अमेरिका-तालिबान समझौता: बहुत कठिन है डगर पनघट की
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अमेरिका-तालिबान समझौता: बहुत कठिन है डगर पनघट की

तालिबान के हाथ में अफ़ग़ानिस्तान को देकर अमेरिका एक बार फिर इस क्षेत्र में एक नई चाल चलने की सोच रहा है.

By प्रकाश के रे

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29 फ़रवरी, को महीनों चली बातचीत के बाद आख़िरकार क़तर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हो गया. इस दौरान क़तर के अलावा पाकिस्तान, तुर्की, भारत, इंडोनेशिया, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के प्रतिनिधि मौजूद थे. यह बताया जाता रहा है कि अब तक इस समझौते में सबसे बड़ी रुकावट यह थी कि अमेरिका चाहता था कि पूरी तरह युद्धविराम हो जबकि तालिबान की मांग थी कि अमेरिका व नाटो की सेनाएं पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दें. इस समझौते के तहत 14 महीने में अमेरिका व नाटो के सैनिक देश से बाहर चले जायेंगे. अमेरिकी सुरक्षा के लिए किसी ख़तरे को अफ़ग़ानिस्तान की धरती इस्तेमाल नहीं करने देने की गारंटी तालिबान ने दी है. एक स्थायी युद्धविराम होना तय हुआ है तथा 10 मार्च से देश के भीतर सक्रिय विभिन्न गुटों, दलों व समूहों के बीच समझौते का दौर शुरू होगा.

तालिबान ने इसे अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े के ख़ात्मे का समझौता बताया है तथा सभी विदेशी सैनिकों की वापसी और भविष्य में देश के अंदरूनी मामलों में कभी दख़ल न देने को इस समझौते को एक बड़ी उपलब्धि की संज्ञा दी है. अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो ने तालिबान से अपने वादे निभाने का आग्रह किया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि दो दशकों की लड़ाई को ख़त्म करने की दिशा में यह अब तक का सबसे बड़ा क़दम है तथा अफ़ग़ानिस्तान में अमन-चैन बहाल करने की कोशिश ऐसे ही किसी समझौते से शुरू की जा सकती थी. लेकिन कुछ अहम तथ्यों तथा देश की मौजूदा स्थिति की रौशनी में जब इस चार पन्ने के समझौते को देखा जाए, तो इसे अमली जामा पहनाना और लोकतंत्र स्थापित कर पाना बहुत मुश्किल लगता है.

अंदरूनी खींचतान को दूर करना बेहद चुनौतीपूर्ण

समझौते से पहले हफ़्ते भर से तालिबान, अमेरिकी सेना और अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के बीच हिंसा में बड़ी कमी आयी है, लेकिन यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि बीता साला 2019 जहां एक ओर तालिबान के साथ समझौते के लिए बातचीत और राष्ट्रपति चुनाव की वजह से बहुत महत्वपूर्ण रहा, वहीं किसी और साल से शायद अधिक हिंसा भी इसी बरस हुई. जुलाई, अगस्त और सितंबर में तो मौतों के पिछले सब आंकड़े पीछे छूट गए. अफ़ग़निस्तान में संयुक्त राष्ट्रसहयोग मिशन के मुताबिक जनवरी से सितंबर के बीच 2,563 नागरिक मारे गए और 5,676 लोग घायल हुए थे. अकेले जुलाई में ही मरने व घायल होनेवालों की तादाद 1,500 से ज़्यादा रही थी. इस संस्था की अप्रैल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 717 नागरिकों को अमेरिकी व अफ़ग़ानी सुरक्षाबलों ने मारा था, जबकि लड़ाकों के हाथों 531 लोग मारे गए थे.

सितंबर के चुनाव अभियान के दौरान चुनाव रोकने की मंशा से तालिबान ने बड़े पैमाने पर हिंसा की थी. चुनाव के मसले पर खींचतान अमेरिका और तालिबान की बातचीत टूटने की बड़ी तात्कालिक वजह भी थी, हालांकि तब अमेरिका ने अपने एक सैनिक के मारे जाने को कारण बताया था. अमेरिकी वायु सेना द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार अमेरिका ने पिछले साल कुल 7,423 बम गिराया था, जो 2018 से अधिक है.

