पार्ट 2: 'मैं हमेशा कहती हूं, फ़िक्शन सच्चाई के करीब है'

अरुंधति रॉय के साथ हिंदी की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'आलोचना' त्रैमासिक के संपादक संजीव कुमार और राजकमल प्रकाशन समूह के संपादक सत्यानन्द निरुपम की बातचीत.

पार्ट 2: 'मैं हमेशा कहती हूं, फ़िक्शन सच्चाई के करीब है'
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संजीव कुमार : नवउदारवाद और साम्प्रदायिकता के हमक़दम होने की बात तो, मेरा ख़याल है, और लोगों ने भी कही है. जैसे मुझे एजाज़ अहमद का लेख याद आ रहा है जिसमें वे बताते हैं कि किस तरह नवउदारवादी निज़ाम इतने कामगारों को बेरोज़गार या अंडरपेड रखता है और अपराध में झोंकता है और वही तबका फ़ासिस्टों को अपनी पैदल सेना के रूप में उपलब्ध हो जाता है, यही उनके स्टॉर्मट्रूपर्स बनते हैं.

अरुंधति रॉय : हां, लेकिन अपने प्रकाश करात तो कहते हैं कि अभी पूँजीवाद का विकास वहां नहीं पहुंचा है कि फ़ासिज़्म की ज़रूरत पड़े. असल में, ज़्यादातर लोग बहुत सारी चीज़ों की ओर से आँख मूँदते रहे हैं. पिछले दिनों कारवान में एक आर्टिकल आया था, ‘द लिबरल्स हू लव्ड एंड लॉस्ट मोदी’. न देखा हो तो देखिएगा. मैंने 2004 में एक व्याख्यान दिया था—‘हाउ डीप शैल वी डिग’—जिसमें मैंने कहा था कि हमें फ़ासिज़्म शब्द लापरवाही से इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, पर अगर ये ये ये ये हो रहा है तो यह फ़ासिज़्म है. रेटॉरिकल पैराग्राफ़ था. उसके छपने पर सबसे ज़्यादा मुझ पर हमला किसने किया था? ये लिबरल. अभी जो जगह बनी है, उसको तैयार करने में लिबरल्स की बड़ी भूमिका है.

पार्ट 1: ‘1990 से पहले देश में दो ताले खुले-बाबरी मस्जिद और बाज़ार का’

सत्यानन्द निरुपम : हां, पुरस्कार वापसी वाले समय भी आप पर कुछ जाने-माने लोगों की ओर से हमले हुए थे, मुझे याद है और उसकी कुछ बहुत कटु यादें हैं.

अरुंधति रॉय : और साहित्य अकादेमी वाले मुझे किस चीज़ पर पुरस्कार दे रहे थे? गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स पर नहीं, मेरे लेखों के कलेक्शन पर. मैंने कहा कि यार, तुम्हारे ख़िलाफ़ मैं लिख रही हूं, तुम्हारी सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़; या तो नीतियों को बदलो या फिर मुझे अवार्ड मत दो!

संजीव कुमार : तो वापस मैं उपन्यास पर जा रहा हूं.

अरुंधति रॉय : हां हां, मुझे भी ज़्यादा ख़ुशी उसी बात में मिलती है. उसके साथ जीना मुझे पसन्द है.

संजीव कुमार : घराना की कथा टाइम लाइन पर बहुत आगे-पीछे होती रहती है. बहुत बाद की बात आपको बिना किसी भूमिका के पहले पता चलती है और पहले की बात धीरे-धीरे बाद के किसी मौक़े पर पता चलती है. तो कई लोगों से यह शिकायत मिली कि पढ़ते गए, पढ़ते गए, बहुत दूर तक तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. क्या आपको लगता है कि इसे आसान बनाया जा सकता था?

