जेएनयू: भीड़ का हमला, स्ट्रीट लाइट का बंद होना और पुलिस का तमाशबीन होना, सबकुछ सुनियोजित नज़र आया
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जेएनयू: भीड़ का हमला, स्ट्रीट लाइट का बंद होना और पुलिस का तमाशबीन होना, सबकुछ सुनियोजित नज़र आया

जेएनयू परिसर के भीतर छात्रों और शिक्षकों पर हमले के दौरान दिल्ली पुलिस की भूमिका उसकी छवि पर एक और बदनुमा दाग बनकर चिपक गई है.

By बसंत कुमार अमन कुमार

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रविवार की शाम जब पूरी दिल्ली ठंड और वीकेंड के आगोश में थी उसी वक़्त जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) परिसर का माहौल गर्मा गया. शाम छह बजे के करीब 50-60 की संख्या में आए नकाबपोश लोगों ने तमाम हॉस्टलों के अंदर घुसकर छात्रों पर हमला किया, तोड़फोड़ किया. उनके हाथ में लाठी, सरिया, हॉकी आदि थे. लगभग तीन घंटे तक परिसर में अराजकता फैलाने के बाद ये हमलावर आराम से बाहर निकल गए. और जेएनयू मेन गेट पर मौजूद पुलिस उन्हें चुपचाप देखती रही. इस हमले में कई छात्र और शिक्षकों को गंभीर चोटे आई हैं जिन्हें एम्स में भर्ती कराया गया है.

रात के नौ बजे चुके थे लेकिन हिंसा और मारपीट की तमाम खबरों के बावजूद जेएनयू गेट के बाहर अंधेरा पसरा हुआ था. इलाके की स्ट्रीट लाइटें बंद कर दी गई थीं. नेल्सन मंडेला रोड की स्ट्रीट लाइट भी बन्द थी. गेट के बाहर सैकड़ों की संख्या में मौजूद पुलिस वालों के सामने भीड़, नक्सली, देशद्रोही, आतंकियों के समर्थक वापस जाओ के नारे लगा रहे थे. इसी दौरान वहां पहुंचे योगेंद्र यादव के ऊपर उस भीड़ ने हमला कर दिया. भीड़ में ज़्यादातर लोगों ने अपने चेहरे पर नकाब लगा रखा था. पुलिस मारपीट और नारेबाजी कर रहे लोगों को गेट से हटाने की बजाय योगेंद्र यादव को बेर सराय की ओर ले गई. पीछे-पीछे भीड़ भी उनका पीछा करती रही.

अपने साथ हुए हिंसक वाकए के बारे में योगेंद्र यादव बताते हैं, “मैं जेएनयू का छात्र रहा हूं. जब छात्रों पर हमले की ख़बर मिली तो मैं यहां आया. गेट बंद था तो मैं गेट पर खड़ा होकर शिक्षकों से अंदर की जानकारी ले रहा था. वो मुझे बता रहे थे कि अंदर क्या हुआ था. तभी पुलिस ने धक्का देना शुरू किया और भीड़ ने मुझ पर हमला कर दिया. मुझे नीचे गिरा दिया. पुलिस इनको कुछ नहीं बोली और मुझे धक्का देकर बाहर ले आई.”

योगेंद्र यादव आगे कहते हैं, “मीडिया और पुलिस के सामने जब मुझ पर हमला किया गया तो सोचिए कैम्पस के अंदर क्या हो रहा होगा. वहां न मीडिया का कैमरा है और न ही पुलिस है. अंदर छात्रसंघ के अध्यक्ष का सर फोड़ दिया है. शिक्षकों पर हमला हुआ है. दोनों अस्पताल में है. यहां पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है. बल्कि पुलिस की पूरी कोशिश है कि मीडिया को और मुझ जैसे लोगों को अंदर नहीं जाने दिया जाय.”

8 बजे के आसपास जब हम जेएनयू मुख्य गेट पर पहुंचे तो पुलिस ने उसे बंद कर रखा था. छात्र और शिक्षक अंदर की तरफ खड़े थे. बाहर लोग नक्सलवादी मुर्दाबाद, देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को, आदि नारे लगा रहे थे. पत्रकारों को अंदर नहीं जाने नहीं दिया गया.

