टाइम्स नाउ की पालघर जांच: भानुमति का कुनबा
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टाइम्स नाउ की पालघर जांच: भानुमति का कुनबा

फर्जी पुलिस स्टेशन, आरएसएस संस्था की वीडियो क्लिप्स जोड़कर बनाया गया टाइम्स नाउ का काल्पनिक पालघर एक्सपोज़े.

By प्रतीक गोयल

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“पालघर का असली सच बाहर आ गया है. टाइम्स नाउ की गहन जांच, सामूहिक हत्या के पीछे उग्र वामपंथी विचारधारा के सूत्र उजागर करती है. सरकार भले ही इन हत्याओं को अफवाहों से फैली गलतफहमी कहकर खारिज कर दे लेकिन एफ़आईआर उसे ‘हत्या की साजिश’ बताती है.”

बुधवार की दोपहर को टाइम्स नाउ चैनल ने 16 अप्रैल को हुई पालघर हत्याओं पर अपनी 8 मिनट की रिपोर्ट की शुरुआत इसी तरह से की. यह कड़ी और इससे जुड़ी हुई टाइम्स नाउ की वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्ट, गढ़चिंचली गांव के ग्रामीणों का हवाला देते हुए कहती है कि युवाओं को “वामपंथियों ने गुमराह” कर दिया है. यह रिपोर्ट एफ़आईआर को भी उद्धरित करती है, जिसमें रिपोर्ट के अनुसार “नक्सली गुरिल्ले” और “हत्या की साजिश” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है.

न्यूजलॉन्ड्री ने पिछले महीने इन हत्याओं की जांच की थी और स्पष्ट रूप से पाया कि भय, आशंका और व्हाट्सएप अफवाहें ही वह मूल कारण हैं जिन्होंने गढ़चिंचली के गांव वालों को दो साधु और उनके ड्राइवर की हत्या करने के लिए उकसाया. पर टाइम्स नाउ की व्याख्या कुछ अलग है और आशानुरूप ही यह बिल्कुल निराधार है.

जिस एफ़आईआर का उल्लेख किया जा रहा है वह कथित रूप से “सोन पुलिस” द्वारा दर्ज की गई है. जैसा कि पालघर के पुलिस निरीक्षक और पालघर के ही पुलिस जनसंपर्क अधिकारी कहते हैं- कोई “सोन पुलिस” है ही नहीं. इसी तरह यह रिपोर्ट, एक दूसरे माध्यम से लिए गए वीडियो क्लिप्स से वामपंथियों के द्वारा गुमराह किए जाने बात को सिद्ध करने की कथित कोशिश करती है. पर स्वयं उस माध्यम से न्यूजलॉन्ड्री की बात हुई और उन्होंने हमें बताया- “यह नहीं कहा जा सकता कि नक्सलियों का इस हत्याओं के पीछे कोई हाथ है.”

यह तो केवल एक नमूना है.

टाइम्स नाउ की “जांच”

पहले संक्षेप में जान लें कि 16 अप्रैल को क्या हुआ.

70 वर्षीय महंत कल्पवृक्ष गिरी और 35 वर्षीय सुशील गिरी महाराज कांदीवली के एक आश्रम में रहते थे. 16 अप्रैल को उन्होंने अपने गुरु मंत्र श्रीराम गिरीजी के अंतिम संस्कार में सूरत जाने के लिए एक गाड़ी किराए पर लिया. गाड़ी का ड्राइवर था 30 वर्षीय नीलेश येलगडे. हालांकि द वायर की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि दोनों साधु आदिवासी थे परंतु यह ख़बर गलत थी. दोनों ही साधु उत्तर प्रदेश से थे जो वर्षों से महाराष्ट्र में रह रहे थे.

महंत कल्पवृक्ष उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के वेदपुर गांव के रहने वाले थे वही महंत सुशील गिरी सुल्तानपुर के चंदा गांव के रहने वाले थे. सन्यास लेने से पहले उनके नाम कृष्ण चंद्र तिवारी और शिव नारायण दुबे थे. द वायर ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य को बाद में ठीक कर लिया था. इन लोगों को पालघर में गढ़ चंचल के पास वन विभाग के अधिकारियों द्वारा रोका गया था. तदुपरांत इनकी गाड़ी को पत्थर, लाठियों और कुल्हाड़ी से लैस गांव वालों ने घेर लिया था. पुलिस का संख्याबल बढ़ता, इससे पहले ही इन तीनों पर गुस्साए आदिवासियों ने हमला कर दिया और इन तीनों की हत्या हो गई.

