धारा 377: कितना मुश्किल होता है अपनी सेक्सुअलिटी को नकारते हुए जीना
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धारा 377: कितना मुश्किल होता है अपनी सेक्सुअलिटी को नकारते हुए जीना

हेट्रोसेक्सुअल होने का नाटक, अपने लैंगिक रुझान के बारे में झूठ बोलकर, लोगों के हंसने के डर से सच न बता पाना, मुझे सफोकेट करने लगा था.

By Rohin Kumar

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धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ सुनवाई के दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर रही है. एक ओर जहां केन्द्र सरकार ने मामले में अपना पक्ष न स्पष्ट करते हुए फैसला कोर्ट पर छोड़ दिया है. दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां 2013 के मुकाबले ज्यादा भरोसा पैदा करती हुई दिख रही हैं. वर्ष 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि यह धारा वयस्कों के अपनी पसंद से जीने के अधिकार के आड़े आता है. हालांकि लेस्बियन-गे-बाइसेक्सुअल-ट्रांसजेंडर-इंटरसेक्स-क्विर-एसेक्सुअल (LGBTIQA+) समुदाय के हितों से जुड़े इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में पलट दिया था. इसके जरिए धारा 377 को वापस अपराध की श्रेणी में शामिल कर दिया गया.

158 साल पुराने, अंग्रेजों द्वारा बनाए इस कानून के तहत सजाएं नाममात्र की हुई हैं पर यह एलजीबीटी समुदाय के सदस्यों के उत्पीड़न का बहुत बड़ा कारण बना है. उनकी लैंगिकता उपहास का कारण बनती रही है. भारत के सामाजिक ढांचे में एलजीबीटी होना क्या होता है, उनके संघर्ष क्या होते हैं- यह समझने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री ने पूजा श्रीवास्तव से मुलाकात की.

बनारस में जन्मी पूजा (42) स्कूलों को फैंसी ड्रेस उपलब्ध कराती हैं. यह उनका स्वरोजगार है. इसके पहले उन्होंने विभिन्न मीडिया संस्थानों (दैनिक जागरण, इशान (टैबलॉयड), ज़ी बिजनेस, पेट्रो वॉच आदि) में 14 साल पत्रकारिता की है. जानवरों की सेवा करना पूजा का शौक है, वह सड़क पर आवारा घूमते जानवरों की देख-रेख करती हैं.

पूजा को अपनी लैंगिकता स्वीकार करने में सालों लग गए. इस दौरान उन्होंने लोगों का तंज झेला, डिप्रेशन का शिकार हुईं और घर और समाज के साथ लुका-छिपी का नतीजा यह रहा कि चिड़चिड़ापन उनके जीवन का हिस्सा बन गया.

बचपन के दिनों को याद करते हुए पूजा कहती हैं, “10-12 की रही होऊंगी, अपने समान सेक्स वालों के प्रति आकर्षण होता था. मालूम नहीं चल पाता था कि ऐसा क्यों हैं. न कभी इस पर सोचते थे. लेकिन घरवालों और समाज ने मुझे टोक-टोककर एहसास दिलाया कि मैं अलग हूं, मैं असमान्य हूं. आपको सामने वाले से उपहास का डर लगने लगता है. आप खुद में सिमटते चले जाते हो.”

पूजा बताती हैं, घर में कभी भी लड़के-लड़की का भेद नहीं रहा है. बहनें पुणे में इंजीनियरिंग कर रहीं थीं. माता-पिता ने कभी यह नहीं कहा कि लड़की है तो कम पढ़ाओ या किसी तरह के कपड़े पहनने पर कोई पाबंदी लगाई हो. “जब मैं छठी क्लास में थी तब मैं बजाज 150 सीसी चलाती थी. स्कूटर था यह, लूना या स्कूटी नहीं,” कहते हुए पूजा चहकती हैं.

