उत्तर प्रदेश: पत्रकारों के ऊपर हमले और मुकदमे की धमकियां बढ़ गई हैं

उत्तर प्रदेश: पत्रकारों के ऊपर हमले और मुकदमे की धमकियां बढ़ गई हैं

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में पत्रकारों पर हमले और धमकियों की घटनाओं में चिंताजनक तेजी आई है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड-19 के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा के दो दिन बाद, 26 मार्च को हिंदी भाषा के दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स ने एक समाचार प्रकाशित किया जिसमें यह बताया गया था कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में एक जनजाति के पास खाने के लिए पर्याप्त अनाज नहीं था और लॉकडाउन की अचानक घोषणा हो जाने के बाद वहां के बच्चे घास खा रहे थे.

उसी दिन, वाराणसी जिले के जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने अखबार को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें उनके द्वारा यह दावा किया गया कि उक्त रिपोर्ट का हिस्सा झूठा एवं "सनसनीखेज" है. सीपीजे द्वारा इस नोटिस की एक प्रति की समीक्षा भी की गयी है. उन्होंने अखबार से 24 घंटे की समय सीमा के भीतर माफीनामा जारी करने की मांग की और कहा कि ऐसा न होने की स्थिति में इस समाचार के लेखक विजय विनीत और प्रधान संपादक सुभाष राय के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ जनसंदेश टाईम्स ही उत्तर प्रदेश सरकार के शासकीय अधिकारियों के चंगुल में है. गौरतलब है कि राज्य में प्रेस स्वतंत्रता का उल्लंघन लंबे समय से हो रहा है, पत्रकारों ने सीपीजे को बताया कि चूंकि भारतीय जनता पार्टी ने भारत में मई, 2019 में हुए आम चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में अपना चुनावी वर्चस्व बनाए रखा है, इसलिये भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में इस तरह की घटनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है. फरवरी महीने के अंत और मार्च की शुरुआत में उत्तर प्रदेश की यात्रा के दौरान, पत्रकारों ने सीपीजे को बताया कि उनके ऊपर आपराधिक आरोप लगने और शारीरिक हमले होने का खतरा बढ़ गया है. इस तरह के डर से स्वतः अभिवेचन की संभावना और प्रबल हो जाती है.

यह रुझान विशेष रूप से खतरनाक हैं क्योंकि कोविड-19 महामारी ने समाचारों और सूचनाओं के प्रवाह को नागरिकों के स्वास्थ्य और आर्थिक अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है. पत्रकारों का कहना है कि इसमें से कुछ उल्लंघन पुलिस और अन्य प्रसासनिक अधिकारियों द्वारा किया गया है, कुछ उल्लंघन संगठित अपराध गिरोहों द्वारा किये गये हैं. इसमें कुछ बालू माफिया और अस्पताल चलाने वाला एक व्यापारिक समूह शामिल है.

भारतीय समाचार वेबसाइट द वायर के संपादक, सिद्धार्थ वरदराजन ने न्यूयॉर्क टाइम्स में 21 अप्रैल को लिखा, "देशव्यापी तालाबंदी एकदम सही वक्त है जब लोकतांत्रिक परिवेश में काम कर रहे पत्रकारों को आधी रात को उनके घरों के दरवाज़ों पर होने वाली दस्तक के भय से मुक्त होकर लिखने और पत्रकारिता करने के लिये स्वतंत्र होना चाहिये." सीपीजे ने पूर्व में उल्लिखित किया है कि वरदराजन को उनके काम के लिये कई मानहानि के मुकदमों और आपराधिक शिकायतों में नामजद किया गया है. हाल ही में उनके ऊपर एक मामला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आलोचना करने के आरोप में दर्ज़ किया गया है.

वरिष्ठ स्वतन्त्र पत्रकार एवं अंग्रेज़ी दैनिक नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका के भूतपूर्व ब्यूरो प्रमुख अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि "मई 2019 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा को उत्तर प्रदेश में मिली अभूतपूर्व जीत ने योगी आदित्यनाथ की सरकार का उत्साहवर्धन किया है." वे आगे कहते हैं, "उन्हें ऐसा लगता है कि वे दंड-मुक्त होकर कुछ भी कर सकते हैं क्यूंकि उन्हें लगातार दो चुनावों में जीत मिली है."