अंदर तोड़फोड़ कर रही भीड़ लौटकर दोबारा जेएनयू गेट पर वापस आई और नारेबाजी में शामिल हो गई. देशद्रोहियों भारत छोड़ो, नक्सली गुंडों भारत छोड़ो. स्ट्रीट लाइट तब भी बन्द थी. चारो तरफ अंधेरे के कारण अराजकता का माहौल था. पुलिस चुपचाप वहां खड़ी थी. इसी दौरान इंडिया टुडे के एक पत्रकार आशुतोष मिश्रा अपने ऑफिस को इनपुट देते हुए पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं. इससे नाराज होकर भीड़ ने उनके ऊपर हमला कर दिया. अशुतोष जैसे-तैसे जान बचाकर भागते हैं.

मिश्रा ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, ”मैं अपना काम कर रहा था. मैंने फोन पर बोला कि इतना बवाल हो गया लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर रही है. तभी भीड़ ने मुझ पर हमला कर दिया. मैं भागने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे दौड़ा-दौड़कर मारा. जेएनयू और जामिया के छात्रों ने कई दफा हमें घेरा और हमारे खिलाफ नारेबाजी की लेकिन कभी उन्होंने हम पर हमला नहीं किया लेकिन आज जो भीड़ थी वो मारपीट कर रही थी.’

थोड़ी देर बाद कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला जेएनयू गेट पहुंचे. नारेबाजी कर रही भीड़ ने उन्हें भी घेर लिया और वापस जाने को कहने लगी. भीड़ में से कुछ ने पूनावाला को मार दिया. फिर पीछे आकर वो आपस में बात करने लगे, “पेल दिया साले वामपंथी को.” दूसरा कहता है- कम मारा साले को. यहां भी पुलिस का रवैया शर्मनाक था. उसने उग्र भीड़ को हटाने की बजाय पूनावाला को वापस जाने को कहा और लगभग धकियाते हुए उनको गेट से थोड़ी दूरी पर ले गई. पुलिस के पीछे-पीछे आई उग्र भीड़ ने कई बार फिर से पूनावाला के साथ मारपीट की.

रविवार की रात जेनएयू के बाहर इसी तरह का सिलसिला लगभग तीन घण्टे तक चला.

गेट के बाहर कुछ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के छात्र और बाहरी लोग हंगामा करते रहे. पुलिस वहां मौजूद रही और स्ट्रीट लाइट बंद रही. 

जैसे तैसे करके हम लोग जेएनयू कैम्पस के अंदर पहुंचे. हर वक़्त गुलज़ार रहने वाले कैम्पस के अंदर एक अजीब सी ख़ामोशी दिखी. ज़्यादातर छात्र चुप और दहशत में दिखे. छात्र मीडिया से बात करने से कतराते नज़र आए. उनके अंदर यह डर बैठ गया है कि मीडिया के सामने आने पर उन पर भी हमला हो सकता है.

जेएनयू की छात्रा और घटना के वक़्त मौजूद रही श्रेया घोष न्यूज़लॉन्ड्री से कहती हैं, “शाम के सात-साढ़े सात के बीच 50 की संख्या में लोग हॉस्टल में घुस आए. उनके हाथ में रॉड, स्टिक, सरिया था. ज़्यादातर कैम्पस के नहीं लग रहे थे. मुंह पर कपड़ा बांधे भीड़ साबरमती हॉस्टल के पास पहुंची. साबरमती के पास एक ढाबा है जहां शाम में काफी भीड़ रहती है. वहीं टीचर एसोसिएशन के साथ छात्र शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हुए थे. भीड़ ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमला शुरू कर दिया. उनके हाथ में हथियार देख छात्र इधर-उधर भागने लगे. इसके बाद हमलावरों ने छात्रावासों के अंदर जाकर छात्र-छात्राओं को पीटना शुरू कर दिया. हॉस्टल के दरवाजे और खिड़कियों को तोड़ दिया.”

श्रेया घोष इस पूरी हिंसा के लिए एबीवीपी को जिम्मेदार बताते हुए कहती हैं कि उन्होंने निशाना बनाकर छात्रों पर हमला किया है. एक दिन पहले भी इस तरह से छात्रों पर एबीवीपी के लोगों ने हमला किया था.

