समानता सिर्फ नारा, महिलाएं अधिक पीड़ित होती हैं

श्रम बल में तीन चौथाई महिलाओं की भागीदारी न होना और एक तिहाई कम वेतन हासिल करना नए भारत की नई तस्वीर है.

समानता सिर्फ नारा, महिलाएं अधिक पीड़ित होती हैं
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नारी समानता, भेदभाव रहित जीवन, जाति-धर्म विहीन समाज जैसी बड़ी-बड़ी बातों वाले हम जितना भी नारे गढ़ लें, पर हकीकत यही है कि हमारे देश में महिलाओं के साथ हर स्तर पर भेदभाव होता है. ऑक्सफैम इंडिया ने अपनी हालिया प्रकाशित रिपोर्ट ‘माइंड द गैप’ (भेदभाव को देखें) में कहा है कि पिछले दो दशक में रोजगार की गुणवत्ता में गिरावट आई है, अतिरिक्त रोजगार के सृजन में कमी आई है और विभिन्न क्षेत्रों में कामगारों का असमान वितरण हुआ है, जिसके चलते समाज में असमानता बढ़ी है. इसका सबसे बुरा असर महिलाओं पर पड़ा है जिसका परिणाम है कि महिलाओं को एक ही तरह के काम के लिए, एक ही तरह की योग्यता होने के बावजूद एक तिहाई (34 फीसदी) से कम धनराशि मिलती है. इतना ही नहीं, वर्ष 2015 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 92 फीसदी महिलाएं और 82 फीसदी पुरुषों की मासिक आमदनी दस हजार से कम है.

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक यहां बात केवल वेतन की नहीं है. एक तरफ देश के श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी में कमी आ रही है (महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले पहले भी कम थी), दूसरी तरफ पुरुषों की रोजगार दर बढ़ रही है. रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015-16 में देश के कुल श्रमिकों में पुरुषों की भागीदारी 75.5 फीसदी थी, जिसमें 1.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और अगले वर्ष बढ़कर 76.8 फीसदी हो गई. जबकि इसी समयावधि में महिलाओं की भागीदारी आधा फीसदी घटकर 27.4 फीसदी से 26.9 फीसदी हो गई.

विश्व बैक के आंकड़े के मुताबिक पिछले दो दशक में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सात फीसदी के आस-पास रहा है, जबकि उसके अनुपात में रोजगार के अवसर की दर काफी खराब रही है. विश्व बैंक के ही अनुसार हमारे देश में सबसे अधिक रोजगार का अवसर या तो असंगठित क्षेत्र में हो रहा है या फिर संगठित क्षेत्र में अनौपचारिक स्तर पर हो रहा है. ऐसी परिस्थिति में किसी भी तरह जीवन जी लेने की मजबूरी इतनी अधिक होती है कि बेहतरी के बारे में इंसान सोच ही नहीं पाता है.

ऑक्सफैम इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ बेहर का कहना है, “रोजगार सृजन और लिंग आधारित न्याय के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति गंभीर बनी हुई है. रिपोर्ट में इस बात की तरफ खासतौर पर ध्यान दिलाया गया है कि किस तरह महिलाएं आर्थिक विकास के नैरेटिव से भी गायब हो रही हैं. महिलाओं के रोजगार में मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में श्रम की कमी, शहरी क्षेत्रों में रोजगार के रूप बदल जाने, गैरबराबरी वाली तनख्वाह, घर-परिवार का देखभाल करने वाले श्रम में पारिश्रमिक न मिलना और पुरानी सामाजिक मानसिकता को बनाए रखना भी जिम्मेवार है.”

बेहर के अनुसार, “श्रम बल में महिलाओं की जो कमी आई है, उसकी वजह सरकार द्वारा उचित नीति नहीं बनाने तथा सामाजिक संरचना व सुरक्षा में पूंजी निवेश नहीं करना है.”

