पृथ्वी दिवस: क्या यह महामारी किसी शहर की परिकल्पना को बदल सकती है?
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पृथ्वी दिवस: क्या यह महामारी किसी शहर की परिकल्पना को बदल सकती है?

इस महामारी के बाद हमारे शहरों को अधिक मानवीय और समावेशी बनाने की जरूरत है.

By अनुमिता रायचौधरी

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संक्रमण के डर ने कई भीड़ भरे शहरों को सुस्त कर दिया है. इस तरह की चिंता बढ़ रही है जिसके मुताबिक अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहरों में इंसानों के बीच आपसी संपर्क अधिक होगा जिससे अधिक संक्रमण और मृत्यु की आशंका रहेगी. कम भीड़-भाड़ वाले दूरदराज के छोटे कस्बे और ग्रामीण परिवेश की छवि ऐसी बन रही है कि यह बचने का आसान रास्ता है. इस महामारी के पांव फैलाने से पहले ही लोगों ने दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर को गंदी हवा की वजह से छोड़ना शुरू कर दिया था.

लेकिन, जानकार लोग इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि इस तरह की प्रवृत्ति से कम जनसंख्या घनत्व वाले इलाकों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ेगा जिससे वहां होने वाले विकास की वजह से अधिक प्रदूषण, खराब स्वास्थ्य और कार्बन और सामाजिक समानता की कमी आने वाले समय में सामने आएगी.

ये कुछ कारण हैं जिससे हमारा ध्यान किसी शहर की क्षमता को बढ़ाकर उसे सुरक्षित आर्थिक और सामाजिक तरक्की के साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षा से हट सकता है. लॉकडाउन के दौरान इसीलिए पृथ्वी दिवस का चिंतन शहर की परिकल्पना से दोबारा जुड़ रहा है.

हाल ही में विक्टोरिया ट्रांसपोर्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट, कनाडा के टॉड लिटमैन ने महामारी से संबंधित अपनी ताजा रिपोर्ट में चेताया कि कई लोग गलत धारणा बना सकते हैं कि संक्रामक रोग अधिक जनसंख्या घनत्व में अधिक खतरनाक और ग्रामीण इलाकों में कम खतरनाक होता है. वह कहते हैं कि एक तरफ शहरी लोग इस संक्रमण की चपेट में अधिक आते हैं लेकिन ग्रामीण लोगों के संक्रमण की स्थिति में मरने की आशंका अधिक होती है और इसकी वजह वहां की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था है.

यह शहर ही हैं जो हमें न सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाएं दुरुस्त करने की अनुमति देते हैं, बल्कि कई दूसरे सामाजिक स्तर की सुविधाएं भी प्रदान करते हैं जिससे अधिक से अधिक लोगों की बढ़िया सुरक्षा हो पाती है. दरअसल संक्रमण का खतरा जिस भीड़भाड़ से है वह एक स्थान पर लोगों की संख्या से है न कि जनसंख्या घनत्व यानी एक भूभाग पर रहने वाले लोगों की संख्या से. लिटमैन कहते हैं कि कई ज्यादा घनत्व वाले शहरी देश जैसे हॉन्गकॉग, जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया ने काफी सफलता के साथ कोविड-19 के संक्रमण और मृत्यु दर को काबू किया है.

यह दिखाता है कि घनत्व के अलावा कारगर जन स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाज की तरफ से मिलने वाले प्रतिक्रियात्मक सहयोग और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है. लिटमैन कहते हैं, “अधिकांश लोग आपदा के समय में अपने आसपास की सामान्य सेवाओं और गतिविधियों तक पैदल पहुंच रखने में सक्षम होते हैं और उनका सामाजिक जुड़ाव भी बेहतर होता है,” सघन शहर परिवहन लागत में 10-30 प्रतिशत की बचत कर सकता है, यात्रा के समय को कम कर सकता है, उत्पादकता बढ़ा सकता है, ट्रैफिक कम कर सकता है, यहां पार्किंग के लिए कम भूमि की आवश्यकता होती है, और ऊर्जा की बचत और उत्सर्जन में कमी होती सकती है.

भारत में क्या लगा है दांव पर?

अभी तक भारत में अधिक घनत्व और घनत्व को बढ़ाने की परिकल्पना को जनता का विरोध झेलना पड़ रहा है. लोगों को डर है कि इससे उनके शहर में भीड़ बढ़ेगी और अधिक भीड़ वाले शहर में ट्रैफिक भी बढ़ेगा. कई लोगों को यह नहीं पता कि कैसे नवीनीकरण से शहर में बढ़ते हुए भीड़ और ट्रैफिक को कम कर सकता है और इससे आम लोगों को रहने लायक आसरा भी दिया जा सकता है.

