उमर खालिद: ‘मेरी गिरफ्तारी के बाद मीडिया में मेरे खिलाफ झूठी खबरें प्लांट होंगी’
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उमर खालिद: ‘मेरी गिरफ्तारी के बाद मीडिया में मेरे खिलाफ झूठी खबरें प्लांट होंगी’

अपनी गिरफ्तारी से कुछ ही दिन पहले, एक्टिविस्ट उमर खालिद ने फरवरी के दंगों पर दिल्ली पुलिस की “कल्पना आधारित जांच" के सिलसिले में न्यूजलॉन्ड्री से बात की थी.

By आयुष तिवारी

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दिल्ली पुलिस की विशेष सेल ने 13 सितंबर की शाम उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया. उनको यूएपीए जैसे गंभीर अपराध की धाराओं के अंतर्गत अप्रैल में ही आरोपी बना दिया गया था.

उमर को इस तरह के खतरे का अंदेशा मार्च में ही हो चला था. मार्च की 2 तारीख को जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों को एक हफ्ता भी नहीं बीता था, भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने उनका एक भाषण ट्वीट किया था.

अमित मालवीय ने लिखा, "उमर खालिद, जिन पर राजद्रोह के आरोप हैं, ने 17 फरवरी को अमरावती में एक भाषण दिया जहां पर उसने एक मूलतः मुस्लिम भीड़ को (डोनल्ड) ट्रंप जब 24 तारीख को भारत आएं तब सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया. क्या दिल्ली में हुई हिंसा की योजना टुकड़े-टुकड़े गैंग के द्वारा हफ्तों पहले ही बना ली गई थी?"

33 वर्षीय उमर खालिद ने न्यूजलॉन्ड्री से अपनी गिरफ्तारी के चंद दिन पहले ही कहा, "दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही दंगों की जांच तथ्यों पर नहीं बल्कि काल्पनिक कहानी पर आधारित है. उनके दिमाग में एक तयशुदा कहानी है और वे तथ्यों को नज़रअंदाज कर उसे साबित करना चाहते हैं."

ख़ालिद जिनके ऊपर दंगों की पूर्व नियोजित साज़िश रचने का इल्ज़ाम लगाया गया है, पुलिस के द्वारा परेशान किए जाने के तथ्य से पहले ही समझौता कर चुके थे. वह कहते हैं, "अमित मालवीय के वीडियो और दक्षिणपंथी मीडिया के दुष्प्रचार के बाद मैं जान गया था कि पूछताछ तो होगी ही. मैंने तो अपने आप को मार्च और अप्रैल में ही गिरफ्तार होने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया था."

अमित मालवीय की ट्वीट के कुछ घंटे बाद ही तमाम दक्षिणपंथी मीडिया वेबसाइटों ने उस वीडियो और उसमें किए गए दावों को जमकर फैलाया.

2 मार्च को ऑप इंडिया नामक प्रोपगैंडा वेबसाइट पर एक हेड लाइन थी, "दिल्ली दंगा पूर्व नियोजित था? उमर खालिद लोगों को ट्रंप के दौरे के समय मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर आने के लिए भड़काते हुए देखा गया.” ज़ी न्यूज़ पर खबर चली- "राजद्रोह के आरोपी उमर ख़ालिद का भड़काऊ वीडियो वायरल."

5 मार्च को रिपब्लिक टीवी पर ख़ालिद के वीडियो को हर्ष मंदर के जामिया वक्तव्य के साथ मिलाकर एक प्राइमटाइम डिबेट इस शीर्षक के साथ की गई- "टेप में कैद: लॉबी ने हिंसा की साजिश कैसे की."

इंडिया टीवी ने पूछा कि क्या यह वीडियो दंगों और "टुकड़े टुकड़े गैंग" के बीच की कड़ी है. टाइम्स नाउ ने अमित मालवीय के आरोपों को जस का तस दिखाया और उन्होंने उमर खालिद का भाषण प्रसारित किया जिसमें नीचे "दिल्ली दंगों की टुकड़े-टुकड़े कड़ी" और "टुकड़े के पोस्टर बॉय पर नज़र" जैसे शब्दों वाला टिकर चल रहा था.

उमर खालिद ने इन दावों को निराधार बताते हुए कहा कि यह सब उनके खिलाफ एक सुनियोजित अभियान के तहत फैलाया जा रहा है.‌ उमर कहते हैं, "यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी आप निष्पक्ष रूप से पुष्टि कर सकते हैं. आप मेरे इस भाषण के या किसी और भाषण के वीडियो को देखें तो आप देखेंगे कि मैंने हमेशा शांतिपूर्ण तरीकों का ही समर्थन किया है."

