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क्या नागरिकता संशोधन कानून ने भाजपा को उसके ही जाल में उलझा दिया है?

देशभर में भारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 9 दिसंबर सोमवार को लोकसभा और 11 दिसंबर को राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पास कर दिया गया. सरकार ने नागरिकता अधिनियम, 1955 को संशोधित कर एक नया एक्ट बना दिया है. पहले नागरिकता अधिनियम के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य था. इसमें व्यक्ति की धार्मिक पहचान कोई बाध्यता नहीं थी. लेकिन नागरिकता संशोधन विधेयक के अंतर्गत 31 दिसंबर, 2014 से पहले बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से आए छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) जिन्हें धार्मिक अल्पसंख्यक होने के नाते अपने देश में अत्याचार अथवा शोषण झेला है- उन्हें नागरिकता देने का प्रावधान है. अब 11 वर्ष की अनिवार्य समयावधि को घटाकर पांच साल कर दिया गया है. नागरिकता के लिए जरूरी दस्तावेजों के अभाव में भी इन्हें नागरिकता दी जा सकती है.

नागरिकता संशोधन विधेयक में मुसलमानों को शामिल नहीं किए जाने को संविधान की मूलभावना से छेड़छाड़ बताया गया है. यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है. विपक्ष के नेताओं ने सदन में सरकार से यह भी सवाल उठाया कि सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के अलावा बाकी पड़ोसी देशों को इसमें शामिल क्यों नहीं किया गया. इसका कोई ठोस जवाब सरकार की ओर से नहीं मिला. हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर पूर्वोत्तर भारत और शेष भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में बुनियादी अंतर है. शेष भारत में इस विधेयक का विरोध संविधान के अनुच्छेद 14 की अवहेलना और मुसलिम समुदाय को नागरिकता के हक़ से वंचित करने की आशंका के चलते हो रहा है वहीं वहीं असम में इसका उग्र विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि यह असम एकॉर्ड की मूलभावना के खिलाफ जाता है.

असम के अलावा अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा में भी नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर प्रदर्शन जारी है. नागालैंड में सालाना होने वाले ‘हॉर्नबिल फेस्टिवल’ की वजह से बंद का प्रभाव कम दिख रहा है. स्थानीय लोगों के मुताबिक त्रिपुरा में ‘जॉइंट मूवमेंट अगेंस्ट सिटिज़नशिप अमेंडमेंट बिल’ ने अनिश्चितकालीन बंद का आह्वान कर रखा है.

अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिज़ोरम में ‘इनर लाइन परमिट’ (आईएलपी) सिस्टम है. इनके अलावा मेघालय, असम और त्रिपुरा के कई हिस्से हैं, जो अनुसूची 6 (सिक्स्थ शेड्यूल) में आते हैं. इन्हें नागरिकता संशोधन विधेयक के दायरे से बाहर रखा जाता है. लेकिन वहां भी प्रदर्शन हो रहे हैं. स्थानीय लोगों को डर है कि इस विधेयक से बाहरी हिंदुओं की संख्या बढ़ेगी और उनकी संस्कृति और जनसांख्यिकी पर खतरा खड़ा हो जाएगा.

नागरिकता संशोधन और असम अकॉर्ड

असम के मूल निवासी इस बात को लेकर सशंकित हैं कि कानून बदलने के बाद बांग्लादेश से आए बंगाली हिंदुओं को आसानी से नागरिकता मिल जाएगी. दरअसल, असम में जो नेशनल रजिस्टार ऑफ सिटिजन (एनआरसी) हुआ, उसमें 19 लाख लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए. इसमें 12 से 14 लाख बंगाली हिंदू हैं. फिलहाल एनआरसी लिस्ट से बाहर किए गए लोगों के पास अपनी नागरिकता साबित करने का मौका है. अब नागरिकता संशोधन कानून बन जाने के बाद असम के मूलनिवासियों के बीच यह आशंका है कि इन बंगाली हिंदुओं को सरकार भारत का नागरिक बना देगी. और, उन्हें नागरिकता मिलने से मूलनिवासियों की संस्कृति, भाषा, परंपरा, रीति-रिवाजों पर असर पड़ेगा.