अरुंधति रॉय : नहीं. मुझे अच्छा लगता है. तकलीफ़ होनी चाहिए. लोगों का कॉन्सन्ट्रेशन ट्वीट में गया और पता नहीं किस-किस चीज़ में गया. याद कीजिए कि जब हम बच्चे थे, किस तरह अपने खिलौने बनाते थे, कितना मशगूल होकर वह सब करना पड़ता था. अब बच्चों के दिमाग़ में बस तैयार चीज़ें धकेली जा रही हैं. तो एटेंशन ग़ायब हो रहा है....जॉन बर्जर को मैंने बहुत क़रीब से देखा जाना है. वे अब नहीं रहे. मैं उनकी एकाग्रता को याद करती हूं. किस तरह वो आदमी सुनता था! जैसे धरती पर बारिश की एक-एक बूँद जज़्ब हो रही हो, कुछ भी ज़ाया न जाए. मैं शुरू में जब यह उपन्यास लिख रही थी, तब उन्हीं के घर पर थी. एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि अरुंधति, तुम कुछ लिख रही हो. अपना कम्प्यूटर खोलो और मुझे सुनाओ और वह सुनना मैं याद करती हूं. अब इस ट्विटर के दौर में हालत यह है कि आपको अगर एक सेकंड में कुछ समझ नहीं आ रहा है तो हमें एडजस्ट करना पड़ेगा, थोड़ी और बेवकूफ़ी लानी पड़ेगी. ये करने के लिए मैं तैयार नहीं हूं.

संजीव कुमार : तो आप ‘स्टूपिडीफिकेशन’ के लिए तैयार नहीं हैं.

अरुंधति रॉय : (ठहाका) अच्छा लगा, आपको याद है. हां, मैं तैयार नहीं हूं. यह नहीं हो सकता कि आप एक शहर से ड्राइव करते हुए गुज़रें और सोचें कि आप इस शहर को जानते हैं. आपको वहां जीना होगा. आपको वह समझ बनानी होगी. जैसे द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स के लिए जब बोली लग रही थी—तब तो मैं कुछ भी नहीं थी—तो यूरोप के एक बड़े प्रकाशक ने मुझसे कहा कि आपको पहला चैप्टर दुबारा लिखना होगा. मैंने पूछा, आपको ऐसा क्यों लगता है? तो बोले, कि आप अपने पाठक का एक परायी दुनिया से तआरुफ़ कुछ ज़्यादा ही जल्दी करा रही हैं. तो मैंने कहा कि मुझे लगता है, उस तरह की चीज़ (ठहर कर तआरुफ़ कराना) साठ के दशक में ख़त्म हो गई. लोगों को अपनी ओर से कोशिश करनी पड़ेगी. मैं कुछ भी बदलने नहीं जा रही. मुझे जटिलता पसन्द है. आपको उससे थोड़ा जूझना पड़ता है और जब आप आख़िरकार उसमें दाख़िल हो जाते हैं, तो आपको महसूस होता है कि हर वाक्य, हर चीज़, वहां किसी वजह से है. हर टाइम फ्रेम भी वहां किसी वजह से है.

सत्यानन्द निरुपम : आप कई माध्यमों में अपने को अभिव्यक्त करती रही हैं. उसमें सिनेमा है, आर्किटेक्चर है, डिजायन है...और अब आपके लेखन में वे सारे माध्यम रिफ़्लेक्ट होते हैं. मैं चाहता हूं कि आप मीडियम्स की इस जर्नी के बारे में कुछ बताएं.