दोहा समझौते की शर्त के मुताबिक अब तालिबान, अफ़ग़ान सरकार और विभिन्न समूहों के बीच बातचीत शुरू होगी. अब तक तालिबान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार को अमेरिका की कठपुतली कहता आया है तथा सीधी बातचीत से परहेज़ करता रहा है. समझौते से लगभग एक पखवाड़े पहले राष्ट्रपति ग़नी ने कहा था कि उन्हें बातचीत की जानकारी अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो से मिलती रहती है. इसका मतलब यह है कि ग़नी ने सब कुछ अमेरिका पर छोड़ दिया है. अब जब आपसी बातचीत का दौर शुरू होगा, तो अलग-अलग समूहों की राय अलग-अलग हो सकती है. ऐसे में सरकार अलग-थलग भी पड़ सकती है. चुनाव परिणाम को ग़नी के प्रतिद्वंद्वी और सरकार में सहयोगी अब्दुल्ला अब्दुल्ला चुनौती दे रहे हैं. समझौते के अनुसार ग़नी को जेलों में बंद 5,000 तालिबानियों को भी रिहा करना है.यह भी साफ़ नहीं है कि अब तक ग़नी से बातचीत नहीं करनेवाले तालिबानी क्या अब उनसे बात करना चाहेंगे, जबकि वे हालिया जीत के बाद भी अफ़ग़ान राजनीति में ख़ास असर नहीं रखते. यदि बातचीत गड़बड़ाती है और हिंसा बढ़ती हैतोउसका ख़ामियाज़ा भी अशरफ़ ग़नी को भुगतना पड़ेगा. यह कहा जा सकता है कि मौक़ा मिलने पर अमेरिका भी अपना हाथ उनकी पीठ से हटा सकता है.

यह कोई अचरज की बात नहीं है कि राष्ट्रपति ग़नी ने अंदरूनी बातचीत शुरू होने से पहले तालिबानी क़ैदियों की रिहाई से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि रिहाई सरकार का अधिकार है और अमेरिका को ऐसा वादा करने का अधिकार नहीं है. उन्होंने यह भी कहा है कि यह मसला बातचीत का हिस्सा हो सकता है, कोई पूर्वशर्त नहीं. अब देखना यह है कि तालिबान वादे के मुताबिक अपने पास बंदी लोगों में से एक हज़ार की रिहाई पर क्या रवैया अपनाता है.

बहरहाल, समझौते के अगले ही दिन ग़नी का ऐसा बयान दो बिंदुओं को इंगित करता है- अमेरिका ने समझौते से पहले ग़नी को भरोसे में नहीं लिया है, जो उसके क़रीबी माने जाते हैं, और ग़नी तालिबान से आसानी से समझौता करने के लिए तैयार नहीं होंगे. उधर तालिबान ने भी कह दिया है कि विदेशी टुकड़ियों पर हमले नहीं करेगा, पर अफ़ग़ान सुरक्षाबलों पर वह फिर से हमला करेगा. इस घोषणा के कुछ घंटे बाद ही देश के पूर्वी हिस्से में एक फ़ुटबॉल मैदान में विस्फ़ोट की ख़बर आ गयी.

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और देश के मुख्य प्रशासक अब्दुल्ला अब्दुल्ला अशरफ़ ग़नी को राष्ट्रपति मानने के लिए तैयार नहीं हैं. वे चुनाव अधिकारियों को देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगा चुके हैं तथा दो प्रांतों में गवर्नरों की नियुक्ति भी कर चुके हैं. कहा जा रहा है कि वे समांतर सरकार बनाकर राष्ट्रपति पद की शपथ भी ले सकते हैं.

