कोरोना की मार से लस्त-पस्त प्रिंट मीडिया
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कोरोना की मार से लस्त-पस्त प्रिंट मीडिया

कोरोना वायरस के चलते घट रहे पाठक और गिर रही आय ने प्रिंट मीडिया के सामने गंभीर आर्थिक और बेरोजगारी का संकट पैदा कर दिया है.

By बसंत कुमार

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23 मार्च को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने मुंबई से प्रकाशित होने वाले अपने तमाम संस्करणों का प्रकाशन रोक दिया. कहा जा रहा है कि टाइम्स मैनेजमेंट ने 31 मार्च तक अख़बार प्रकाशित नहीं करने का निर्णय लिया है, लेकिन इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकरी सामने नहीं आई है.

मुंबई टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रसार विभाग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, ‘‘हॉकर्स की समस्याओं को देखते हुए सोमवार को अख़बार प्रकाशित नहीं हुआ. आगे क्या होगा इस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है. हॉकर्स ने 25 मार्च तक अख़बार नहीं बांटने की घोषणा अपने स्तर पर कर दी है, इसलिए 25 तक तो अख़बार का प्रकाशन स्थगित ही रहेगा.”

वो आगे कहते हैं, “31 मार्च तक प्रकाशन स्थगित रखने के फैसले की मुझे कोई जानकारी नहीं है. लेकिन हालात ऐसे ही हैं कि अख़बार का प्रकाशन संभव नहीं लग रहा है. प्रकाशित होने से ज्यादा अख़बारों को बांटने में दिक्कत आ रही है.’’

सिर्फ टाइम्स ऑफ़ इंडिया ही नहीं मुंबई से प्रकाशित होने वाला अख़बार मिड-डे समेत कई अख़बार सोमवार को प्रकाशित नहीं हुए है. प्रकाशित नहीं करने के फैसले पर मिड-डे ने लिखा है, ‘‘राज्य में आने-जाने पर लगे प्रतिबंध को देखते हुए अपने हॉकर्स की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया गया है. मिड-डे की खबरों को पढ़ने के लिए ऑनलाइन वेबसाइट पर जाएं. अख़बार जल्द ही आपके घर पर होगा.’’

मुंबई में दो दिन पहले इसी तरह का विज्ञापन हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार ने भी छापा है. जहां उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जाकर ख़बरें पढ़ने की सलाह दी गई है.

हालांकि अख़बारों को लग रहा था कि कोरोना वायरस के दौर में लोगों की निर्भरता उन पर बढ़ेगी. इसी को लेकर बीते दिनों दैनिक भास्कर ने बिहार के अपने कर्मचारियों के बीच एक पत्र जारी किया था. जिस पत्र में लिखा गया है कि वर्तमान समय में हमारे पाठक के पास अख़बार पढ़ने के लिए ज्यादा समय है और उत्सकुता भी. प्रत्येक जर्नलिस्ट के जीवन में ऐसे क्षण जब ख़बरें महत्वपूर्ण हों और पाठक की उत्सुकता भी ज्यादा हो, ये सबसे अनूठे दिन होते है.

दैनिक भास्कर अख़बार के एमडी सुधीर अग्रवाल द्वारा लिखा गया यह पत्र कोरोना वायरस फैलने के दौर में अख़बारों को अपनी भूमिका निभाने के संदर्भ में है.

सुधीर अग्रवाल की माने तो इस दौर में लोगों के पास समय ज्यादा है और वे अख़बार पढ़कर अपना समय गुजारेंगे लेकिन इसके ठीक उल्ट ग्राउंड पर नज़र आ रहा है. कोरोना के फैलने की खबरों के बीच बड़ी संख्या में लोगों ने अख़बार मंगवाना बंद कर दिया है.