अरुंधति रॉय : जहां तक उपन्यास में इन सारे मीडियम्स के हुनर का इस्तेमाल करने की बात है, मैं तय करके तो शायद कुछ भी नहीं करती हूं. किसी और को जो जवाब मैंने दिया था, वही यहां भी कहूंगी. उसने मुझसे पूछा था कि आप जब कुछ लिखती हैं तो अपनी भाषा का चुनाव कैसे करती हैं? मैंने कहा, ऐसा नहीं है कि मेरे सन्दूक में अलग-अलग स्टाइल्स रखी हैं और मैं चुन लेती हूं कि इस चीज़ के लिए यह वाली ठीक रहेगी, जैसे कबर्ड खोला और देखा कि कहीं जाने के लिए कौन-से कपड़े अच्छे रहेंगे. वह अपने-आप होता है, मुझे पता चल जाता है कि क्या होना चाहिए, एंड आइ नो बिकॉज द ब्लड वेसल्स इन माइ बॉडी ओपन अप. आजकल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का ज़माना है. वो लोग क्या कर रहे हैं कि म्यूज़िक या नॉवल पूरा फीड करते हैं डेटा की तरह और वे एक परफ़ेक्ट मास्टरपीस बना सकते हैं. ऐलगोरिद्म उसे बनाता है. वे इसे एक प्रॉडक्ट की तरह देखते हैं और फिर परफ़ेक्शन की खोज करते हैं. लेकिन मेरे लिए आनन्द रचने में है. हर वो चीज़, जो आपने पढ़ी है, जी है, जिसके बारे में बातें की हैं, जिससे होकर गुज़रे हैं, वो एक कलाकृति को बनाने में जिस तरह से एक जगह लगती है, आनन्द उसमें है. फिर यह दोयम चीज़ है कि दो लोग उसको पसन्द करते हैं या दो लाख लोग पसन्द करते हैं या पचास लाख करते हैं, या कोई पसन्द नहीं करता. मैं इस उपन्यास के साथ 10 साल रही हूं. इस भाषा के साथ रही हूं, इन नोट्स के साथ, इस सोच-विचार के साथ रही हूं. और जब यह तैयार हो गया तो मेरी देह ने कहा कि यह तैयार हो गया है, दिमाग़ ने नहीं. सो इट इज बिटविन मी, माइ बॉडी एंड दिस नॉवल. इसके अलावा हर चीज़ दोयम है और मेरे लिए, मैं नहीं कह रही कि सबके लिए, पर मेरे लिए उपन्यास, कला का सर्वोत्तम रूप है, और इबादत के सबसे क़रीब ठहरने वाली चीज़ है. मेरा हर कौशल और मेरी हर चीज़ उसके लिए इस्तेमाल हो जाती है. मेरे बाल, मेरे नाखून, मेरी आँखें, मेरा दिमाग़...हर चीज़. जैसे आपने इस उपन्यास पर मिलने वाली प्रतिक्रियाओं के बारे में पूछा, वैसे ही द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स के बारे में किसी ने पूछा मुझसे, तो मैंने कहा कि यह उसी तरह है जैसे कोई मुझसे कहे कि आपका गॉल ब्लाडर बहुत छोटा है, या आपके लिवर का आकार बहुत अजीब है. (ठहाका)

सत्यानंद निरुपम : उपन्यास में पहले कोई किरदार आपको कहानी के लिए उकसाता है, या कोई घटना उकसाती है या सीधे प्लॉट उभर कर आता है?