सरकार में शामिल अन्य गुट स्थितियों के अनुसार ग़नी के साथ रह भी सकते हैं और नहीं भी. हाल तक ग़नी के उपराष्ट्रपति रहे अब्दुल रशीद दोस्तम भी ग़नी के चुनाव पर सवाल उठा चुके हैं. शायद अमेरिका इस समझौते के अपने विशेष दूत ज़ालमी ख़लीलज़ाद का फिर इस्तेमाल करे और ग़नी को पटरी पर लाये. कई अफ़ग़ानी भी बातचीत विफल होने के लिए ग़नी को ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं, जो किसी भी तरह अमन चाहते हैं. अफ़ग़ान सरकार व तालिबान द्वारा नियंत्रित इलाक़ों की तादाद घटती-बढ़ती रही है. अफ़ग़ानिस्तान पुनर्निर्माण के विशेष महानिरीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक 31 जनवरी, 2018 तक 229 ज़िलों पर सरकार का क़ब्ज़ा था और 59 ज़िले तालिबान के पास थे. शेष 119 ज़िलों में क़ब्ज़े के लिए लड़ाई चल रही थी. महानिरीक्षक की रिपोर्ट के साथ कुछ अन्य स्रोतों के आकलन के आधार पर तैयार फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसिज़ के लॉन्ग वार जर्नल के हालिया अध्ययन के मुताबिक सरकार के नियंत्रण में 133 ज़िले, तालिबान के नियंत्रण में 74 ज़िले तथा विवादित ज़िले 190 हैं. वर्ष 2001 के बाद से तालिबान का कहीं अधिक इलाक़े पर आज दख़ल है. वर्ष 2018 में बीबीसी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि तालिबानियों की सक्रियता देश के 70 फ़ीसदी हिस्से में है.

अमेरिकी नीति, भू-राजनीति और अफ़ीम के पेंच

बहुत लंबे समय से यह कहा जाता रहा था कि अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में फंस चुका है और सरकार जनता को जान-बूझकर यह झांसा दे रही है कि लड़ाई सही रास्ते पर है. पिछले साल द वाशिंगटन टाइम्स द्वारा प्रकाशित गोपनीय दस्तावेज़ों से यह बात साबित भी हो गयी थी. बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी वादों में इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों को हटाना प्रमुख था. अब यह साफ़ हो गया है कि ट्रंप इस जगह से हाथ झाड़ लेना चाहते हैं और वे इस साल के चुनाव में इसे स्वाभाविक रूप से भुनायेंगे. पर, क्या सचमुच अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से हट जायेगा? क्या सेना के अधिकारी और युद्ध कारोबारी ऐसा होने देंगे? क्या सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआइए) भी वहां से निकाल जायेगी? आख़िर अफ़ीम के मुनाफ़े के कारोबार का क्या होगा? हाल में इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों में तेज़ी आयी है और कुछ बड़े ख़ून-ख़राबे इस गुट ने की है. इससे लड़ने का पूरा ज़िम्मा तालिबान का होगा या फिर अमेरिका की भी कोई भूमिका रहेगी? इन सवालों को समझा जाना चाहिए.

अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के दो साल के भीतर ही तत्कालीन रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्ज़फ़ेल्ड ने एक मई, 2003 को काबुल में कह दिया था कि अब बड़ी लड़ाई ख़त्म हो गयी है. उसी दिन जॉर्ज बुश ने इराक़ में कामयाब होने की घोषणा की थी. अफ़ग़ानिस्तान में अब तक लगभग ढाई हज़ार अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के मरनेवाले सैनिकों की कुल तादाद क़रीब साढ़े तीन हज़ार है. डेढ़ लाख से अधिक अफ़ग़ानी मौत के मुंह में जा चुके हैं. पिछले साल फ़रवरी में संयुक्त राष्ट्र ने बताया था कि मरनेवाले नागरिकों की संख्या 32 हज़ार से अधिक है.

