सीएए: जब संसद गूंगी और अंधी हो जाती है तब सड़कें लड़ाई का मैदान बन जाती हैं
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सीएए: जब संसद गूंगी और अंधी हो जाती है तब सड़कें लड़ाई का मैदान बन जाती हैं

हमने जिस सरकार को देश के लिए चुना था, उसने देश को दल में बदल लिया है. वह भूल गई है कि नागरिक उससे नहीं हैं, वह नागरिकों से है.

By कुमार प्रशांत

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देश सड़कों पर है. जिसे स्कूलों-कॉलेजों में होना चाहिए था,  बाजारों और दूकानों में, घरों और दफ्तरों में होना चाहिए था वह अगर सड़कों पर उतर आए तो समझ लेना चाहिए कि देश की गाड़ी पटरी से उतर रही है. जिस नागरिक ने देश को गुलामी से मुक्त किया, अपने देश का अपना लोकतंत्र बनाया, इस और ऐसी कितनी ही सरकारों को बनाया-मिटाया, आज उसी नागरिक से, उसकी ही बनाई सरकार उसकी वैधता पूछ रही है और उसे अवैध घोषित करने का कानून बना कर इतरा रही है.

कोई कहे कि नौकरों ने (प्रधानसेवक !) मालिक तय करने का अधिकार ले लिया है, तो गलत नहीं होगा. जब सरकार संविधान से मुंह फेर लेती है,  विधायिका विधान से नहीं,  संख्याबल से मनमाना करने लगती है,  नौकरशाही जी-हुजूरों की फौज में बदल जाती है और न्यायपालिका न्याय का पालन करने और करवाने के अलावा दूसरा सब कुछ करने लगती है, तब देश पटरी से उतर जाता है.

हमने जिस सरकार को देश के लिए चुना था, उसने देश को दल में बदल लिया है और हमने लोकसभा में उसे जो बहुमत दिया था, उसे उसने मनमाना करने का लाइसेंस मान लिया है. वह भूल गई है कि नागरिक उससे नहीं हैं, वह नागरिकों से है. नागरिक उसे चाहे जब तब बदल सकता है. वह चाहे तो भी नागरिक को बदल नहीं सकती है.

नागरिकता की एक परिकल्पना और उसका आधार हमारे संविधान ने हमें दिया कि जो भारत में जनमा है वह इस देश का नागरिक है. फिर उसी संविधान ने यह भी कहा कि कोई जनमा कहीं भी हो, यदि वह इस देश की नागरिकता का आवदेन करता है और संविधान सम्मत किसी भी व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करता है, तो सरकार उसे नागरिकता देगी. ऐसा करते समय सरकार न लिंग का भेद कर सकती है, न धर्म या जाति का, न रंग या रेस या देश का. नागरिकता अनुल्लंघनीय है, नागरिक स्वंयभू है. सरकार को याद कराना जरूरी हो गया है कि उसने नागरिक प्रमाणित करने का जो अधिकार लपक लिया है, वह लोकतंत्र, संविधान, राजनीतिक नैतिकता और सामाजिक जिम्मेवारी के खिलाफ जाता है.

इतिहास में उतरें हम तो 1925 से, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की स्थापना के बाद से, एक सीधी और साफ धारा मिलती है जो हिंदुत्व का अपना ही नया दर्शन बनाती है और दावा करती है कि देश धर्मों से बनते हैं और इसलिए वह हिंदू बहुमत के इस देश को हिंदू राष्ट्र बना कर रहेगी. विनायक दामोदर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर आदि से प्रेरित और इनके द्वारा ही संगठित-संचालित हिंदुत्व के इस दर्शन को सबसे पहला और सबसे बड़ा समर्थन मिलता है मुस्लिम लीग से. सावरकर-जिन्ना धर्माधारित राष्ट्र के इस मंच पर एक साथ खड़े मिलते हैं. इन दोनों की इस सांप्रदायिक सोच को, उसके जन्म से लगातार ही महात्मा गांधी से सबसे बड़ी चुनौती मिलती रही.