अरुंधति रॉय : यह मामला बहुत उलझा हुआ है. आइ एम अ पर्सन ऑफ़ इंस्टिंक्ट. मतलब, आम तौर पर कुछ प्लान नहीं करती हूं. आप कुछ-कुछ चीज़ें अपने दिमाग़ में रखने लगते हैं, वह बस धुएँ की तरह होता है और सालों-साल वह धुआँ ही होता है. फिर वह इकट्ठा होने लगता है और आप उससे कोई शक्ल, कोई शिल्प बनाना शुरू करते हैं, और किताब निकल कर आती है. यह कभी इतना सरल नहीं होता कि कोई चीज़ अलग से निकाल कर बताई जा सके. कहानी, और कैरेक्टर्स, और भाषा तथा संरचना—मेरे लिए बराबर का महत्व रखते हैं. मैं कभी ऐसी नॉवलिस्ट नहीं बनूँगी कि कोई पूछ दे मुझे कि आपको किस चीज़ से प्रेरणा मिली और मैं कहूं, ‘ओ, यू नो, वन डे आइ वाज वॉकिंग एंड आइ थॉट...’ वग़ैरह वग़ैरह. (ठहाका) लिखने की प्रक्रिया में ही चीज़ें अपने को उद्घाटित करती हैं. ऐसा नहीं होता कि आप कोई न्यूज़पेपर कटिंग देखते हैं और फिर सोचते हैं कि आपको इस पर एक कहानी लिखनी है. इसीलिए मैं नहीं चाहती हूं कि मैं ढेर सारे उपन्यास लिखकर जाऊँ. जो मैं लिखूँगी वह मेरे लिए एक चुनौती होनी चाहिए....कभी-कभी कोई वाक्य ही आपके लिए एक शुरुआत बन सकती है. इस फ़ोन में मेरे पास इतने सारे नोट्स हैं जो मुझे पता ही नहीं है कि क्यों मैंने लिखा और कब? और इस उपन्यास में वो हैं. (अपने स्मार्टफ़ोन से कई वाक्य पढ़ कर सुनाती हैं.) ऐसी कई चीज़ें हैं, कई नोट्स हैं, बड़ी भारी तादाद है उनकी. जैसे कई साल पहले, मैं उस समय थी जंतर मंतर में जब एक बच्चा रात के दो बजे वहां पड़ा मिला था. सब अचरज कर रहे थे, फिर आख़िरकार पुलिस को बुलाया. मैंने बहुत साल उसके बारे में सोचा और मुझे लगता रहा कि हम लोग कितनी सारी चीज़ों के बारे में कितना कुछ कहते हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि उस बच्चे के साथ क्या किया जाए! (उपन्यास में जूनियर मिस जुबीन की घटना ऐसी ही है)...तो इतनी सारी चीज़ें हैं इसमें. जैसे मैं कश्मीर जाती थी तो सबसे पहले मैंने कश्मीरी इंग्लिश अल्फाबेट लिखना शुरू किया (उपन्यास में एक जगह ढाई पेज में कश्मीरी इंग्लिश अल्फाबेट आता है). मैंने सोचा, ये पूरे मुल्क में एक ऑक्युपेशन की भाषा है....और कई बार यह भी होता है कि आपको बाद में जाकर कोई ऐसी ख़बर मिलती है जो आपने उपन्यास में लिख रखा है. आपको याद होगा उपन्यास का एक प्रसंग, जिसमें तिलोत्तमा आज़ाद भारतीय के बारे में सोच रही है और फुटपाथ पर सोनेवाले इस बंदे के बारे में सोचते हुए वो उन लोगों के बारे में सोचती है जो सड़क के किनारे सोते हुए कुचल गए थे और वे वहां इसलिए सोते थे कि ट्रकों के डीजल के धुएँ से डेंगू के मच्छर मर जाते हैं. अच्छा, अब उपन्यास के आने के महीनों बाद की एक न्यूज कटिंग है मेरे पास, जिसमें फुटपाथ पर सोनेवाले लोग ठीक यही बात कह रहे हैं, वहां सोने के बारे में!...तो कितनी ही चीज़ें हैं...और वो सब मेरे पास हैं....मैं पुरानी दिल्ली में बहुत घूमती हूं ना, तो अंजुम जैसे लोगों से मेरी पहली मुलाक़ात कैसे हुई, वह दिलचस्प है. मैं सरमद शहीद की दरगाह में बैठी थी. वहां पर एक डेरा है जिसमें किन्नर लोग रहते हैं. और मैंने देखा कि कोई एक बूढ़ी-सी थीं, वो किसी को उर्दू अख़बार से पढ़कर पैलेस्टाइन के बारे में समझा रही थीं. दरगाह के पास वो एक झोपड़ी में रहती हैं. मैंने कहा उनसे, मैं कल-परसों आउंगी, आपको एक चीज़ दूंगी. मेरे पास एक पोस्टकार्ड था जिसमें पैलेस्टाइन का एक मानचित्र था. उसमें 1948, 1962 और...कैसे कैसे इज़रायल ने पैलेस्टाइन का टेरिटरी ऑक्युपाइ किया, यह उससे बड़ी अच्छी तरह समझ आता था. मैंने उनको दिया और समझाया कि आप जब किसी से बात करते हो तो आराम से समझा सकते हो कि ऐसा हुआ. तो, वो तो उसको पीछे दीवार पर लगाकर क्लास ही लेने लगीं. ( हंसी ) फिर वहां जमावड़ा लगने लगा. मेरा ऐसा कोई प्लान नहीं था कि मैं ये करूंगी. मैं बैठती थी, उनसे बात करती थी और वे मुझसे बात करते थे और फिर और लोग आ जाते थे. वो एक अड्डा जैसा बन गया था.

