कोविड-19: इस बार लीपापोती से काम नहीं चलेगा

भारत अपने जीडीपी का 1.28 प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है, जबकि चीन 3 प्रतिशत. हमें अपना एजेंडा बदलने की जरूरत है.

कोविड-19: इस बार लीपापोती से काम नहीं चलेगा
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जोर देकर कहा है कि उनके देश में कोविड-19 के कारण होने वाली मौतों की संख्या इतनी अधिक नहीं हैं. ऐसा उन्होंने उस दिन कहा जिस दिन इस वायरस के कारण अमेरिका में हुई मौतों की संख्या 1,60,000 को पार कर गई. हालांकि ट्रम्प कितने भी गलत क्यों न प्रतीत हों, उनकी बात में कुछ सच्चाई अवश्य है. यदि उनकी ही तरह आप भी अमेरिका में हो रही मौतों को कुल मामलों की रोशनी में देखें यानि बड़ी संख्या में हुए संक्रमण के मुकाबले मृत्यु दर पर ध्यान दें, तो यह सच है कि अमरीका की हालत कई अन्य देशों से बेहतर है.

अमेरिका में कोरोना पीड़ितों की मृत्यु दर 3.3 प्रतिशत के आसपास है जबकि यूके और इटली में यह 14 प्रतिशत और जर्मनी में लगभग 4 प्रतिशत है. इस लिहाज से वो सही भी है और पूरी तरह से गलत भी. अमेरिका में संक्रमण नियंत्रण से बाहर है. दुनिया की 4 प्रतिशत आबादी वाला देश में 22 प्रतिशत मौतें हो रही हैं. लेकिन अंततः बात इस पर आकर टिकती है कि आप किन बिंदुओं को चुनते हैं और किन आंकड़ों को प्रमुखता देते हैं. यही कारण है कि भारत सरकार कहती आ रही है कि हमारी हालत भी अधिक बुरी नहीं है. भारत में मृत्यु दर कम (2.1 प्रतिशत) तो है ही अमेरिका के मुकाबले काफी कम है.

इसका मतलब यह हुआ कि हमारे यहां संक्रमण की दर भले ही अधिक है लेकिन लोगों की उस हिसाब से मृत्यु नहीं हो रही है. लेकिन सरकार यह भी कहती है कि भारत एक बड़ा देश है और इसलिए हमारे यहां होने वाले संक्रमण एवं मौतों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक होगी ही होगी. यही कारण है कि भारत में रोजाना औसतन 80,000 नए मामले (3 सितंबर, 2020 के पहले हफ्ते तक) आने के बावजूद, दस लाख आबादी पर कुल 140 मामले ही हैं और हम यह कह सकते हैं कि दुनिया के अन्य देशों के बनिस्बत हमारे यहां हालात नियंत्रण में हैं. अमेरिका में दस लाख पर 14,500 मामले हैं, ब्रिटेन में 4,500 और सिंगापुर में भी दस लाख पर 9,200 मामले हैं.

इसका एक पहलु यह भी है कि हमारे यहां संख्या इसलिए कम हो सकती है क्योंकि भारत में टेस्टिंग की दर बढ़ी अवश्य है लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देशों के मुकाबले अब भी यह हमारी कुल आबादी की तुलना में नगण्य है. 6 अगस्त तक भारत ने प्रति हजार लोगों पर 16 परीक्षण किए जबकि अमेरिका ने 178 किए. यह स्पष्ट है कि हमारे देश के आकार और हमारी आर्थिक क्षमताओं को देखते हुए, अमेरिकी परीक्षण दर की बराबरी करना असंभव होगा.

इससे बी अहम बात यह है कि अपनी स्थिति को बेहतर दिखाने के लिए हमें अमेरिका के साथ तुलना करने की क्या आवश्यकता है. ऐसे में सवाल यह है कि हमसे क्या गलतियां हुई हैं और आगे क्या करना चाहिए. मेरा मानना है कि यही वह क्षेत्र है जिसमें भारत ने अमेरिका से बेहतर काम किया है.