वह अपने पहले प्यार का किस्सा बताती हैं. मैं सातवीं क्लास में थी. और भाषा (बदला हुआ नाम) बारहवीं में थी. उसके लिए मैं पागल थी, बीसियों बार उसके घर के आगे से गुजरना, छत पर जाकर धूप में भी खड़े रहना कि शायद वह दिख जाए. ऐसा नहीं था कि मैं सेक्स चाहती थी लेकिन उसके प्रति पागलपन जबरदस्त था. “ऐसा होता था कि एक बार दिख जाए तो मेरा दिन बन जाए टाइप.”

पूजा अपनी बात जारी रखती हैं, “उन दिनों जब सहेलियां लड़कों या ब्यॉयफ्रेंड के बारे में बातें किया करती तो मैं शांत रहती थी. मन करता था कि मैं भी बताऊं, मैं किसे चाहती हूं. कह नहीं पाती थी. मन में यह बैठता चला गया था कि लोग मजाक बनाएंगें.”

पूजा भाषा के लिए डायरी लिखा करती थी. वह बताती हैं, “जैसे मुझे वह किसी दिन नहीं दिखी थी तो मैं डायरी में लिखती, ‘आज तुम नहीं दिखी, मेरा दिन बुरा बीत रहा है.”

“बिल्कुल आशिक आवारा टाइप,” कहते हुए पूजा हंस देती हैं.

यही वह पहला वाकया था, जब घर में मां से सामना हुआ था. मां ने भाषा को लिखी चिट्ठियां देख ली थीं. “ऐसे पत्र लड़कियां लड़कों के लिए लिखती हैं और इस उम्र में तुम्हें एक लड़की के लिए ये सब महसूस हो रहा है? तुम पागल हो गई हो, डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा,” मां ने तब पूजा को फटकार लगाई थी.

वर्ष 1995 में पूजा दिल्ली आ गईं. यहां उन्होंने कंप्यूटर सॉफ्टवेयर विषय में तीन साल का प्रोफेशनल कोर्स किया. तब पूजा की बहन दिल्ली में काम करने लगीं थी. इन्हीं दिनों पूजा बताती हैं, उन्हें अपनी बहन के ऑफिस में काम करनी वाली एक सहयोगी के प्रति आकर्षण महसूस हुआ. उसका नाम राजबाला (बदला हुआ नाम) था. “मुझे उससे प्यार था और राजबाला मुझे दोस्त समझती थी. मैं भी दिखाती थी कि दोस्त ही हूं, दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं हूं.”

पूजा बताती हैं, उनकी बहन को कुछ ‘गड़बड़’ लगा. उन्होंने टीका-टिप्पणी करना शुरू कर दिया. “यह सही नहीं है,” दीदी ने कहा था.
दिल्ली में पूजा जहां पढ़ाई कर रही थी, वहां उनकी मित्रता गुंजन से हुई. उन्होंने उसे बताया, यार मेरे घरवाले इस बात पर ऑब्जेक्शन करते हैं कि मैं राजबाला को लाइक करती हूं.”

“यह वह पहला मौका था, जब गुंजन ने मुझे ‘लेस्बियन’ टर्म बताया. तब मुझे मालूम हुआ, लेस्बियन भी कोई शब्द होता है. गुंजन मेरी जीवन की पहली इंसान थी जिसने मुझे बताया कि मैं सामान्य हूं,” कहते हुए पूजा लंबी सांस लेती हैं.

फुर्सत के पलों में पूजा

हालांकि गुंजन की बात को तब पूजा ने ही बहुत गंभीरता से नहीं लिया. राजबाला से नजदीकियां बढ़ती गईं. राजबाला को डर था कि चूंकि पूजा उसे पसंद करती है, राजबाला पूजा के साथ जीवन बीता नहीं पाएगी, कहीं इस वजह से दोनों की दोस्ती न टूट जाए. नतीजतन राजबाला, पूजा को पूर्वी दिल्ली में एक मनोवैज्ञानिक के पास ले गईं. यह वर्ष 1997-98 था. मनोवैज्ञानिक ने पूजा को दवाईयां दी. दवाईयां लेने के हफ्ते भर बाद पूजा की तबीयत बिगड़ने लगी. उन्होंने मनोवैज्ञानिक को फोन कर स्थिति बताई.

