तूफ़ान से निकाल कर लाया है आरएसएस हिंदुस्थान समाचार की क़श्ती

जब पीटीआई में सैंकड़ों लोगों की छंटनी हुई है तब हिंदुस्थान समाचार देश की सबसे बड़ी एजेंसी बनने की ओर अग्रसर है. कैसे हुआ यह चमत्कार?

WrittenBy:राहुल कोटियाल
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2016 में मध्य प्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ महाकुम्भ मेला अपने चरम पर था. इसी दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी मध्य प्रदेश के निनौरा में एक ‘विचार महाकुम्भ’ आयोजित किया था. सर संघचालक मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैयाजी जोशी समेत संघ से जुड़े तमाम बड़े चेहरे इस आयोजन में मौजूद थे. तीन दिवसीय इस आयोजन के समापन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे.

संघ के इस आयोजन के दौरान ही एक दिलचस्प घटना घटी, जिसकी प्रासंगिकता अब लगातार बढ़ रही है. उस घटना का जिक्र इंडिया टुडे पत्रिका की दो साल पुरानी रिपोर्ट में भी मिलता है. घटना कुछ यूं थी कि ‘विचार महाकुम्भ’ के दौरान ही संघ के शीर्ष नेतृत्व ने आपस में विचार-विमर्श के बाद भाजपा के राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा को तत्काल इस विचार महाकुंभ में पहुंचने का संदेश भिजवाया. संदेश मिलते ही आरके सिन्हा आनन-फानन में निनौरा पहुंचे. वहां सबसे पहले उनकी मुलाकात भैय्याजी जोशी से हुई. जोशी ने उन्हें बताया, “संघ नेतृत्व ने निर्णय लिया है कि हिंदुस्थान समाचार की जिम्मेदारी आपको सौंपी जाए.” आरके सिन्हा ने बिना किसी संकोच या प्रतिप्रश्न किए यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. अगले कुछ दिनों में आरके सिन्हा को ‘हिंदुस्थान समाचार’ के निदेशक मंडल का अध्यक्ष बनाने की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई.

अरबपति आरके सिन्हा के हिंदुस्तान समाचार का अध्यक्ष बनते ही इस अनजान सी समाचार संस्था के अच्छे दिन शुरू हो गए. हालांकि यह देश की सबसे पुरानी बहुभाषी न्यूज़ एजेंसी है लेकिन बीच के वर्षों में यह लोगों की नज़रों से ओझल रहा. लेकिन सिन्हा के आते ही रातों-रात इसका कार्यालय पहाड़गंज की तंग गलियों से निकलकर नोएडा के सेक्टर 63 में स्थित एक ऊंची-आलिशान ईमारत में जा पहुंचा. इसका स्टाफ तेजी से बढ़ने लगा, बाज़ार में इसकी चर्चा सुनाई देने लगी. जल्द ही सरकारी नीतियां भी इस तरह से बदलने लगी जो इसके विस्तार के लिए बिलकुल मुफीद साबित हुई. इसका परिणाम यह हुआ कि आरएसएस के विचारों की आधारशिला पर खड़ा यह संस्थान अब ‘देश की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी’ बनने का न सिर्फ सपना देख रहा है बल्कि तेजी से उस सपने को हकीकत में बदलने की राह पर दौड़ भी रहा है.

हिंदुस्थान समाचार आज हिंदी, मराठी, गुजराती, नेपाली, उड़िया, असमी, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलगु, सिन्धी, संस्कृत, पंजाबी और बांगला जैसी कुल 14 भाषाओं में काम कर रहा है. देश के सैकड़ों छोटे-बड़े अखबारों को यह ख़बरें मुहैय्या करवा रहा है. दावा है कि जल्द ही इसका प्रसार भारती के साथ भी एक करार हो सकता है. हिंदुस्थान समाचार और प्रसार भारती के बीच काफी समय से इस करार को लेकर मोल-भाव चल रहा है. बात अटकी हुई धन को लेकर. अंग्रेजी में ख़बरें उपलब्ध करवाने वाली समाचार एजेंसी पीटीआई का भुगतान कई करोड़ में है, जबकि अंग्रेजी भाषा की पहुंच बहुत सीमित है. अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी की पहुंच बहुत व्यापक है फिर भी प्रसार भारती हिंदुस्थान समाचार को अपेक्षाकृत कम भुगतान ऑफर कर रहा है. यदि यह करार कामयाब हुआ तो काफी संभावनाएं हैं कि भविष्य में दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो की ख़बरों का मुख्य स्रोत आरएसएस समर्थित हिंदुस्थान समाचार ही हो.

