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‘मुआवज़े के पैसे से बलात्कार पीड़ितों के लिए फंड बनाऊंगी’
“17 साल की लड़ाई के बाद मुझे न्याय मिला है. मैं खुश हूं और सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ मेरी लड़ाई में साथ देने वाले तमाम लोगों को शुक्रिया कहना चाहती हूं.”
प्रेस क्लब में नीले रंग के दुपट्टे से सर को ढंकते हुए बिल्किस बानो जब खुश होने की बात कहती हैं, तब भी उनके चेहरे पर खुशी नहीं दिखती. उदास और घबराई बिल्किस पत्रकारों के सवालों का जवाब भी एक से दो शब्दों में देती हैं. कुछ जवाब गुजराती में देती हैं, तो कुछ टूटी-फूटी हिंदी में.
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2002 में हुए गुजरात दंगे के दौरान सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई बिल्किस बानो को 50 लाख रुपये के मुआवज़े के साथ-साथ सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश गुजरात सरकार को दिया है. यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने मंगलवार को दिया.
ज्यादातर वक़्त चुप रहने वाली और जब बोलने की ज़रूरत हो, तो कम से कम बोलने वाली बिल्किस के पास कहने को तो बहुत कुछ होगा, पर शायद पीड़ा से कुछ कह नहीं पाती हैं.
साल 2002 में गुजरात में हुए दंगे ने बहुत से घर उजाड़े और बिल्किस का घर तो तबाह ही कर दिया. दंगाइयों ने बिल्किस के घर पर कत्लेआम किया. उनके परिवार के चौदह लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया. मज़हब के नाम पर पगलाई भीड़ कत्लेआम तक कहां रुकने वाली थी. भीड़ ने पांच महीने की गर्भवती बिल्किस का सामूहिक बलात्कार किया. बिल्किस की तीन साल की बेटी सालेहा की हत्या उनके सामने ही कर दी गयी.
दंगे की आग कम हुई, तो उस आग में सबकुछ खो चुकी बिल्किस न्याय के लिए आगे आयीं. बिल्किस बानो के साथ दुष्कर्म और उनके परिजनों की हत्या के मामले में विशेष अदालत ने 21 जनवरी, 2008 को 11 आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनायी थी, जिसे बाद में बंबई हाईकोर्ट ने भी जारी रखा. समाजसेवी फराह नक़वी बताती हैं, “तब पत्रकारों ने बिल्किस से पूछा था कि आप फांसी की मांग क्यों नहीं कर रही हैं? तब बिल्किस ने कहा था कि मुझे न्याय चाहिए, किसी से बदला नहीं.”
जनसत्ता की ख़बर के अनुसार इसी साल मार्च में इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पीड़िता बिल्किस बानो को पांच लाख रुपये मुआवज़ा देने के संबंध में प्रस्ताव दिया था, लेकिन बिलकिस ने इसे लेने से इंकार कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े की रकम बढ़ाने के साथ-साथ सरकारी नौकरी और घर देने का भी निर्देश दिया है.
मुआवज़े के रूप में जो रकम बिल्किस को मिलने वाली है, उसका कुछ हिस्सा वो उन महिलाओं को न्याय दिलाने पर खर्च करना चाहती हैं जो दंगे की पीड़िता हैं. वहीं नौकरी और आवास के सवाल पर बिल्किस कुछ नहीं बोल पाती हैं. उनके पति याकूब कहते हैं कि बिल्किस चाहती हैं कि उन्हें सरकार गांव के आसपास ही घर बनवाकर दे. जहां तक रही रोजगार की बात, तो मुझे या परिवार के किसी और सदस्य को नौकरी दी जाये.
बिल्किस अपनी वकील शोभा सिंह को बार-बार धन्यवाद कहती हैं. शोभा को ही देखकर वो अपनी बेटी (जो घटना के दौरान गर्भ में थी) को वकील बनाना चाहती हैं. शोभा सिंह बिल्किस के मामले में मिले न्याय को नज़ीर मानती हैं. वो कहती हैं कि “इतना ज़्यादा मुआवज़ा आज तक बलात्कार के किसी भी मामले में नहीं मिला है. आने वाले समय में बलात्कार पीड़िताओं को न्याय दिलाने में इस मामले को उदाहरण के रूप में देखा जायेगा.”
गुजरात दंगे के पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाली तीस्ता सीतलवाड़ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि “इसके बाद हम तमाम ऐसी पीड़िताओं को सुप्रीम कोर्ट ले जायेंगे. इस फैसले से हिम्मत मिली है.” वहीं लगभग 17 साल बाद आये इस फैसले के सवाल पर तीस्ता कहती हैं, “सिस्टम ही ख़राब है. यहां जब तक ‘टाइम बॉन्ड ट्रायल’ की सुविधा नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता है. हमारी मांग भी है कि टाइम बॉन्ड ट्रायल का इंतज़ाम हो, ताकि लोगों को समय पर न्याय मिल सके.”
17 साल बाद मिले न्याय पर बिल्किस के पति याकूब कहते हैं, “कठिन वक़्त था, पर हमें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा था. हम दर-दर भटके लेकिन पीछे नहीं हटे, जिसका नतीज़ा आज सामने आ गया है. सच की जीत हुई है.”
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