ब्राउन यूनिवर्सिटी के वाटसन इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 58 हज़ार सुरक्षाबल और 42 हज़ार विपक्षी लड़ाके मारे जा चुके हैं. अमेरिका में लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि तीन करोड़ की आबादी वाले देश अफ़ग़ानिस्तान पर करदाताओं के अरबों डॉलर बर्बाद हो रहे हैं. कुछ आकलनों का मानना है कि अब तक अमेरिका इस युद्ध पर और देश के पुनर्निर्माण पर दो ट्रिलियन डॉलर ख़र्च कर चुका है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान का सकल घरेलू उत्पादन लगभग 21 अरब डॉलर है. भले ही ओबामा युद्धों से हाथ खींचने की बात कहते रहे हों, पर 2009 के अंत में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख कर दी थी.

अभी अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 14 हज़ार अमेरिकी तथा 39 नाटो व सहयोगी देशों के 17 हज़ार सैनिक हैं. तालिबान के साथ समझौते के बाद अब अमेरिका अपने सैनिकों की संख्या पहले 135 दिनों में 8,600 तक सीमित कर लेगा. ट्रंप के कार्यभार संभालने से पहले अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या लगभग यही थी. शेष सैनिकों की वापसी 14 महीने की अवधि में होगी.

इस्लामिक स्टेट के बहाने या गुटों की आपसी लड़ाई की आड़ में या फिर दूतावासों व अन्य हितों की रक्षा के लिए अमेरिकी सेनाएं वहां रुक सकती हैं. यह देखने की बात होगी कि इसे तालिबान लड़ाके किस तरह स्वीकार करेंगे. इतिहास को देखते हुए तालिबान और विभिन्न गुटों से हिंसा के त्याग की उम्मीद करना अभी बहुत जल्दबाज़ी होगी. फिर वित्तीय ज़रूरतों और बुनियादी सुविधाओं को तैयार करने के सिलसिले में कैसे इंतज़ाम होंगे, इस बारे में भी कुछ कहना मुश्किल है. यह बेहद अहम पहलू है क्योंकि बरसों के युद्धों से पूरा देश तबाह हो चुका है तथा उसे नये सिरे से बनाने की ज़रूरत है.

शांति प्रक्रिया से ईरान को अलग रखना भी समझौते की समझ के ऊपर एक सवालिया निशान है. ईरान न केवल एक अहम पड़ोसी देश है, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं. लाखों की तादाद में अफ़ग़ान शरणार्थी ईरान में हैं. अमेरिका और तालिबान समझौते में रूस ने भी बड़ी भूमिका निभायी है. रूस के जरिये और सीधे भी तालिबान के संपर्क का एक ख़ास सिरा ईरान से जुड़ता है.

विश्लेषक पेपे एस्कोबार की मानें, तो चीन व रूस की तुलना में ईरान के बेहतर संबंध अफ़ग़ानिस्तान में हैं. मुजाहिद्दीनों के ताक़तवर हिस्से- नॉर्दर्न एलायंस- के साथ तालिबान की सत्ता में हिस्सेदारी एक संभावना बन सकती है. लेकिन चीन की अगुवाई में बेल्ट-रोड परियोजना के बढ़ते दायरे के बरक्स अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशियाई देशों से एक नए व्यापारिक मार्ग की परिकल्पना कर रहा है. ऐसे में वह अफ़ग़ानिस्तान को किसी भी तरह से चीन, रूस और ईरान का सहयोगी बनने से रोकने की पूरी कोशिश कर सकता है.

मध्य एशिया में पहले से ही अमेरिका की ताक़तवर आर्थिक और सामरिक मौजूदगी है. अफ़ग़ानिस्तान उस भौगोलिक समुच्चय का हिस्सा है, जिसे ग्रेटर मिडिल ईस्ट कहा जाता है और जिसमें मध्य पूर्व, उत्तरी अफ़्रीका व पाकिस्तान भी आते हैं. इस हिसाब से और रूस, चीन और ईरान से नज़दीकी के लिहाज़ से क्या अमेरिका सचमुच अपने सैनिकों को पूरी तरह हटा सकता है? अभी एक ही संभावित उत्तर है- नहीं.

