ज़ी न्यूज़ पार्ट-2 : क़दम-क़दम पर नियमों के उल्लंघन और लापरवाही के फुट प्रिंट
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ज़ी न्यूज़ पार्ट-2 : क़दम-क़दम पर नियमों के उल्लंघन और लापरवाही के फुट प्रिंट

ज़ी समूह के कर्मचारी आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में अपनी चिंता और मैनेजमेंट द्वारा की जा रही लापरवाहियों को बयान कर रहे हैं.

By अतुल चौरसिया और बसंत कुमार

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19 मई को न्यूजलॉन्ड्री ने ज़ी न्यूज़ में कोरोना संक्रमण फैलने को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट की थी. इस रिपोर्ट में सामने आया कि किस तरह से ज़ी मीडिया के दफ्तर में कोरोना संबंधी नियमों का उल्लंघन करते हुए कामकाज जारी था. लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को नजरअंदाज कर दफ्तर बुलाया जा रहा था, उन्हें वर्क फ्रॉम होम की अनुमति नहीं थी, और ऐसा नहीं करने वालों को नतीजे भुगतने की चेतावनी दी गई.

न्यूज़लॉन्ड्री के पास कुछ ऐसे सबूत हैं जो ज़ी मीडिया में लगातार की जा रही नियम कानूनों की अनदेखी को साफ-साफ बयान करते हैं. इन संदेशों में तमाम कर्मचारी खुलेआम शिकायत कर रहे हैं, डरे हुए हैं, दफ्तर लाने, ले जाने वाली कैब में नियमों का उल्लंघन हो रहा है, लिफ्ट में एहतियात नहीं बरती जा रही है. साथ ही हमारे पास ज़ी के कर्मचारियों की बातचीत का एक ऐसा दस्तावेज है जिससे पता चलता है कि ज़ी में कोरोना का सबसे पहला केस अप्रैल महीने में सामने आया था लेकिन प्रबंधन ने उसे पूरी तरह से दबाने और लोगों को भरमाने का काम किया.

इन सब लापरवाहियों के चलते आज ज़ी मीडिया कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया है. अपने कर्मचारियों को कोरोना वारियर्स कहने वाले सुधीर चौधरी का एक दूसरा ही चेहरा हमारे सामने आया है, जो कि उनके सार्वजनिक चेहरे से एकदम विपरीत है.

कैब को लेकर गृहमंत्रालय के नियमों की अनदेखी

यह बात बार-बार कही जा रही है कि कोरोना से लड़ने के लिए अभी कोई दवाई उपलब्ध नहीं है. ऐसे में साफ़-सफाई और एक दूसरे के बीच शारीरिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) रखकर ही हम खुद को और दूसरों को बचा सकते हैं. लेकिन ज़ी मीडिया में इन दोनों चीजों को लगातार नजरअंदाज किया गया.

देशव्यापी लॉकडाउन के पहले चरण से ही यह नियम बनाया गया कि किसी भी कार या कैब में ड्राईवर के अलावा सिर्फ दो लोग सफ़र कर सकते हैं. लेकिन ज़ी मीडिया के प्रबंधन ने लगातार इस नियम का उल्लंघन किया और कर्मचारियों की जान जोखिम में डाली. एक कैब में ड्राइवर के अलावा चार-चार लोगों को उनके घर भेजा गया और ऑफिस लाया गया. इस बाबत तमाम कर्मचारियों ने व्हाट्सएप ग्रुप में शिकायत की और अपनी चिंताएं जताई. ये तमाम स्क्रीनशॉट इसकी बानगी हैं.

लोगों की हर शिकायत के बाद एचआर टीम की तरफ से यह कहा गया कि हम लोग कैब में सोशल डिस्टेंसिंग फॉलो करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अचानक रोस्टर में तय कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होने के कारण हम इस परेशानी से गुजर रहे हैं. मैं टीम से नियमों को सख्ती से पालन करने का निर्देश दूंगा और आगे इसका ख्याल रखा जाएगा.

ज़ी न्यूज़ के नोएडा स्थिति बिल्डिंग में ज़ी न्यूज़ हिंदी के अलावा ज़ी हिंदुस्तान और बाकी अलग-अलग क्षेत्रीय चैनलों का संचालन होता है. इन तमाम चैनलों में काम करने वाले कर्मचारियों को घर से लाने और ले जाने के लिए मैनेजमेंट ने रूट तय कर रखे हैं मसलन रूट नंबर 1, 2, 3... 11, 12 आदि. इन सभी रूट से सभी चैनलों के कर्मचारियों को एक साथ उठाया जाता है. मसलन रूट नंबर एक पर जो गाड़ी जाएगी वह उस रूट पर मौजूद ज़ी समूह के सभी चैनलों के कर्मचारियों को उठाएगी. यह समस्या किसी विशेष रूट नम्बर तक ही सीमित नहीं थी. लगभग हर रूट से आने वाले कर्मचारियों ने ग्रुप में इसको लेकर शिकायत की.