2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने के बाद से ही योगी आदित्यनाथ ने अपनी छवि एक कठोर प्रशासक के रूप में बनाने की चेष्टा की है जिसके मन में सामाजिक अशान्ति को लेकर कोई चिंता या विचार नहीं है. मुख्यमंत्री एक हिन्दू साधु हैं और दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ हैं, जो खुले तौर पर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत करता है. जहां एक तरफ वे दावा करते हैं कि उन्होंने राज्य में कानून और व्यवस्था में काफी सुधार किया है, उनकी सरकार पर न्यायेतर हत्याओं का समर्थन करने, अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर हमला करने और राजनीतिक विरोधियों और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी करवाने के आरोप लगे हैं. इन मामलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से प्रकाशित भी किया गया है.

उत्तर प्रदेश के गृह और सूचना सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने सीपीजे से एक मुलाकात के दौरान इस बाबत पूछे गए कुछ सवालों का जवाब नहीं दिया.

जनसंदेश टाइम्स वाराणसी में तालाबंदी के परिणामों पर अपने द्वारा किये गये समाचारों के प्रकाशन के साथ मजबूती से खड़ा है. इस समाचार पत्र में पूर्वांचल के सम्पादकीय प्रभारी के तौर पर कार्यरत विजय विनीत बताते हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उन्हें अपने समाचार पत्र में खबरों के प्रकाशन को लेकर राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन से आमना-सामना करना पड़ा हो.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 250 किलोमीटर पूरब में स्थित आज़मगढ़ जनपद में जनसंदेश टाइम्स के पत्रकार संतोष जायसवाल को पिछले वर्ष 7 सितम्बर को एक प्राथमिक विद्यालय में बच्चों से जबरदस्ती विद्यालय परिसर की सफाई करवाये जाने के सन्दर्भ में एक समाचार प्रकाशित करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था. लखनऊ से लगभग 260 किलोमीटर दक्षिणपूर्व में स्थित मीरजापुर के पत्रकार पवन जायसवाल (इनका संतोष से कोई सबंध नहीं है) को पिछले वर्ष 31 अगस्त को आपराधिक साजिश करने के आरोप में नामजद किया गया था.

पवन जायसवाल ने एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें एक स्थानीय सरकारी विद्यालय द्वारा सरकार के न्यूनतम मानकों से काफी निम्न स्तर का भोजन विद्यार्थियों को परोसा जा रहा है. इस समाचार के छपने के बाद राज्य सरकार ने तीन महीनों तक समाचार पत्र के सभी सरकारी विज्ञापनों के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी. विनीत बताते हैं कि उक्त मामले में सामाजिक विरोध एवं महीनों तक चले एक अभियान के बाद प्रदेश की सरकार ने केस निरस्त कर दिये थे.

विनीत ने सीपीजे से फोन पर हुयी बातचीत में बताया कि इस बार उन्हें लगता है कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जायेगा क्यूंकि उन्हें डर है कि राज्य सरकार औपनिवेशिक काल में बने महामारी रोग अधिनियम के तहत अपनी विस्तारित शक्ति का दुरुपयोग कर सकती है. इस अधिनियम को संघीय सरकार ने 11 मार्च को लागू किया था और इसके तहत राज्य सरकारों को गलत सूचना फैलाने के लिये मीडिया संगठनों को दंडित करने के अधिकार दे दिए गए हैं. 26 मार्च को टीवी समाचार चैनल से बातचीत के दौरान वाराणसी के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा ने बिलकुल वही करने की धमकी दी. अगर वे इस मामले में अग्रिम कार्यवाही करते हैं तो विनीत एवं मिश्रा को छह महीने का कारावास या 1000 रुपये (लगभग १५ अमेरिकी डॉलर) का जुर्माना या दोनों हो सकता है.

कानूनी और शारीरिक उत्पीड़न

विगत एक वर्ष में सीपीजे ने राज्य के विभिन्न स्तरों पर शासन के प्रति आलोचनात्मक पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों पर हुए कई हमलों का दस्तावेजीकरण किया है. इनमें 8 जून को नेशन लाइव टीवी न्यूज चैनल के पत्रकारों समेत एक स्वतंत्र पत्रकार की गिरफ्तारी से सबंधित एक मामला भी शामिल है. इन सभी पत्रकारों को कथित तौर पर हिंसा के लिये उकसाने और मुख्यमंत्री को बदनाम करने की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

ये सभी पत्रकार अब जमानत पर रिहा हो चुके हैं लेकिन उक्त समाचार चैनल को उचित सरकारी मंजूरी के बिना कथित रूप से संचालन के लिये बंद कर दिया गया था.