लोगों ने अख़बार बंद किया

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए सरकार ने पूरे देश को 21 दिन तक पूरी तरह से लॉकडाउन करने का फैसला लिया है. 22 मार्च तक भारत में इससे प्रभावित लोगों की संख्या 400 के पास पहुंच गई है. अभी तक देश में इससे नौ लोगों की मौत हुई है. बीते रविवार को जब देश में सरकार ने जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था उस दिन 46 नए मामले सामने आए हैं. जिसमें सबसे ज्यादा केरल से 15 मामले हैं.

दिल्ली में भी केजरीवाल सरकार ने लॉकडाउन करने का फैसला लिया है, जिसका असर अख़बारों पर पड़ता नजर आ रहा है.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के विजय नगर और गुप्ता कॉलोनी में दिल्ली विश्विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से सिविल सर्विस की तैयारी करने आए युवा रहते हैं. इसी इलाके में राजकुमार रोजाना पांच सौ अख़बार बांटते थे, लेकिन पिछले दो दिनों से लगभग डेढ़ सौ लोगों ने अख़बार बंद करने का फोन उनको किया है.

न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए राजकुमार कहते हैं, ‘‘मैं पिछले पन्द्रह साल से वेंडर का काम कर रहा हूं लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. दो दिनों से लगातार लोग फोन करके अख़बार बंद करने के लिए कह रहे है. अब तो फोन भी उठाने का मन नहीं कर रहा है. लोगों को अपनी सुरक्षा का डर है. हमारी सुरक्षा भी संकट में है.’’

राजकुमार ही नहीं दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में अख़बार देने वाले ज्यादातर हॉकर्स की स्थिति ऐसी ही है.

मुखर्जी नगर में लंबे समय से हॉकर का काम करने वाले अभिषेक कुमार कहते हैं, ‘‘मैं अपने इलाके के लगभग 300 घरों में अख़बार डालता था. उसमें से ज्यादातर छात्र हैं. अब तमाम छात्र अपने घर लौट गए हैं, जो हैं वो भी एहतियातन अख़बार लेने से मना कर दिया है.”

अभिषेक से बातचीत में एक बड़ी चिंता उभर कर ये सामने आई कि लोगों को भरोसा नहीं है कि अख़बार को पूर्णणतया सैनिटाइज़ किया जा सकता है. यह वाजिब चिंता है. लोग यह कहकर मना कर रहे हैं कि अख़बार कई हाथों से गुजर कर आता है ऐसे में उससे संक्रमण फैलने की आशंका बहुत बढ़ जाती है.

लोगों में अख़बार से कोरोना फैलने की बात जब सोशल मीडिया के जरिए फैली तो कई अख़बारों ने बकायदा लेख लिखकर अपने पाठकों को संतुष्ट करने का प्रयास किया कि उनका अख़बार पूरी तरह सुरक्षित है. ऐसा करने वालों में नवभारत टाइम्स भी था.

अखबारों का यह प्रयास असल में मीडिया मालिकों और प्रबंधन के भीतर मौजूद उस भय का भी संकेत है कि आने वाले दिनों में लोग अखबार पढ़ने से दूर हो सकते हैं.

नवभारत अख़बार, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप का ही है. अख़बार ने ‘न्यूज़ पेपर से नहीं फैलता वायरस’ शीर्षक से लिखी अपनी खबर में लिखा कि कोरोना वायरस अख़बार से नहीं फैलता है. आप पहले की तरह आराम से न्यूज़ पेपर पढ़ सकते हैं. महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस तरह की खबरों को अफवाह बताया है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने चेताया कि झूठी ख़बरें फ़ैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

सिर्फ नवभारत टाइम्स ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान, अमर उजाला और पत्रिका ने भी इस तरह की ख़बरें प्रकाशित की है.

