टीवी छाप टुटपुंजिया इस्लामी विद्वानों से मुक्ति का संगठन आईएमपीएआर
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टीवी छाप टुटपुंजिया इस्लामी विद्वानों से मुक्ति का संगठन आईएमपीएआर

देश के सामने मुस्लिमों की सही तस्वीर दिखाने और छवि सुधारने के लिए ‘मुस्लिम थिंक टैंक’ का गठन.

By मोहम्मद ताहिर शब्बीर

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पूरे देश में मुस्लिम समुदाय पर लगातार हमलावर टीवी मीडिया और उसके चलते दिन ब दिन धूमिल होती मुस्लिम समाज की छवि को सुधारने और उनकी सही तस्वीर पेश करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर “इंडियन मुस्लिम्स फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म्स” यानि इम्पार नामक एक मुस्लिम थिंक टैंक का गठन किया गया है. इस थिंक टैंक में देश के मुस्लिम समुदाय के सिविल व पुलिस सेवा के कई बड़े पूर्व अफसर, जाने-माने पत्रकार, वकील, डॉक्टर, उद्योगपति, शिक्षाविद सहित लगभग 300 लोग शामिल हैं. ये थिंक टैंक भारतीय मुस्लिमों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर रिसर्च कर तमाम बातें और उनकी समस्याओं को मीडिया और देश तक सही रूप में पहुंचाने का काम करेगा. साथ ही मुस्लिम समुदाय को जागरूक कर उसे देश निर्माण में अपनी भागीदारी बढ़ाने की ओर अग्रसर करेगा.

वर्तमान परिस्थिति में देशव्यापी लॉकडाउन के बीच मुस्लिम समुदाय में फैली गलत धारणाओं को दूर कर उन्हें कानून व्यवस्था का पालन करने और स्वास्थ्य कर्मियों का सहयोग देने के लिए भी इस संगठन ने अपील किया है. 23 अप्रैल, 2020 को इम्पार के सदस्यों ने एक प्रेस रिलीज कर ये जानकारी दी.

इस थिंक टैंक में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, गल्फ़ न्यूज़ दुबई के एडिटर बॉबी नकवी, नई दुनिया उर्दू के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी, पत्रकार कमर आगा, क़मर वाहिद नकवी, पूर्व नौकरशाह अनीस अंसारी, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी लखनऊ के चांसलर डॉ. एसडब्लू अख्तर, पूर्व आईपीएस और मुम्बई पुलिस के पूर्व आईजी अब्दुर्रहमान, एमबीआई ग्रुप जाम्बिया के चेयरमैन जुनैद युसूफ, पूर्व मंत्री तारिक अनवर और रोशन बेग, उद्योगपति सईद शेरवानी, लेखिका शीबा असलम फ़हमी सहित देश के प्रमुख व अग्रणी मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल हैं.

आखिर इस समय में इस संगठन की आवश्यकता देश के प्रबुद्ध मुस्लिमों को क्यों पड़ी? यह बहुत अहम सवाल है. हाल के कुछ सालों में जिस तरीके से मुख्यधारा के मीडिया ने प्रोपगैंडा और अर्धसत्य के आधार पर मुसलमान और इस्लाम के सामने जो संकट पैदा किया है, उसके चलते इस तरह के एक संगठन की जरूरत थी. टीवी पर इस्लाम के विद्वान होने की हैसियत से ऐसे तमाम मौलवी-मौलाना पूरे समुदाय की नुमाइंदगी का दावा करते नज़र आते हैं जिनकी विद्वता और सोच-विचार का दायरा संदेहास्पद और संकुचित है.

इम्पार के मुताबिक, “इस थिंक टैंक के जरिए देश के मुस्लिम समाज के बहुसंख्यक तबके की आवाज़ और रचनात्मक सोच को आगे लाया जा सकेगा जो किसी कारणवश आगे नहीं आ पाती है. इसके साथ ही थिंक टैंक ने मीडिया के साथ विमर्श, जो पिछले कुछ सालों में बेहद खराब रहा है, को लेकर भी एक विशेष रणनीति तैयार की है. इम्पार अपने सदस्यों को मीडिया डिबेट में भेजने का काम भी करेगा. इसके लिए इम्पार की तरफ से 100 विशिष्ट लोगों का पैनल भी तैयार किया है, जो सही और तथ्य के आधार पर टीवी चैनल में मुस्लिम समुदाय का पक्ष रख सकें. इनकी सूची प्रत्येक मीडिया हाउस को भेज दी गई है. जिन्हें ये टीवी चैनल डिबेट में बुला सकते हैं. इसके अलावा थिंक टैंक मुस्लिम समुदाय के आंतरिक सुधारों पर भी काम करेगा.”

संस्था का पोस्टर
संस्था का पोस्टर

पिछले कुछ सालों में देखने में आया है कि मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर मीडिया में फर्जी ‘ढाई हजारी मुल्लाओं’ का दखल बढ़ गया है. ऐसे भी नुमाइंदे देखने को मिले जो पैसों की खातिर टीवी डिबेट में इस्लाम के नाम पर आधारहीन और ऊल-जलूल बाते कर पूरे मुस्लिम समाज को बदनाम करने और उसकी गलत तस्वीर पेश करने का काम करते हैं.