दशकों पुराने हिंदुस्थान समाचार का इस तेजी से कायाकल्प होना कुछ मूलभूत सवालों को जन्म देता है. मसलन, क्या आरएसएस हिंदुस्थान समाचार के माध्यम से ख़बरों की दुनिया में अपनी वैसी ही पैठ बनाना चाहता है जैसी प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में उसने शिशु मंदिर और विद्या मंदिर स्थापित करके देश भर में बनाई है? सालों से मरणासन्न पड़े हिंदुस्थान समाचार में हाल-फिलहाल क्या बदलाव हुए हैं, कितने लोग इसमें कार्यरत हैं, कितने राज्यों में इसकी मजबूत पकड़ है और भविष्य में इसका स्वरुप कैसा होने जा रहा है? इस संस्थान के वर्तमान और भविष्य से जुड़े इन तमाम सवालों के जवाब के साथ ही इसका इतिहास टटोलना भी प्रासंगिक है.

हिंदुस्थान समाचार का इतिहास

हिंदुस्थान समाचार का इतिहास स्वतंत्र भारत जितना ही पुराना है. इसकी स्थापना 1 दिसंबर, 1948 के दिन शिवराम शंकर उर्फ़ दादा साहेब आप्टे ने की थी. आप्टे आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक थे जिन्होंने आगे चलकर विश्व हिन्दू परिषद की भी स्थापना की और इसके पहले महासचिव बने. इसके बावजूद यह दिलचस्प है कि आज हिंदुस्थान समाचार की वेबसाइट में कहीं भी इसके संस्थापक दादा साहेब आप्टे का नाम दर्ज नहीं है. ऐसा शायद हिंदुस्थान समाचार की छवि बदलने के उद्देश्य से किया गया है जिस उद्देश्य के चलते इस संस्था से जुड़े अधिकतर लोग यह बात कहते हैं कि, ‘हिंदुस्थान समाचार का आरएसएस से कोई सीधा लेना-देना नहीं है.’

हिंदुस्थान समाचार के संपादक रहे आशुतोष भटनागर बताते हैं, “आज़ादी के समय देश में कोई भी भारतीय न्यूज़ एजेंसी नहीं थी. लिहाजा हिंदुस्थान समाचार की शुरुआत के पीछे मूल उद्देश्य तो यही था कि एक अखिल भारतीय एजेंसी खड़ी की जाए जो क्षेत्रीय भाषाओं में भी काम करे.” इस एजेंसी की शुरुआत के कुछ समय बाद ही बिहार सरकार ने इसका सब्सक्रिप्शन लेना शुरू कर दिया. इसके बाद एक-एक कर कई राज्य सरकारों ने हिंदुस्थान समाचार को सब्सक्राइब किया और यह संस्था देशभर में पकड़ बनाने लगी.

शुरुआत में हिंदुस्थान समाचार की विशेषता यह थी कि यह क्षेत्रीय भाषाओं में ख़बरें देने वाली एकमात्र न्यूज़ एजेंसी थी. यही विशेषता हिंदुस्थान समाचार के विस्तार का मुख्य कारण बनी और कम ही समय में सैकड़ों छोटे-मोटे अखबार इसके सब्सक्राइबर बन गए. हालंकि इनमें राष्ट्रीय स्तर के अखबार कम ही थे.

हिंदुस्थान समाचार के वर्तमान समूह संपादक राम बहादुर राय बताते हैं, “अभी कुछ समय पहले जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी से मेरी मुलाकात हुई. उन्होंने मुझसे बताया कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत राजस्थान समाचार से की थी. उस दौर में राजस्थान समाचार इस हद तक हिंदुस्थान समाचार पर निर्भर था कि अगर यह एजेंसी न होती तो अखबार निकालना मुश्किल हो जाता. थानवी साहब की इस बात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हिंदुस्थान समाचार उस दौर में कितना विस्तृत रहा होगा.”

हालांकि न्यूज़लॉन्ड्री ने जब इस बात की पुष्टि के लिए वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी से बात की तो उनका कहना था, “मैंने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही थी.”

हिंदुस्थान समाचार में हमेशा ही आरएसएस से जुड़े लोगों का वर्चस्व रहा है और इसकी छवि भी संघ की विचारधारा पर खड़े एक संस्थान की ही रही है. लेकिन इसके पूर्व संपादक आशुतोष भटनागर कहते हैं, “यह धारणा सही नहीं है. हिंदुस्थान समाचार के अध्यक्षों में सरोजिनी महिषी और हरेकृष्ण महताब जैसे लोग भी शामिल रहे हैं. ये लोग तो जनता पार्टी और कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं जिनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं रहा. अगर हिंदुस्थान समाचार आरएसएस की संस्था होती तो ये लोग इसके अध्यक्ष कैसे हो सकते थे?”

1948 में एक कंपनी के तौर पर रजिस्टर हुए हिंदुस्थान समाचार को साल 1956 में एक कोऑपरेटिव सोसाइटी में बदल दिया गया. इस बदलाव के साथ ही हिंदुस्थान समाचार के तमाम कर्मचारी इसके शेयर-धारक बन गए. राम बहादुर राय याद करते हैं, “मैं 1979 में हिंदुस्थान समाचार से जुड़ा था. उस वक्त बालेश्वर अग्रवाल इसके संपादक हुआ करते थे. वे इससे जुड़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सौ रुपये का शेयर-धारक बनवाते थे. अब यह रकम काफी बढ़ चुकी है. आज प्रत्येक व्यक्ति को दस हजार रुपये का शेयर धारक बनाया जाता है.”

