“आगे और बड़ा संकट हमारा इंतजार कर रहा है”
Shambhavi
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“आगे और बड़ा संकट हमारा इंतजार कर रहा है”

91 वर्षीय नॉम चोम्स्की जाने-माने अमेरिकी भाषाविद और राजनीतिक विश्लेषक हैं. पिछले दिनों उन्होंने डीआईईएम-25 टीवी के लिए स्रेको होर्वाट से बात की. इस बातचीत का एक अंश यहां प्रस्तुत हैं.

By नॉम चोम्स्की

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यह चौंकाने वाला है कि कोरोनावायरस के इस महत्वपूर्ण क्षण में डोनाल्ड ट्रम्प इसका नेतृत्व कर रहे हैं. कोरोनोवायरस काफी गंभीर है. लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि दो और बहुत बड़े खतरे हैं, जो मानव इतिहास में घटित होने वाली घटनाओं से कहीं ज्यादा बदतर हैं. एक परमाणु युद्ध का बढ़ता खतरा और दूसरा ग्लोबल वार्मिंग जैसा वैश्विक खतरा. ये दोनों खतरे बढ़ते जा रहे हैं.

कोरोनावायरस भयानक है और इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन हम इससे उबर जाएंगे. जबकि अन्य दो खतरों से उबर पाना नामुमकिन होगा. इनसे सब कुछ तहस-नहस हो जाएगा. अमेरिका के पास असीम ताकत है. यह एकमात्र ऐसा देश है, जो ईरान और क्यूबा जैसे अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाता है, तब बाकी के देश उसका अनुसरण करते हैं. यूरोप भी अमेरिका का अनुसरण करता है.

ये देश अमेरिकी प्रतिबंधों से पीड़ित हैं, लेकिन आज के वायरस संकट की सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि क्यूबा, यूरोप की मदद कर रहा है. जर्मनी ग्रीस की मदद नहीं कर सकता, लेकिन क्यूबा यूरोपीय देशों की मदद कर सकता है. भू-मध्यसागर क्षेत्र में हजारों प्रवासियों और शरणार्थियों की मौतों के मद्देनजर इस समय पश्चिम की सभ्यता का संकट विनाशकारी है.

युद्ध के वक्त की जाने वाली बयानबाजी का आज कुछ महत्व है. अगर हम इस संकट से निपटना चाहते हैं, तो हमें युद्ध के समय की जाने वाली लामबंदी की तरफ देखना होगा, उदाहरण के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के लिए अमेरिका की वित्तीय लामबंदी (वित्त जुटाने की विभिन्न योजनाएं). दूसरे विश्व युद्ध ने देश को कर्ज में डाल दिया था और अमेरिकी विनिर्माण को चौपट कर दिया था. लेकिन, वित्तीय लामबन्दी ने आगे विकास को आगे बढ़ाया. इस अल्पकालिक संकट को दूर करने के लिए हमें उसी मानसिकता की आवश्यकता है और अमीर देश ऐसा कर सकते हैं. एक सभ्य दुनिया में, अमीर देश, दूसरे देशों का गला घोंटने के बजाय सहायता देते हैं.

कोरोनावायरस संकट लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर सकता है कि हम किस तरह की दुनिया चाहते हैं.इस संकट की उत्पत्ति बाजार की विफलता और नव-आर्थिक नीतियों का भी नतीजा है, जिसने गहरी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया है और तीव्र किया है.

यह लंबे समय से पता था कि सार्स महामारी कुछ बदलाव के साथ कोरोनावायरस के रूप में आ सकती है. अमीर देश संभावित कोरोनावायरस के लिए टीका बनाने का काम कर सकते थे और कुछ संशोधनों के साथ आज ये हमारे पास उपलब्ध होता. बड़ी दवा कंपनियों की निरंकुशता जगजाहिर है. उन पर लगाम लगा पाना सरकारों के लिए कठिन है. ऐसे में लोगों को विनाश से बचाने के लिए एक वैक्सीन (टीका) खोजने की तुलना में नई बॉडी क्रीम बनाना अधिक लाभदायक है.

पोलियो का खतरा सरकारी संस्थान द्वारा बनाए गए टीके से खत्म हो गया. इसका कोई पेटेंट नहीं था.वही काम इस समय किया जा सकता था, लेकिन नवउदारवादी आफत ने इस काम को होने नहीं दिया.हमने ध्यान नहीं दियाअक्टूबर 2019 में ही अमेरिका को कोरोना जैसी संभावित महामारी की आशंका थी. हमने इस पर ध्यान नहीं दिया.