असम के मूलनिवासी निबिर डेका (26) बताते हैं, “सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध असम में बिल्कुल अलग है. यहां मामला मुसलमानों को नहीं शामिल किए जाने का नहीं है. यहां मामला है मूलनिवासी और ‘बाहरी’ का.” ‘बाहरी’ कौन है? “कोई भी व्यक्ति जो असम का मूलनिवासी नहीं है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, वह बाहरी है.”

वह बताते हैं कि देशभर में प्रोटेस्ट “एक्सक्लूज़न ऑफ मुस्लिम” को लेकर हो रहा है. लेकिन असम में प्रोटेस्ट “इनक्लूज़न ऑफ ऑल फाइव रिलिजन” को लेकर हो रहा है. मतलब, असम के मूलनिवासियों का सवाल है- बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के शोषित हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख भी आखिर क्यों नागरिकता के अधिकारी हैं?

यह भी एक तथ्य है कि एनआरसी का समर्थन असम के मूलनिवासियों ने ही किया था. अब वे नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं. इसके संबंध में निबिर कहते हैं, “यह बिल्कुल सही है कि असम के लोगों ने एनआरसी का समर्थन किया था. यही नहीं, मूलनिवासियों ने भारतीय जनता पार्टी को एनआरसी के नाम पर वोट भी दिया. लेकिन भाजपा ने मूलनिवासियों को छला है. सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए मूलनिवासियों के भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है.”

अम्लान ज्योति देउरी, जो नागिरकता संशोधन विधेयक के प्रदर्शनों में सक्रिय हैं, कहते हैं, “हम लोग इस्लामोफोबिक नहीं हैं. हमारी मुसलमानों से कोई दुश्मनी नहीं है. हमारी दिक्कत ‘घुसपैठियों’ से है. ‘घुसपैठियों’ का कोई धर्म नहीं होता.” अम्लान ज्योति के अनुसार, असम में करोड़ों की संख्या में बांग्लादेशी रहते हैं. भाजपा सरकार मुसलमानों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों को चोर दरवाजे से नागरिक बनाना चाहती है.

अम्लान ज्योति जिन करोड़ों घुसपैठियों का जिक्र कर रहे हैं, उसका जिक्र असम के चुनावों में खूब हुआ है. राजनीतिक भाषणों में बांग्लादेशियों की संख्या 50 लाख से 2 करोड़ तक बता दी जाती है. “राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना जबरदस्त था कि हमें भी लगता था कि एनआरसी में कुछ नहीं तो कम से कम 50 लाख लोग जरूर बाहर जाएंगे. लेकिन जब लिस्ट जारी हुआ तो हम लोग हैरान रह गए. सिर्फ 19 लाख लोग और उसमें भी कई मूलनिवासियों का ही नाम कट गया. हमें पहले से शक था कि बांग्लादेशियों को नागरिकता दे दी गई है,” अम्लान ज्योति कहते हैं.

आसू के कार्यकर्ता और आंदोलन में सक्रिय पार्था ने इस रिपोर्टर को असम में गैर-असमिया भाषा बोलने वालों के बढ़ते वर्चस्व के बारे में बताया, “1971 में बांग्लादेश की हिंदू आबादी 22 से 25 फीसदी थी. अभी बांग्लादेश में हिंदू आबादी है तकरीबन 3 से 7 फीसदी. ये लोग कहां गए? इनमें से ज्यादातर लोग असम और बंगाल आ गए. मैं ये बात इसीलिए कह रहा हूं क्योंकि आप अगर जनगणना देखोगे तो पाओगे कि हर दशक के साथ असमिया, बोडो, राभा बोलने वाले घटते गए हैं और बंगाली बोलने वाले बढ़ते गए हैं.”