इस महामारी के बाद भारत इस संवाद से दूर नहीं भाग सकता है. यहां अधिक घनत्व, सघन और आपस में जुड़े शहरों की गहरी समझ बननी जरूरी है जो कि लचीले, सुरक्षित, स्वस्थ और साफ, घिरे हुए और बस्तियों के विस्तार के साथ होते हैं.

भारत के अधिकांश शहर सघन जनसंख्या घनत्व वाले हैं. वे एक हद तक घनत्व पर काबू तो रखते हैं लेकिन मुफीद शहरी संरचना और अधिक भीड़-भाड़ के असर को कम करने के लिए योजना और रणनीति को नहीं अपनाते हैं. हमारे शहर आने वाले समय में भी जीविकोपार्जन के लिए लोगों को आकर्षित करते रहेंगे, इसलिए हमें इसकी योजना बनाने की जरूरत होगी.

कोविड-19 के संकट ने नज़र से दूर शहरी आबादी को सामने कर दिया और इसका खुलासा किया कि कैसे अधिक भीड़ में रहना स्वास्थ्य के लिए खतरा साबित हो सकता है. लेकिन, क्या हम इसके लिए पुख्ता रणनीति बना रहे हैं? 1.4 करोड़ लोगों के करीब जनसंख्या शहरी झुग्गियों में न रहने लायक हालत में रहती है. सेंसस 2011 के मुताबिक भारत हर वर्ष 40 लाख लोगों की आबादी को हर साल झुग्गियों में जोड़ता है.

शहरी घरों की कमी के ऊपर बने तकनीकी समूहों ने अनुमान लगाया है कि 80 प्रतिशत तक घर की राष्ट्रीय मांग भीड़ और घरों में क्षमता से अधिक रह रहे लोगों की तरफ से आती है. बिना जीवन-सुरक्षा और आजीविका सुरक्षा से समझौता किए हम इनके लिए कैसे घर डिजाइन करते हैं?

यह सर्वविदित है कि हमारे शहरों में घनत्व नियंत्रण और जमीन की बढ़ी कीमतों से बड़ी संख्या में लोग शहर से दूर रहने को विवश होते हैं. निम्न और मध्यम आयु वर्ग और व्यापारी शहर के बाहर सस्ते इलाकों की तरफ जाते हैं जहां आवाजाही और शहरी व्यवस्थाओं की बेहद कमी होती है. इससे भीड़भाड़ और प्रदूषण से तो बच जाते हैं लेकिन बेहद बड़े सामाजिक असमानता की कीमत देकर. मुंबई और नेशनल कैपिटल रीजन (एनसीआर) में सस्ते घर के प्रोजेक्ट शहर के केंद्र से 65-75 किलोमीटर दूर बने हुए हैं.

वर्ष 2016 में विश्व बैंक ने अपने अध्ययन में अनुमान लगाया था कि बेहतर प्रबंधन के साथ शहरी विकास के मॉडल की तुलना में एक बड़ा, फैला हुआ शहरी विकास का मॉडल भारत को 330 बिलियन अमेरिकी डॉलर से लेकर 1.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक खर्च करवा सकता है. यह सामने आया कि सघन शहर फैले हुए शहर की तुलना में आर्थिक रूप से भी अधिक बेहतर करते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का जिक्र भी इस अध्ययन में आता है जिसने पैदल चलकर या साइकिल चलाकर (एक्सीडेंट के खतरों और ट्रैफिक सुरक्षा का ध्यान रखते हुए) स्वास्थ्य के फायदों का अनुमान लगाया है. उदाहरण के लिए, इस वक्त और वर्ष 2050 के बीच फैले हुए शहरीकरण पर खर्च की तुलना में स्मार्ट ग्रोथ (अधिक से अधिक पैदल और साइकल ट्रैक) से भारत के कुल बजट हर वर्ष 120 बिलियन अमेरिकी डॉलर होती है. यहां तक की परिवार भी इस सघन विकास से लाभांवित होगा. उदाहरण के लिए, एक फैले हुए शहर में एक परिवार यातायात पर 50,000 से 1,20,000 सालाना खर्च करता है, इसकी तुलना अगर कई स्तरीय मॉडल पर बने सघन शहर से करेंगे तो यह खर्च 10,000 से 20,000 तक सालाना आएगा.

भारत की स्थिति क्या है?

ऐसा नहीं है कि भारत शहरी विकास के इन सिद्धांतों को नहीं समझता हो. पिछले कुछ दशकों में नई नीतियों में ये सिद्धांत झलकते हैं. राष्ट्रीय आवास मानकों ने नए विकास के लिए सुलभ सघन शहरी रूप को परिभाषित किया है.

