छंटनी के दौर में मीडिया एकता और यूनियन की याद
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छंटनी के दौर में मीडिया एकता और यूनियन की याद

पत्रकारिता का क्षेत्र असंगठित सेक्टर की तर्ज पर विकसित हो रहा है जहां नौकरियां जाना आए दिन की कहानी है.

By Rohin Kumar

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शनिवार, 6 जनवरी को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में एक बार फिर से पत्रकारों का जुटान हुआ. जुटान का मकसद था मीडिया में आए दिन होने वाली बड़े पैमाने पर छंटनियां.

कुछ महीने पहले जब एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर पर सीबीआई का छापा पड़ा था तब भी प्रेस क्लब में इसी तरह पत्रकारों का भारी जुटान हुआ था. इस बार उतनी बड़ी संख्या में पत्रकार नहीं पहुंचे थे. इसकी एक वजह यह भी रही कि पिछली बार जिस एनडीटीवी के पक्ष में लोग जुटे थे, इस बार खुद एनडीटीवी भी अपने 25 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी के कारण निशाने पर था.

पिछली बार जब जुटान हुई थी तब अरुण शौरी, कुलदीप नैय्यर, समेत कई बड़े पत्रकार वहां मौजूद थे, राजदीप सरदेसाई, अरुण पुरी जैसे तमाम बड़े पत्रकार जो वहां मौजूद नहीं थे, उनके संदेश सभा में पढ़े गए. अन्य मीडिया समूहों ने भी प्रणय रॉय को समर्थन दिया.

लेकिन शनिवार को जब नौकरियों और छंटनी पर सभा हुई तो इनमें से लगभग सभी बड़े चेहरे गायब रहे, भीड़ भी नहीं जुटी. प्रेस क्लब ने एनडीटीवी में हुई हालिया छंटनी के मद्देनजर प्रणय रॉय को भी आमंत्रित किया था पर वे नहीं आए.
इससे भी दुखद बात यह रही कि छंटनी की मार झेल रहे 25 फीसदी में से ज्यादातर कर्मचारी भी अपने हक के लिए प्रेस क्लब में नहीं जुट सके.

आईबीएन-7 के पूर्व एसोसिएट एडिटर और मीडिया विजिल के संपादक पंकज श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा, “इस बात का दुख नहीं है कि बड़े पत्रकार नहीं बोल रहे हैं. वे अच्छा काम करते रहे यही बहुत बड़ी बात होगी. लेकिन दुख इस बात का है कि जिन लोगों के पास खोने को कुछ नहीं है वे क्यों चुप हैं?”  उन्होंने पत्रकार और ट्रेड यूनियनों के खत्म होने पर भी चिंता जताई.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने एनडीटीवी को तमाम बुरे चैनलों में कम बुरा चैनल बताते हुए अपने संबोधन की शुरुआत की. लोगों ने उनके इस कथन का स्वागत तालियां बजाकर किया. उन्होंने एनडीटीवी में मोटी पगार ले रहे कर्मचारियों पर निशाना साधते हुए कहा- “सबको मालूम है सत्ता की तरफ से एनडीटीवी पर बहुत दबाव है. लेकिन एक काम तो किया जा सकता था. जो लोग एक लाख से बीस लाख के बीच मोटी तनख्वाहें ले रहे हैं, वे अपने अपने हिस्से से थोड़ा-थोड़ा छोड़ देते तो कई लोगों की नौकरियों को जाने से बचाया जा सकता था.”

उर्मिलेश के संबोधन का जोर जब एनडीटीवी की ओर ज्यादा हो गया तो सभा में मौजूद एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने उन्हें याद दिलाया कि छंटनियां हिंदुस्तान टाइम्स, टेलिग्राफ, एबीपी जैसे अन्य संस्थानों में भी हुई है.

ट्रेड यूनियनों की निष्क्रियता पर उठ रहे सवालों का जबाव दिया शबीना ने जो भारतीय जर्नलिस्ट यूनियन (आईजेयू) से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि ट्रेड यूनियन खंडहर हो गए हैं. ट्रेड यूनियन काम कर रहे हैं. वे जीवित हैं. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब से संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था लागू की गई ट्रेड यूनियन हाशिये पर चले गए.”

लगभग सभी वक्ताओं ने इस ओर इशारा किया कि पत्रकारों को संगठित होने की जरूरत है. ऐसी सलाह रैली के उद्घोष और आंदोलन में कार्यकर्ताओं के भीतर जान फूंकने के काम आती हैं. लेकिन हकीकत यह है कि लोगों की रोजी रोटी गई है. उस तनख्वाह से जुड़े और आश्रित कुछ और लोग भी है. उनकी तात्काल क्या व्यवस्था हो सकती है?

आज वक्त ऐसा है कि अगर संस्थान अथवा संपादक अपने पत्रकार को क्रांतिकारी कहकर संबोधित कर रहा है मतलब मीडिया उद्योग उस पत्रकार की संभावनाएं नष्ट करने में लगा है. यह बदल रही व्यवस्था की नजीर है.

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