निबिर डेका असम में ताजा प्रदर्शनों का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य समझाते हैं. वो कहते हैं, “भाजपा एनआरसी के जरिए असम को खुश करना चाहती है और कैब के जरिए बंगाल में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है.” दरअसल, निबिर और अम्लान ज्योति दोनों ही यह बताते हैं कि असम के लोग एनआरसी में एक बड़ी संख्या (करीब 30 से 50 लाख) की उम्मीद लगाए बैठे थे. यह उम्मीद भाजपा और आरएसएस के राजनीतिक दावों से उपजी थी. 19 लाख की संख्या उनके लिए पहला झटका था. दूसरा, नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर बंगाल में भीतर ही भीतर तृणमूल ने यह कहना शुरू कर दिया था कि भाजपा सरकार बंगाली हिंदुओं को देश से निकालना चाहती है. भाजपा यहीं पर फंस गई है. लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिस तरह की सफलता प्राप्त हुई है, वह उस मोमेंटम को तोड़ना नहीं चाहती.

“अगर एनआरसी में चिन्हित किए गए लाखों बंगाली हिंदुओं को भाजपा नागरिकता से वंचित कर दे तो वह बंगाल में उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी. दूसरी तरफ, असम ने भाजपा को जो बहुमत दिया है, कि वे असम से बाहरी लोगों को बाहर करे. वहां धर्म कहीं पर है ही नहीं. बाहरी किसी भी धर्म का हो सकता है. फिलहाल भाजपा की यही दुविधा है,” कॉटन कॉलेज के एक प्रोफेसर ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया. सरकार कह रही है कि वह असम अकॉर्ड के क्लॉज़ 6 पर कमेटी बनाकर असम के मूलनिवासियों की चिंता दूर करेगी.

क्या है लड़ाई?

1979 में असम के मूल निवासियों ने महसूस किया कि मंगलदोई लोकसभा के उपचुनाव में वोटरों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है. उन्होंने पाया कि इसकी वजह बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिए थे. मूल निवासियों ने अप्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. नतीजतन 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने असम अकॉर्ड पर दस्तखत किए. इस समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 के बाद आए विदेशियों की शिनाख्त कर उन्हें देश निकालने का वादा किया गया. बांग्लादेश विभाजन और उससे उपजे विस्थापन को मानवीय शर्तों के आधार पर 1971 की समयसीमा तय की गई. दूसरे राज्यों के लिए यह समयसीमा 1951 की है. अब नागरिकता विधेयक में यही समयसीमा 2014 कर दी गई है.

असम मूलनिवासियों का एक गुस्सा समयावधि को लेकर भी है. निबिर कहते हैं,”दिल्ली मीडिया हमें कहती है कि हम मानवता विरोधी हैं. हमारा कहना है कि असम ने तो पहले ही मानवीय आधारों पर 20 वर्षों (1951 से 1971) की रियायत दी है. असम बॉडर स्टेट है, हम कह रहे हैं कि अगर इन्हें नागरिकता देना है तो इसका बोझ अकेले असम नहीं ले सकता. असम अकॉड इसीलिए साइन किया गया था. हम कहते आप इनकी जनसंख्या को पूरे भारत में बराबर बांट दें.”

एक तथ्य यह भी है कि 1985 से लेकर अब तक असम अकॉर्ड के अंदर आने वाले क्लॉज 6 की कमेटी बनी ही नहीं है. तो आखिर इस आश्वासन पर कैसे यकीन करें मूलनिवासी. हालांकि नागरिकता विधेयक पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा, “मैं इस सदन के माध्यम से आश्वस्त करना चाहता हूं कि एनडीए की सरकार, बीजेपी की सरकार क्लॉज 6 की कमेटी के माध्यम से आपके सभी हितों की चिंता करेगी. इसकी बिल्कुल चिंता न करें. यह सरकार सबका साथसबका विकास के आधार पर चलने वाली है. हम मानते हैं कि असम आंदोलन के अंदर जो शहीद हुए हैं उन सबकी शहादत बेकार नहीं जाएगी. इसलिए हमने क्लॉज 6 की कमेटी बनाई है। इसमें आसू (ऑल असम स्टूडेंट यूनियन) भी है जिसने आंदोलन किया था. असम गण परिषद (एजीपी) के साथी भी हैं.”