ज़ी न्यूज़ के कैब में सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की अनदेखी पर कई बार पुलिस ने भी उन्हें रोका. लेकिन मैनेजमेंट ने इसे अपने संपर्कों के जरिए सुलझाया और यह गड़बड़ी बदस्तूर जारी रही. आप यह स्क्रीनशॉट देखिए-

ज्यादातर मौकों पर एचआर का जवाब टालमटोल वाला रहा लेकिन एक जवाब बेहद हैरान करने वाला है. इसमें कहा जाता है- हम कैब में लोगों की संख्या कम करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आखिरी समय में कैब के लिए गुजारिश आने के कारण और गाड़ियों की संख्या कम होने के कारण हम लोग 3 प्लस 1 और 4 प्लस 1 मैनेज कर रहे हैं. हम टीम से गुजारिश करते हैं कि अगर किसी के पास अपनी गाड़ी हो तो उसका इस्तेमाल करें. टीम से निवेदन है कि निजी गाड़ियों का इस्तेमाल करें.

इसके आगे एचआर टीम के एक दूसरे सदस्य की तरफ से एक और जवाब आता है जो एक और चिंताजनक बात की ओर इशारा करता है. इससे साबित होता है कि ज़ी मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह लापरवाह था.

मैनेजमेंट की तरफ से लिखा जाता है कि आप सभी से आग्रह है कि यह समय सहयोग का है. कृपया संभव हो पर्सनल गाड़ी इस्तेमाल करें. कार में पूलिंग करें. अभी समान्य दिनों के तुलना में पिक अप और ड्राप के लिए काफी संख्या में मांग हो रही है.

यह स्थिति तब है जब कंपनी ने 1 मई से सभी कर्मचारियों को दफ्तर से ही काम करना अनिवार्य कर दिया है, सार्वजनिक यातायात बंद है, कैब में गृह मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइन्स का उल्लंघन कर पांच लोग यात्रा कर रहे हैं. ज़ी के एक कर्मचारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “17 मई तक कंपनी में कैब की यही व्यवस्था चलती रही.”

लिफ्ट और कैफेटेरिया

जी न्यूज़ में जब कोरोना के 28 मामले सामने आए तब फिल्म सिटी स्थित ज़ी मीडिया के दफ्तर की चौथी मंजिल को सील कर दिया गया. जबकि बाकी मंजिलों पर कामकाज बदस्तूर जारी है. यहां पर काम करने वाले तमाम कर्मचारियों ने एक और चिंता उसी व्हाट्सएप ग्रुप में दर्ज कराई. पूरे बिल्डिंग में ऊपर और नीचे आने-जाने के लिए कर्मचारी कॉमन लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं. उसी लिफ्ट का इस्तेमाल कोरोना संक्रमित कर्मचारी भी करते थे और दूसरे सहयोगी चैनलों के कर्मचारी भी. इसके अलावा कैफेटेरिया में सर्व करने वाले वेटर भी कॉमन हैं, वो सभी फ्लोर पर आते-जाते हैं. एक कर्मचारी हमसे बताते हैं, “पूरी बिल्डिंग को सील किया जाना चाहिए था. लेकिन हम लोगों को ऐसे ही छोड़ दिया गया है. ज़ी न्यूज़ वाले वॉयन चैनल (ज़ी समूह का एक और न्यूज़ चैनल) की बिल्डिंग में शिफ्ट हो गए हैं.”

इन तमाम लापरवाहियों के साथ एक हैरान करने वाली शिकायत ग्रुप में ज़ी के एक कर्मचारी ने की. सनद रहे इस ग्रुप में एचआर और फैसिलिटी टीम के सदस्य भी हैं. यह शिकायत लिफ्ट को लेकर थी. लिफ्ट में अपने फ्लोर पर जाने के लिए बटन को छूना ना पड़े इसके लिए मैनेजमेंट द्वारा टूथपिक रखा गया था. एक कर्मचारी ने ग्रुप में जानकारी दी, ‘‘जानना और बताना ज़रूरी है. लिफ्ट के बाहर लगाई गई टूथपिक जब खत्म हो जाती है तब लिफ्ट के अंदर यूज की गई टूथपिक को ही फिर से बाहर लगा दिया जाता है. इसलिए सभी लोग टूथपिक प्रयोग के बाद तोड़ दें.’’