हिंदुस्तान की वेबसाइट पर मौजूद ‘COVID-19 से घबराएं नहीं! अख़बार छूने से नहीं होता कोरोना’ शीर्षक से लिखे गए लेख में कहा है कि कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसी ख़बरें प्रसारित हो रही है कि दूध की थैली, अख़बार अथवा नोटों से वायरस का संक्रमण फैल रहा है. पर यह बातें सरासर भ्रम फ़ैलाने वाली हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि इन चीजों पर वायरस हो सकता है लेकिन इनसे कोरोना का फैलना तथ्यात्मक रूप से बिलकुल गलत है.’’

लेख में आगे लिखा गया है कि अख़बार की छपाई और यहां तक की बंडल बांधने का काम भी मशीनों के जरिए होता है. आपके इलाके में पहुंचने के बाद हॉकर अख़बार आपके घर तक फेंकता है. बस इस दौरान वह हर अख़बार को छूता है. अब इस बात की ही संभावना कितनी है कि अख़बार फेंकने वाला हॉकर संक्रमित हो.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया नोएडा ने तो बकायदा एक वीडियो बनाकर ट्विटर के जरिए साझा किया कि अख़बार से कोरोना वायरस नहीं फैलता है.

कैसे पहुंचता है अख़बार पाठक तक?

अख़बार छपने का बाद कई हाथों से गुजरता है. प्रिंट होने के बाद कई लोग मिलकर उसे एक गाड़ी में रखते हैं. उसके बाद वह अपने एजेंसी तक पहुंचता है जहां कुछ लोग मिलकर उन अख़बारों के बंडल को गाड़ी से उतारते है. वहां सैकड़ों की संख्या में हॉकर अपनी ज़रूरत के हिसाब से अख़बार उठाते हैं और फिर लोगों के घर-घर पहुंचाते हैं. ऐसे में एक अख़बार कई हाथों से होकर गुजरता है. जाहिर है संक्रमण के लिहाज से यह एक खतरनाक और पूरी तरह से असुरक्षित चेन श्रृंखला है.

साल 1983 से दिल्ली यूनिवर्सिटी के इलाके में अख़बार बेच रहे आकाश बताते हैं कि ज्यादातर लोगों ने अख़बार लेने से मना कर दिया है. वे कहते हैं, ‘‘मुझे एक दिन में लगभग 70 लोगों के फोन आए कि हमारा अख़बार बंद कर दीजिए.’’

आकाश मानते हैं कि लोगों की चिंता जायज है. वो कहते हैं, “अख़बार कई हाथों से होकर गुजरता है. कुछ लोग तो सफाई का ख्याल रख रहे हैं लेकिन बहुत सारे लोगों के पास न तो इतनी सुविधा है न ही इतनी सतर्कता है. ऐसे में वे कैसे सफाई का ध्यान रख पाएंगे. जिसके बाद हमने भी फैसला किया है कि हम अब अख़बार नहीं डालेंगे. ऐसा निर्णय हमारे इलाके के 60 से ज्यादा हॉकर्स ने किया है. उन्होंने बाकायदा हस्ताक्षर किया है कि हम बढ़ते कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए अख़बार नहीं बाटेंगे.’’

अख़बार नहीं बांटने का निर्णय

बाहरी दिल्ली न्यूज़पेपर वितरक संघ वेलफेयर एसोसिएशन जिसका ऑफिस रोहिणी में हैं, ने अख़बार नहीं बांटने को लेकर एक पत्र तमाम मीडिया संस्थानों को लिखा है.

एसोसिएशन के प्रधान विजय पोद्दार ने लिखा है कि सभी वितरक भाइयों की तरफ से 24 मार्च से 31 मार्च तक अख़बार की सप्लाई रोक दी जाए. यह कदम देशहित, सामाजहित और वितरक भाइयों के हित में उठाया गया है. आप सभी प्रेसों को सूचित किया जा रहा है. मैं अपेक्षा करता हूं कि आप यह निवेदन स्वीकार करेंगे.