संजीव कुमार : और ख़्वाबगाह? मतलब इस नाम से नहीं, पर इस तरह की कोई जगह?

अरुंधति रॉय : ऐसी जगह तो होगी, पर...

सत्यानन्द निरुपम : अगर आपको किसी शहर का आर्किटेक्चर/स्थापत्य तैयार करना हो तो कैसा बनाएँगी?

अरुंधति रॉय : वो तो फ़ासिज़्म होता है ना, मतलब, किसी शहर को बनाना. शहर तो अपने-आप बनता है, तैयार होता है.

सत्यानन्द निरुपम : मेरा मतलब था कि आपकी कल्पना के हिसाब से उसमें ख़्वाबगाह जैसी भी एक जगह होनी चाहिए ना!

संजीव कुमार : उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है शायद जन्नत गेस्ट हाउस जैसी जगह. अच्छा, हम जब इस तरह उपन्यास के कई हिस्सों को लेकर आपसे ऐसे बात करते हैं जैसे यह कोई साथ जिया हुआ जीवन है, तब कौन-सी चीज़ है जो आपको लगता है कि हर बार छूट जाती है? यानी उपन्यास का कोई ऐसा हिस्सा जिसको हमने, लोगों ने उस तरह से नहीं समझा जैसे उसे समझा जाना चाहिए था?

अरुंधति रॉय : एक चीज़ है जो किसी ने इस उपन्यास में नहीं पकड़ा है और मेरे लिए यह उपन्यास का सबसे मार्मिक हिस्सा/मोस्ट पॉयनन्ट पार्ट ऑफ़ द नॉवल है. लोग उसे नहीं समझ पाए हैं, पर उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. वो है, जब तिलोत्तमा की मां हॉस्पि‍टल में हैलुसिनेशन में कुछ-कुछ बोलती है. केवल मेरे नॉर्वेजियन प्रकाशक ने कहा कि यह हिस्सा सबसे अच्छा है, पर उसको भी यह ज़्यादा समझ में नहीं आया. अगर आप ग़ौर करें तो एक तरह से गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स की अमू, राहेल से बात कर रही है. नहीं, राहेल से नहीं, उस बेबी से जो उसको वेलूथा से हुआ होता. उसकी जाति पर बात करती है, तुम कौन हो...वग़ैरह. इस मां ने बहुत विरोध झेला है और अब उसे ही अपने हैलुसिनेशन में वह अपनी बेटी की ओर मोड़ रही है, रिडाइरेक्ट कर रही है. यह प्रतिक्रिया है उन सारी चीज़ों पर जो उसने झेली हैं. फिर एक दिन वह तिलो से कहती है कि ‘परयाओं (अछूतों) से कहो कि जल्दी से मेरी टट्टी साफ़ करें!’ यह तिलो के बर्दाश्त से बाहर चला जाता है. उसकी तो रगों में अछूत का ख़ून है. यहां आकर वह एकदम फट पड़ती है.

