एनएल चर्चा 134: संसद सत्र से अपेक्षा और अन्य घटनाएं
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एनएल चर्चा 134: संसद सत्र से अपेक्षा और अन्य घटनाएं

हिंदी पॉडकास्ट जहां हम हफ़्ते भर के बवालों और सवालों पर चर्चा करते हैं.

By न्यूज़लॉन्ड्री टीम

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एनएल चर्चा का 134वां अंक संसद के मानसून सत्र में कोविड-19 के मद्देनजर किए गए बदलावों और सरकार द्वारा अध्यादेशों के जरिए लागू किए गए नए कानूनों पर केंद्रित रहा. इस दौरान सरकार की कृषि नीति से नाराज़ होकर एनडीए में भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी अकाली दल ने विरोध शुरू कर दिया है, अकाली दल के कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफ़ा, भारत- चीन के बिगड़ते रिश्ते, और कृषि नीतियों के दीर्घकालिक प्रभाव का जिक्र भी हुआ.

इस बार की चर्चा में खास मेहमान साकेत सूर्या जुड़े, जिनका संबंध पीआरएस लेजिस्लेटिव से है. यह संस्था, संसद की गतिविधियों और नीतियों पर शोध और विश्लेषण का काम करती है. न्यूज़लॉन्ड्री के सह संपादक शार्दुल कात्यान भी चर्चा में शामिल हुए. इस अंक का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया.

मेघनाद ने संसद सत्र के विषय पर साकेत सूर्या से सवाल के साथ चर्चा की शुरुआत की. उन्होंने पूछा, “इस बार के संसद सत्र और अन्य सत्रों में क्या अंतर आया हैं, खासतौर पर कोविड महामारी फैलने के बाद से. संसद किस प्रकार अपने कार्यों को अंजाम दे रही है?”

इस पर साकेत कहते हैं, "कोविड-19 की वजह से संसद के दोनों ही सदनों में, फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करने की जरूरत महसूस की गई है. और जो भी कार्यवाही होगी उसमें, लोकसभा और राज्यसभा साथ-साथ नहीं चलेंगी. राज्यसभा का समय सुबह 9 बजे से दिन के एक बजे तक और लोकसभा दिन के 3 बजे से शाम के 7 बजे तक चल रही है. आमतौर पर दोनों सदन 6 घंटे काम करते हैं जो अब घट कर 4 घंटे रह गया है."

साकेत आगे जोड़ते हैं, "समय की कमी को देखते हुए प्रश्न काल नहीं होगा, शून्यकाल जो आमतौर पर एक घंटे का होता था उसको भी कम किया गया है. इसके अलावा सत्ता में जो गैर सरकारी संगठनों के कार्य होते हैं उनके लिए अब समय नहीं दिया जाएगा. पहले संसद पांच दिन चलाती थी. जहां शनिवार और रविवार को छुट्टियां होती थी, परंतु अब हफ़्ते के सभी दिन लगातार संसद में बिना किसी ब्रेक के कार्यवाही चलेगी. मैं एक बात बताना चाहूंगा कि यह जो सत्र है वह हमारे बजट सत्र के 175 दिनों बाद आरंभ हो रहा है. संसद के इतिहास में किसी भी बजट और मॉनसून सत्र के बीच में यह सबसे बड़ा ब्रेक है."

मेघनाद फिर से सवाल करते हुए कहते हैं कि इन सत्र के अंतराल में 11 आर्डिनेंस (अध्यादेश) को हरी झंडी मिली. आप श्रोताओं को यह भी बता दीजिए कि ऑर्डिनेंस होते क्या हैं और कौन-कौन से महत्वपूर्ण अध्यादेश सरकार ने इस बीच पास कर दिए? इसमें शार्दुल ने भी अपनी बात जोड़ते हुए पूछा कि क्या इससे भी बड़ा कोई अंतराल, दो सत्रों के बीच हमारे इतिहास ने देखा है?

इस पर साकेत कहते हैं कि, "संविधान में व्यवस्था है कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए. तो यह 175 दिन उसके करीब-करीब है, इसके अलावा कोई उदाहरण मेरे तो ध्यान में नहीं है."

मेघनाद के सवाल का जवाब देते हुए साकेत आगे बताते हैं, "ऑर्डिनेंस को हम देखे तो शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत है जिसमें कार्यपालिका का काम क़ानूनों को लागू करना, विधायिका का काम उन्हें बनाना, और न्यायपालिका का कार्य उनकी विवेचना करना होता है. ऑर्डिनेंस अस्थाई कानून रचना है, जिसे बनाने का हक कार्यपालिका को है. जब संसद नहीं चल रही हो तब एक्जीक्यूटिव यानी सेंट्रल गवर्मेंट इन्हें बनाने का अधिकार रखती है. तो कोविड की वजह से बजट सत्र और मॉनसून सत्र में आए अंतराल के बीच कुल 11 ऑर्डिनेंस सरकार ने जारी किए. कुछ कोविड से जुड़े हैं, जैसे कि टैक्स फाइल करने की अंतिम तिथि में छूट और दो अध्यादेश संसद में भत्ते और वेतन में कटौती करने के लिए हैं. कुछ ऐसा है जिनका लंबे टर्म का प्रभाव है. तीन ऐसे है जिनका संबंध कृषि नीतियों से जुड़ा है जैसे कि एग्रीक्चरल मार्केटिंग और कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग वगैरह (यह वही अध्यादेश है जिस पर हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफ़ा दे दिया). इसके अलावा बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट में भी बदलाव किया गया है. तो इमरजेंसी के हालात में जैसे महामारी की चुनौतियों को देखते हुए इनका प्रयोग हुआ है."

यहां पर शार्दुल चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं, "मैं संसदीय कार्यवाही का ज्ञाता नहीं हूं, लेकिन मैंने एक चीज नोटिस की है कि सरकार जवाब देने से बहुत कतरा रही है, और जब वह जवाब देती है तो अपनी ही बात से पलटती हुई दिखाई देती है. सरकार जो बात ऑन रिकॉर्ड कहती है, चाहे वह लोकसभा हो या राज्यसभा, उसे आधार बना कर हमारे पास कोई कानूनी प्रक्रिया है जिससे हम उनसे पूछ सकें कि आपके दो बयानों में इतना अंतर क्यों है? जब आप पॉलिसी घोषित करते हैं तो वह कुछ होती है और फिर जब कागज पर आती है तो कुछ और होती है.”

शार्दूल के इस प्रश्न पर कुछ दिलचस्प राय सामने आई. इसे जानने के लिए और बाकी विषयों के लिए पूरी चर्चा सुनें और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करना न भूलें.

चर्चा के दौरान जिक्र हुए तथ्य-

एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी (एपीएमसी)

सांसदों द्वारा संसद में मतदान की विधि

संसद में सवाल करने की विधि-प्रक्रिया

पत्रकारों की राय, क्या देखा पढ़ा और सुना जाए.

मेघनाद

अ टेकी एंड अ न्यूरोसाइंटिस्ट रिव्यु ‘द सोशल डिलेमा’

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शार्दूल

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