इस मैसेज का जवाब देते हुए एक कर्मचारी लिखते हैं कि ये तो गंभीर अपराध है, जानबूझकर कोरोना संक्रमण फ़ैलाने जैसा अपराध.

इसके जवाब में एचआर द्वारा लिखा गया कि आपको सूचित किया जाता है कि हमलोग टूथपिक डिस्पोज़ कर देते हैं.

अब जब ज़ी न्यूज़ कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया तब सुधीर चौधरी अपने साथियों को कोरोना वारियर्स बुला रहे हैं लेकिन उन कर्मचारियों को कोरोना न हो इसके लिए कोई सावधानी नहीं बरती गई. यह बात हम नहीं कह रहे हैं. यह बात ग्रुप में आए मैसेज और ज़ी में काम करने वाले कर्मचारी कह रहे हैं. कोई भी अपना नाम नहीं उजागर करना चाहता क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी नौकरी जा सकती है.

15 मई को भी जब पहला कोरोना पॉजिटिव केस सामने आया था, उस दिन भी सुधीर ने अपने शो में तो इसे देशभक्ति और तमाम चीजों से जोड़कर वाहवाही बटोरने की कोशिश की लेकिन दफ्तर में उन्होंने कर्मचारियों को सीधे इशारा दिया कि, सारे लोग रोजाना दफ्तर आएं. महज एक केस को बहाना मत बनाएं. 18 मई को भी उन्होंने ऐसा ही किया.

क्या 15 मई का मामला ज़ी में कोरोना का पहला मामला था?

जवाब है नहीं. इससे दो हफ्ते पहले 29 अप्रैल को एक कैमरामैन सुरेश चौहान (बदला हुआ नाम) कोरोना पॉजिटिव पाया गया था. इसके बाद पूरे ज़ी मीडिया में सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. वह कैमरामैन अपनी रिपोर्ट पॉजिटिव (29 अप्रैल) आने से तीन-चार दिन पहले तक ऑफिस में आकर लोगों से मिलता-जुलता रहा. उनके साथ ही ज़ी न्यूज़ के लिए कैब चलाने वाला एक ड्राइवर भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया था. इस पर व्हाट्सएप ग्रुप में स्टाफ ने आशंकाएं जताई थी और स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी.

तब एचआर ने कहा था कि संक्रमित कैमरामैन फील्ड में ही रहता था वो दफ्तर नहीं आया था. लेकिन ये सच नहीं है. इसकी ताकीद कई ज़ी कर्मचारी करते हैं. उल्टे मैनेजमेंट का रवैया फिर से टालमटोल वाला रहा.

29 अप्रैल को ही सुरेश चौहान (कैमरामैन) कोरोना पॉजिटिव पाया गया था, उसके बाद ज़ी न्यूज़ ने पूरे मामले पर परदा डालते हुए न तो किसी का टेस्ट करवाया, ना ही किसी को क्वारंटीन किया.

15 मई को जब ज़ी न्यूज़ में नाइट शिफ्ट में काम करने वाले आशीष (बदला हुआ नाम) का कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आया तब सुधीर चौधरी ने अपने शो में आशीष को जी न्यूज़ का ‘व्हिसल-ब्लोअर’ बताते हुए कहा कि जब उन्होंने बताया कि उनके अंदर कुछ लक्षण दिख रहे है. उसके बाद उन्होंने ऑफिस आना बंद कर दिया. हमने उनसे कहा कि अब आप ऑफिस मत आइये. ये अपने घर चले गए और उसके बाद इन्होंने अपना टेस्ट कराया और शुक्रवार को वो टेस्ट कन्फर्म आया. जिसमें वो पॉजिटिव हैं.

असल में सुधीर चौधरी जिसे ‘व्हिसल ब्लोअर’ कह रहे हैं वो ज़ी के लिए ‘फ्लैग बियरर’ साबित हुआ जो उसने अपनी पहल पर अपना टेस्ट करवाया, वरना जाने कितने दिन और ये बात यूं ही दबी रहती और जाने कितने लोग इसकी चपेट में आते.