टाइम्स नाउ का एंकर कहता है- “आदिवासियों को गुमराह किया जा रहा है. झूठी अफवाहें फैलाई जा रही हैं और इन लोगों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काया जा रहा है.”

“सोन पुलिस” की एफ़आईआर का हवाला देते हुए रिपोर्ट कहती है- “एफ़आईआर कहती है कि घटना का मुख्य आरोपी सीपीआई (एम) का ग्राम पंचायत सदस्य है, जिसने कथित तौर पर भीड़ को पत्थर और डंडों के साथ साधुओं को मारने के लिए एकत्रित किया. एफ़आईआर यह भी कहती है ‘कि पेड़ काटना और रास्ते में पत्थर डालना नक्सलियों का पुराना तौर तरीका है.”

रिपोर्ट आगे कहती है- “महाराष्ट्र का गढ़चिंचले गांव वामपंथियों का गढ़ है जहां सीपीआई (एम) की तूती बोलती है, अधिकतर ग्रामीण आदिवासी हैं. गांव के कुछ आदिवासियों ने टाइम्स नाउ को बताया कि क्षेत्र के “युवाओं को वामपंथी भड़का रहे हैं.”

रिपोर्ट एक स्थानीय व्यक्ति, छगन बावरे के हवाले से यह कहती है कि पालघर की जवाहर तालुका में लोगों को यह पढ़ाया जा रहा है कि “उनके भगवान राम नहीं रावण हैं.”

टाइम्स नाउ का एक रिपोर्टर जो इस प्रसारण का भी हिस्सा था, बार-बार इस बात पर जोर दे रहा था कि पालघर के आदिवासी क्षेत्र “सीपीआई (एम) के गढ़ हैं” और यहां के नागरिक आम तौर पर वामपंथी विचारधारा से जुड़े हुए हैं. रिपोर्टर के अनुसार- “यह आदिवासी अधिकतर वामपंथी विचारधारा का ही अनुसरण करते हैं तो हां माओइस्ट लिंक बिल्कुल साबित होता है.”

चैनल का लगातार चलता हुआ टिकर भी “भगवा के खिलाफ अवैध हत्या का अपराध”, “वामपंथ के पदचिन्ह जांच के घेरे में”, “बच्चा चोरी की खबरें एक छलावा” और “अल्ट्रा लेफ्ट, अर्बन माओइस्ट शक के घेरे में” जैसी हेडलाइनें चलाकर, लगातार आक्षेप लगाता रहा.

टाइम्स नाउ कि यह स्टोरी स्वराज्य मैगजीन के द्वारा उठाई गई और फिर इसे भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने शेयर कर दिया. न्यूजलॉन्ड्री में टाइम्स नाउ के द्वारा बताए गए “पालघर के असली सत्य” की जांच की.

‘सोन पुलिस’ है ही नहीं

सोन पुलिस के द्वारा लिखी गई एफ़आईआर ही चैनल कि इस जांच की रीढ़ की हड्डी थी. परंतु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पालघर में “सोन पुलिस स्टेशन” जैसी कोई जगह ही नहीं है.

पालघर पुलिस की वेबसाइट के अनुसार, पालघर जिले में 23 पुलिस स्टेशन हैं. इनके नाम अरनाला, बोइसर, दहानू, घोलवाड़, जवाहर, कासा, केलवा, मानिकपुर, मनोर, मोखड़ा, नाल्लासोपारा, पालघर, सफाले, सत्पति, तालसरी, तारापुर, तूलिंज, वनगांव, वसई, विक्रमगढ़, विरार, वाड़ा और वालिव है.

यह माना जा सकता है कि टाइम्स नाउ से नाम में कुछ भूल हो सकती है लेकिन इनमें से एक भी नाम “सोन” से मिलता-जुलता तक नहीं है, लिहाजा इसकी संभावना कम है.

न्यूजलॉन्ड्री ने पालघर के पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह और पालघर पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी हेमंत काटकर से इस बात की पुष्टि की कि पालघर जिले में सोन नाम से कोई पुलिस स्टेशन है जहां की जिक्र एफआईआर में हुआ है.