गांधी भारत की आजादी की लड़ाई के सेनापति भर नहीं थे, भारतीय समाज के नये दार्शनिक भी थे. वे खुद को हिंदू कहते थे -सनातनी हिंदू ! – लेकिन हिंदुत्व के संघ-परिवारी दर्शन के किसी तत्व को स्वीकार नहीं करते थे. गांधी को सीधी चुनौती दे कर, साथ लेने की बनावटी मुद्राएं धर कर और फिर छल की सारी कोशिशों के बाद भी जब गांधी हाथ नहीं आए, और भारतीय जनमानस पर उनके बढ़ते असर व पकड़ की कोई काट ये खोज नहीं पाए तब जा कर यह तय किया गया कि इन्हें रास्ते से हटाया जाए. यही वह फैसला था जो पांच विफल कोशिशों के बाद, 30 जनवरी 1948 को सफल हुआ और गांधी की हत्या हुई. योजना यह थी कि हत्या से देश में ऐसी अफरा-तफरी मचेगी, मचाई जाएगी कि जिसकी आड़ में हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर कब्जा कर लेंगी. हिंदुत्व की इनकी अवधारणा तानाशाही की है और इसलिए वह सत्ता की बैसाखी के बगैर चल ही नहीं पाती है. सत्ता इनके लिए अस्तित्व का सवाल है.

गांधी की हत्या तो कर दी गई, लेकिन देश में वैसी अफरा-तफरी नहीं मची कि जिसकी आड़ ले कर ये सत्ता तक पहुंचें. गांधी का रचा राष्ट्र-मन, जवाहरलाल और सरदार की दृढ़ एकाग्रता ने देश को अफरा-तफरी से बचा भी लिया और निकाल भी लिया. इसलिए सरदार की आड़ में नेहरू इनके निशाने पर थे और हैं. तब से आज तक हिंदुत्व का यह दर्शन समाज में न वैसी जगह बना सका जिसकी अपेक्षा से ये काम करते रहे और न सत्ता पर इनकी कभी ऐसी पकड़ बन सकी कि ये अपने एजेंडे का भारत बना सकें. अटलबिहारी वाजपेयी के पांच साल के प्रधानमंत्रित्व-काल में यह हो सकता था लेकिन अटलजी ‘छोटे-नेहरू’ का चोला उतारने को तैयार नहीं थे. वे संघी हिंदुत्व की मदद तो लेते थे, लेकिन उसके खतरों से बचते भी थे. इसलिए अटल-दौर संघी हिंदुत्व की सत्ता का नहीं, जमीन तैयार करने का दौर बना और उसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला नरेंद्र मोदी के गुजरात में खोली गई. सत्ता की मदद से हिंदुत्व की जड़ जमाने का वह प्रयोग संघ व मोदी, दोनों के लिए खासा सफल रहा. दोनों की आंखें खुलीं.

फिर कांग्रेस के चौतरफा निकम्मेपन की वजह से दिल्ली नरेंद्र मोदी के हाथ आई. तब से आज तक दिल्ली से हिंदुत्व का वही एजेंडा चलाया जा रहा है जो 1925 से अधूरा पड़ा था. यह गांधी को खारिज कर, भारत को अ-भारत बनाने का एजेंडा है. अब ये यह भी जान चुके हैं कि लोकतांत्रिक राजनीति में सत्ता का कोई भरोसा नहीं है. इसलिए ये अपना वह एजेंडा पूरा करने में तेजी से जुट गये हैं जिससे लोकतांत्रिक उलट-फेर की संभावनाएं खत्म हों, और सत्ता अपने हाथ में स्थिर रहे. नोटबंदी से ले कर राष्ट्रीय नागरिकता बंदी तक का सारा खेल समाज की ताकत को तोड़-मरोड़ देने, संविधान को अप्रभावी बना देने तथा संवैधानिक संस्थानों को सरकार का खोखला खिलौना बनाने के अलावा कुछ दूसरा नहीं है. आज कांग्रेस अपनी ही छाया से लड़ती, लड़खड़ाती ऐसी पार्टी मात्र है जिसका राजनीतिक एजेंडा मोदी तय करते हैं. विपक्ष के दूसरे सारे ही दल सत्ता की बंदरबांट में से अपना हिस्सा लपक लेने से ज्यादा की न तो हैसियत रखते हैं, न सपने पालते हैं. ऐसे में भारतीय लोकतंत्र का विपक्ष कहां है ? वह संसद में नहीं, सड़कों पर है. आज युवा और नागरिक ही भारतीय लोकतंत्र के विपक्ष हैं.