“नोएडा जनपद की पुलिस ने यह दावा करते हुए बाकी राज्यों के लिये एक खाका तैयार किया है कि नेशन लाइव के पत्रकार सीएम (मुख्यमंत्री) को बदनाम करके एक संभावित रूप से कानून व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं.”

सीपीजे द्वारा किये गये तात्कालिक दस्तावेजीकरण के अनुसार 11 जून को रेलवे पुलिस ने शामली जिले में एक निजी समाचार चैनल न्यूज़ 24 से सबंधित एक पत्रकार को दो घंटे तक हिरासत में रखने के दौरान न सिर्फ मारा-पीटा और निर्वस्त्र किया बल्कि उनके मुंह पर जबरन पेशाब भी किया गया. प्रदेश सरकार ने त्वरित कार्यवाही करते हुए सभी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया और चार के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया है. लेकिन सरकारी अधिकारी और पुलिस पत्रकारों को हिरासत में लेकर या आपराधिक मामलों में आरोपित बनाकर निशाना बनाते रहे.

स्थानीय स्वतंत्र पत्रकार उत्पल पाठक ने बताया, "मुझे यह जानकारी नहीं है कि सच में सीएम (मुख्यमंत्री) ने नौकरशाहों और पुलिस को पत्रकारों के पीछे पड़ने का सुझाव दिया है या नहीं लेकिन उस समय ऐसा लग रहा था कि पत्रकारों को निशाना बनाना राज्य की नीति बन गई है."

पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के किनारे बसे शहर वाराणसी में स्वतन्त्र चेतना समाचार पत्र में फोटोपत्रकार के रूप में कार्यरत बच्चा गुप्ता ने सीपीजे से हुयी बातचीत के दौरान बताया कि पुलिस ने बीते नवम्बर महीने में अतिचार एवं आपराधिक षडयंत्र करने के मामले में उनके खिलाफ एक मामला दर्ज किया था. यह मामला तब दर्ज हुआ जब उन्होंने गंगा तट पर बाढ़ प्रभावित जल पुलिस थाने में बच्चों द्वारा सफाई करवाये जाने की तस्वीरें ली थी.

"राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारों को उनके प्रबंधन के माध्यम से या सत्तारूढ़ दल के द्वारा प्रोत्साहन के अलग अलग तरीकों से व्यवस्थित किया जा सकता है [जैसे कि सरकारी विज्ञापन]. लेकिन जिला या ग्रामीण स्तर पर यह करना काफी कठिन है और यही कारण है कि उनके काम को ईमानदारी से करने से रोकने का एकमात्र तरीका है कि उन्हें कानूनी मामलों के जरिए निशाना बनाया जाय," स्थानीय मानवाधिकार समूह पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स के संस्थापक लेनिन रघुवंशी कहते हैं.

हस्तक्षेप करने से इंकार करना

पत्रकारों ने सीपीजे को बताया कि कुछ मामलों में जब किसी अराजपत्रित या राजनेताओं द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाया गया है, तब स्थानीय अधिकारियों और पुलिस ने इन मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप ही नहीं किया.

एक अन्य मामले का उल्लेख करते हुए दैनिक भास्कर के एक पत्रकार आकाश यादव ने वाराणसी में पुलिस पर स्थानीय अस्पताल माफिया के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाया. यादव ने सीपीजे को बताया कि एक अयोग्य चिकित्सक द्वारा एक निजी अस्पताल चलाये जाने का समाचार प्रकाशित करने के बाद उन्हें और पांच अन्य पत्रकारों पर लूट और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया. उनके स्थानीय सम्पादक घनश्याम पाठक ने बताया कि पुलिस और निजी अस्पतालों के बीच सांठगांठ है.

घनश्याम पाठक आगे बताते हैं, "हम वास्तव में काफी परेशान हैं क्योंकि हमें लगातार विभिन्न अधिकारियों द्वारा धमकियां मिलती रहती हैं जो हमें यह सुझाव देते रहते हैं कि हमें ऐसे मुद्दों पर समाचार नहीं लिखने चाहिये. वे कहते हैं कि हमें प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर काम करना चाहिये."

राज्य के 13 पूर्वी जिलों में लगभग 400 अंशकालिक और पूर्णकालिक पत्रकारों का नेतृत्व करने वाले विजय विनीत ने कहा कि माफिया के सदस्यों द्वारा स्थानीय पत्रकारों पर हमले के मामले उनकी सुरक्षा की चिंता का मुख्य विषय है.