न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए विजय पोद्दार कहते हैं, ‘‘मेरे यहां से 1200 से ज्यादा अख़बार प्रतिदिन बांटे जाते हैं लेकिन दो-तीन दिन पहले से लोगों ने अख़बार नहीं देने के लिए कहना शुरू कर दिया. रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान जब मेरे लड़के अख़बार बांटने के लिए सोसायटी में गए तो लोगों ने साफ़ मना कर दिया कि आप अख़बार 31 मार्च तक मत लाओ. लोगों के अलावा हमारे यहां काम करने वाले चालीस से ज्यादा लड़कों ने भी कोरोना के डर से अख़बार बांटने से मना कर दिया. इसके बाद मुझे यह निर्णय लेना पड़ा. इससे हमारा काफी नुकसान हो रहा है लेकिन हम कर क्या सकते है. अभी जो हालात है उसके अनुसार फैसला लेते हुए मैंने अख़बार वालों को पत्र लिखा है कि हम 31 मार्च तक अख़बार नहीं बांट सकते है.’’

सिर्फ यही नहीं दिल्ली के कमला नगर सेंटर से अख़बार उठाने वाले लोगों ने भी इसी तरह अख़बार नहीं बांटने का निर्णय किया है. कमला नगर सेंटर से अख़बार उठाने वाले 60 से ज्यादा लोगों ने लिखित रूप से दिया है कि अगले 31 मार्च तक वे अख़बार नहीं बांटेगे. आकाश हमसे वो पत्र साझा करते हैं जिसपर 60 से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किया है.

अख़बारों को नुकसान

अभी तक मुंबई से प्रकाशित होने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया समेत कुछ अख़बारों का ही प्रकाशन बंद हुआ है लेकिन बिगड़ते हालात और वेंडर्स की परेशानी को देखते हुए बाकी अख़बार भी छपाई बंद करने का निर्णय ले सकते हैं. ये हालात दिल्ली समेत देश के कई बड़े शहरों में देखने को मिल सकते हैं.

इंडियन राइडर्स सर्वे (आईआरएस) के 2019 की रिपोर्ट के अनुसार टाइम्स ऑफ़ इंडिया देशभर में अंग्रेजी का सबसे बड़ा अख़बार है. देशभर में इसके पाठकों की संख्या 2019 में एक करोड़ 5 लाख थी. टाइम्स ऑफ़ इंडिया मुंबई में भी नम्बर एक अख़बार है. सिर्फ मुंबई में इसकी 7 लाख 25 हज़ार प्रतियां प्रतिदिन छपती हैं. यहां इसके 26 लाख पाठक हैं. आईआरएस के ही अनुसार मिरर नाउ की मुंबई में 22 लाख पाठक हैं. मिरर नाउ टाइम्स ऑफ़ इंडिया का ही अख़बार हैं.

मुंबई में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की कीमत सात रुपए है. ऐसे में देखे तो रोजाना सिर्फ प्रिंटिग कॉपी से होने वाला नुकसान 50 लाख 75 हज़ार रुपए का है. इसके अलावा इस अख़बार में रोजाना करोड़ों रुपए का सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन छपता है. इसका आकलन जल्द ही हमारे सामने होगा तब हम समझ पाएंगे कि कोरोना के चलते देश के प्रिंट मीडिया को किस तरह का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है.

यह तो महज एक शहर का उदाहरण है. महाराष्ट्र के कई बड़े शहरों में टाइम्स ऑफ़ इंडिया नहीं निकल रहा है. ऐसे में अख़बारों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ सकता है.

मिड डे की बात करें तो 2019 के आईआरएस आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में इसके 13 लाख 84 हज़ार पाठक हैं. इसकी लगभग तीन लाख प्रतियां प्रकाशित होती हैं. जिसमें एक अख़बार की कीमत 4 रुपए है. ऐसे में रोजाना का लगभग 12 लाख का नुकसान तो इसकी हार्डकोर कॉपी की छपाई रुकने से हो रही है.

मीडिया विश्लेषक क्या कहते हैं...

