जो जीता वही नरेंदर

पिछले पांच साल में मोदी की छवि ऐसे नेता की बनी है, जो बदलाव लाना चाहता है, फैसले करता है, उन्हें लागू करता है और बहुत सक्रिय है.

WrittenBy:प्रमोद जोशी
Date:
Article image
  • Share this article on whatsapp

निश्चित रूप से यह अविश्वसनीय परिणाम है. इस परिणाम का असर हमारे सामाजिक जीवन पर भी पड़ेगा. पर इसके पीछे भारतीय राजनीति में लगातार आ रहे बदलाव की दशा-दिशा भी नज़र आ रही है. अब परीक्षा बीजेपी की समझदारी की है, साथ ही देश की प्रशासनिक-न्यायिक संस्थाओं की भी. साल 2014 के चुनाव और इस बार के चुनाव की वरीयताएं और मुद्दे एकदम अलग रहे हैं, भले ही परिणाम एक जैसे हैं. बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं और उसका प्रभाव क्षेत्र बढ़ा है. बंगाल और ओडिशा में उसका प्रवेश जोरदार तरीके से हो गया है. पर दक्षिण भारत में दो तरह की तस्वीरें देखने में आयी हैं. तमिलनाडु, केरल और आंध्र ने उसे स्वीकार नहीं किया, पर कर्नाटक में उसने अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है. केरल में सबरीमाला प्रकरण के बावजूद उसे खास सफलता नहीं मिली.

subscription-appeal-image

Support Independent Media

The media must be free and fair, uninfluenced by corporate or state interests. That's why you, the public, need to pay to keep news free.

Contribute

दस से ज़्यादा राज्यों में बीजेपी को 50 फीसदी या उससे ज़्यादा वोट मिले हैं. इसमें महाराष्ट्र को ग्यारहवें राज्य के रूप में जोड़ा जा सकता है, जहां बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन को 50 फीसदी से ज़्यादा वोट मिले हैं. गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 60 फीसदी से भी ज़्यादा. हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में 60 से कुछ कम. ये परिणाम साल 2015 में दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत की याद दिला रहे हैं.

imageby :

पुलवामा प्रभाव

कुछ महीने पहले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में पराजित होने वाली बीजेपी को ऐसी भारी विजय मिलने के पीछे निश्चित रूप से पुलवामा और बालाकोट का हाथ है. पर केवल इतना ही नहीं है. कांग्रेसी रणनीति की कमियां भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदार हैं. कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद उम्मीदों के जो महल खड़े हुए थे, वे देखते ही देखते ध्वस्त होने लगे हैं. उसका असर ताश के पत्तों के महल की तरह होगा.

दो बातें नज़र आती हैं. एक, भारतीय जनता पार्टी अपने नज़रिये को जनता के सामने न केवल रखने में, बल्कि उसका अनुमोदन पाने में सफल हुई है. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी इसका काउंटर-नैरेटिव तैयार करने में बुरी तरह विफल हुई है. अमेठी में राहुल गांधी की हार कांग्रेस के लिए अशुभ संकेत है. भले ही वे वायनाड से जीत गये, पर अमेठी उनका पारिवारिक गढ़ रहा है. इस हार का संदेश उत्तर प्रदेश की राजनीति में गहरे मायने रखता है.

सामाजिक आधार बढ़ा

कांग्रेस जिसे हिंदू-राष्ट्रवाद और भावनाओं की खेती बता रही थी, उसे जनता ने महत्वपूर्ण माना. वह कांग्रेस की बातें सुनने के लिए तैयार ही नहीं है. यह कांग्रेसी साख की पराजय है. कांग्रेस ने गरीबों और किसानों की बातें कीं, पर गरीबों और किसानों ने भी उसकी नहीं सुनी. बीजेपी को पिछली बार के 31 फीसदी से कहीं ज़्यादा वोट मिले हैं.

बीजेपी की सीटें तो बढ़ी ही हैं, सामाजिक आधार भी बढ़ा है. इसमें बड़ी भूमिका बंगाल और ओडिशा के वोटर की भी है. बंगाल में बीजेपी ने पिछली बार के 17 फीसदी वोटों को बढ़ाकर 40.3 फीसदी कर लिया है. वहीं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वोटों में 20 फीसदी की गिरावट आयी है. तृणमूल कांग्रेस के वोट बढ़े हैं, पर सीटें घटी हैं. इसकी वजह है वाम मोर्चे और कांग्रेस का पराभव. बंगाल में मुकाबले सीधे हो गये हैं. यह बात वहां की भावी राजनीति में महत्वपूर्ण होगी.

imageby :

उत्तर प्रदेश का सामाजिक गणित

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सपा-बसपा के सामाजिक गणित को बिगाड़ दिया है.  विरोधी राजनीति की तमाम उम्मीदें उत्तर प्रदेश पर टिकी थीं. साल 2014 में बीजेपी की जीत का यह सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिन्दु था. लगता था कि इसबार विरोधी दलों की किलेबंदी को बीजेपी नहीं तोड़ पायेगी, पर ऐसा हुआ नहीं. उत्तर प्रदेश में 49.6 फीसदी वोट बीजेपी को मिले हैं. क्या यह हैरत की बात नहीं है?

इन परिणामों के बाद अब राजनीतिक समीकरणों पर फिर से नज़र डालनी होगी. चुनाव के पहले अखिलेश यादव ने कहा था कि बसपा के साथ हमारा गठबंधन लंबा चलेगा और 2022 के चुनाव में भी हम साथ रहेंगे. उनके इस आत्मविश्वास की अब परीक्षा होगी. इस चुनाव में सबसे गहरी चोट सपा को लगी है. बसपा के पास लोकसभा में एक भी सीट नहीं थी, उसे जो कुछ भी मिला है, वह उसकी प्राप्ति है. बावजूद गठबंधन के सपा ने पाया कुछ नहीं, खोया ही है.