1960 और 70 के दशक में हिंदुस्थान समाचार से जुड़े रहे लोग बताते हैं कि वह दौर इस संस्थान का ‘स्वर्णिम दौर’ था. रामबहादुर राय बताते हैं कि उस दौर में हिंदुस्थान समाचार का कार्यालय दिल्ली के कनॉट प्लेस में फायर ब्रिगेड लेन में हुआ करता था. वहां तीन बड़ी कोठियां थीं जहां इस संस्थान का मुख्यालय था. दिल्ली के अलावा जयपुर, मुंबई और भोपाल में भी हिंदुस्थान समाचार के बड़े कार्यालय हुआ करते थे और हर नए व्यक्ति को ट्रेनिंग के लिए इन्हीं चार में से किसी एक जगह भेजा जाता था. हिंदुस्थान समाचार से जुड़े लोगों का यह भी दावा है कि देश में पहली बार देवनागरी लिपि में टेलीप्रिंटर की शुरुआत इस संस्थान के प्रयासों से ही सफल हुई थी और यह उस दौर में किसी क्रांतिकारी परिवर्तन से कम नहीं था.

मुसीबतों की शुरुआत

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तभी से हिंदुस्थान समाचार के तारे भी गर्दिश में आने लगे. 70 के दशक से ही हिंदुस्थान समाचार से जुड़े रहे चंद्र मोहन भारद्वाज बताते हैं, “हिंदुस्थान समाचार की ख़बरें इंदिरा सरकार को असहज करती थीं इसलिए हम उनके निशाने पर हमेशा ही रहते थे. आपातकाल और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान तो जैसे हम इंदिरा सरकार के दुश्मन ही बन गए. उन्होंने हिंदुस्थान समाचार को ख़त्म करने का मन बना लिया था.”

देश में आपातकाल लागू होने के कुछ समय बाद ही देश की कई न्यूज़ एजेंसियों का विलय कर दिया गया. पीटीआई, यूएनआई, समाचार भारती और हिंदुस्थान समाचार को एक साथ मिलाकर ‘समाचार’ नाम की एक नई एजेंसी बना दी गई जो सीधे सरकार के नियंत्रण में थी. आशुतोष भटनागर बताते हैं, “इस विलय से एजेंसी की अपनी पहचान तो जाती रही लेकिन इसका एक फायदा कर्मचारियों को हुआ. हिंदुस्थान समाचार में जो लोग तब काम करते थे वो सरकार के पेरोल पर आ गए. यही कारण था कि कई कर्मचारियों ने इसका विरोध भी नहीं किया और इस विलय को आराम से स्वीकार कर लिया.”

न्यूज़ एजेंसियों का यह विलय ज्यादा लंबे समय तक नहीं चला. आपातकाल समाप्त होने के बाद कुलदीप नैयर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ जिसकी संस्तुति पर सभी न्यूज़ एजेंसियों को अलग-अलग काम करने की स्वतंत्रता मिल गई. 14 अप्रैल, 1978 के दिन चारों न्यूज़ एजेंसियां एक बार फिर अलग-अलग हो गई लेकिन हिंदुस्थान समाचार इसके बाद ज्यादा लंबे समय तक खुद को नहीं बचा सका.

राम बहादुर राय बताते हैं, “हिंदुस्थान समाचार एक कोऑपरेटिव सोसाइटी के तौर पर काम करता था और किसी भी कोऑपरेटिव सोसाइटी की गर्दन तोड़ना सरकारों के लिए बहुत आसान होता है. आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी जब दोबारा प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने हिंदुस्थान समाचार के साथ यही किया. उन्होंने अपने लोगों को बतौर एडमिनिस्ट्रेटर इसके ऊपर बैठा दिया जिसके बाद यह संस्था धीरे-धीरे ख़त्म होने लगी.”

चंद्र मोहन भारद्वाज कहते हैं, “विलय के बाद जब 1978 में जब चारों एजेंसी अलग हुई, तब हिंदुस्थान समाचार की स्थिति ठीक थी. यह अपने पैर दोबारा जमाने भी लगी थी लेकिन 1982 में इंदिरा गांधी सरकार ने इसकी कमर तोड़ना शुरू किया. सरकार से एक एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया और तर्क दिया गया कि एजेंसी को ‘आर्थिक तौर से आत्मनिर्भर बनाने’ के लिए ऐसा किया जा रहा है. रॉ से जुड़े लोगों को हिंदुस्थान समाचार के ऊपर बैठा दिया गया. यह नियुक्ति पहले एक साल के हुई थी लेकिन इसे पूरे-पूरे तीन साल, तीन महीने और 19 दिनों तक विस्तार दिया गया. इस बीच हिंदुस्थान समाचार कर्जे में डूबता चला गया. न तो इसके बिजली के बिल भरे गए और न ही कार्यालय का किराया चुकाया गया.” नतीजा यह हुआ कि 1986 आते-आते हिंदुस्थान समाचार बंद हो गया.