‘नक्सलवादी और उनकी साजिश’ का आरोप लगाती एफ़आईआर

टाइम्स नाउ ने एक एफ़आईआर के दृश्य बार-बार दिखाये. पर ये एफ़आईआर किसी काल्पनिक सोन पुलिस ने नहीं, बल्कि 17 अप्रैल 2020 को सब इंस्पेक्टर आनंद काले द्वारा कासा पुलिस स्टेशन में लिखी गई थी. न्यूजलॉन्ड्री ने इस एफ़आईआर को देखा.

The_FIR_registered_at_Kasa_police_station_on_April_17__2020.pdf
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न्यूज़ चैनल ने एफ़आईआर के उन अंशों का उल्लेख किया जिसमें “हत्या की साजिश” और नक्सलियों के “पेड़ काटने और पत्थर डालने की कार्य प्रणाली” का कथित तौर पर जिक्र है.

एफ़आईआर स्पष्ट रूप से यह कहती है- “आनंद काले को एक कॉल आई जिसमें बताया गया कि एक “बड़ी भीड़” गढ़चिंचले के पास जमा हो गई है, उसने एक गाड़ी को पलट दिया है और भीड़ तीन लोगों पर हमला कर रही है. वह कासा पुलिस स्टेशन से उस स्थान पर एक पुलिस सब इंस्पेक्टर, दो असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर और रायट कंट्रोल पुलिस की टुकड़ी के साथ पहुंचे.”

जब उन्होंने पलटी हुई गाड़ी में से 2 लोगों को बचाया और उन्हें अपनी गाड़ी में आगे बिठा लिया तब, “400-500 लोगों की बड़ी भीड़ उग्र हो गई. भीड़ ने वाहन के बाहर खड़े हुए पुलिस वालों को घेर लिया और जो अंदर बैठे थे उन्हें घसीट कर बाहर निकाल लिया. फिर, हमारी दिशा से, इन लोगों ने सरकारी वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया. इकट्ठा हुई भीड़ बहुत उग्र हो गई और उसने चिल्लाना शुरू कर दिया कि ‘छोड़ना मत इन्हें, इन्हें हमारे हवाले कर दो, हम इन्हें देख लेंगे’. और उसके बाद भीड़ ने तीनों लोगों को सर और शरीर पर डंडे और पत्थरों से मार-मार कर उनकी हत्या कर दी.”

एफ़आईआर स्पष्ट रूप से कहती है कि दोनों साधु और उनका ड्राइवर- सुशील गिरी महाराज, महंत कल्पवृक्ष गिरी और नीलेश तेलगड़े- 5 लोगों के द्वारा “गलती से चोर समझे गए” जो 400-500 की गैर कानूनी भीड़ में आपराधिक गतिविधियों की मंशा से आए थे.”

एफ़आईआर में कहीं भी, किसी भी “हत्या की साजिश और “नक्सली दांवपेच” का उल्लेख नहीं है. कहीं भी किसी माओइस्ट कड़ी का उल्लेख नहीं है. एफ़आईआर बस इतना कहती है कि तीन आदमी गलती से चोर समझ लिए गए.

न्यूजलॉन्ड्री ने जवाहर डिवीजन के सब डिविजनल ऑफिसर भागवत सोनावने के द्वारा दर्ज की गई रिपोर्ट भी देखी, जो महाराष्ट्र के गुन्हे अन्वेषण विभाग को केस हस्तांतरित किए जाने से पहले उसकी जांच कर रहे थे. एफ़आईआर की तरह ही, उनकी रिपोर्ट में भी पालघर की घटना में किसी “नक्सली हाथ” या साजिश का कोई जिक्र नहीं है.

Investigating_officer_s_report_before_the_case_was_transferred_to_the_CID.pdf
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टाइम्स नाउ के वीडियो क्लिप्स की पड़ताल

‘वामपंथी आदिवासियों को गुमराह कर रहे हैं’, इस दावे को सहारा देने के लिए चैनल ने अपनी “खोजबीन” में छगन बावरे नाम के एक अध्यापक का वीडियो क्लिप जोड़ा.