पारगमन उन्मुख विकास नीति (ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट पॉलिसी) कहती है कि उच्च घनत्व वाले जमीन का मिश्रित उपयोग कर उसमें आवाजाही की योजना, पैदल चलने योग्य व्यवस्था बनाई जाए. ऐसे जमीनों में अधिक से अधिक हरित क्षेत्र और सामुदायिक उपयोग के क्षेत्र शामिल हों और आवाजाही की सुविधा 500 से 800 मीटर की परिधि के भीतर ही हो. यह नीति कहती है कि ऐसे पैदल चलने और रहने योग्य समाज में घर की आपूर्ति में हर आय वर्ग के लोग मसलन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, मध्य आय वर्ग भी शामिल हो.

यह काफी सराहनीय है कि भारतीय रेलवे स्टेशन्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिडेट एक अनोखे ‘फॉर्म आधारित कोड’ का विकास कर रही है जिसका उपयोग रेलवे की जमीन पर डिजाइन करने और लेआउट योजना की स्वीकृति प्रदान करने में किया जाएगा. इस कोड से स्टेशन के इलाके में सघन, पैदल चलने योग्य, बाजारोन्मुखी और सुचारू यातायात से लैस टिकाउ विकास का मॉडल बन सकेगा. यह शहरी फॉर्म बेहतर योजना के साथ बने छोटे ब्लॉक, सड़कों की अधिक संख्या, जमीन का मिश्रित उपयोग और वहां रहने वाले लोगों में मिश्रित आय वर्ग पर आधारित होगा.

इससे कई चुनौतियां जैसे फैले हुए शहर, आस पड़ोस की खराब स्थिति, पैदल चलने वालों की सुरक्षा की उपेक्षा, प्रदूषण और ऊर्जा अपव्यय और नए शहरी विकास में शहरी गरीबों पर असामयिक प्रभाव का मुकाबला कर सकेंगे.

आने वाले समय की जरूरत

यह सिर्फ शहरी नियोजन की भूमिका के बारे में नहीं है. दरअसल, शहर बड़े होते हैं और अनायास और स्वायत्त रूप से आकार लेते जाते हैं, जो अक्सर पूर्व नियोजित होते हैं. समुदाय स्वयं निर्माण और उनकी आवश्यकताओं के माध्यम से इसे आकार देते हैं. इसलिए, किफायती आवास के डिजाइन में सुधार कर और खुद के द्वारा बनाए जाने वाले घरों में सहायता प्रदान कर सेवाओं के विकेंद्रीकरण और स्वस्थ जीवन जीने के लिए आवास की योजना की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए.

शहर के स्तर पर, एक अधिक कुशल, न्यायसंगत और सभी के लिए शहरी ज़मीन का किफायती उपयोग करने के लिए एक नए विकास और शहरी नवीनीकरण के मॉडल की आवश्यकता है. गरीबों को भी इस समाधान का हिस्सा बनाना होगा. नियमों को दोबारा देखकर उसमें बदलाव करने की जरूरत है जो कि सघनता में बाधक है और बेवजह कई तरह की बाधा पैदा करते हैं. पार्किंग की निम्नतम जरूरत भी इसमें शामिल है. इसमें वो नियम भी शामिल हैं जो हरित स्थान और सामुदायिक स्थान को लेकर अनिश्चित हों और अधिक रफ्तार वाली सड़कों की तरफ संसाधनों को ले जाते हों. इसकी वजह से ज़मीन का अकुशल और खराब उपयोग होता है जिससे लोगों की भलाई और सुरक्षा से समझौता होता है.

अपने आस पड़ोस को इस तरह से बनाया जाए जिसमें पैदल चलने, साइकिल चलाने और इलेक्ट्रॉनिक के इस्तेमाल से चलने वाली सामुदायिक यातायात की सुविधा हो जो कि भरोसेमंद, सुरक्षित और साफ-सुथरी हो. महामारी की वजह से जीवनशैली में काफी बड़े पैमाने पर बदलाव आए हैं, जिसमें दूरसंचार के साधनों के उपयोग, डिजिटल कार्यस्थल के उपयोग ने यात्रा करने की जरूरत कम की है. योजनाओं में इस समाधान को भी शामिल किया जाए.

महामारी के बाद हमारे शहरों को सस्ती और कायदे की जीवनशैली प्रदान करना होगा जिसमें विकेंद्रीकृत जल प्रदाय, पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कचरा और साफ-सफाई की सुविधा और सबकी अच्छी आर्थिक स्थिति सुनिश्चित करना शामिल है.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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