इस बहस का एक ख़ास पहलू है अफ़ीम की खेती, जिससे हेरोइन नामक ख़तरनाक नशीला पदार्थ बनता है और जिसकी मांग दुनियाभर में है. संयुक्त राष्ट्र के ऑफ़िस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम की 2018 की रिपोर्ट कहती है कि गंभीर सूखे के बावजूद 2018 में 6400 टन अफ़ीम की ऊपज हुई थी और इसकी खेती 2.63 लाख हेक्टेयर में की गयी थी. देश की बदहाली और रोज़गार के अवसरों के न होने के कारण आबादी का एक बड़ा हिस्सा अफ़ीम की खेती या संबंधित कामकाज व कारोबार में लगा है.

वर्ष 2001 के बाद से ही यह देश अफ़ीम का सबसे बड़ा उत्पादक है तथा यहीं से दुनिया की 90 फ़ीसदी से अधिक हेरोइन आपूर्ति होती है. यूरोप में जो हेरोइन मिलती है, वह लगभग पूरी तरह से अफ़ग़ानी अफ़ीम से बनी होती है. ऐसे कई अध्ययन सामने आ चुके हैं, जो यह बताते हैं कि अमेरिकी एजेंसियां अफ़ग़ानी खिलाड़ियों के साथ मिलकर अफ़ीम को बढ़ावा देने में पूरी तरह से शामिल रही हैं. ऐसा अमेरिका वियतनाम युद्ध के दौर में इंडो-चाइना में भी कर चुका है. इन मामलों पर कई अध्ययन और रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी हैं.

पिछले साल द गार्डियन में अल्फ़्रेड डब्ल्यू मैक्कॉय ने एक सारगर्भित रिपोर्ट लिखी थी, जो समूचे खेल का पर्दाफ़ाश करती है. इस विषय पर इनकी किताबें भी छप चुकी हैं. वियतनाम में हार के कुछ साल बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में भी अफ़ीम के हथियार का इस्तेमाल किया. इसका दोहरा लाभ था. एक तो अमेरिका-समर्थित लड़ाकों को धन उपलब्ध कराने में मदद मिलती थी और दूसरे नशे के कारोबार की आमदनी को सीआइए दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपने ख़ुफ़िया गतिविधियों में ख़र्च कर सकता था.

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित 1993 के एक लेख में लैरी कॉलिंस ने लिखा था कि सीआइए जितनी पुरानी है, इसका नशीले पदार्थों से रिश्ता भी उतना ही पुराना है. यह भी दिलचस्प है कि कई बार अमेरिका में जांच होने के बाद भी सीआइए के रवैए में कोई फ़र्क़ नहीं आया है. इसका मतलब है कि यह सब अमेरिका शासन की स्थायी नीति का हिस्सा है, जिसे अक्सर डीप स्टेट भी कहा जाता है. पेपे एस्कोबार जैसे विश्लेषक भी इन बातों पर लिखते रहे हैं. सार-संक्षेप यह है कि सीआइए अफ़ीम के कारोबार को आसानी से हाथ से नहीं जाने देगा और आनेवाले कई वर्षों तक कोई स्थानीय सरकार भी इस पर रोक नहीं लगाएगी. वरना लोगों की नाराज़गी का सामना करना पड़ेगा, जिनके पास आमदनी का कोई और रास्ता नहीं है.

हालांकि शांति-प्रक्रिया की किसी भी कोशिश का स्वागत होना चाहिए, पर तालिबान के हाथ में अफ़ग़ानिस्तान को देकर अमेरिका एक बार फिर इस क्षेत्र में एक नयी चाल चलने की सोच रहा है, जहां उसका नुक़सान काम और फ़ायदा ज़्यादा हो. ख़ैर, जो होगा, वह सामने आ जाएगा, लेकिन एक पूरे देश को दो दशक में तबाह करने और बड़ी संख्या में लोगों का क़त्लेआम करने के साथ समूचे दक्षिणी एशिया को अस्थिर करने का जवाबदेह कौन है? और, यह तबाही अभी जारी ही है.

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