‘‘तिलो का ख़ून जैसे अपनी राह से भटककर जंगली रास्तों की ओर चला गया. जिस कुर्सी पर वह झुकी हुई थी, वह बग़ैर चेतावनी के ऊपर उठी और नीचे गिरकर खंड-खंड हो गई. दरकती हुई लकड़ी की आवाज़ से पूरा वार्ड गूंज उठा. ससुइयां नसों से बाहर निकल आईं. ट्रे में रखी हुई दवा की बोतलें खड़खड़ाने लगीं. कमज़ोर दिलवाले लोगों की एक धड़कन गुम हो गई. तिलो ने उस आवाज़ को अपनी मां के पैरों से ऊपर की ओर पूरे शरीर में इस तरह जाते हुए देखा जैसे किसी लाश का कफ़न हटाया जा रहा हो.’’

फिर डॉक्टर वर्गीज उसे अपने कमरे में ले जाते हैं.

‘‘उन्होंने कॉफ़ी पी और तिलो की कॉफ़ी अनछुई रही तो उन्होंने कहा कि आईसीयू में जाकर वह अपनी मां से माफ़ी मांग ले.

‘तुम्हारी मां कोई मामूली महिला नहीं है. तुम्हें समझना होगा कि ऐसे भद्दे शब्द वे नहीं बोल रही हैं.’

‘ओह, तो कौन बोल रहा है?’

‘कोई और है. उनकी बीमारी. उनका ख़ून. उनकी तकलीफ़. हमारा परिवेश, हमारे दुराग्रह, हमारा इतिहास...’

‘तो किससे माफ़ी मांगनी होगी? दुराग्रह से? इतिहास से?’

कहते हुए वह बरामदे से नीचे उनके पीछे चल पड़ी. आईसीयू की तरफ़.

उनके वहां पहुंचने से पहले तिलो की माँ कोमा में चली गई थीं. वे जानने से परे, इतिहास से परे, दुराग्रह से परे, माफ़ी से परे जा चुकी थीं. तिलो बिस्तर पर आई और अपना चेहरा माँ के पैरों में तब तक रखे रही जब तक वे ठंडे नहीं पड़ गए....सुबह होते ही मरियम आइप की मृत्यु हो गई.’’

आप हमारे ख़ून में बैठी जाति की क्रूरता के बारे में बात कर रहे हैं और इसकी प्रतिक्रिया में आप अपनी मां को मार देते हैं और उसके बाद आप उस मां के पैर पकड़ कर बैठे रहते हैं. यह जो जाति की व्यवस्था है, यह ऐसी है कि इसे ऐड्रेस करने के लिए पहले हमें अपनी मांओं को मारना पड़ता है और फिर उसका मातम मनाना पड़ता है. जाहिर है मैं मेटाफोरिटकली कह रही हूं. यह उपन्यास का बहुत दारुण क्षण है....मैंने लिखा नहीं, पर यह सचमुच मेरे साथ हुआ. मेरी मां मरी नहीं, पर कोमा में चली गई थीं. मैंने गुस्से में कुर्सी तोड़ी थी. मेरे अन्दर इतना ग़ुस्सा था!...हर चीज़ में कुछ होता है जिसे आकार लेने में बरसों लग सकते हैं. ये कोई खिलौने की तरह नहीं है.

सत्यानन्द निरुपम : कभी-कभी मुझे मेम्वायर या ऑटोबायोग्राफ़ी पढ़ते हुए लगता है कि उसमें भी आदमी कुछ छुपा लेता है. लेखकों से बात करते हुए कई बार ऐसा सुनने को मिलता है कि यह तो मैंने लिखा नहीं, पर ऐसा हुआ था. ऐसे में मुझे लगता है कि जब आदमी फिक्शन लिखता है तो जिस तरह वह दूसरों की ज़िन्दगी के बारे में लिख लेता है, अपने जीवन की घटना उतनी ही आसानी से शायद वह नहीं लिख पाता होगा?