सड़कों पर उतरे युवाओं-छात्रों-नागरिकों में सभी जातियों-धर्मों के लोग हैं. सीएबी या सीएए किसी भी तरह मुसलमानों का सवाल नहीं है. वे निशाने पर सबसे पहले आए हैं क्योंकि दूसरे असहमतों को निशाने पर लेने की भूमिका बनाई जा रही है. इसलिए लाठी-गोली-अश्रुगैस की मार के बीच भी सड़कों से आवाज़ यही उठ रही है कि हम पूरे हिंदुस्तान को, और इस हिंदुस्तान के हर नागरिक को सम्मान व अधिकार के साथ भारत का नागरिक मानते हैं. कोई भी सरकार हमारी या उनकी या किसी की नागरिकता का निर्धारण करे, यह हमें मंजूर नहीं है. इसलिए कि सभी सरकारें जिस संविधान की अस्थाई रचना हैं, जनता उस संविधान की रचयिता भी है और स्थाई प्रहरी भी! सरकारें स्वार्थ, भ्रष्ट और संकीर्ण मानसिकता वाली हो सकती हैं. सांप्रदायिक भी हो सकती हैं और जातिवादी भी! सरकारें मौकापरस्त भी होती हैं और रंग भी बदलती हैं. यह संविधान से बनती तो है, लेकिन संविधान का सम्मान नहीं करती है. यह वोट से बनती है, लेकिन वोटर का माखौल उड़ाती है. यह झूठ और मक्कारी को हथियार बनाती है और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर अपना मतलब साधना चाहती है. आज  यह हमारी नागरिकता से खेलना चाह रही है, कल हमसे खेलेगी. यह चाहती है कि इस देश में नागरिक नहीं, सिर्फ उसके वोटर रहें. सत्ता के खेल में यह समाज को खोखला बना देना चाहती है. इसलिए लड़ाई सड़कों पर है. जब संसद गूंगी और व्यवस्था अंधी हो जाती है तब सड़कें लड़ाई का मैदान बन जाती हैं.

लेकिन सड़क को यह अहसास होना ही चाहिए कि हिंसा हमेशा आत्मघाती होती है. गांधी की इस बात को भूलना आत्महत्या करना होगा. निजी हो या सार्वजनिक, किसी भी संपत्ति का विनाश दरअसल अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. जब लड़ाई व्यवस्था से हो तब व्यक्ति गौण हो जाता है. सरकार को यह समझाना है या समझने के लिए मजबूर करना है कि वह नागरिकता के निर्धारण का अपना कदम वापस ले ले. यह उसका काम है ही नहीं. अगर देश में घुसपैठियों का संकट है तो यह सरकार की, और सिर्फ सरकार की जिम्मेवारी है कि वह अपनी व्यवस्था को चुस्त बनाए. घुसपैठिए बिलों से देश में दाखिल नहीं होते हैं. वे व्यवस्था की कमजोरी में सेंध लगाते हैं. वे जानते हैं कि सेंध वहीं लग सकती है जहां दीवार कमजोर होती है. इसलिए आप सरकार बनें, षड्यंत्रकारी नहीं, आप अपनी कमजोरी दूर करें, नागरिकों को कमजोर न करें.

आज से कुछ ही दिन पहले की तो बात है जब वर्दीधारी पुलिस राजधानी दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शनकारी बन कर उतरी थी. सरकार के खिलाफ, अपने अधिकारियों के खिलाफ उसने नारे लगाए थे. सड़कें जाम कर दी थीं. तब वे वर्दीधारी वकीलों का मुकाबला करने में जनता का समर्थन चाहते थे. तब किसी ने उन पर अश्रुगैस के गोले दागे क्या?  लाठियां मारीं क्या? पानी की तलवारें चलाईं? नागरिकों ने एक स्वर से कहा था कि ये अपनी बात कहने सड़कों पर तब उतरे हैं जब दूसरे किसी मंच पर इनकी सुनवाई नहीं हो रही है. पुलिस को भी ऐसा ही समझना चाहिए. पुलिस को नागरिकों से जैसा समर्थन मिला था, क्या नागरिकों को पुलिस से वैसा ही समर्थन नहीं मिलना चाहिए? आज पुलिस नागरिकों से ऐसे पेश आ रही है मानों दुश्मनों से पेश आ रही है. पुलिस भी समझे, सरकारी अधिकारी भी समझें, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी समझें, हमारे और उनके मां बाप भी समझें कि यह लड़ाई नागरिकता को बचाने की लड़ाई है. इसलिए हिंसा नहीं, हिम्मत गालियां नहीं, वैचारिक नारे,  पत्थरबाजी नहीं, फौलादी धरना! गोडसे नहीं, गांधी; भागो नहीं, बदलो.  डरो नहीं, लड़ो.  हारो नहीं, जीतो. और इसलिए भीड़ का भय नहीं, शांति की शक्ति और संकल्प का बल ही नागरिकों की सबसे बड़ी ताकत है. वह यह ताकत और संयम न खोए तभी यह सरकार समझेगी. सरकार समझे और अपने कदम वापस ले तो हमारा लोकतंत्र ज्यादा मजबूत बन कर उभरेगा.

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