31 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को निमोनिया के बारे में सूचित किया और एक हफ्ते बाद चीनी वैज्ञानिकों ने इसे कोरोनावायरस के रूप में पहचाना. फिर इसकी जानकारी दुनिया को दी गई. इस इलाके के देशों जैसे, चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान ने कुछ-कुछ काम करना शुरू कर दिया और ऐसा लगता है कि संकट को बहुत अधिक बढ़ने से रोक लिया.

यूरोप में भी कुछ हद तक यही हुआ. जर्मनी के पास एक विश्वसनीय अस्पताल प्रणाली है और वह दूसरों की मदद किए बिना अपने हित में काम करने में सक्षम था. अन्य देशों ने इसे अनदेखा कर दिया. सबसे खराब रवैया रहा ब्रिटेन और अमेरिका का.

जब हम किसी तरह इस संकट से उबर जाएंगे, तब हमारे पास जो विकल्प मौजूद होगा वह अधिक अधिनायकवादी व क्रूर राज्यों की स्थापना के रूप में देखा जा सकता है या फिर पहले के मुकाबले अधिक मानवीय समाज का पुनर्निर्माण भी संभव है. एक ऐसा समाज जो निजी लाभ के बजाय मानवीय आवश्यकताओं को वरीयता दे. इस बात की संभावना है कि लोग संगठित होंगे, एक बहुत बेहतर दुनिया बनाने के लिए काम करेंगे. लेकिन वे भारी-भरकम समस्याओं का सामना तब भी करेंगे, जैसे हम आज परमाणु युद्ध की आशंका का सामना कर रहे हैं. पर्यावरणीय तबाही की समस्याएं भी होंगी, जिसकी अंतिम सीमा छूने के बाद शायद ही हम कभी उबर पाएं. इसलिए, जरूरी है कि इन समस्याओं को लेकर हम निर्णायक रूप से कार्य करें.

यह मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण है. न केवल कोरोनावायरस की वजह से, जो दुनिया की खामियों के बारे में जागरुकता ला रहा है, बल्कि पूरे सामाजिक-आर्थिक प्रणाली की गहरी त्रुटियों के बारे में भी हमें इस वक्त पता चल रहा है. अगर हमें जीवन जीने लायक भविष्य चाहिए तो मौजूदा हालात को बदलना ही होगा. कोरोना संकट चेतावनी का संकेत हो सकता है और आज इससे निपटने या इसके विस्फोट को रोकने के लिए एक सबक हो सकता है.

हमें इसकी जड़ों के बारे में भी सोचना है, जो हमें आगे और अधिक बदतर हाल में ले जा सकते हैं. आज 2 बिलियन से अधिक लोग क्वारंटाइन हैं. सामाजिक अलगाव का एक रूप वर्षों से मौजूद है और बहुत ही हानिकारक है. आज हम वास्तविक सामाजिक अलगाव की स्थिति में हैं. किसी भी तरह, फिर से सामाजिक बंधनों के निर्माण के जरिए इससे बाहर निकलना होगा, जो जरूरतमंदों की मदद कर सके. इसके लिए उनसे संपर्क करना, संगठन का विकास, विस्तारित विश्लेषण जैसे कार्य करने होंगे.

उन लोगों को कार्यशील और सक्रिय बनाने से पहले, भविष्य के लिए योजनाएं बनाना, लोगों को इंटरनेट युग में एक साथ लाना, उनके साथ शामिल होना, परामर्श करना, उन समस्याओं के जवाब जानने के लिए विचार-विमर्श करना, जिसका वे सामना करते हैं, और उन पर काम करना आवश्यक है.

यह आमने-सामने का संचार नहीं है, जो मनुष्य के लिए आवश्यक है. लेकिन इसे कुछ समय के लिए आप रोक सकते हैं. अंत में कहा जा सकता है कि अन्य तरीकों की तलाश करें और उसके साथ आगे बढ़ें. उन गतिविधियों का विस्तार और उन्हें गहरा करें. यह संभव है. यह आसान नहीं है. इंसानों ने अतीत में भी कई समस्याओं का सामना किया है.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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