आठ अध्यायों में बंटी ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि आज जबकि एनडीए सरकार का पांच साल पूरा हो गया है तो यह जरूरी है कि उसके पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान रोजगार सृजन करने के वायदे का लेखा-जोखा निकाला जाये. रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि उसकी सरकार एक करोड़ रोजगार हर साल पैदा करेगी. शायद यही कारण था कि पहली बार जो युवक-युवती अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे, उन्होंने यह सोचकर वोट डाला होगा कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके कार्यकाल में उसे पहली नौकरी मिलेगी. पांच साल बीत चुका है लेकिन सरकार अपने वायदे को पूरा करने में पूरी तरह असफल रही है. जबकि विश्व बैंक का कहना है कि मौजूदा रोजगार दर को ही बनाए रखने के लिए भारत में हर साल कम से कम आठ मिलियन (मतलब 80 लाख) रोजगार सृजित करने की जरूरत है.

रिपोर्ट में दिया दत्ता ने लिखा है कि इस रिपोर्ट में भारत में रोजगार की स्थित को जेंडर के नजरिए से समझने के लिए विश्लेषण किया गया है. भारत में महिलाओं की आबादी आधी है, लेकिन श्रम में उनका हिस्सा एक चौथाई से भी कम है. चार में से तीन महिलाएं श्रम बाजार में नहीं हैं तो फिर क्या तेज आर्थिक संवृद्धि के दौर में महिलाओं को भुला दिया गया है? यह समावेशी विकास का सबसे महत्वपूर्ण मसला है, जिसमें असमानता का प्रश्न भी शामिल है. दिया के अनुसार, “लिंग आधारित मजदूरी में भेदभाव को एशिया के स्तर पर देखें, तो यह असमानता भारत में सबसे अधिक पाई गई है. एक जैसा काम, एक जैसी योग्यता लेकिन महिलाओं की आय में 34 फीसदी की कमी.”

असमानता दूर करने के लिए रोजगार का सृजन और रोजगार दर सबसे महत्वपूर्ण पहलू होता है. ऑक्सफैम की पहली रिपोर्ट ‘भारत में असमानता’ ने इस बारे में गहरी चिंता व्यक्त की थी कि उदारीकरण के बाद के दौर में जिस तरह का विकास हो रहा है, उसमें रोजगार के अवसर नहीं पैदा हो रहे हैं. अर्थव्यवस्था संवृद्धि में तेजी व श्रम शक्ति में वृद्धि के बावजूद रोजगार का सृजन काफी धीमा रहा है.

इशिता मेहरोत्रा ‘ग्रामीण रोजगार व असमानता’ नामक शोध पत्र में बताती हैं कि कैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आर्थिक संरचना के चलते निर्धन दलित महिलाओं को लगभग बंधुआ मजदूर वाली स्थिति में जीवनयापन करना पड़ रहा है. इक्कीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक बीत रहा है, लेकिन हम पाते हैं कि अतिरिक्त रोजगार का सृजन होना आज भी बड़ी चुनौती है. इस भारतीय संवृद्धि की असंतुलित प्रवृत्तियों को समझे बगैर पूरी असमानता को समझना मुश्किल है. हमारे देश में जीडीपी का आधा से अधिक भाग ‘सेवा’ या ‘सर्विस’ क्षेत्र से आता है. लेकिन रोजगार सृजन में इसकी कोई भूमिका नहीं है. जीडीपी में कृषि की भागीदारी घटते-घटते 14 फीसदी तक पहुंच गई है, जबकि अभी भी लगभग आधा श्रम (49 फीसदी) इसी पर आश्रित है.

‘भारत में श्रम कानून में सुधार’ नाम से लिखे गए अध्याय में वैभव राज ने प्रधानमंत्री के पकौड़ा बनाने को रोजगार कहने के उद्धरण को अपने शोध में शामिल किया है. वैभव के अनुसार, “अनौपचारिक श्रम को हमेशा बुरा नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री का बयान श्रम के बारे में सरकार की मौजूदा सोच को उजागर करता है. हमारे देश में आर्थिक व सामाजिक श्रेणियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. इसलिए पकौड़ा बेचनेवाले, रेहड़ी-पटरी वालों की श्रेणी में आते हैं. वे कामगार प्रायः अन्य पिछड़ा वर्गों के सामाजिक समूह से जुड़े होते हैं. हम जानते हैं कि अनौपचारिक मजदूरों की कार्यस्थिति अच्छी नहीं होती है और वे समग्र सामाजिक सुरक्षा से भी वंचित रहते हैं.”

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