डिप्टी कलेक्टर बनीं वसीमा शेख की कहानी
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डिप्टी कलेक्टर बनीं वसीमा शेख की कहानी

नांदेड़ जिले के एक छोटे से गांव में गरीबी और सामाजिक ताने-बाने को तोड़कर महाराष्ट्र सिविल सर्विस के महिला वर्ग में तीसरी रैंक लाने वाली लड़की की कहानी.

By मोहम्मद ताहिर शब्बीर

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एमपीएससी यानि महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग ने शुक्रवार, 19 जून को महाराष्ट्र अधीनस्थ सेवा परीक्षा-2019 के अंतिम परिणाम जारी किए. इसमें कुल 420 अभ्यर्थी सफल हुए. इन अभ्यर्थियों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बेहद मुश्किल हालात से गुजरकर, कड़ी मेहनत की और इस परीक्षा में सफल हुए.

ऐसी ही एक सफल अभ्यर्थी नांदेड़ जिले की लोहा तहसील के छोटे से गांव जोशी सांगवी की रहने वाली वसीमा शेख हैं. उन्होंने गरीबी और विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हुए कड़ी मेहनत से इस परीक्षा में सफलता हासिल की.यह वसीमा का दूसरा प्रयास था. उन्होंने महिला वर्ग में तीसरी और कुल 26वीं रैंक प्राप्त कर अपना, परिवार और इलाके का नाम रोशन किया.

वसीमा उन लोगों के लिए एक मिसाल बन गई हैं जो गरीबी या अन्य परेशानी के कारण बीच में ही हार मान जाते हैं.मराठी माध्यम से तैयारी करने वाली वसीमा शेख को महाराष्ट्र में डिप्टी क्लेक्टर या उप-जिलाधिकारी पद के लिए चुना गया है. वसीमा की राह पर चलते हुए इनकी दो छोटी बहनें भी अब सिविल सर्विस की तैयारी कर रही हैं.

वसीमा शेखसे न्यूजलॉन्ड्री के रिपोर्टर मोहम्मद ताहिरकी बातचीत.

वसीमा जी, पहले तो आपको बहुत-बहुत बधाई. मेरा पहला सवाल यही रहेगा कि कैसा और कितना मुश्किल रहा आपका ये सफर?

शुक्रिया! मुश्किल तो था. लेकिन बचपन में जो संघर्ष किया था, उसी हिसाब से प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी कर रही थी तो इस कारण ज्यादा मुश्किल नहीं हुई.

क्या आप अपने उस संघर्ष के बारे में कुछ बता सकती हैं?

मैं महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखती हूं. लगभग 1500 की जनसंख्या वाले सांगवी गांव में हम 4 बहन और 2 भाई,माता-पिता के साथ रहते थे. क्योंकि मेरे अब्बा की दिमागी हालत ठीक नहीं है तो घर का पूरा भार अम्मी के सिर था. वे दूसरे लोगों के खेतों पर काम कर घर का खर्च चलाती थीं. 10वीं तक कभी-कभी हम भी उनके साथ जाते थे. लेकिन घर में ज्यादा लोग थे तो उन पर भार ज्यादा पड़ रहा था.

जब मैं दसवीं में थी तो मुझसे बड़े भाई जो तब बीएससी फर्स्ट ईयर में थे उन्होंने घर को सपोर्ट करने और हमारा पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. तो अम्मी और भाई ने मिलकर हमको पढ़ाया.

मेरी 7वीं क्लास तक की पढ़ाई बेसिक जिला परिषद के स्कूल में हुई. उसके बाद गांव में ही स्थित एक छोटे से प्राइवेट स्कूल से मैनें 10वीं की पढ़ाई पूरी की.

उसके बाद 11वीं की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल नहीं था तो रोज 6 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना होता था. क्योंकि सवारी का भी कोई साधन नहीं था. ऊपर से गांव से कोई लड़की पढ़ने के लिए नहीं जाती थी. जैसे-तैसे तो 11वीं किया. फिर 12वीं में मैंने अपनी नानी के यहां एडमिशन लिया. हालांकि वहां भी स्कूल 10 किलोमीटर दूर था लेकिन वहां से आने-जाने के लिए लोकल बस की सुविधा उपलब्ध थी. तो उसी से मैं आती-जाती थी.

12वीं के बाद मैंने महाराष्ट्र ओपन यूनिवर्सिटी से बीए में एडमिशन लिया और साथ-साथ प्राइमरी टीचर के लिए एक डिप्लोमा बीपीएड किया.

जैसा कि आपने बताया, आपके साथ कोई लड़की पढ़ने के लिए नहीं जाती थी तो क्या आप पर या आपके घरवालों पर गांव, समाज के लोगों का कोई दबाव था कि आपकी भी पढ़ाई रोक दी जाए.

जी हां! मुझे और मेरे घर वालों को बाहर के लोग बोलते थे, उनके विरोध का हमें सामना करना पड़ा. लेकिन मेरे भैय्या और अम्मी ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया.उन्होंने मुझे कभी नहीं रोका.

आपकी जिंदगी में वह मौका कब आया जब आपको लगा कि आपको सरकारी नौकरी या सिविल सर्विस में जाना चाहिए?