अपने अमरावती के भाषण में उमर खालिद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर महात्मा गांधी के आदर्शों को मिट्टी में मिलाने का आरोप लगाया था. वीडियो में वह घोषणा करते हुए दिखाई देते हैं, "हम हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देंगे. हम नफरत का जवाब नफरत से नहीं देंगे. अगर वे नफरत फैलाते हैं तो हम उसके जवाब में प्रेम की बात करेंगे. अगर वह हम पर लाठियां बरसाते हैं तो हम तिरंगा उठाए रखेंगे."

अमित मालवीय की ट्वीट के 1 दिन बाद 3 मार्च को टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक एकतरफा रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें यह दावा किया गया कि उमर ख़ालिद अपने भाषण के कारण "जांच एजेंसियों की नज़र" में हैं. भाजपा के आईटी सेल मुखिया द्वारा फैलाए गए आधे-अधूरे वीडियो को जस का तस हिंदुस्तान टाइम्स और इंडिया टुडे मैगजीन ने भी बिना अपनी तरफ से कोई छानबीन किए छाप दिया.

महीने भर से थोड़ा अधिक समय बीत जाने के बाद 21 अप्रैल को उमर खालिद पर यूएपीए के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया गया. एफआईआर में इल्ज़ाम था कि उमर खालिद ने दिल्ली में हिंसा होने से पहले "भड़काऊ भाषण" दिया था.

31 जुलाई को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए ‘राजद्रोह विवाद’ से मशहूर हुए इस एक्टिविस्ट से पहली बार पूछताछ की. उमर खालिद ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "मुझे साफ तौर पर लगता है कि पुलिस पहले कुछ निष्कर्षों पर पहुंची और उसके बाद उन निष्कर्षों के हिसाब से जांच पड़ताल की. वह सीएए और एनआरसी के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों को बदनाम कर देना चाहते हैं जबकि हिंसा में प्रशासन और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है."

‘मेरे खिलाफ उनके पास सबूत नहीं इसीलिए सबूत गढ़े जाएंगे’

अगस्त के आखिर में जब न्यूज़लॉन्ड्री ने उमर खालिद से बात की तो वह अपने दूसरे प्रदर्शनकारी साथियों और सीएए के खिलाफ मुहिम में साथ देने वाले कुछ नेताओं के खिलाफ चल रही खबरों से विचलित थे. दंगे में आरोपी बहुत से लोगों के "इकबालिया बयानों" की खबरें आ रही थीं. यह खबरें अधिकतर ज़ी न्यूज़ पर दिल्ली पुलिस के हवाले से आती थीं. न्यूज़लॉन्ड्री पर पिछले हफ्ते प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ज़ी, द प्रिंट और एएनआई पर आम आदमी पार्टी के पूर्व सभासद ताहिर हुसैन, जामिया की छात्र मीरान हैदर और आसिफ इकबाल तन्हा तथा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुल्फिशा फातिमा के कानूनी तौर पर अमान्य बयानों को उनके इकबालिया बयान की तरह पेश किया गया.

पुलिस, मोदी सरकार के आलोचकों के खिलाफ जनता की राय बनाने के लिए काम कर रही है, ऐसा मानने वाले खालिद कहते हैं, "मेरे खिलाफ उनके पास सबूत नहीं इसीलिए सबूत गढ़े जाएंगे. मुझे विश्वास है कि मेरी गिरफ्तारी के बाद मीडिया में मेरे खिलाफ झूठी खबरें चलाई जाएंगी. झूठ और फरेब पैदा करना तो दिल्ली पुलिस का रोज़ का काम है."

सितंबर की शुरुआत में ख़ालिद ने आरोप लगाया कि स्पेशल सेल ने उनके एक जानकार‌ पर पहले से लिखे हुए झूठे शपथपत्र (एफिडेविट) पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया. दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव को लिखे गए पत्र में उमर कहते हैं, "मेरे खिलाफ कोई वाजिब मामला और सबूत न होते हुए भी, वे (दिल्ली पुलिस) आम जनता के दिमाग में झूठे बयान और झूठी कहानियां भर कर मेरे खिलाफ माहौल बना रहे हैं."