अकेले स्वयंसेवक ने लड़ी कानूनी लड़ाई

20 मार्च, 1986 के दिन हिंदुस्थान समाचार का लिक्विडेशन आदेश जारी हो गया. इसका काम बंद हो गया, इससे जुड़े तमाम लोग बिखर गए. लेकिन आरएसएस के एक समर्पित कार्यकर्ता ने अब भी हार नहीं मानी. इस कार्यकर्ता का नाम था चंद्र मोहन भारद्वाज. भारद्वाज 1970 के दशक में बतौर क्लर्क हिंदुस्थान समाचार से जुड़े थे. 1986 में जब इस संस्था पर संकट आया और इससे जुड़े तमाम पत्रकार और अन्य लोग बिखर गए तब भारद्वाज ने ही इस संस्था को बचाए रखने की लड़ाई लड़ी. वे कहते हैं, “मेरी कानूनी लड़ाई करीब 15 साल चली. इस दौरान लोग मुझे कहते थे कि मैं पागल हूं जो अपना पैसा, समय और ऊर्जा लगाकर एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा हूं. लेकिन मेरे लिए ये विचारधारा की लड़ाई थी. हिंदुस्थान समाचार संघ की एक संस्था थी और संघ से मेरा जुड़ाव कुछ सालों या दशकों का नहीं बल्कि पीढ़ियों का है. मैं सिर्फ नौकरी के लिए हिंदुस्थान समाचार से नहीं जुड़ा था.”

चंद्र मोहन भारद्वाज ने हिंदुस्थान समाचार के लिक्विडेशन के आदेश को कोर्ट में चुनौती दी और इस आदेश पर कोर्ट का स्टे ले लिया. चार साल की कानूनी लड़ाई के बाद भारद्वाज को पहली सफलता मिली. लिक्विडेशन का आदेश निरस्त कर दिया गया. इससे इतना तो साफ़ हो गया कि न्यूज़ एजेंसी आगे भी चलाई जा सकती है लेकिन इसकी पूरी टीम बिखर चुकी थी. भारद्वाज बताते हैं, “रजिस्ट्रार से मेरा सालों तक पत्राचार चला. उनका कहना था कि इस एजेंसी को दोबारा चलाए जाने की अनुमति तभी दी जा सकती है जब इसकी मैनेजिंग समिति के लोग इसके लिए आवेदन करें. वह टीम दोबारा ढूंढ़ना बहुत मुश्किल काम था. लेकिन हमने मैनेजिंग समिति के तमाम पुराने दस्तावेज खंगाले और पुराने शेयरधारकों को ढूंढ़ कर एक नई मैनेजिंग समिति का गठन किया.”

अंततः साल 2000 में हिंदुस्थान समाचार एक बार फिर शुरू हो गया. एक दिलचस्प संयोग यह भी है कि हिंदुस्थान समाचार के दोबारा शुरू होने की राह तभी खुली जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बन चुकी थी. बल्कि इसके पुनः शुरू होने पर तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने ही इसका उद्घाटन किया था.

वर्तमान और भविष्य

साल 2000 के करीब हिंदुस्थान समाचार एक बार फिर शुरू तो हो गया लेकिन यह शुरुआत बस औपचारिकता भर की ही थी. वितीय संकट इसमें लगातार बना रहा और इससे जुड़े ज्यादातर लोग यहां ‘स्वयंसेवा’ ही कर रहे थे. हिंदुस्थान समाचार के एक कर्मचारी गोपनीयता की शर्त पर बताते हैं, “बीच-बीच में आरएसएस से जुड़े कई लोगों ने थोड़ा-बहुत वित्तीय सहायता की लेकिन यह इतनी नहीं थी इससे एक अखिल भारतीय न्यूज़ एजेंसी चलाई जा सके. एजेंसी के सब्सक्राइबर भी सीमित थे और उनसे भी ज्यादा पैसा नहीं आता था. ज्यादातर लोग सिर्फ वैचारिक जुड़ाव के चलते ही संस्था के साथ जुड़े रहे हैं.”