नोएडा प्रशासन का रवैया

ज़ी न्यूज़ के 28 कर्मचारियों के कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद नोएडा के फिल्मसिटी स्थित ज़ी मीडिया के कार्यालय की चौथी मंजिल को सील कर दिया गया है. बाकी सभी मंजिलों से ज़ी मीडिया के बाकी चैनलों का संचालन बदस्तूर जारी है. क्या यह कानूनन वैध है? कोरोना हॉटस्पॉट की उत्तर प्रदेश सरकार और गौतमबुद्ध नगर प्रशासन की नियमावली क्या कहती है? यह जानना आवश्यक है. नोएडा एडमिनिस्ट्रेशन में तैनात एक क्लास वन अधिकारी अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “एक होता है मोनो और एक होता है कलस्टर. अगर किसी बिल्डिंग में एक कोरोना पॉजिटिव केस मिलता है तो उस बिल्डिंग और उसके 200 मीटर के दायरे को अगले 20 दिन के लिए सील कर दिया जाता है. इसे हम मोनो कहते हैं. इसमें थोड़ी बहुत गतिविधियों की छूट रहती है.”

वो अधिकारी आगे कहते हैं, “अगर किसी जगह एक साथ बल्क में कोरोना पॉजिटिव मिलते हैं तो इसे कलस्टर घोषित कर दिया जाता है. कलस्टर घोषित होने वाले इलाके में 500 मीटर के दायरे में हर तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित कर दी जाती हैं. किसी भी बाहरी व्यक्ति को भीतर नहीं जाने दिया जाता न ही किसी को बाहर निकलने की इजाज़त होती है. सिर्फ मेडिकल टीम ही आ जा सकती है.”

फर्ज कीजिए कि अगर यह नियम नोएडा की फिल्मसिटी में लागू कर दिया जाय तो लगभग दो किलोमीटर के दायरे में तो पूरी फिल्मसिटी ही फैली है. यानि देश के सभी बड़े चैनलों की गतिविधियां रुक जानी चाहिए. लेकिन यहां पूरी तरह से ज़ी मीडिया की बिल्डिंग को भी सील नहीं किया गया है, 500 मीटर के दायरे को सील करना तो दूर की बात है.

नोएडा प्रशासन के ज्यादातर अधिकारी इस मामले पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं. हमने नोएडा के सिटी मजिस्ट्रेट उमाशंकर सिंह से पूछा कि कोरोना हॉटस्पॉट का कलस्टर घोषित करने के नियम के तहत ज़ी न्यूज़ का दफ्तर आता है या नहीं तो उन्होंने कहा कि आप नोएडा के सीएमओ से बात कीजिए, वही बता सकते हैं. सीएमओ से संपर्क करने की सभी कोशिशें असफल रहीं.

इस संबंध में हमने नोएडा के डीसीपी (मुख्यालय) नितिन तिवारी से बात की कि ज़ी का मामला कलस्टर के दायरे में आता है या नहीं, तो उन्होंने बताया, ‘‘पुलिस विभाग को जैसा बोला जाता है हम उस पर अमल करते हैं. किस इलाके को सील करना है यह एडमिनिस्ट्रेशन और डॉक्टर्स बताते हैं. सील करने के लिए आदेश मिलने के बाद हम लोग वहां फोर्स भेजते हैं. इसके अलावा हमारी इसमें कोई भूमिका नहीं है.”

हमने जिलाधिकारी सुहास एलवाई से बात करने की कोशिश भी की. उनके सहायक ने फोन उठाया और बताया कि साहब व्यस्त हैं. हमने उन्हें इससे संबंधित सवाल भेजा है. उसका अभी तक जवाब नहीं आया है.

ज़ी मीडिया के कर्मचारियों द्वारा व्हाट्सएप ग्रुप में की गई शिकायतों और उन पर की गई कार्रवाइयों को लेकर हमने ज़ी समूह के एचआर विभाग और ज़ी न्यूज़ के एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी को कुछ सवालों की फेहरिस्त ईमेल और वाट्सऐप के जरिए भेजा है, लेकिन उनका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. उनका जवाब मिलने की स्थिति में हम इस स्टोरी को अपडेट कर देंगे.

(स्पष्टीकरण: इस स्टोरी में इस्तेमाल किए गए सभी स्क्रीनशॉट ज़ी समूह के चैनल ज़ी हिंदुस्तान के अफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप के हैं. गौरतलब है कि कैब में ज़ी समूह के सभी चैनलों के कर्मचारी एक साथ आते-जाते हैं. इसी तरह एक ही लिफ्ट का इस्तेमाल सभी कर्मचारी करते हैं.)

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