मीडिया विश्लेषकों की माने तो टीवी और डिजिटल मीडिया पर कोरोना का कोई खास असर नहीं होगा लेकिन प्रिंट मीडिया इसके तत्काल चपेट में आ गई है. कोरोना के दौर में लोगों की निर्भता डिजिटल मीडिया और टीवी पर बढ़ेगी.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार कहते हैं, ‘‘आज 75 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास इंटरनेट की पहुंच है. उससे ज्यादा लोगों तक टीवी की पहुंच है. अब जैसे ही मौखिक रूप से यह बात लोगों तक पहुंच रही है कि अख़बार से वायरस फ़ैल सकता है. इसको देखते हुए तमाम अख़बारों ने बताया कि ऐसा नहीं है. दैनिक जागरण ने लिखा कि आपका अख़बार उतना ही सुरक्षित है जितना कि दूध की थैली. हालांकि लोगों के बीच यह बात फ़ैल चुकी है कि अख़बार से वायरस फैल सकता है. और आज अगर कुछ संस्थान अपना अख़बार निकालना बंद कर रहे हैं तो इसका मतलब हुआ कि उन तक यह बात पहुंच चुकी है. अभी लोगों की प्राथमिकता है कि उन तक ख़बरें पहुंचे और उसका एक माध्यम सिर्फ अख़बार नहीं है.’’

विनीत कुमार आगे कहते हैं, ‘‘अख़बार को चहिए कि अभी ई-पेपर की जो सब्सक्रिप्शन दर थी उसमें कुछ छूट दें. इससे अख़बार की विजिविलिटी बनी रहेगी. हालांकि कोरोना का असर अख़बारों पर तो होगा ही. लेकिन लम्बे समय तक असर नहीं रहेगा. जैसे-जैसे कोरोना का असर कम होगा लोग अख़बारों की तरफ वापस आयेंगे. क्योंकि अख़बार कई लोगों के लिए आदत है लेकिन अभी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शायद अख़बार पढ़ना बंद कर दें.’’

एक बड़ा सवाल कोरोना वायरस का नौकरियों पर पड़ रहा है. अगर अखबार मालिकों को आर्थिक नुकसान होगा तो आने वाले समय में इसका खामियाजा मीडिया में काम करने वालों को भी भुगतना होगा. वरिष्ट पत्रकार और इंडियन मीडिया बिजनेस नाम की किताब लिखने वाली वनिता कोहली खांडेकर कहती हैं, ‘‘सिर्फ मीडिया इंडस्ट्री ही नहीं बल्कि देश की हर इंडस्ट्री में कोरोना का असर दिखेगा और लोगों की नौकरियां जाएगी.’’

वनिता कहती हैं, ‘‘अमेरिका में इसका असर दिखने लगा है, लोगों की नौकरियां जा रही है. कोरोना का असर हर क्षेत्र की तरह अख़बारों पर भी देखने को मिलेगा और इसका रेवेन्यु सिस्टम प्रभावित होगा. आमदनी कम होगी यह साफ़ दिख रहा है. ऐसे में अगर आमदनी कम होगी तो वे खर्च भी कम करेंगे ताकि संस्थान चल सकें. ऐसे में कई लोगों की नौकरियां जाने का खतरा है. सीनियर और जूनियर दोनों स्तर पर लोगों की नौकरियां जाने की आशंका है.’’

न्यूजलॉन्ड्री ने दिल्ली एम्स में कार्यरत डॉक्टर विजय कुमार से जानना चाहा कि क्या कोरोना या इस जैसा वायरस अखबारों के जरिए भी फैल सकता है. उनका जवाब था कि नहीं.

लेकिन लोगों के मन में यह बात घर कर गई है कि अख़बार से वायरस फैलता है. दूसरी बात कर्फ्यू लगने की स्थिति में गाड़ियों की आवाजाही पर लगी रोक का असर भी अखबारों पर साफ़ दिख रहा है. इसका बुरा असर इस क्षेत्र में पैदा होने वाले रोजगार पर भी पढ़ेगा.

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