हिंदुस्थान समाचार की इस स्थिति में असली परिवर्तन साल 2016 में आया. उज्जैन सिंहस्थ महाकुंभ के दौरान आरएसएस ने जब हिंदुस्थान समाचार की कमान आरके सिन्हा को सौंपने का फैसला लिया, तब से इस संस्था की तस्वीर बदलनी शुरू हो गई. आरके सिन्हा भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं और निजी सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली मशहूर कंपनी एसआईएस सिक्योरिटीज़ के मालिक हैं. इस कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2017-18 में इसका टर्नओवर 5,800 करोड़ रुपये रहा है. एसआईएस के कई संसाधन पिछले दो सालों से हिन्दुस्तान समाचार को मजबूत करने के लिए भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

हिंदुस्थान समाचार के निदेशक मंडल के अध्यक्ष बनने के बारे में सांसद आरके सिन्हा कहते हैं, “इस पद के लिए चुनाव होता है और बोर्ड मेंबर इसमें वोट देते हैं. मेरा इस पद आना संघ का नहीं बल्कि बोर्ड के सदस्यों का फैसला था जिन्होंने वोट देकर मुझे चुना.” यदि ऐसा है तो फिर उज्जैन सिंहस्थ महाकुंभ में उन्हें रातों-रात क्यों बुलाया गया था और हिंदुस्थान समाचार की कमान संभालने की जिम्मेदारी संघ के नेतृत्व ने उन्हें ही क्यों सौंपी थी? यह सवाल पूछे जाने पर सिन्हा सपाट उत्तर देते हैं, “ऐसा इसलिए किया गया ताकि मैं यह जिम्मेदारी लेने से इनकार न कर सकूं.”

हिंदुस्थान समाचार की कमान आरके सिन्हा के हाथों में सौंप देने के बाद भी संघ की मौजूदगी इस संस्था में लगातार बनी रही है. 2016 में जब आरके सिन्हा ने इसकी कमान संभाली तो इसके तुरंत बाद ही हिंदुस्थान समाचार का कार्यालय सिन्हा के नोएडा सेक्टर 63 स्थित एक बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिया गया. अब यही हिंदुस्थान समाचार का मुख्यालय है. इस नए कार्यालय का उद्घाटन करने स्वयं संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी आए थे. इतना ही नहीं, उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद संघ के शीर्ष नेतृत्व के लोग भी इस कार्यालय में पहुंचे और पूरी टीम का ‘मार्गदर्शन’ किया गया.

हिंदुस्थान समाचार के एक कर्मचारी बताते हैं, “उस कार्यक्रम में पूरी टीम को बताया गया कि कैसे वैचारिक दृष्टिकोण से अहम ख़बरों पर संस्थान का ध्यान होना चाहिए और ऐसी ख़बरों को बढ़ावा मिलना चाहिए. सिर्फ उस कार्यक्रम में ही नहीं बल्कि हर साल ही एक बार हमारी पूरी टीम के मार्गदर्शन के लिए संघ के लोग आते हैं. कई बार हमारी पूरी टीम दो या तीन दिन के लिए देहरादून या किसी अन्य जगह भी जाती है जहां कई-कई घंटों के सत्र संघ के विचारक लेते हैं.”

2016 में आरके सिन्हा के आते ही हिंदुस्थान समाचार में कुछ अहम बदलाव किए गए. सिन्हा बताते हैं, “पहला बदलाव तो हमने आते ही यह किया कि मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतनमान लागू किया. इसके अलावा वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सारा लेन-देन डिजिटल और चेक से करवाया. साथ ही कर्मचारियों के लिए चौबीस घंटे खुली रहने वाली कैंटीन शुरू की.” निश्चित तौर पर मजीठिया की सिफारिशें लागू करना एक बड़ा फैसला था, बाकी चीजें किसी प्रोफेशनल संस्थान में आमतौर पर होती ही हैं.

इन बदलावों के साथ ही हिंदुस्थान समाचार की टीम और सब्सक्राइबर, का दायरा भी अब तेजी से बढ़ने लगा. हिंदुस्थान समाचार के डिप्टी मैनेजर अविनाश कुमार बताते हैं, “हमारे स्ट्रिंगर और रिपोर्टरों की संख्या पहले करीब आठ सौ थी जो अब बढ़कर 1800 से ऊपर हो चुकी है. इसके साथ ही हमारे पेड सब्सक्राइबर आज तीन हजार के करीब हो चुके हैं जो 2016 से पहले साढ़े सात सौ के करीब थे.’

आज इस न्यूज़ एजेंसी का देश के हर राज्य में ब्यूरो है, पचास से ज्यादा शहरों में इसके कार्यालय हैं, 14 भाषाओं में यह एजेंसी काम कर रही है, दिल्ली-एनसीआर में ही इसके डेढ़ सौ से ज्यादा कर्मचारी हैं और देशभर में इस एजेंसी के पत्रकारों की संख्या 1800 से ऊपर बताई जाती है.

