रामधुन के बीच ‘मादर-फादर’ की सद्गति को प्राप्त हुई टीवी पत्रकारिता
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रामधुन के बीच ‘मादर-फादर’ की सद्गति को प्राप्त हुई टीवी पत्रकारिता

दिन ब दिन की इंटरनेट बहसों और विवादों पर संक्षिप्त टिप्पणी.

By अतुल चौरसिया

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हिंदी व्यंग्य के पितामह हरिशंकर परसायी के एक व्यंग्य का छोटा सा हिस्सा पढ़िए- “अब दोनों राजनीतिक दलों में लड़ाई शुरू हो गई. पहले वे एक-दूसरे के ‘साले’ बने. इस रिश्ते के कायम होने से मुझे विश्वास हो गया कि देश में मिली-जुली स्थिर सरकार बन जाएगी. फिर कुछ ‘मादर, फादर’ वगैरह हुआ. इससे लैंगिक नैतिकता का एक मानदंड स्थापित हुआ. फिर मार-पीट हुई. मैंने कहा, ‘आप दोनों का काम बिना पैसे खर्च किए हो गया. आपके अपने सर फूटे हुए हैं और नाक से खून बह रहा है. अब प्रचार कीजिए जनतंत्र के लिए और देश के लिए. मैं गवाह बनने को तैयार हूं.”

इसी तरह हम सब गवाह बने पीछे हफ्ते टेलीविजन पत्रकारिता के चरमोत्कर्ष का. पहुंचाने का श्रेय मिला दीपक चौरसिया को. दीपक चौरसिया या उनकी पीढ़ी के वो तमाम पत्रकार जो टीवी पत्रकारिता की इस सद्गति के जिम्मेदार हैं, उनसे कुछ कड़े सवाल करने का यह वक्त है. इनके दोहरे चरित्र पर बात होनी चाहिए. हालात यहां तक बिगड़े हैं तो साल दर साल इन पत्रकारों ने धकियाकर उसे यहां तक पहुंचाया है.

बीते बीस साल से जिन टेलीविजन पत्रकारों को आप टेलीविज़न के परदे पर देख रहे हैं उनके दोहरे चरित्र को समझ लीजिए. सभा सेमिनारों में इनकी आदर्शवादी भाषा और टीवी स्टूडियों में इनके खटकरम के बीच मौजूद दोहरेपन की भारी-भरकम खाई को समझने के लिए हमने इस बार अतीत के कुछ वीडियो खंखाले हैं, ख़ास आपके लिए.

हिप्पोक्रिसी यानि पाखंड हमारे देश की टीवी पत्रकारिता का संकट बन चुका है. सुधीर चौधरी, अमीश देवगन, अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह, रूबिका लियाकत, सुमित अवस्थी, किशोर अजवाणी तक एक लंबी फेहरिस्त है. पत्रकारिता में एक रेखा खींचनी पड़ती है. किसी प्रोग्राम अच्छी टीआरपी, अच्छी पत्रकारिता का सर्टिफिकेट नहीं है. लेकिन इनके पास बस यही खोखला तर्क है.

किसी भी दिए गए वक्त में एक न्यूज़ शो की लोकप्रियता हमेशा बिग बॉस में होने वाली नौटंकी या किसी म्यूजिक कॉन्टेस्ट से अधिक होगी. पोर्न और न्यूज़ में चुनना हो तो संभव है कि ज्यादातर लोग पोर्न देखना पसंद करें. मनोरंजन का अपना एक स्थान है. कोई भी व्यक्ति हर समय केवल खबरें नहीं देख सकता, हम सब इंटरटेनमेंट चैनल देखते हैं. लेकिन खबर ख़बर है. पत्रकारिता में जो बिकता है वही दिखता है वाला फार्मूला लागू नही होता है. दुर्भाग्य है कि ऐसी सोच वाले एंकरों की ही टीवी पत्रकारिता में पौ-बारह है.

आपसे अपील है कि इस वीडियो को 5, 10,15 लोगों तक जरूर भेजें. खबरों के नाम पर लंबे समय से की जा रही इस बेईमानी को ज्यादा से ज्यादा लोगों के सामने उजागर करने का वक्त है. दीपक चौरसिया या सुधीर चौधरी जैसे एंकर टीवी पत्रकारिता को जितना गर्त में पहुंचाना था, पहुंचा चुके हैं.

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