इस रिपोर्ट में बावरे कहते हैं, “युवाओं को वामपंथ के अनुयायियों द्वारा पथभ्रष्ट किया जा रहा है. व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर इस प्रकार के मैसेज जो यह कहते हैं कि ‘आदिवासी हिंदू नहीं हैं,’ जोर-शोर से फैलाए जा रहे हैं. यह संदेश युवा मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं. युवाओं को प्रभावित करने के लिए कुछ गतिविधियां भी की जाती हैं. यह गतिविधियां विभिन्न प्रकार की होती हैं. जिनमें से एक है यह पढ़ाया जाना कि उनके भगवान राम नहीं रावण हैं.”

बावरे को दिखाते हुए एक क्लिप में न्यूज़ भारती का लोगो कोने पर था. जिसका अर्थ है कि टाइम्स नाउ ने वावरे से स्वतंत्र रूप से खुद बात नहीं की. बल्कि किसी और का वीडियो उठा लिया. न्यूज़ भारती पुणे स्थित एक छोटा-मोटा “समाचार पोर्टल” है. इसके लेखकों की सूची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विभिन्न संगठनों से जुड़े हुए चिंतक और सदस्य हैं.

5 मई की सुबह न्यूज़ भारती ने अपने फेसबुक पेज पर बावरे के एक इंटरव्यू के 4 क्लिप्स पोस्ट किए. (देखे यहां, यहां, यहां और यहां) चारों वीडियो में तरुण भारत का लोगो था. तरुण भारत आरएसएस की विचारधारा को प्रचारित करने वाला मराठी समाचार पत्र है.

सुबह 10:31 के वीडियो में, बावरे गढ़चिंचले में हुई तीन व्यक्तियों की सामूहिक हत्या की भर्त्सना करते हैं. सुबह 10:30 के वीडियो में वह कहते पाए जाते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में गरीबों के विकास के नाम पर “राजनीति खेली जाती है”.

इनसे अलग दो वीडियो अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं.

इनमें से पहला जो सुबह 10:21 बजे पोस्ट किया गया, उसमें बावरे कहते हैं कि “कुछ लोग” इस “कहानी को फैला रहे हैं” कि “वामपंथी विचारधारा को लेकर आदिवासी युवाओं को गुमराह किया जा रहा है.”

“इन्हें बताया जा रहा है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं और ऐसे संदेशों कि सोशल मीडिया पर भरमार है. जवाहर के इलाकों में एक कहानी बहुत प्रचलित हो रही है कि हमारे भगवान राम नहीं रावण हैं.” बावरे आगे कहते हैं, “एक बड़ी साजिश खेली गई है रावण को राम से ज्यादा बड़ा दिखाने की, और अब यह लोग इस साजिश को धीरे-धीरे पालघर में भी फैला रहे हैं. ऐसे दुष्प्रचार सोशल मीडिया से फैलाए जाते हैं जिसकी वजह से भोले भाले आदिवासी भ्रमित हो जाते हैं कि वह हिंदू हैं या नहीं.”

दूसरा वीडियो जो सुबह 10:17 बजे पोस्ट किया गया उसमें बावरे कहते हुए दिखाई देते हैं, “वामपंथी विचारधारा के सहारे आदिवासियों को प्रायः ये बताया जाता है कि उनका कोई धर्म ही नहीं है. पर मैं मानता हूं कि आदिवासी सबसे ज्यादा धार्मिक प्रवृत्ति के लोग होते हैं क्योंकि उनके पास संस्कृति है और रीति-रिवाज भी. अगर देखा जाए तो आदिवासी सबसे बड़े हिंदू हैं.”

संक्षेप में अगर कहें तो, बावरे के अनुसार वामपंथी विचारधारा कहती है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं और वह उसको गलत मानते हैं.

टाइम्स नाउ ने सुबह 10:21 बेजे वाली पोस्ट का एक हिस्सा अपनी रिपोर्ट में लिया, वह भाग जिसमें बावरे रावण को एक आदिवासी भगवान की तरह प्रचारित करने की वामपंथी “साजिश” का जिक्र करते हैं और यह प्रमाणित करने की कोशिश की आदिवासी हिंदू हैं.

हमें याद रखना चाहिए कि यह वीडियो न्यूज़ भारती ने भी सूट नहीं किया बल्कि यह सर्वप्रथम तरुण भारत द्वारा अपलोड किया गया था. पहले एक पूरा इंटरव्यू उनके यूट्यूब चैनल MahaMTB पर डाला गया और उसके बाद उसे चार भागों में 30 अप्रैल से 2 मई तक फिर से अपलोड किया गया.(देखे यहां, यहां, यहां और यहां)

इन क्लिप्स को लेकर टाइम्स नाउ ने पालघर की हत्याओं में माओइस्ट हाथ होने का पुरजोर दावा किया.