मोदी सरकार की नई विज्ञापन नीति

हिंदुस्थान समाचार के ताजा विस्तार के पीछे एक सरकारी नीति की भी अहम भूमिका मानी जा रही है. 2016 में एक तरफ आरएसएस ने आरके सिन्हा को हिंदुस्थान समाचार की कमान सौंपी तो दूसरी तरफ मोदी सरकार ठीक उसी दौरान एक ऐसी नीति लेकर आई जो हिंदुस्थान समाचार के लिए फायदेमंद साबित हुई. इधर संघ की आज्ञा का पालन करते हुए आरके सिन्हा ने हिंदुस्थान समाचार में निवेश शुरू किया, दूसरी तरफ, 7 जून 2016 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नई विज्ञापन नीति की घोषणा कर दी.

नई नीति के तहत अखबारों को सरकारी विज्ञापन हासिल करने के लिए सौ अंकों का एक पैमाना तय किया गया. मध्यम श्रेणी के अखबारों को सरकारी विज्ञापन हासिल करने के लिए कम-से-कम 45 अंक हासिल करने थे. इन अंकों के कई आधार बनाए गए. जैसे, यदि अखबार ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का सब्सक्रिप्शन लिया है तो उसके लिए 10 अंक, यदि आरएनआई (रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज़पेपर इन इंडिया) या एबीसी (ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन) का प्रमाणपत्र है तो 25 अंक, यदि कर्मचारियों का प्रोविडेंट फंड काटा जाता है तो अधिकतम 20 अंक और अखबार के पन्नों की संख्या के आधार पर अधिकतम 20 अंक. इन्हीं में से एक आधार न्यूज़ एजेंसी के सब्सक्रिप्शन को भी बनाया गया. नीति में स्पष्ट लिखा गया कि ‘यूएनआई, पीटीआई या हिंदुस्थान समाचार को सब्सक्राइब’ करने के लिए भी अखबारों को 15 अंक दिए जाएंगे. ऐसा पहली बार हुआ जब विज्ञापन के लिए एजेंसी के सब्सक्रिप्शन को पैमाना बनाया गया और हिंदुस्थान समाचार जैसे अपेक्षाकृत गुमनाम एजेंसी का नाम स्पष्ट रूप से इस नीति में शामिल किया गया.

हालांकि सीधे तौर पर यह नीति यह नहीं कहती कि आप हिंदुस्थान समाचार को ही सब्सक्राइब करें. लेकिन इसमें कई बातें ऐसी हैं जो सीधे तौर पर हिंदुस्थान समाचार को फायदा पहुंचाती हैं. मसलन एक कारण तो यही था कि हिंदुस्थान समाचार कहने को ही सही लेकिन कई भाषाओं में काम कर रही थी और इसकी सब्सक्रिप्शन फीस भी तुलनात्मक रूप से बहुत कम थी. हालांकि हिंदुस्थान समाचार के समूह संपादक राम बहादुर राय के मुताबिक इस नई नीति से संस्थान को कोई सीधा फायदा नहीं मिला लेकिन हिंदुस्थान समाचार से ही जुड़े अन्य लोग कुछ और ही कहानी बताते हैं.

डिप्टी मैनेजर अविनाश कुमार बताते हैं, “इस नीति के लागू होने से पहले करीब ढाई से तीन हजार लोग हमारे फ्री सब्सक्राइबर थे. उनसे हमें कोई पैसा नहीं मिलता था. लेकिन इस नीति के आने से वे सभी पेड सब्सक्राइबर हो गए हैं.”

2016 में जब यह नीति लागू हुई तो मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगे कि वह आरएसएस के विचारों पर खड़े हिंदुस्थान समाचार को बढ़ावा देने के लिए ही यह नीति लेकर आई है. इस नीति के आने के बाद जिस तेजी से हिंदुस्थान समाचार का विस्तार हुआ उसे देखते हुए यह आरोप काफी हद तक सही भी लगते हैं. लेकिन हिंदुस्थान समाचार के संपादक राम बहादुर राय इन आरोपों को नकारते हुए कहते हैं, “सरकार ने क्या हिंदुस्थान समाचार को कोई जमीन आवंटित कर दी जैसा कि पिछली कई सरकारों में होता रहा था? क्या प्रसार भारती या अन्य किसी सरकारी संस्था के माध्यम से हिंदुस्थान समाचार को वित्तीय लाभ पहुंचाए गए? ऐसा कुछ नहीं हुआ. आप हिंदुस्थान समाचार के एकाउंट्स देख सकते हैं, इस सरकार से उसे कोई मदद नहीं मिली है.”