हमारी सरकार ने शुरू से ही मास्क पहनने की आवश्यकता पर जोर दिया और कभी इस वायरस को कमतर करके नहीं आंका है. हमने दुनिया के अन्य हिस्सों में सफल रहे सुरक्षा नुस्खों का पालन करने की हरसंभव कोशिश की है. भारत ने मार्च के अंतिम सप्ताह में एक सख्त लॉकडाउन लगाया जिसकी हमें बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी है. इस लॉकडाउन की वजह से हमारे देश के सबसे गरीब तबके को जान माल की भारी हानि उठानी पड़ी है. जो भी संभव था हमने किया. लेकिन साथ ही यह भी सच है कि वायरस हमसे जीत चुका है या कम से कम फिलहाल तो जीत रहा है.

हमें हालात को समझने की आवश्यकता है और इस बार विषय बदलने और लीपापोती से काम नहीं चलेगा. इसका मतलब है कि हमें अपनी रणनीति का विश्लेषण करके अर्थव्यवस्था को फिर से चालू करने और करोड़ों गरीब जनता तक नगद मदद पहुंचाने की आवश्यकता है. देश में व्यापक संकट है, भूख है, बेरोजगारी है, चारों ओर अभाव का आलम है. इसकी भी लीपापोती नहीं की जा सकती. हमारे समक्ष शीर्ष पर जो एजेंडा है वह है सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और उससे भी महत्वपूर्ण, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के मुद्दे का समाधान.

हमारे सबसे सर्वोत्तम शहरों में भी गरीब लोग रहते हैं. ऐसा न होता तो हमारे गृहमंत्री सहित हमारे सभी उच्च अधिकारी जरूरत पड़ने पर निजी स्वास्थ्य सेवाओं की मदद क्यों लेते. संदेश स्पष्ट है, भले ही हम इन प्रणालियों को चलाते हों, लेकिन जब अपने खुद के स्वास्थ्य की बात आती है तो हम उन सरकारी प्रणालियों पर भरोसा नहीं करते.

इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि उन राज्यों, जिलों और गांवों में, जहां संक्रमण में इजाफा हो रहा है, वहां स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा न के बराबर है. यह भी एक तथ्य है कि सरकारी प्रणालियां अपनी क्षमता से कहीं अधिक बोझ उठाते-उठाते थक चुकी हैं. वायरस के जीतने के पीछे असली वजह यही है. डॉक्टर, नर्स, क्लीनर, नगर पालिका के अधिकारी, प्रयोगशाला तकनीशियन, पुलिस आदि सभी दिन-रात काम कर रहे हैं और ऐसा कई महीनों से चला आ रहा है.

सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में शीघ्र निवेश किए जाने की आवश्यकता है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि अब समय आ चुका है जब सरकार को इन एजेंसियों और संस्थानों के महत्व को स्वीकार करना चाहिए. हम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी भी करें और समय आने पर वे निजी सेवाओं से बेहतर प्रदर्शन करें, यह उम्मीद बेमानी है. अतः हमारी आगे की रणनीति ऐसी ही होनी चाहिए. हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और नगर पालिका प्रशासन में भारी निवेश करने की आवश्यकता है. हमें इस मामले में न केवल आवाज उठानी है बल्कि इसे पूरा भी करना है.

सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करने की हमारी वर्तमान दर न के बराबर है. जीडीपी का लगभग 1.28 प्रतिशत. हमारी तुलना में, चीन अपनी कहीं विशाल जीडीपी का लगभग 3 प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है और पिछले कई वर्षों से ऐसा करता आया है. हम इस एजेंडे को अब और नजरअंदाज नहीं कर सकते. कोविड-19 का मतलब है स्वास्थ्य को पहले नंबर पर रखना. इसका मतलब यह भी है कि हमें अपना पैसा वहां लगाना चाहिए जहां इसकी सर्वाधिक आवश्यकता हो. यह स्पष्ट है कि हमें बीमारियों को रोकने के लिए बहुत कुछ करना होगा. दूषित हवा, खराब भोजन एवं पानी और स्वच्छता की कमी के कारण होने वाली बीमारियों पर लगाम लगाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए. अब बात हमारे देश, हमारे स्वास्थ्य की है.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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