अरुंधति रॉय : फ़िक्शन में आपके सामने मेमोरी, इमैजिनेशन, इंवेंशन, स्टीलिंग (ठहाका)...इन सबके बीच कोई बॉर्डर नहीं होता. गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स में एक हिस्सा है जहां एस्था और राहेल याद करते हैं कि अलग होने से पहले उनके मां-बाप कैसे लड़ते थे, कैसे वे बच्चों को एक दूसरे की ओर धक्का देते थे कि तुम इसको रखना, मुझे नहीं रखना है. तो मेरी मां ने मुझसे पूछा कि यह सब तुम्हें कैसे याद है? मैंने कहा कि मुझे कुछ याद नहीं, मैंने तो बस अपने मन से गढ़ा है यह सब. तो उन्होंने कहा, ‘नहीं, तुमने अपने मन से नहीं गढ़ा है.’ सोचिए! मैं समझ रही थी कि मैंने यह सब बनाया है.

संजीव कुमार : मतलब आप जो अपने जानते कल्पना से लिख रहे हैं, वह भी शुद्ध कल्पना नहीं है, कहीं आपके ही अन्दर है.

अरुंधति रॉय : मैं हमेशा कहती हूं, फ़िक्शन इज़ ट्रूथ. मेरे पास एक टीशर्ट है जिस पर यह लिखा है. मेरे लिए यह हाइएस्ट ट्रुथ है—मतलब, अच्छा फ़िक्शन, फालतू का फ़िक्शन नहीं. (ठहाका) यह टीशर्ट की दूसरी तरफ़ लिखा होना चाहिए, फुटनोट.

संजीव कुमार : मैं आपकी हाइएस्ट ट्रूथ वाली बात को इस तरह से भी लेता हूं कि सच के जिन रूपों का हम साक्षात्कार नहीं करना चाहते, या जिसका साक्षात्कार करने में हमारी बनी-बनायी धारणाएं कहीं बीच में बाधा बन जाती हैं, एक अच्छा फ़िक्शन एकाएक उन बाधाओं को हटा देता है. जैसे मैं आपको बताऊँ कि घराना में ये जो आज़ाद भारतीय का चरित्र है, ऐसे लोगों को पता नहीं कितनी बार मैंने जंतर मंतर पर देखा है और लगभग हिक़ारत के साथ देखा है कि यह एक पागलपन है, ये जाने कैसे लोग हैं, महीनों-महीनों यहां जमे रहते हैं. पर घराना ऐसे लोगों को देखने के लिए मुझे नई निगाह देता है.

अरुंधति रॉय : ये आज़ाद भारतीय मुझे कई जगह मिलते हैं. मेरे कई कैरेक्टर्स इधर-उधर मिलते रहते हैं. अभी मैं पर्यावरण को लेकर किसी सेमिनार में आईआईसी गई थी तो वहां आज़ाद भारतीय दिख गए. ये जो आदमी देख रहे हैं ना (तस्वीर दिखाती हैं), वहां आए हुए थे....हम और आप जैसे लोग भी एक तरह से आज़ाद भारतीय जैसे हैं.

संजीव कुमार : अच्छा, एक सवाल रह गया. उपन्यास से मिलनेवाली छूट की जो बात मैं कर रहा था, उसमें यह तो है ही कि कश्मीर के सच को फ़िक्शन में ही पकड़ा जा सकता है, किसी फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में नहीं. पर साथ में यह भी कि कश्मीर के बारे में आप तथ्यात्मक लेखन वाली विधा में कितनी बातें लिख भी सकते हैं? क्या स्टेट उसकी इजाज़त देगा? उपन्यास है तो आप कथा कहकर बहुत कुछ बता सकते हैं. ऐसा है क्या?