ऐसा कोई खास ‘टर्निंग पॉइंट’ तो नहीं था लेकिन मैं हमेशा सोचती थी कि एक सरकारी अधिकारी को पूरा सिस्टम सपोर्ट करता है. अगर एक सरकारी अधिकारी कोई एक अच्छा निर्णय लेता है तो समाज के लाखों लोगों पर उसका पॉजिटिव असर पड़ता है. चूंकि मैं ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखती हूं तो मैंने लोगों की समस्याओं को बहुत पास से देखा है. छोटे-छोटे कामों के लिए उन्हें बहुत परेशानी उठानी पड़ती है. तो उन लोगों की समस्याओं को कम करने के लिए मैं ये करना चाहती थी.

आपने कब और कैसे इन परीक्षाओं की तैयारी शुरू की?

मैंने ग्रेजुएशन के बाद 2016 में एमपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू की. चूंकि सिविल सेवा की तैयारी के लिए कंसिस्टेंसी के साथ रोज 10-12 घंटे की पढ़ाई करनी होती है. और वह माहौल मुझे नांदेड़ में मिल नहीं पा रहा था, ऊपर से अपने ही समुदाय के लोग विरोध करते थे तो मेरे बड़े भाई मुझे पुणे लेकर आ गए जिससे की मुझे यहां अच्छा माहौल, लाइब्रेरी वगैरह की सुविधा मिल सके. फिर यहां आकर मैंने किराए पर रहकर रोज 12-15 घंटे बिना कोचिंग के पढ़ाई की. 2 साल बाद 2018 में मेरा चयन नागपुर में सेल्स टैक्स -इंस्पेक्टर के लिए हो गया था. जो मैंने जॉइन भी किया और अभी मैं वहीं कार्यरत हूं.

अब चूंकि यह एक ऑफिस वर्क था और ज़मीन पर रहकर काम करना मेरा जुनून था, फील्ड वर्क मुझे अच्छा लगता था तो मैंने साथ ही साथ डिप्टी कलेक्टर के लिए पढ़ाई भी जारी रखी.

इसके लिए आपने टाइम मैनेज कैसे किया?

इसमें मुझे काफी परेशानियां भी आईं, मेरे पास टाइम बहुत कम था. सुबह 10-7 ऑफिस जाना होता था. लेकिन मैंने ये डिसाइड कर लिया था कि मुझे करना है तो करना है. तो मैं सुबह फज़र में उठकर पढ़ाई करती और फिर रात में टाइम निकालकर पढ़ती. साथ ही जब ज्यादा जरूरी हुआ जैसे एक्जाम का टाइम आया तो छुटिटयां ले लेती थी. और दूसरे प्रयास में मैंने कुल 26वीं और महिलाओं में तीसरी रैंक लाकर सफलता प्राप्त कर ली. पहले प्रयास में भी सिर्फ 2 मार्क्स से मेरा मेन क्वालीफाई होने से रह गया था, प्री क्वालीफाई करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई.

वसीमा शेख का रिजल्ट
वसीमा शेख का रिजल्ट

जब समाज में लगातार आपको लोगों के कुछ विरोध का सामना करना पड़ा, तो आपने पर्सनली उसे कैसे डील किया.

मैंने लोगों के इस विरोध को एक मोटिवेशन के तौर पर लिया. मैंने सोचा कि जो ये लोग मुझे डी-मोटिवेट कर रहे हैं उन्हें मैं ऐसे जवाब नहीं दूंगी बल्कि मैं पढ़ूंगी और जब मेरा रिजल्ट आएगा और मैं ऑफिसर बनूंगी तो इन लोगों को खुद-ब-खुद जवाब मिल जाएगा.

आप, अपनी इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहेंगी?

इस पूरी सफलता में बहुत लोगों ने मेरी मदद की है. लेकिन मुख्यत: इस सफलता में मेरे रोल मॉडल मेरी अम्मी और भाई थे. साथ में मेरे पति भी काफी सपोर्टिव हैं और उनका सपोर्ट भी मुझे रहा. अभी 15 दिन पहले ही हमारी शादी हुई है.

जो स्टूडेंटअभी सिविल सर्विस या अन्य परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उनसे आप क्या कहना चाहेंगी?

सबसे पहले एक्जाम के सिलेबस को समझना और एनालिसिस करना बहुत जरूरी है, जैसे जो सर्विस कमीशन है उसका माइंड क्या है, वह कैसे सवाल पूछता है? ये बेसिक बातें हैं. दरअसल हम कहीं न कहीं सिविल सर्विस के पैटर्न को ही समझने में गलती कर देते हैं जिससे हमें ज्यादा टाइम लगता है. और हमेशा एक्जाम के लिए पूरी तरह तैयार रहने के माइंडसेट के साथ कंसिस्टेंसी से 12-15 घंटे पढ़ाई करना बेहद जरूरी है. यह बेहद जरूरी है.

आखिरी सवाल, डिप्टी क्लेक्टर पर जॉइन करने के बाद आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?

डिप्टी क्लेक्टर के तौर पर मैं अपनी जिम्मेदारियों को 100 प्रतिशत देकर पूरा करने का प्रयास करूंगी. आम जिंदगी से सम्बंधित लोगों की इतनी छोटी-छोटी समस्याएं होती हैं जो एक सरकारी अधिकारी बहुत आसानी से सॉल्व कर सकते हैं. तो मैं लोगों की इन सब समस्याओं को दूर करने का प्रयास करूंगी.

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