कॉटन कॉलेज के प्रोफेसर के अनुसार, “असम अकॉर्ड की ही बात करें तो उसकी अवहेलना तो नई समयसीमा से भी हो रही है. किस आधार पर 1971 से 2014 की समयसीमा तय की गई. हमारी जानकारी में तो कोई भी वैसा बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम बांग्लादेश और भारत के बीच नहीं घटा. इससे सरकार की नीयत का पता चलता है. भाजपा अपने लिए नए वोटर (बांग्लादेशी हिंदू) तैयार कर रही है.”

जारी है प्रदर्शनों का सिलसिला

भारत में व्यापक प्रदर्शनों और नागरिकता संशोधन विधेयक के विभिन्न आयामों को भले ही हिंदी मीडिया नजरअंदाज कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसकी घोर निंदा की जा रही है. न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट ने नागरिकता संशोधन बिल को समाज को बांटने वाला बिल बताया है. अमेरिका, ब्रिटेन, इज़रायल, कनाडा, सिंगापुर जैसे देशों ने अपने नागरिकों के लिए अडवाइजरी जारी की है और उन्हें भारत जाने के लिए एहतियात बरतने को कहा है. बांग्लादेश के दो केंद्रीय मंत्रियों का असम दौरा जो 15 से 17 दिसंबर को तय था, उसे टाल दिया गया है. जापान के प्रतिनिधिमंडल ने भी अपना गुवाहाटी दौरा रद्द कर दिया है. विधेयक पर विरोध जताते हुए असम राज्य के फिल्म फाइनेंस डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन जतिन बोरा ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है. वे असम के लोकप्रिय फिल्मस्टार हैं.

इन सबके बीच सबसे चिंतनीय बात है असम का अलगाववादी संगठन उल्फा (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम) के फिर से सक्रिय होने की आशंका पैदा हो गई है. उल्फा ने सरकार को चेताया है कि नागरिकता संशोधन बिल को अगर वापस नहीं लिया गया तो वे ‘मुंहतोड़ जबाव’ देंगे. उल्फा नेता जितेन दत्त को डिब्रूगढ़ से हिरासत में लिया गया है. इसके दो दिन पहले कृषक मुक्ति संग्राम समिति के अध्यक्ष अखिल गोगोई और उनके दो साथियों को भी हिरासत में लिया गया था. खबरों के मुताबिक असम के प्रदर्शनों में अब तक 4 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है. 175 लोग गिरफ्तार किए गए हैं. 1,400 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रदर्शनों में उल्फा के झंडे देखे जा रहे हैं. गुवाहाटी के एक प्रतिष्ठित स्थानीय अखबार में काम करने वाले पत्रकार ने बताया कि अगर सरकार ने तत्काल ध्यान देकर असम में फैले असंतोष को खत्म नहीं किया तो शायद सरकार यहां अपनी वैधता खो देगी.

रिसर्च एंड एनैलिसिस विंग (रॉ) ने भी भारत सरकार को नागरिकता विधेयक से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे के बारे में आगाह किया है. इसी वर्ष जनवरी में लोकसभा और राज्यसभा की ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी को एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस विधेयक का इस्तेमाल करके पड़ोसी देश अपने जासूस भारत में घुसा सकता है. “नागरिकता विधेयक पड़ोसी मुल्क के घुसपैठियों को एक कानूनी ढांचा प्रदान कर सकता है. बिना उचित दस्तावेजों के नागरिक बनाने की प्रक्रिया देश की सुरक्षा के लिए एक चुनौती बन सकती है,” कमेटी ने अपने रिपोर्ट में कहा.