निजी स्कूलों की लूटमार कहीं खा न जाये हमारे बच्चों का भविष्य

स्कूलों को इतना कठोर नहीं होना चाहिए. इतना तो सोचना चाहिए कि इन बच्चों पर क्या असर पड़ेगा.

निजी स्कूलों की लूटमार कहीं खा न जाये हमारे बच्चों का भविष्य
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दो साल पहले जब मैंने प्राइवेट स्कूलों की लूट पर लगातार कई दिनों तक प्राइम टाइम किया था, तब लोगों ने रास्ते में रोक कर कहा कि आप मोदी विरोध में ऐसा कर रहे हैं. मुझे समझ नहीं आया कि स्कूलों के इस लूट सिस्टम पर रिपोर्ट करने का संबंध मोदी विरोध से कैसे है.

ख़ैर, लूट जारी है. क्योंकि इन स्कूलों में पीछे से नेताओं का पैसा सफेद होता है. मीडिया घराने भी स्कूल चलाने लगे हैं. इसलिए संघर्ष करने वाले अभिभावक अनाम चैनलों की यू-ट्यूब रिकार्डिंग शेयर करके खुश हो रहे हैं. जिन चैनलों को नामी मानते हैं, उन पर उनकी व्यथा नहीं है और न होगी कभी. अपवाद छोड़ कर.

हर साल कुछ अभिभावक संघर्ष करते हैं. बाकी अभिभावक अपनी ग़ुलामी को जारी रखते हैं. उनके पास ग़ुलामी का प्रीमियम भरने का पैसा होता है. मगर जिन अभिभावकों ने संघर्ष का रास्ता अपनाया है, उनकी कहानी दिलचस्प है. राजनीतिक समझ भले अधूरी हो, मगर लड़ने की समझ तो है. राजनीतिक समझ अधूरी इसलिए कहा कि यह तंत्र हवा में नहीं बनता है. जिस स्कूल के बाहर बैठकर बच्चे पढ़ रहे हैं, उसी स्कूल में उपराष्ट्रपति 30 अप्रैल को वेंकैया नायडू आ रहे हैं. ऐसा एक अभिभावक ने बताया है.

नोएडा में एपीजे स्कूल को बढ़ी हुई फीस लौटानी पड़ी है. स्कूल ने एक सत्र की फीस 5000 रुपये अधिक कर दी. अभिभावकों का समूह ज़िला फीस नियम कमेटी( DFRC) चले गया. जब नियमन समिति ने चेतावनी दी, तो स्कूल को फीस लौटानी पड़ी है. स्कूल ने यह भी कहा है कि वह इसके ऊपर की समिति में फैसले को चुनौती देगा. स्कूल पर 5 लाख का जुर्माना लगा है.

अब आप इस तस्वीर को देखिये. सेठ आनंद राम जयपुरिया स्कूल के बाहर बच्चे ज़मीन पर पढ़ाई कर रहे हैं. इन्हें स्कूल ने भीतर आने से रोका हुआ है. ज़िला प्रशासन ने क्लास में बैठने के निर्देश जारी किये हैं, मगर कोई फ़र्क नहीं पड़ा है. एक अभिभावक ने बताया कि स्कूल 94,980 रुपये मांग रहा है, साल का. ज़िला फीस नियम कमेटी ने 75,783 रुपये तय किये हैं. मगर बेस ईयर फीस 69,000 होती है. 4 अप्रैल से स्कूल ने 47 बच्चों को क्लास में नहीं आने दिया है. जबकि उन्होंने 69,000 रुपये जमा करा दिये हैं.

अभिभावकों ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह को पत्र भेजा है. कई संस्थाओं में शिकायत की है. स्कूल के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का आदेश भी जारी हुआ है. सोमवार को ज़िलाधिकारी के कार्यालय में 47 बच्चों की क्लास लगायी गयी. आज स्कूल के गेट पर ये बच्चे बैठे हैं. 1 मई से परीक्षा है और 20 दिनों से इन बच्चों ने एक भी क्लास नहीं की है.

स्कूल ने हाईकोर्ट जाकर फरवरी 2019 के ज़िला फीस नियम समिति के आदेश पर रोक हासिल कर लिया है. उन अभिभावकों के ख़िलाफ़ एफआईआर कर दिया, जो अपने बच्चों को बचाने के लिए स्कूल के भीतर गये थे. बच्चों को अलग कमरे में रख दिया गया था. ऐसा अभिभावकों ने बताया है. अभिभावकों ने स्कूल के प्रिंसिपल के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ करा दिया है. हमारे पास स्कूल का पक्ष नहीं है. जो भी पक्ष हो, स्कूल को इतना कठोर नहीं होना चाहिए. भले उनके संपर्क में हर दल के नेता और महंगे वकील हों, लेकिन ये सोचना चाहिए कि इन बच्चों पर क्या असर पड़ेगा. शर्म आनी चाहिए.

मीडिया ऐसी ख़बरों को किसी किनारे छाप देता है. पाठक और दर्शक को ट्रेनिंग दी गयी है कि वे किस तरह की खबरें देखें. जैसे आप इस वक़्त सभी चैनलों पर प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू देख रहे हैं, जिसे अभिनेता अक्षय कुमार ने लिया है. आज यही महत्वपूर्ण है. पांच साल से प्रधानमंत्री बचपन की कहानियां सुना रहे हैं. साल 2014 में तो कॉमिक्स छपवा दिया था, जिसमें वे मगरमच्छ से भरे तालाब में कूद गये थे गेंद लाने के लिए. आप कितने भी चैनल बदल लें, आज के दिन प्रधानमंत्री ही दिखेंगे और लोग भी यही देखेंगे. एक तरफ़ उनका घंटा-घंटा भर भाषण लाइव होता है, तो दूसरी तरफ़ घंटा-दो-घंटा लंबा इंटरव्यू बिना ब्रेक के चलते रहता है. आप इसे देखते हैं और इसे ख़बर समझते हैं.

नींद तब टूटती है जब आप सड़क पर उतरते हैं और मीडिया को खोजते हैं. तब आप ख़ुद को कॉमन-मैन कहने लगते हैं. मीडिया में मूल मुद्दा खोजने लगते हैं. मगर याद कीजिये, क्या आप तब टीवी देखते हैं जब किसी और से जुड़ा मूल मुद्दा दिखाया जाता है, या फिर आप चैनल बदल कर अक्षय कुमार का लिया इंटरव्यू देखते हैं, जिसे पीआर यानी आत्मप्रचार कहते हैं.

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