प्रसार भारती से जिस मदद के न मिलने का जिक्र राम बहादुर राय कर रहे हैं वह भले ही अब तक हिंदुस्थान समाचार को न मिली हो लेकिन जल्द ही यह संभव हो सकता है. आरके सिन्हा स्वयं इस संभावना को स्वीकारते हुए कहते हैं, “प्रसार भारती हमारी सेवाएं ले रही है लेकिन इसके बदले जो रकम वो हमें देने की बात कर रहा है वह हमें स्वीकार नहीं है. वह सम्मानजनक ऑफर नहीं दे रहे हैं.” सिन्हा आगे बताते हैं, “इस देश में हिंदी के पाठक 36 प्रतिशत हैं, क्षेत्रीय भाषाओं के 60 प्रतिशत और अंग्रेजी के सिर्फ चार प्रतिशत. पीटीआई अंग्रेजी में खबरें देता है यानी वह सिर्फ चार प्रतिशत दर्शकों की जरूरत पूरी करता है और प्रसार भारती उसे नौ करोड़ रुपये दे रही है. जबकि हमसे वह उम्मीद कर रहे हैं कि हम हिंदी के साथ ही तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में उन्हें सिर्फ दो करोड़ रुपए में ख़बरें दें. यह संभव नहीं है.” जल्द ही दोनों के बीच बातचीत का हल निकल सकता है.

प्रसार भारती और हिंदुस्थान समाचार के बीच वित्तीय करार भले ही मोल-भाव के स्तर पर अटका हुआ है लेकिन हिंदुस्थान समाचार की ख़बरें प्रसार भारती में पिछले काफी समय से इस्तेमाल हो रही है. एजेंसी से जुड़े लोग बताते हैं कि पिछले एक साल में प्रसार भारती को हिंदुस्थान समाचार ने करीब साढ़े सात लाख ख़बरें भेजी हैं जिनमें से 2 लाख 40 हजार प्रसार भारती ने इस्तेमाल भी की हैं. प्रसार भारती ही दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो का संचालन देखता है. इसके 16 केंद्रों पर हिंदुस्थान समाचार की ख़बरों को इस्तेमाल किया जा रहा है. यानी दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से देश के कोने-कोने में वह ख़बरें पहुंचने भी लगी हैं जो आरएसएस के वैचारिक मार्गदर्शन पर चलने वाला हिंदुस्थान समाचार तैयार कर रहा है.

विस्तार- व्यवसायिक या वैचारिक

हिंदुस्थान समाचार ने हाल ही में अपनी एक न्यूज़ वेबसाइट भी शुरू की है जिसके जरिये इसमें राजस्व भी आने लगा है. इसके अलावा तीन पत्रिकाएं भी हिंदुस्थान समाचार निकाल रहा है. युगवार्ता, यथावत और नवोत्थान नाम से हिंदुस्थान समाचार की साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाएं निकल रही हैं. यह पत्रिकाएं पहले आरके सिन्हा निकाला करते थे लेकिन जब से उन्होंने हिंदुस्थान समाचार की जिम्मेदारी संभाली है, तब से इन पत्रिकाओं को भी इस समूह का हिस्सा बना लिया गया है. इन पत्रिकाओं के पिछले कुछ अंक देखकर ही स्पष्ट हो जाता है कि इन्हें सरकारी विज्ञापन भी लगातार अच्छी-खासी मात्रा में मिल रहे हैं. गेल, इंडियन आयल, आयल इंडिया लिमिटेड, एअरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया, एलआईसी और पॉवर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड के साथ ही हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे उन राज्यों के सूचना विभागों के विज्ञापन इन पत्रिकाओं में लगातार छप रहे हैं जहां भाजपा की सरकार हैं. जबकि निजी कंपनियों के विज्ञापन इन पत्रिकाओं में नगण्य ही हैं. ‘द इंडियन पब्लिक स्कूल’ का निजी विज्ञापन जरूर इन सभी पत्रिकाओं में दिखता है लेकिन यह स्कूल स्वयं आरके सिन्हा का ही है.

हिंदुस्थान समाचार का वर्तमान में जिस तेजी से विस्तार हो रहा है, उसके पीछे अहम भूमिका आरके सिन्हा ही निभा रहे हैं. नोएडा स्थित कार्यालय में जो लोग हिंदुस्थान समाचार के लिए काम कर रहे हैं, उनमें काफी बड़ी संख्या उन लोगों की है जो 2016 से पहले एसआईएस सिक्योरिटीज़ के लिए काम किया करते थे. हिंदुस्थान समाचार को कार्यालय से लेकर तमाम वित्तीय सहायता भी आरके सिन्हा खुद ही मुहैया करवा रहे हैं. सवाल उठता है कि एक कोऑपरेटिव सोसाइटी में वे इतना निवेश क्यों कर रहे हैं? इस सवाल के जवाब में सिन्हा कहते हैं, “हिंदुस्थान समाचार से मेरा वैचारिक और भावनात्मक जुड़ाव रहा है. मैंने साल 1966 में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार हिंदुस्थान समाचार में कदम रखा था और लंबे समय तक इसमें काम किया. ये मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे इस संस्थान की कमान संभालने का अवसर मिला है.”

यहां एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि आरके सिन्हा आज भले ही हिंदुस्थान समाचार से पुराने भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव की बात कह रहे हैं लेकिन उनकी लिखी किताब कुछ अलग ही कहानी कहती है. साल 2015 में (हिंदुस्थान समाचार के अध्यक्ष बनने से पहले) उनकी एक किताब प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक है ‘मी एंड माय गुरु.’ यह किताब उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु स्वामी मृत्युंजय महाराज के साथ अपने अनुभवों पर लिखी है.