अरुंधति रॉय : बिल्कुल है. आप तो बोल भी नहीं सकते. और फिर यह देखिए ना कि कश्मीर की कितनी सारी चीज़ें नॉवल में अलग-अलग व्यूप्वाइंट से आती हैं. वही-वही कहानी आप गार्सन होबार्ट की जगह से देखते हैं, अमरीक सिंह की जगह से, अमरीक सिंह की बीवी की जगह से, मूसा की जगह से, तिलो की जगह से, नागा की जगह से और...यानी कई कोणों से आप एक ही चीज़ को देखते हैं. तो वहां एक कॉम्प्लैक्सिटी है. यह कोई ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट नहीं है....कभी कभी मुझे लगता है कि मैं घराना की दुनिया में ही रहना चाहती हूं. जिस दुनिया में मैं दस साल थी.

संजीव कुमार : क्या गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स के साथ भी ऐसा हुआ था?

अरुंधति रॉय : गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स की दुनिया तो ऐसी थी जिसे मैंने झेला था और उससे बाहर निकल भागने के बारे में सोचती थी. हम जब छोटे थे तो क्योंकि मेरी मां तलाकशुदा थी, हमें हमेशा दुर्व्यवहार झेलना पड़ा. लोग कहते, जाओ यहां से, यह तुम्हारा घर नहीं है. हमें बड़े-बड़े लोगों के यहां कोई न्योता नहीं मिलता था, हम बुलाए नहीं जाते थे....आज जाने पर पता चलता है, सब लाइन में लगे हैं.

सत्यानन्द निरुपम : अपनी किताबों की असली कमाई आप किस चीज़ को मानती हैं?

अरुंधति रॉय : असली रॉयल्टी? लोगों का प्यार और भरोसा. आपको दिलचस्प घटना बताती हूं. मैं लन्दन में थी तो अपने भाई के लिए मुझे एक दवा लानी थी. बहुत ज़्यादा मात्रा में लाने की वजह से वह काफ़ी महँगी थी. लगभग 200 पाउंड. केमिस्ट एक पंजाबी थे. उन्होंने पैक कर दिया और दाम लेने से मना कर दिया. मैंने उनसे कहा कि अरे, ऐसे नहीं होता. आप मेरी कोई और ख़ातिरदारी कर दो, पर ये दाम तो ले लो, लेकिन वो माने नहीं. उसके बाद हम मीट लेने गए. वहां मीट वाले ने पैसा लेने से इंकार कर दिया. वो पाकिस्तानी थे. उन्होंने कहा कि आपकी किताब मैंने उर्दू में पढ़ी, इतना कुछ सीखने को मिला, आपसे पैसा नहीं लूंगा. हम वहां से चले तो मेरे साथ जो दोस्त था, उसने बोला कि आज तो लन्दन का पूरा मार्केट लूटना चाहिए तुमको साथ लेकर. मैंने अपनी किताबों से बहुत भरोसा कमाया और भरोसा कमाने से क्या होता है कि आपके पास और नायाब चीज़ें आती हैं. जैसे घराना में जो कुछ है, वह आपको रिसर्च से नहीं मिलेगा, वह आपको लोगों से बात करके नहीं मिलेगा. वह ऐसे ही मिलेगा कि पहले आपने जो लिखा है, उससे लोगों का भरोसा हासिल किया और फिर. जैसे मैं बस्तर गई, या कश्मीर गई, वो आप किसी भी क़ीमत में नहीं ख़रीद सकते. यह भरोसा है जिसकी वजह से वे आपको इनवाइट करते हैं. ये भी नहीं है कि वे जब आपको बुलाते हैं तो सोचते हैं कि आप हू-ब-हू उनकी पार्टी लाइन का समर्थन करेंगे. नहीं. यह एक लेखक को दिया जानेवाला विशेष न्योता है....और बाहर आकर मैंने कोई माओवादी पार्टी लाइन लिखी भी नहीं....आप जो लिखते हैं, उससे लोगों का आपमें भरोसा जग जाए, इससे बड़ा क्या रिटर्न होगा!

( यह इंटरव्यू आलोचना पत्रिका के जुलाई-सितंबर 2019 के अंक में प्रकाशित हो चुका है )

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