तब मनोवैज्ञानिक ने उदाहरण देकर समझाया, “अगर आपको सिगरेट छोड़नी होती है तो पहले आपको पता होना चाहिए कि सिगरेट गलत चीज़ है और आपको छोड़नी है. आपको पहले खुद यह तय करना पड़ेगा कि आपको ठीक होना है. लगता है आप खुद तय नहीं कर पा रही हैं कि आपको ठीक होना है.”

यह वाकया पूजा को आज भी परेशान करता है. यही निराशा का वह पल था जब पूजा का परिचय गूगल से हुआ. “मैंने दीदी के ऑफिस में ही बैठकर पहली बार गूगल पर सर्च मारा. की वर्ड था, Why do I get attracted to women.”

यहां से वह संगिनी नाम की स्वंयसेवी संस्था के संपर्क में आईं. तब यह संस्था बहुत सक्रिय थी. वहां एलजीबीटी समुदाय के सदस्य एक दूसरे से परेशानियां और अनुभव साझा करते थे.

“मैंने उनसे पूछा, मैं एक लड़की हूं और लड़की के प्रति आकर्षित होती हूं. उन्होंने मुझसे एक घंटे बातचीत की और समझाया कि मैं सामान्य हूं. ऐसा कई लोगों के साथ होता है. ऐसा लगा मेरे माथे से बहुत बड़ा बोझ खत्म हो रहा हो. मेरा स्ट्रेस लेवल कम हुआ,” पूजा कहती हैं.

यह बात पूजा को आज भी परेशान करती है कि उनके भाई-बहनों ने उसी वक्त उनकी मदद क्यों नहीं की. “भाई बहनों में मैं सबसे छोटी हूं. भाई-बहन सारे इंजीनियर्स हैं. मुझे यह बहुत हैरानी वाली बात लगी, जब मैं गूगल सर्च कर सकती हूं तो क्या मेरे भाई-बहनों को मेरे लिए गूगल सर्च नहीं करना चाहिए था.”

हालांकि, अगले ही पल वह अपने परिवार को लेकर सुरक्षित हो जाती हैं. खुद ही यह सोचती हैं कि शायद तब उनके भाई-बहनों के कुछ अलग ही संघर्ष रहे हों और वे भूल गए हों.

वह हंसती हुए कहती हैं, “मुझे आजतक समझ ही नहीं आया, इतने दिनों से मुझे परेशान क्यों किया जा रहा था?”

अपनी लैंगिकता के बारे में ज्ञात होने के बावजूद घर और समाज का दबाव बनना कम नहीं हुआ. न ही वह अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर पाईं. घरवालों ने पूजा के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. “ठीक है हम समझते हैं कि तुम लड़की के प्रति आकर्षित हो. लेकिन यह कैसे पता कि तुम पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं हो सकती?” घरवालों ने पूजा के सामने प्रश्न रखा. पूजा को घरवालों के प्रश्न में दम लगा. उन्होंने यह भी ‘ट्राई’ किया.

तब पूजा के सहयोगी रहे सतीश (बदला हुआ नाम) से उनकी शादी तय हो गई. अब सतीश उनका सहयोगी न होकर एक पार्टनर की तरह बर्ताब करने लगा था. “वह मेरा हाथ पकड़ता, मेरे करीब आने की कोशिश करता. मैं कुछ ही दिनों में उचट गई. मैंने उसे फोन करके कह दिया, यार नहीं चल पाएगा. मैं गे हूं.”