कांग्रेस का क्षरण

इस चुनाव परिणाम के तीन-चार निहितार्थ हैं.

  • देश की जनता के मन को बीजेपी ने बेहतर तरीके से पढ़ा है. उसने इस दौरान अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार भी किया है. अब वह केवल उत्तर भारत की पार्टी नहीं है.
  • कांग्रेस पार्टी के पास सामाजिक बहुलता और धर्म-निरपेक्षता की व्यापक छतरी होने के बावजूद व्यावहारिक जमीन पर उसका प्रभाव लगातार क्षरण होता गया है. उसे इसबार 44 से कुछ ज़्यादा 52 सीटें मिली हैं, पर उसकी राजनीतिक ताकत घट गयी है. यह परिणाम राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए सीधी चुनौती है.
  • बीजेपी को मिली भारी सफलता एक नये खतरे को भी जन्म दे रही है. विपक्ष का लुप्त या बेहद कमजोर हो जाना भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है.
  • देश के अल्पसंख्यकों और दूसरे समुदायों को आश्वस्त करने की ज़रूरत है. बीजेपी के पिछले कार्यकाल में गोरक्षा के नाम पर हिंसा और मॉब-लिंचिंग की जो घटनाएं हुई हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए.

संदेश बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए हैं. बीजेपी को इस परिणाम से इतना खुश नहीं होना चाहिए कि वह हवा में उड़ने लगे और कांग्रेस को जनता की भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जिसमें वह अभी तक विफल है. कांग्रेस पार्टी ने मोदी-विरोध की नकारात्मक राजनीति को अपना हथियार बनाया था, जिसमें वह सफल नहीं हुई. उसे अपनी सकारात्मक राजनीति विकसित करनी होगी. इस साल महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभाओं के चुनाव और होंगे. लोकसभा चुनाव के परिणामों से कांग्रेस के लिए कोई शुभ संकेत नहीं हैं.

कांग्रेस अब क्या करेगी?

साल 2016 में पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया था कि पार्टी को बड़ी सर्जरी की ज़रूरत है. सोनिया गांधी ने आत्म-निरीक्षण की बात कही. शशि थरूर ने कहा, ‘आत्ममंथन का समय गुज़र गया, अब कुछ करने का समय है…नज़र आने वाले बदलाव होने चाहिए….अब वक़्त है कि कुछ निष्कर्ष निकाले जायें और कार्रवाई की जाये.’ ऐसे बयान अभी नहीं आये हैं, पर आयेंगे ज़रूर. पर बड़ी सर्जरी का मतलब क्या है?

परिणामों पर नज़र डालें, तो पायेंगे कि कांग्रेस ने सबसे अच्छा प्रदर्शन पंजाब में किया है. पार्टी ने सीट ही नहीं जीतीं, वोट प्रतिशत भी बेहतर हासिल किया है. वहां पार्टी की स्थानीय इकाई मजबूत है. पर दूसरी तरफ कर्नाटक में राजनीतिक संकट आने वाला है. कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन कितना चलेगा, कहना मुश्किल है. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी ऐसी ही दिक्कतें खड़ी होंगी. दोनों राज्यों में पार्टी के भीतर गुटबाजी है और क्षेत्रीय नेतृत्व संकीर्ण स्वार्थों में लिप्त है.

खतरे और उम्मीदें

दुनियाभर की राजनीति में सामाजिक पहचान एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रही है. अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों में भावनात्मक मसले राजनीति पर हावी हो रहे हैं. हालांकि भारत को लेकर पश्चिमी देशों में चिंताएं है, पर वहां भी ऐसे ही लक्षण हैं. पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी ने अपना राजनीतिक आधार तीन तरह के मतदाताओं के बीच बनाया. एक, अपवार्ड मोबाइल शहरी युवा और स्त्रियां, जिन्हें एक नया आधुनिक भारत चाहिए. दूसरा ग्रामीण भारत, जो अपनी बुनियादी ज़रूरतों को लेकर परेशान रहता है. तीसरे, बीजेपी के ‘राजनीतिक हिंदुत्व’ के समर्थक, जिसे पार्टी का ‘कोर वोटर’ कह सकते हैं. पर वे पहली पंक्ति में नहीं थे. पिछले चुनाव में पार्टी की मुख्य अपील विकास और बदलाव को लेकर थी.

यह चुनाव ऐसे वक़्त में हुआ है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था बदलाव के संधि-स्थल पर खड़ी है. पिछले पांच साल में मोदी की छवि ऐसे नेता की बनी है, जो बदलाव लाना चाहता है, फैसले करता है, उन्हें लागू करता है और बहुत सक्रिय है. तमाम विरोध और आलोचनाओं के बावजूद उनके दीवानों की संख्या कम नहीं है. तमाम वायदों के पूरा न होने या अधूरा रह जाने के बावजूद, उनके समर्थक निराश नहीं हुए हैं. पर इस बार का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति में कोलाहल मचायेगा. सामाजिक ध्रुवीकरण और सामाजिक सौहार्द बिगड़ने के खतरे देश के सामने हैं. देखना होगा कि बीजेपी के पास इन बातों का समाधान क्या है. अब परीक्षा हमारी प्रशासनिक-न्यायिक संस्थाओं की भी है. देखना होगा कि इतनी बहुल संस्कृति वाले देश को जोड़ने के सूत्र बीजेपी के पास हैं भी या नहीं.

You may also like