इस किताब में सिन्हा ने अपनी पत्रकारिता का भी कई बार जिक्र किया है. लेकिन हर जगह उन्होंने यही लिखा है कि उनकी पत्रकारिता की शुरुआत ‘प्रदीप’ अख़बार से हुई और कुछ समय बाद उन्होंने ‘द सर्चलाइट’ में भी काम किया. इस किताब में उन्होंने यह भी लिखा है कि 1971 की लड़ाई में भी उन्होंने ‘प्रदीप’ अखबार के लिए रिपोर्टिंग की थी. पत्रकारिता की दुनिया से अलग होकर जहां उन्होंने एसआईएस सिक्योरिटीज़ की शुरुआत का जिक्र किया है, वहां भी यही बताया गया है कि वे प्रदीप और द सर्चलाइट में पत्रकार रहे. इस किताब में उन्होंने जहां भी अपनी पत्रकारिता का जिक्र किया है, उसमें कहीं भी हिंदुस्थान समाचार का जिक्र नहीं मिलता.

आरके सिन्हा आरएसएस से लंबे समय से जुड़े रहे हैं और हिंदुस्थान समाचार के पुराने शेयरधारक भी हैं. लेकिन इससे बतौर पत्रकार जुड़े होने जिक्र खुद उनकी ही किताब में नहीं मिलता. ऐसे में यह सवाल और भी वाजिब लगता है कि क्या संघ के आदेश या निर्देश पर ही वे इस संस्थान को विस्तार देने का काम कर रहे हैं और इसमें निवेश कर रहे हैं?

व्यापारिक दृष्टिकोण से उनका इस संस्थान में निवेश करना कोई फायदे का सौदा नहीं लगता. हिंदुस्थान समाचार के एक कर्मचारी बताते हैं, “फिलहाल तो हिंदुस्थान समाचार घाटे में है. सब्सक्राइबर से भी इतना पैसा नहीं आता कि यह बड़ा मुनाफा कमा सके. ऐसे में इसमें मुनाफा तभी हो सकता है जब सरकार प्रसार भारती के जरिये या किसी अन्य तरीके से इसकी मदद करे. लेकिन एक कोऑपरेटिव सोसाइटी होने के कारण इस संस्थान को जो मुनाफा होगा भी वह संस्थान में लगेगा. लिहाजा सिन्हा साहब का इसमें निवेश करना व्यापारिक दृष्टिकोण से फायदेमंद नहीं दिखता लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से इसके फायदे हैं. साथ ही वे ख़बरों की दुनिया में संघ की पैठ मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं.”

हिंदुस्थान समाचार में कार्यरत एक पत्रकार बताते हैं, “2016 में दैनिक जागरण समूह और जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा ने भी हिंदुस्थान समाचार को चलाने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन संघ ने यही तय किया कि इसकी जिम्मेदारी किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपी जाए जो संघ परिवार के प्रति समर्पित हो और वैचारिक रूप से दृढ़ हो. इसके बाद ही आरके सिन्हा को टटोला गया.”
आरके सिन्हा इस निवेश के बारे में कहते हैं, “मुझे यहां से कुछ भी लेना नहीं है. इससे जुड़ने का फैसला मैंने दिल से लिया है दिमाग से नहीं. मेरी कोशिश यही है कि यह न्यूज़ एजेंसी अपने गौरवशाली स्वरुप में लौट सके. ये मेरी बालेश्वर अग्रवालजी को गुरुदक्षिणा होगी जो लंबे समय तक इसके संपादक रहे.” सिन्हा यह भी बताते हैं कि हिंदुस्थान समाचार जल्द ही एक दैनिक अखबार भी शुरू करने जा रहा है.

हिंदुस्थान समाचार से जुड़े अधिकतर लोग कहते हैं कि इसका आरएसएस से कोई सीधा लेना-देना नहीं है, संघ इसके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता और इसमें सभी तरह के विचारों और ख़बरों को शामिल किया जाता है. लेकिन इसकी लगातार विस्तृत होती टीम के ‘मार्गदर्शन’ में संघ की अहम भूमिका रहती है. इसमें कार्यरत लोगों की समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं जहां संघ के वरिष्ठ लोग शामिल होते हैं और पत्रकारों को ‘राष्ट्रहित’ की पत्रकारिता के बारे में बताते हैं.

इसके अलावा जो निर्देश प्रबंधन इस संस्थान के पत्रकारों को देता है उसके बारे में आरके सिन्हा कहते हैं, “हमारा बस यही निर्देश है कि हम किसी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधि का कभी समर्थन नहीं करेंगे और गौ, गंगा, गायत्री, गांव में हमारी जो श्रद्धा है उसका हमेशा ध्यान रखते हुए काम करेंगे.”

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