घरवालों को पूजा ने बताया कि उन्होंने सतीश को अपने बारे में गे बताया है. घरवालों को लगा कि पूजा को लड़का पसंद नहीं है और इसीलिए वह शादी नहीं करना चाहती. आगे चलकर वह किसी और लड़के से शादी कर लेंगीं. “मैं घर में स्ट्रेट होने का नाटक करती रही. दीदी को कहती, ये लड़का पसंद है. वो अच्छा लगता है,” पूजा कहती हैं.

शादी न करने के फैसले में पूजा के पिता ने पूजा का पक्ष लिया था. वर्ष 2002 में वह चल बसे. उन्हें याद करते हुए पूजा बताती हैं, “मुझे अब लगता है कि शायद पिता मेरे सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में समझते थे. उन्होंने कभी मेरे ऊपर शादी का दबाव नहीं बनाया.”

एक चैनल में काम करने के दौरान पूजा की सहयोगी तुली (बदला हुआ नाम) को उनसे प्यार हो गया. पूजा की उम्र तब 26 थी और तुली 23 की थी. दोनों घंटों साथ बिताते थे. पर यहां भी दिक्कत थी, पूजा बताती हैं, “तुली मुझे मर्द समझकर प्यार करना चाहती थी. मुझे मर्द मानकर जीना चाहती थी.”

चूंकि पूजा वह सारे काम कर पाने में खुद को सक्षम मानती थी जो एक मर्द कर सकता है, शायद इसीलिए तुली उन्हें मर्द मानकर प्यार करना चाहती थी. जीवन के इस पड़ाव को याद करते हुए पूजा कहती हैं, “मैं टॉमब्यॉय जैसी थी तो मुझे भी लगने लगा कहीं मैं ट्रांसजेंडर तो नहीं. मैन स्टक इन ए रॉन्ग बॉडी.”

यह रिश्ता तकरीबन चार साल चला. पत्रकारों के गलियारों में दोनों के बारे में खबरें पकनी शुरू हो गई थी. तुली के घरवालों ने शादी का दबाव बनाया और उसने दूसरी जगह शादी कर ली.

तुली की शादी और उससे अलगाव के बाद पूजा टूट गईं. उनके भीतर चिड़चिड़ापन बढ़ता चला गया. थोड़े ही दिनों बाद उन्होंने वह चैनल छोड़ दिया. वह एलजीबीटी कार्यक्रमों में सक्रिय होने लगीं. गे प्राइड मार्च में हिस्सा लेने लगी. लोधी गार्डन, नई दिल्ली के एक ऐसे ही कार्यक्रम में उनकी मुलाकात शॉमी गुहा ठाकुरता से हुई. दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती गईं. शॉमी और पूजा ने साथ रहने का फैसला किया.

इस रिश्ते की स्वीकृति के लिए पूजा की मां ने एक शर्त रखी, “ठीक है, मैं ये रिलेशनशिप स्वीकार कर रही हूं लेकिन एलजीबीटी कम्युनिटी का न कोई हमारे घर आएगा, न ही तुम उनके घर जाओगी.”

कुछ साल तो बेहतरीन बीते पर शॉमी को महसूस होने लगा कि बाहर की दुनिया उन्हें जोड़े के तौर पर नहीं बल्कि दोस्त के तौर पर पहचानती है. एलजीबीटी कम्युनिटी के कार्यक्रमों से दूरी बनाने के साथ वहां सदस्यों की बीच वे अनजान होने लगीं.

रिश्तों के इस पक्ष के संदर्भ में पूजा ने कहा, “कहने का मतलब आपकी शादी हो जाती है या आप लवर्स हैं तो आप खुद को कपल (जोड़े) के तौर पर देखे जाना चाहते हैं. लेकिन हमारे केस में दुनिया में आप कहीं भी जा रहे हो, सब लोग आपको फ्रेंड मान रहे हैं.”

शॉमी को यह व्यवहार परेशान करने लगा. उसे मां की पाबंदियां पसंद नहीं थीं. शॉमी और मां की प्राथमिकताओं में रिश्ते खराब होने लगे. शॉमी वापस कलकत्ता चली गई. थोड़े दिनों तक फोन पर बातें होती रही लेकिन फिर बातचीत बंद हो गई.