हम नहीं कह सकते कि इन हमलों में नक्सलियों का कोई हाथ है

छगन बावरे दहानू के शिश्ना गांव के एक स्कूल में अध्यापक हैं. वह बताते हैं कि उनके मन में आरएसएस के लिए विशेष जगह है पर वह उसके लिए काम नहीं करते ना ही कोई दायित्व रखते हैं.

उन्होंने न्यूजलॉन्ड्री को बताया कि उन्होंने तरुण भारत को इंटरव्यू दिया था. उसके अलावा उन्होंने किसी और सामाचार संस्था से बात नहीं की है, न टाइम्स नाउ से न न्यूज़ भारत से.

क्या वावरे ने कहा था कि पालघर घटना के पीछे माओइस्टों का हाथ है?

वह उत्तर देते हैं, "हम यह नहीं कह सकते कि हमले का तार नक्सलियों से कहीं जुड़ा हुआ है. परंतु जिस प्रकार से साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या पुलिस के सामने की गई, यह दिखाता है कि हमलावरों को ज़रा भी पुलिस का डर नहीं था, अभी भी नहीं पता कि इनके पीछे असली ताकत कौन थी. पर इस घटना ने हमारी चिंताएं बढ़ा दी हैं, और हम चिंतित और भयाक्रांत हैं कि नक्सलवाद जैसी चीजें यहां शुरू न हो जाएं."

बावरे इस बात से सहमत हैं की बच्चा चोरों की अफवाहें इन हत्याओं का कारण हो सकती हैं. पर वो इंगित करते हैं, कि गांव वालों को यह जाहिर तौर पर समझ आ गया था कि इन तीनों लोगों में साधु भी हैं. उसके बाद भी उनकी हत्या हो गई.

टाइम्स नाउ का नक्सली हथकंडा

टाइम्स नाउ की खोजबीन में कथित एफ़आईआर के हवाले से यह कहा गया कि "पेड़ काटना और रास्ते में पत्थर डालना" नक्सली गुरिल्लों का सामान्य हथकंडा है.

अपने कार्यक्रम के दौरान इस न्यूज़ चैनल ने रतन शारदा से इस घटना पर उनका मत लेने के लिए संपर्क बनाने की कोशिश की, जो आरएसएस चिंतक और न्यूज़ भारती के एक लेखक भी हैं. परंतु तकनीकी कठिनाइयों के कारण संपर्क स्थापित नहीं हो पाया.

गौर करने वाली बात है कि 6 मई को न्यूज़ भारती पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें नक्सली साजिशों की आशंका जताई गई थी.

यह रिपोर्ट इस बात पर थी कि, कैसे 200-300 लोगों की भीड़ ने महाराष्ट्र पुलिस की एक टुकड़ी को चिस्दा गांव में, जो गढ़चिंचली से 13 किलोमीटर दूर है, तीनों हत्याओं के रात ही घेर लिया था. यह रिपोर्ट बड़े-बड़े आरोप लगाती है, जैसे कि: "अगर इस तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि कम्युनिस्टों ने आदिवासियों के बाहुल्य क्षेत्र में अपना घर बना लिया है, माओवादी विचारधारा और उसके हिंसक तरीकों का हाथ इस घटना के पीछे से पूरी तरह से झुठलाया नहीं जा सकता."

ऐसा भी शिगूफा इस रिपोर्ट में छोड़ा गया कि चिस्दा वाली घटना महज़ एक संयोग नहीं थी, बल्कि इसने पुलिस टुकड़ी को "पेड़ काटकर सड़क रोक कर" गढ़चिंचली पहुंचने से रोक दिया.

खानवेल पुलिस स्टेशन में चिस्दा की घटना की एफ़आईआर लिखी गई है, जो कि केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली की सीमा में पड़ता है. परंतु दादरा और नगर हवेली की पुलिस के अनुसार चिस्दा में पुलिस पर कोई "घात" नहीं लगाया गया था, और इसमें नक्सलियों या माओवादियों का हाथ होने की कोई संभावना नहीं लगती.

खानवेल पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर हरीश राठौड़ ने बताया, "कंट्रोल रूम के द्वारा गढ़चिंचली के घटना की बात सुनने पर एक पुलिस की टुकड़ी घटनास्थल की तरफ बढ़ रही थी."