साबरमती हॉस्टल में सबसे ज़्यादा नकाबपोश लोगों ने हंगामा मचाया जिसकी गवाही देर रात तक हॉस्टल की गेट के सामने बिखरे कांच और गेट पर खड़े लोगों के अंदर की दहशत दे रही है.

साबरमती हॉस्टल के रहने वाले सलमान (बदला नाम) न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, “उस वक़्त मेरे कमरे में मेरे तीन दोस्त थे. हम सब नमाज़ पढ़कर अभी बैठे ही थे तभी दो दोस्त बाहर से दौड़ते हुए आए और दरवाजा बंद करते हुए बोले कि हाथ में हथियार लिए कुछ लोग अंदर घुस आए हैं. जो मिल रहा है उसे मार रहे है. हम दरवाजे को बंद कर उसके पीछे खड़े हो गए. थोड़ी ही देर में वो मेरे दरवाजे तक पहुंच गए. उन्होंने पहले मेरे दरवाजे की खिलाड़ी तोड़ दी. दरवाजा तोड़ने की कोशिश लगातार करते रहे. भीड़ में शामिल एक शख्स ने मेरा नाम लेते हुए कहा कि इसमें यह रहता है. साले को मारना है. वे काफी कोशिश करते रहे लेकिन मेरा दरवाजा नहीं टूटा. थक-हार वे गाली देते हुए वापस लौट गए. उन्होंने हमारे खिड़की का कांच तोड़ दिया.”

घटना के तीन घण्टे गुजर जाने के बाद भी सलमान के अंदर का डर खत्म नहीं हो रहा था. वे कहते हैं, “उस वक़्त जिस तरह से तोड़-फोड़ और हंगामे की आवाज़ें आ रही थी. जिस तरह से वे चिल्ला रहे थे. लग रहा था कि उनके हाथ लग गए तो वे मार ही देंगे. भीड़ में कुछ जेएनयू के छात्र तो थे. बाहर के लड़कों को क्या पता कि किस रूम में कौन रहता है.”

दिव्यांग छात्र को भी नहीं छोड़ा

साबरमती हॉस्टल के 51 नम्बर कमरे में बाबा साहब आंबेडकर की पेंटिंग है. कमरे के बाहर और अंदर छोटे-बड़े कांच बिखरे हुए हैं. कमरे के अपने बेड पर 25 वर्षीय सूर्यप्रकाश बैठे हुए हैं जो थोड़ी देर पहले ही एम्स से इलाज कराकर लौटे हैं. सूर्यप्रकाश देख नहीं सकते हैं. नकाबपोश लोगों ने इनको भी नहीं छोड़ा है. घायल सूर्यप्रकाश अस्पताल से लौटने के बाद काफी दहशत में हैं जिस वजह से हॉस्टल की वार्डन उन्हें अपने घर ले गई थीं. थोड़ी देर वहां आराम करने के बाद सूर्यप्रकाश वापस अपने कमरे में लौट आए हैं.

अपने कमरे में सूर्यप्रकाश

न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए सूर्यप्रकाश कहते हैं, “मैं तो ना लेफ्ट का हूं और ना राइट का. यूपीएससी की तैयारी करता हूं. हमें तो खाने तक का भी वक़्त नहीं मिलता है. शाम के सात से साढ़े सात के बीच का समय होगा जब वो मेरे कमरे में घुस आए. उस वक़्त मैं पढ़ाई का रहा था. मेरा गेट बंद था. उन्होंने धक्का देकर गेट तोड़ा और मारने लगे. मेरे हाथ में और सर में काफी चोट आई है. मैं उनसे बोला कि मैं देख नहीं सकता.”

सूर्यप्रकाश कहते हैं, “वे टारगेट करके मार रहे थे. दरअसल वो दहशत पैदा करना चाहते थे. वो लगातार गाली दे रहे थे. उसमें कुछ कैंपस के लोग भी थे. बिना कैम्पस के लोगों की मिलीभगत के ऐसा होना नामुमकिन है. मैं जेएनयू से मास्टर करने के बाद पीएचडी कर रहा हूं पर इस तरह के हालात कभी नहीं देखे. पुलिस समय पर नहीं आई, अगर आ गई होती तो शायद ऐसा नहीं होता.”

