्मों से मुक्ति पायी. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री के आंसूओं ने एंकर एंकराओं का पक्षपातपूर्ण चेहरा भी उजागर किया. जिनसे आप नीर-क्षीर विवेकी हंस होने की कामना करते हैं वो बगुला भगत निकले.
रायता मोदीजी ने भी कम नहीं फैलाया. पहले तो संसद भवन में रो दिए फिर किसानों के आंदोलन को आंदोलनजीवी, परजीवियों की करतूत बता गए. ज्यादा रायता फैल गया तो लीपापोती की गरज से फिर बोले आंदोलन में पवित्र और अपवित्र दो हिस्से हैं. अब अगर प्रधानमंत्री ही इतना यू-टर्न मारेंगे तो उनके इशारे पर नागिन डांस को तैयार बैठे एंकर एंकराओं की क्या दशा होगी आप कल्पना कर सकते हैं.
दरअसल प्रधानमंत्री का इशारा भीमा कोरेगांव और तमाम अन्य आंदोलनों के मामलात में जेलों में बंद नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर था. आप समझिए देश का प्रधानमंत्री उन लोगों के आधार पर किसानों के एक पूरे आंदोलन को परजीवी और आंदोलनजीवी बता रहा है जिनके मामले अभी कोर्ट में लंबित हैं. एक मामले में सामने आया है कि रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक करके उसमें षडयंत्र के दस्तावेज प्लांट किए गए. सुधा भारद्वाज जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जिन्हें तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर जमानत जैसे मूलभूत अधिकार से महरूम किया जा रहा है. प्रधानमंत्री इन लंबित मामलों की बुनियाद पर लोकसभा में सीधे दावा कर देते हैं.
हिंदी पत्रकारिता का गुलशन कैसे बर्बाद हुआ है? तमाम चैनल सीधे सरकारों के इशारे पर, रटी-रटाई स्क्रिप्ट पर मंच सजाकर शो करते हैं. इसका नतीजा है कि कोई आपको प्राइम टाइम पर राजा बाबू दिखा रहा है तो कोई प्राइम टाइम पर प्रोटेस्ट के काल्पनिक विज्ञापन दिखा रहा है. यह इसी वजह से हो रहा है क्योंकि खबरों की दुनिया में आपकी कोई हिस्सेदारी नहीं है. इसको आसान शब्दों में इस तरह से समझिए कि पांच रुपए का जो अखबार आप पढ़ते हैं उसकी छपाई और कागज की लागत ही बीस रुपए आती है. इसके ऊपर खबरों के जुटाने के तमाम खर्चें और खतरे हैं. लेकिन आपको वो पांच रुपए में मिल रहा है. तो बाकी पैसा अखबार अपने घर से नहीं देता बल्कि सरकार और कारपोरेट के विज्ञापन से वसूलता है. लिहाजा सरकारें और कारपोरेशन जब चाहे मनमाने तरीके से खबरों का गला घोंट देती है और मीडिया संस्थान ऐसा करने के लिए खुशी खुशी तैयार रहते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री इस मॉडल के खिलाफ खड़ा होने का एक प्रयास है. ऐसा मीडिया जो आपके समर्थन से आपके खर्चे से चलता है. न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करके आज़ाद मीडिया का कंधा मजबूत कीजिए.
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