इन्हें तथाकथित राष्ट्रवादी एंकर न सिर्फ डांटते डपटते हैं, बल्कि खूब बेइज्जत भी करते हैं. साथ ही अन्य पैनलिस्ट के साथ गाली-गलौच और कभी-कभी तो मारपीट की नौबत भी आ जाती है. हालांकि मुस्लिम समाज ने इन्हें कभी भी अपना प्रतिनिधि नहीं नियुक्त किया है. क्योंकि उन्हें खुद मुस्लिम समाज की कोई खास समझ या शिक्षा नहीं है. जो इनकी डिबेट में की गई तथ्यहीन बातों से साबित हो जाता है. जिससे पूरे मुस्लिम की बदनामी हो रही है. न्यूज़लांड्री में छपी एक अन्य रिपोर्ट में इन स्वंयभू मुल्लाओं के फर्जीवाड़े को बखूबी बताया गया है.

पिछले कुछ दिनों में भी मीडिया व देश के अन्य इलाकों में मुस्लिम समुदाय की बेहद नकारात्मक छवि पेश की गई है. तबलीगी जमात प्रकरण के बाद इसमें ओर तेजी देखने को मिली, जिसमें पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया. नतीजतन देश के कई इलाकों में मुस्लिमों पर हमले होने की खबरें आई. यहां तक कि लोगों ने सार्वजनिक रूप से मुस्लिम समाज के फल-सब्जी विक्रेताओं का बहिष्कार कर उन्हे अपने इलाके में प्रतिबंधित कर दिया गया. इनमें बीजेपी से जुड़े लोग भी शामिल थे. 2 दिन पहले भी यूपी के देवरिया जिले की बरहज विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक सुरेश तिवारी खुलेआम लोगों से मुस्लिम विक्रेताओं से फल-सब्जी न खरीदने का आह्वान करते नजर आ रहे हैं.

इम्पार के मुताबिक, “इन घटनाओं में मीडिया और उनकी डिबेट में मुस्लिमों के प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा लेने वाले स्वयंभू मौलाना जैसे लोगों का अहम योगदान है. जिन्होंने शोहरत और चंद रुपयों की खातिर खुद को टीवी पर मुस्लिमों के प्रतिनिधि के तौर पर पेश किया और वहां बैठकर असंगत, असंतुलित और वाहियात बातें की. जिससे मुस्लिम समुदाय की सही तस्वीर देश के सामने नहीं आ पाई और धीरे धीरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक गलत धारण बना दिया गया, जिसका खमियाजा आम गरीब मुसलमानों को भुगतना पड़ा.”

थिंक टैंक ने उम्मीद जताई है कि मीडिया तथा अन्य जगह अच्छे विमर्श के द्वारा और देश के अन्य समुदाय, सिविल सोसायटी के साथ मिलकर वे मुस्लिमों की बिगड़ती छवि में सुधार ला पाएंगे और मुस्लिमों की एक अलग तस्वीर देश के सामने पेश करेंगे.

इंडियन मुस्लिम्स फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म्स के संयोजक एमजे खान से हमने इस बारे में विस्तार से बात की.

खान बताते हैं, “ये राष्ट्रीय स्तर की एक संस्था है, 5 साल पहले भी हमने ‘इंडियन माइनॉरिटी इकनोमिक डेवलपमेंट एजेंसी’ बनाया था. जिसका उद्देश्य मुस्लिम युवाओं को अवसरों जैसे- बेहतर एडमिशन, जॉब, स्टार्ट-अप आदि से जोड़ना और सूचित करना था. उस पर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में काम भी शुरू किया था. लेकिन ये थिंक टैंक का आईडिया हमारे दिमाग में 2004 से था और उस पर हम मुख्यत: 5-7 लोग अनऑफिसियल काम भी कर रहे थे. इसके लिए 2004 में ही एक फोरम भी बनाया था. आईडिया ये था कि मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों पर एक थिंक टैंक हो जो लिस्टिंग करे उनकी समस्याओं और एजेंडा आदि की. और उस पर एक रणनीति बनाकर सरकार से, राजनितिक पार्टियों से, सोसाइटी से, मीडिया से एन्गेज कर अपनी बात बेहतर तरीके से रख सके. ताकि समाज में मुस्लिम समुदाय के बारे में एक अच्छी समझबूझ बने. इसमें साल दो साल में मिलकर मीटिंग करते रहे. 15-20 लोगों का ग्रुप था, जो चलता रहा.”