साबरमती हॉस्टल में रहने वाले पीएचडी के छात्र नौशाद बताते हैं, “जब यह सब बवाल हुआ तो मैं हॉस्टल में नहीं था. शाम को वापस लौटा तो अपने कमरे को तहस-नहस स्थिति में पाया. कमरे में शीशे टूटे पड़े थे. मैं सेकेंड फ्लोर पर रहता हूं. उसी फ्लोर के बाकी कमरों में हमलावर गए भी नहीं. सिर्फ मेरे कमरे को निशाना बनाया गया है. साफ जाहिर होता है कि हमलावरों के निशाने पर अल्पसंख्यक और लेफ्ट के छात्र थे.”

प्रदर्शनकारी गए और स्ट्रीट लाइट जली

रात के ग्यारह बजे क़रीब सैकड़ों की संख्या में पुलिसकर्मी जेएनयू गेट के बाहर पहुंचे. थोड़ी ही देर बाद वहां की स्ट्रीट लाइटें जल गईं और इसके साथ ही वहां मौजूद एबीवीपी के सदस्य और मारपीट कर रही हिंसक भीड़ गायब हो गई. क्या यह महज संयोग था?

गेट के बाहर प्रदर्शन कर रहे जेएनयू के एक छात्र ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि फीस वृद्धि को कम करने के नाम पर लेफ्ट संगठन पिछले दो महीने से यूनिवर्सिटी में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. ना पढ़ाई हो रही और ना ही कोई दूसरा काम. अभी जेएनयू प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की शुरुआत की तो उसे भी रोकने की कोशिश इन लोगों ने की. ऑफलाइन किसी को भी रजिस्ट्रेशन नहीं करने दे रहे थे. प्रशासन ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा मुहैया कराया तो उसे रोकने के लिए शनिवार को इन्होंने कैम्पस का वाईफाई ही बन्द कर दिया. उन्हें अगर नहीं पढ़ना है तो ना पढ़ें, जिन छात्रों को पढ़ना है उन्हें क्यों रोक रहे हैं. विवाद इसी को लेकर शुरू हुआ.”

जेनएयू के छात्र से हम बात कर ही रहे थे तभी प्रदर्शन में शामिल मुनिरका के एक शख्स ने मीडिया से नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि हमने सस्ते दरों पर यह जमीन सरकार को इसलिए नहीं दिया कि यहां आकर ये लोग भारत को तोड़ने की बात करें. यह ग़लत है. ये नेता लोग (योगेंद्र यादव)  यहां के छात्रों को भड़काने के लिए आते हैं.

थोड़ी देर पहले योगेंद्र यादव और पत्रकारों पर हमला कर रहे लोग अचानक राष्ट्रगान गाने लगते हैं. इस दौरान भी हंगामा जारी रहा. भीड़ में शामिल कई लोग इस दौरान भी गाली-गलौज जारी रखते हैं.

स्ट्रीट लाइट बन्द होने के सवाल पर वहां मौजूद दिल्ली पुलिस के सीनियर अधिकारी कहते हैं, “पता नहीं कैसे हुआ. इसे ठीक करने के लिए कहा गया है.”

झगड़े की शुरुआत और एबीवीपी की सफाई

रविवार को जेनएयू में जो कुछ हुआ इसकी शुरुआत शनिवार को हुई थी. जेएनयू के छात्र बताते हैं कि फीस वृद्धि ना हो इसको लेकर दबाव बनाने के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संगठन ने एग्जाम बायकॉट किया था. कैंपस में लगभग हर गतिविधि रोक दी गई थी. जेएनयू प्रशासन ने बिना एग्जाम लिए रजिस्ट्रेशन की शुरुआत की. जिसे रोकने के लिए प्रदर्शनकारी छात्रों ने वाई-फाई कनेक्शन ही बन्द कर दिया. इसके बाद लेफ्ट समर्थक कार्यकर्ताओं और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट हुई थी.