वो आगे बताते हैं, "पर वे लोग मोड़ छोड़ कर आगे निकल गए, 56 किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद उन्हें गांव वालों ने चिस्दा पर रोका." राठौड़ बताते हैं, "गांव वालों ने उन्हें जाने नहीं दिया और उन्होंने पुलिसकर्मियों पर भी चोर होने का शक किया. गांव वाले पूछ रहे थे कि वह लोग लॉकडाउन के दौरान क्यों सफर कर रहे हैं और उन्हें पुलिसकर्मी मानने को तैयार भी नहीं थे."

राठौड़ आगे बताते हैं कि करीब 200-300 गांव वाले थे और उन्होंने पुलिस के वाहन को भी क्षति पहुंचाई. जिस पर एक दूसरी पुलिस की टुकड़ी पहुंची और तब भी गांव वालों को विश्वास दिलाने में कि वे पुलिसवाले हैं करीब 3 घंटे लग गए. "हमने 200-300 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है और 19 को हिरासत में लिया जा चुका है."‌

क्या चिस्दा की घटना की कोई नक्सली कड़ी है? राठौर उत्तर देते हुए कहते हैं, "इस घटना को किसी भी स्तर पर नक्सलियों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता क्योंकि इस इलाके में नक्सली हैं ही नहीं." उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गांव वालों ने पुलिस को चोरों, अपहरणकर्ताओं और मानव अंगों के तस्कर होने की अफवाहों के चलते ही रोका था.

दादरा और नगर हवेली के पुलिस अधीक्षक शरद दराडे भी इस बात की पुष्टि करते हैं, "प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि पुलिस की टुकड़ी को अफवाहों के चलते रोका गया. हम अभी ऐसा नहीं समझते कि यह कोई नक्सली हमला था हमारी तहकीकात जारी है और हम सभी संभावनाओं को टटोल रहे हैं."

न्यूजलॉन्ड्री ने पालघर के पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह से पूछा, कि क्या पालघर की हत्याओं के पीछे कोई नक्सली हाथ है या फिर यह हत्याएं किसी भी तरह से चिस्दा में हुई घटना से जुड़ी हुई हैं?

गौरव सिंह उत्तर देते हैं, "दोनों में से किसी भी घटना का नक्सलियों से कोई लेना देना नहीं है, इसके पीछे कोई सांप्रदायिक कारण भी नहीं था. यह सब केवल अफवाहों की वजह से हुआ. हालांकि हमारी जांच जारी है और हम सभी संभावनाओं को टटोल रहे हैं."

न्यूजलॉन्ड्री ने महाराष्ट्र के गुन्हे अन्वेषण विभाग के एडीजी अतुल चन्द्र कुलकर्णी से संपर्क किया. कुलकर्णी ही पालघर की जांच को देख रहे हैं. जब उनसे संभावित नक्सली हाथ के बारे में पूछा गया उन्होंने कहा, "एफआईआर में इस तरह की किसी बात का कोई जिक्र नहीं. इस तरह की बात जांच के दौरान ही सामने आती है. पर मेरी जांच अभी चल रही है तो मैं इसके बारे में हां या ना किसी भी तरह की कोई टिप्पणी नहीं कर सकता."

क्या कुलकर्णी ने पालघर घटना के लिए "सोन पुलिस स्टेशन" में दर्ज कराई गई एफ़आईआर के बारे में सुना है? उनके अनुसार- "मुझे इस चीज के बारे में कुछ नहीं मालूम है."

महंत कल्पवृक्ष गिरी के भांजे/भतीजे, गोपाल तिवारी ने न्यूजलॉन्ड्री को बताया, "हम अपने ताऊजी और बाकी 2 लोगों की दुर्दांत हत्या के लिए न्याय चाहते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हत्यारे कौन हैं पर वह गिरफ्तार होने चाहिए. अगर वह किसी राजनीतिक दल के भी हों, वह भी निरर्थक है. इस घटना के लिए केवल पुलिस जिम्मेदार है वह उन्हें बचा सकती थी."

वह अंत में कहते हैं, "मीडिया को किसी भी तरह की फेक न्यूज़ और गलत जानकारी नहीं प्रसारित करनी चाहिए. यह एक संवेदनशील मामला है."

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