शॉमी से दूर होने का पूजा पर गहरा असर हुआ. वह अकेलेपन के कारण वो डिप्रेशन का शिकार हो गईं. उन्होंने मनोवैज्ञानिकों से परामर्श लिया. कहती हैं, “मैं दोहरी जिंदगी से तंग आ गई थी.” तब उन्होंने तय किया कि उन्हें खुद को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना पड़ेगा.

“मैं हेट्रोसेक्सुअल होने का नाटक, अपनी लैंगिकता के बारे में झूठ बोलकर, लोगों के हंसने के डर से सच न बता पाना, मुझे सफोकेट करने लगा था,” कहते हुए पूजा की आवाज़ में गुस्सा झलकता है.

खुद की लैंगिकता सार्वजनिक करने से पहले पूजा संशय के बादलों में घिर गईं. “कौन मुझे समझ पाएगा?” इसका एक उपाय उन्होंने ढूंढ़ निकाला.

“मुझे अपनी फ्रेंडलिस्ट में जितने भी लिबरल लगे, मैंने उन्हें अपनी सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में संदेश भेजा. मैंने उनसे आग्रह किया कि ‘उम्मीद है आप मुझे समझेंगे’,” पूजा ने बताया. इसे पूजा अपने सार्वजनिक स्वीकृति की एक प्रक्रिया बताती हैं.

इस दौरान दिसंबर 2017 में पूजा की मुलाकात 35 वर्षीय निकिता विश्वास से हुई. पूजा कहती हैं, “निकिता से मुझे लव एट फर्स्ट साइट हुआ. वह बहुत समझदार और जेनुइअन लड़की है.”

निकिता को एक व्यवस्थित जीवन पसंद हैं. कोर्ट में जारी सुनवाई से दोनों ही उत्साहित हैं. वे चाहती हैं कि कोर्ट न सिर्फ धारा 377 को निरस्त करे बल्कि जल्द ही संसद होमोसेक्सुअल शादियों को मंजूरी भी दे. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह साफ किया है कि वह फिलहाल धारा 377 से जुड़े मसलों का दायरा नहीं बढ़ाएगा और बहस सिर्फ उसकी वैधता पर केन्द्रित होगी.

पूजा भारतीय समाज को “हेट्रो-नॉर्मेलिटी” का समाज बताती हैं, जहां सारी शब्दावली और आचरण महिला और पुरुषों के संबंधों के इर्द-गिर्द ही बुने जाते हैं.

पूजा बताती हैं, उन्हें 42 की उम्र में अविवाहित देखकर लोग अजीबो-गरीब टिप्पणियां करते हैं. एक दिन पड़ोस की एक आंटी ने कहा, “ओह, तुमने शादी नहीं की. मम्मी के साथ रहने के लिए इतना बड़ा सैक्रिफाइस किया.”

एक दिन दूसरी आंटी ने कहा, “अरे मेरी बेटी तो बोलती है कि देखो, पूजा ने शादी नहीं की, कितने मजे से रहती है. जैसे मन करता है वैसे रहती है. मां के पास रहती है. हसबैंड से चिक-चिक का कोई टेंशन नहीं” पूजा को यह पसंद नहीं आता.

पूजा चाहती हैं कि लोगों को जेंडर और सेक्सुअलिटी के बारे में अंतर बताया जाना चाहिए. वह खुद भी एलजीबीटी समुदाय के लोगों को सोशल ग्रुप्स में शिक्षित करने का प्रयास करती हैं.

वह चाहती हैं कि लोग समाज के बनाये जेंडर नॉर्म्स से खुद को आज़ाद करें. “किसी लड़के को पिंक पसंद है वह खुलकर बताए कि उसे पिंक पसंद हैं. पिंक लड़कियों का रंग है, इस ख्याल से आज़ाद होना पड़ेगा.”

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