उन्होंने बताय, "राज्य स्तर के पत्रकारों की तरह जिला और ग्रामीण स्तर के पत्रकारों के पास कोई समर्थन प्रणाली या संगठनात्मक ढांचा नहीं है, वे स्थानीय प्रशासन की दया पर हैं."

एक अन्य मामले में मीरजापुर जिले में हिंदुस्तान हिंदी दैनिक में कार्यरत एक पत्रकार कृष्ण कुमार सिंह पर सितम्बर में स्थानीय भीड़ द्वारा जानलेवा हमला किया गया. उन्होंने सीपीजे को बताया कि एक स्थानीय पार्किंग माफिया पर रिपोर्टिंग शुरू करने के बाद से ही उनके साथ दुर्व्यवहार एवं शारीरिक शोषण होने के अलावा उन पर कानूनी आरोप लगाये गये. सिंह यह भी आरोप लगाते हैं कि उक्त स्थानीय पार्किंग माफिया को स्थानीय राजनेताओं का समर्थन प्राप्त है. उन्होंने कहा, "पुलिस ने हमले के एक मामले को दर्ज करने के लिए छह घंटे से अधिक का समय लिया, हालांकि उस समय कई पुलिस अधिकारी मौजूद थे जब मुझे बेरहमी से पीटा गया था."

सोनभद्र जनपद के स्थानीय समाचार पत्र "परफेक्ट मिशन" के पत्रकार मनोज कुमार सोनी ने बताया कि विगत 4 नवम्बर को उनके ऊपर छह व्यक्तियों ने लोहे की रॉड से हमला किया जिसके फलस्वरूप उनके घुटने टूट गये एवं अन्य जगहों पर भी गंभीर चोट लगी. सोनी ने सीपीजे को बताया कि यह दूसरी बार हुआ जब स्थानीय भू-माफिया के इशारे पर उनके ऊपर इस प्रकार का हमला हुआ. जब पहली बार उन पर हमला हुआ तो 2018 में उन्होंने इसके खिलाफ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवायी थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.

दूसरी बार हमला होने के बाद उन्हें लगभग एक महीने तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा और अस्पताल की फीस देने में उनके लगभग तीन लाख रुपए खर्च हो गये.

सोनभद्र जनपद के पुलिस विभाग के एक प्रवक्ता ने सीपीजे को बताया कि अभी तक इस मामले की जांच चल रही है.

पत्रकारों पर हुए हमलों को रेखांकित करने के क्रम में इन मामलों में शासकीय लापरवाही का भाव स्पष्ट दिखता है. एक पत्रकार राजेश मिश्रा की हत्या के मामले में जिन्हें वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद ही गोलियों से भून दिया गया था, के परिवार के सदस्यों ने मुझे बताया कि अब तक इस मामले में मुक़दमा शुरू नहीं हुआ है. वो लोग गाजीपुर में रहते हैं.

योगी आदित्यनाथ ने त्वरित जांच का वादा किया था, लेकिन पुलिस का कहना है कि हत्यारों में से एक अभी भी फरार है, ”उनके भाई बृजेश कुमार मिश्रा ने यह कहते हुए मुझे बताया कि उन्हें स्थानीय बालू माफिया का अपने भाई की हत्या के पीछे होने का संदेह है. स्थानीय पुलिस अधिकारी रविंदर पांडे ने मोबाइल पर बताया कि 10 में से नौ आरोपी पुलिस हिरासत में हैं और पुलिस जल्द ही मुक़दमा शुरू करने के लिये तारीख की मांग करेगी.

वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी भाषा के समाचार वेबसाइट न्यूट्रैक के संपादक, योगेश मिश्रा कहते हैं, "हालांकि, पत्रकार ऐसे अपराधों को हल करने के लिये कानून व्यवस्था द्वारा इन मामलों के हल करने की प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन आजकल उत्तर प्रदेश में पुलिस छोटे-छोटे मामलों में भी पत्रकारों के पीछे पड़ जा रही है. एक दौर था जब राजनेता आपको चाय पिलाकर आपसे आपके सूत्र के बारे में पूछते थे. लेकिन अब वे स्पष्ट रूप से आपको अपशब्द बोलते हैं. ऐसा नहीं लगता कि हम लोग लोकतांत्रिक परिवेश में रह रहे हैं."

(लेखक कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) के भारत संवाददाता है. यह रिपोर्ट सीपीजे से साभार है)

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