ज़ी न्यूज़ पर दिखाई गई बहुत सी रिपोर्टों में उमर खालिद पर तरह-तरह के इल्ज़ाम लगाए गए. एक तरफ, वह ताहिर हुसैन को कांच की बोतलें, पत्थर, पेट्रोल और तेज़ाब अपने खजूरी खास के घर की छत पर इकट्ठा करने के "निर्देश" दे रहे थे, दूसरी तरफ वह आसिफ इकबाल तन्हा को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फरवरी में होने वाले दौरे पर "चक्का जाम" करने को कह रहे थे. एक और कहानी में वह शाहीन बाग में स्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के ऑफिस में "हिंदुओं के खिलाफ जंग" पर विचार कर रहे थे, वहीं एक दूसरी कहानी में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र को दिलासा दे रहे थे कि उनके पीएफआई संपर्कों की वजह से दंगों के लिए "पैसों की कोई कमी" नहीं होगी.

खालिद इन आरोपों को सुनकर हंस पड़े, उन्होंने कहा, "मेरा पीएफआई से कभी कोई नाता नहीं रहा और न ही जैसा पुलिस कह रही है, मैं उनके संपर्क में था. पीएफआई तो बस एक हौवा है जो पुलिस की कहानियों में गढ़ा जाता है, पर वे उसके खिलाफ कभी कुछ करते नहीं. अगर इस संगठन के संपर्क में रहना अपराध है तो सरकार उस पर प्रतिबंध लगा दे?"

"आज, कल या साल भर बाद, मैं इससे बाहर आ ही जाऊंगा"

एक इतिहासकार बनने का सपना देखने वाले उमर खालिद को लगता है कि दंगों की पड़ताल सुनियोजित तरीके से केवल मुसलमानों को नहीं बल्कि छात्रों और प्रदर्शनकारियों को घेर रही है. वे कहते हैं, "प्रशासन में ऊपर कहीं से यह सोच आ रही है कि दिल्ली के सामाजिक और नागरिक संगठनों पर और आक्रामक हुआ जाए. ऐसा लगता है कि वह और गिरफ्तारियों के लिए तैयार हो रहे हैं."

वे इस आक्रमण को तीन श्रेणियों में रखते हैं, "सबसे निचली श्रेणी में उत्तर पूर्वी दिल्ली के नागरिक आते हैं. फिर उसके ऊपर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी जगहों के छात्र आते हैं. उसके ऊपर वे शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता या नागरिक हैं जो इस सरकार के सामने झुक नहीं रहे."

खालिद ने यह भी कहा कि अगर प्रदर्शन दिल्ली के बजाय किसी छोटे शहर में हुआ होता तो वह और बाकी लोग "इस मुहिम को इतनी दूर तक न ला पाते."

उमर खालिद को अपनी गिरफ्तारी जल्द ही होती दिख रही थी, "मुझे पहली बार निशाने पर नहीं लिया जा रहा. इसकी भी आशंका है कि मुझे ही नहीं कुछ और लोगों को भी कुछ साल जेल में बिताने पड़ें." उमर को यह भी लग रहा था कि उनकी जेल यात्रा लंबी भी हो सकती है क्योंकि पुलिस के पास उनके खिलाफ सबूत नहीं है इसलिए उनका कहना था कि, "प्रक्रिया ही सज़ा होगी."

इसके उदाहरण के तौर पर वह भीमा कोरेगांव मामले की बात करते हैं, "देखिए कि मुकदमा शुरू होने से पहले ही सुधा भारद्वाज के नाम की चिट्ठियां लीक कर दी गईं. उन्हें कभी अदालत में पेश नहीं किया गया पर वह अभी भी हिरासत में हैं. लोग अलग राजनैतिक मत रखने की वजह से सलाखों के पीछे हैं. हम बहुसंख्यकवाद के एक गहरे गड्ढे में गिर रहे हैं."

उमर खालिद की गिरफ़्तारी, दिल्ली पुलिस को एफआईआर 59/2020 में आरोप पत्र दाखिल करने की आखिरी तारीख से कुछ ही दिन पहले हुई, जो दंगों की कथित साजिश से जुड़ी है. उनकी नजर में इस मामले के चारों ओर किए जा रहे दावे "घिनौने" और "राजनीतिक रूप से प्रेरित" हैं.

प्रशासन और पुलिस के खिलाफ उनके प्रखर शब्दों को देखते हुए मैंने उनसे पूछा कि क्या इस अंधकार में उन्हें कोई प्रकाश की किरण दिखाई पड़ती है? "मैं इससे बाहर आने के बाद भी बोलता रहूंगा. आज, कल या साल भर बाद, मैं इससे बाहर आ ही जाऊंगा."

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