इस मारपीट में घायल छात्र संघ के सचिव सतीश बताते हैं, ”शनिवार को मुझे जानकारी मिली कि एबीवीपी के छात्र दुर्गेश कुमार, मनीष जांगिड़, शिवम चौरसिया, रवि कुमार, जयंत आदि लोग हमारे कार्यकर्ताओं से मारपीट कर रहे थे. मैं वहां पहुंचा ताकि लोगों को समझाकर अलग करूं तो उन लोगों ने मुझ पर भी हमला कर दिया. आप देख सकते है कि मेरी आंखों के नीचे अब भी चोट के निशान है.”

रविवार को कैंपस में जो कुछ हुआ उसको लेकर सतीश कहते हैं, “आज कैंपस में जो कुछ हुआ उसमें यहां के एबीवीपी के दुर्गेश कुमार, मनीष जांगिड़ समेत कई लोग शामिल थे. यहां मारपीट करने डीयू से सत्येंद्र अवाना (पूर्व डीयू प्रेसिडेंट) अपने साथियों के साथ आया था. उसके साथ बीजेपी के लोग भी थे. उनके हाथों में डंडा और रॉड समेत कई हथियार थे. उन्होंने छात्रों को बिना देखे मारा.”

सतीश कहते हैं, “रविवार को जो कुछ हुआ वह पुलिस, जेएनयू प्रशासन, एबीवीपी और सरकार की मिलीभगत से हुआ है. बिना मिली भगत यह सब मुमकिन नहीं है.”

जेएनयू में रविवार की रात जो कुछ हुआ उसका आरोप एबीवीपी पर लग रहा है. जेएनयू एबीवीपी के अध्यक्ष दुर्गेश कुमार न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “जेएनयू में एबीवीपी एक छोटा संगठन है. हमारे यहां 100 से 150 कार्यकर्ता हैं. लेफ्ट बड़ा संगठन है. ऐसा हो सकता है कि एबीवीपी वाले उन्हें मार दें? कैंपस में मुंह बांधकर घूमने की प्रथा कब से है और किनकी है? 9 फरवरी, 2016 को मुंह पर कपड़े बांधकर देश विरोधी नारे लेफ्ट के लोगों ने लगाया था. यह उनका पुराना टैक्टिक है.” इस तरह दुर्गेश कुमार सारा आरोप लेफ्ट पर थोप देते हैं.

जेएनयू गेट पर राजनेताओं और पत्रकारों पर हुए हमले के दौरान कई एबीवीपी कार्यकर्ता ना सिर्फ वहां मौजूद रहे बल्कि हमले में शामिल भी दिखे. इस सवाल पर दुर्गेश कुमार कहते हैं, “आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि हमारा कोई भी कार्यकर्ता बाहर नहीं है. सब इधर-उधर छुपे हुए हैं.”

छात्रों ने पुलिस को लौटाया

रात के दो बजे के करीब गेट पर शांति हो गई थी. तब लेफ्ट समर्थक छात्र एक बार फिर से गेट पर इकट्ठा होने लगे. थोड़ी देर बाद दिल्ली पुलिस के सीनियर अधिकारियों के साथ सैकड़ों की संख्या में पुलिसकर्मी जेएनयू कैंपस के अंदर पहुंचे. रास्ते में जो भी छात्र उन्हें नज़र आया पुलिस उनसे आईकार्ड मांगती दिखी.

पुलिस जेएनयू के अंदर पहुंची तो छात्रों ने सड़क को घेर लिया. छात्र नारे लगाने लगे और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नज़्म हम देखेंगे गाने लगे. पुलिस के सीनियर अधिकारी जैसे-तैसे कर प्रशासनिक भवन की तरफ बढ़े तभी जेएनयू छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी के नेतृत्व में छात्रों की टोली ने उन्हें घेर लिया. छात्र लगातार पुलिस को बाहर जाने का नारा लगा रहे थे. छात्रों का कहना था कि जब पुलिस की ज़रूरत थी तब वो नहीं आई, अब क्यों आई है. इसके बाद पुलिस को वापस लौटना पड़ा.

न्यूज़लॉन्ड्री ने वहां मौजूद सीनियर अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन अधिकारियों ने सब ‘नॉर्मल’ है के अलावा कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

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