एमजे खान ने आगे बताया, “अभी जो एक डेढ़ महीने से समुदाय के बारे में चल रहा है उस पर हमने गम्भीरता के साथ विचार शुरू किया. जो देश में मुस्लिम समुदाय का नाम खराब हो रहा है और जो एकतरफा नैरेटिव पेश किया जा रहा है. इससे जो गुस्सा फ़ैल रहा है उसका नतीजा बहुत ही खराब निकलने वाला है. तो इस पर हम क्या कर सकते हैं और तबलीगी जमात प्रकरण के बाद मीडिया में जो एकतरफा नैरेटिव बना है, जहां फैक्ट एक तरफ थे और मनगढ़ंत कहानियां दूसरी तरफ. असल में लोगों का नज़रिया इसी से बनता है फैक्ट से नही. और फैक्ट रखने वाला कोई नहीं था. फैक्ट के नाम पर जो ये दाढ़ी-टोपी वाले फर्जी मौलाना बुलाए जाते थे, इसमें भी एक खेल चल रहा था. जिसमें उन्हें गाली देकर, चुप कराकर ये साबित किया जाता था कि पूरी कम्युनिटी इसी तरह की है. तो हमारी कोशिश ये थी कि हम देश को दिखाएं कि ये लोग हमारे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, बल्कि समुदाय में और लोग भी हैं. तो ये तय हुआ कि जो अच्छे पढ़े लिखे लोग हैं, फैक्ट और जानकारी के आधार पर बातचीत कर सकते हैं, उन्हें एक प्लेटफॉर्म पर लाया जाए, अकेले बात करने से तो काम नहीं चलेगा. क्योंकि हर कोई इसे लेकर फिक्रमंद था कि ये सब हो क्या रहा है.”

संस्था का पोस्टर
संस्था का पोस्टर

खान बताते हैं, “उसके लिए 2 अप्रैल, 2020 को 30-40 लोगों ने पहले आईएमआईएफ यानि “इंडियन मुस्लिम इंडिया फर्स्ट” नाम से इसका गठन किया. उसके एक हफ़्ते के अंदर कुछ सुझाव और करेक्शन आए तो फिर हमने इसे इम्पार कर दिया. इसके दो मुख्य एजेंडे हैं- पहला, चैलेंज ये है कि लोगों का जो नजरिया मुस्लिमों को लेकर बन रहा है उसे कैसे सुधार जाए. जैसे आज मुस्लिम लॉकडाउन में खाना खिला रहे हैं, दान दे रहे हैं, ब्लड डोनेट कर रहे हैं तो उसे लोगों के बीच कैसे बताया जाए कि मुस्लिम इस तरह के भी हैं. दूसरा, मीडिया वालों को हम 100 लोगों का पैनल दें कि ये लोग मुस्लिम समुदाय की बातों को अच्छे से रख सकते हैं तो आप इन “किराए के मौलाना” की जगह इन्हें आमंत्रित करें. और अगर कोई मौलाना को ही बुलाना है तो हम काबिल मौलाना भी भेजेंगे जो तथ्य के आधार पर, समझदारी से बात रख सके.”

अन्त में वो कहते हैं, “इसके अलावा सरकार में जो दिक्कत हो रही है, कोई नाइंसाफी या अत्याचार हो रहा है, कोई सुनने वाला नहीं है तो वहां पर भी प्रशासन को लेटर या किसी अन्य तरीके से पीड़ित की मदद करेंगे. फिलहाल तो इन्हीं 3 बातों पर काम चल रहा है. साथ ही अगर कोई अच्छा काम करे तो उसकी तुरंत तारीफ करेंगे चाहे वो उद्धव ठाकरे हों या नरेंद्र मोदी हों, या कोई प्रशासनिक अधिकारी. और ये तो शॉर्ट टर्म है, लॉन्ग टर्म ये है कि हमको खुद ही समुदाय में रिफॉर्म लाना है. इसके लिए उन्हें अच्छी शिक्षा और सोशल सर्विस के रास्ते पर आगे बढ़ाना है और एक अच्छा साइंटिफिक थिंकिंग प्रोसेस भी विकसित कराना है. जिससे की वो देश के विकास में भागीदार बनें और जिससे लोगों में ये पर्सिप्शन बने की मुस्लिम समाज भी कैसे योगदान दे रहे हैं.”

अगर इस काम में कोई चुनौती आती है तो उससे निपटने के लिए आपका क्या प्लान है? इसके जवाब में खान कहते हैं, “हम एक दिया जला कर शुरुआत कर रहे हैं. जो भी चुनौती आएगी उसे हर सम्भव खत्म करने की कोशिश करेंगे. आप भी जानते हैं कि जब भी कोई काम शुरू करते हैं तो सबसे पहला आरोप लगाया जाता है कि ‘इन्हें बीजेपी से पैसे मिले हैं’. इसमें कुछ अपने लोग भी शामिल होते हैं. अब हालांकि उन्हें पता है कि ऐसा कुछ नहीं है लेकिन दुःख इस बात का है कि उसे ये करने का मौका नहीं मिल पाया, या उसने इसकी शुरुआत क्यों नहीं की. असल में समाज में निगेटिव सोचने वाले लोग इतने हैं कि बिना देखे सोचे धारणा बनाना शुरू कर देते हैं. खैर, हमने तो ये दिया जला दिया है, जो होगा आगे उसे भी देखेंगे.”

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