मनरेगा भाग- 2 "कितना हकीकत कितना फ़साना"

विभिन्न राज्य सरकारें ढोल पिट रही हैं कि उन्होंने मनरेगा कार्यों के जरिये लोगों की समस्याओं का समाधान कर दिया है.

मनरेगा भाग- 2 "कितना हकीकत कितना फ़साना"

मनरेगा रिपोर्ट के प्रथम हिस्से में हमने देखा था कि मनरेगा कार्यों ने कैसे हमारी लोक संस्कृति, पारिस्थितिकी और सामुहिकता के दर्शन को बिगाड़ा है. मनरेगा के इस हिस्से में हम सरकार के उन दावों की पड़ताल करेंगे जो कहते हैं कि मनरेगा ने महिला सशक्तिकरण, पिछड़ी जातियों के सामाजिक उत्थान, पूंजी तथा अवसंरचना निर्माण करने में अहम भूमिका निभाई है. अंत मे हम उन आरोपों की भी गहराई से पड़ताल करेंगे जो कहते हैं कि हमने अपनी असीम सम्भवनाओं को खो दिया है.

वर्तमान लोकसभा सत्र में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि लॉकडाउन के कारण मनरेगा में इस वर्ष 22.49 करोड़ लोगों ने रोजगार मांगा है जो पिछले वर्ष के मुकाबले 38.79% ज्यादा है. पिछले वर्ष काम मांगने वालों की संख्या 16.2 करोड़ थी. उन्होंने आगे कहा कि इस वर्ष 8.29 करोड़ लोगों को मनरेगा से रोजगार दिया जा चुका है. केंद्र सरकार ने मनरेगा का इस वर्ष 2020- 2021 का बजट 61,500 करोड़ बनाया था. केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने Covid-19 में जारी आर्थिक पैकेज में मनरेगा को 40 हज़ार करोड़ की अतिरिक्त मदद दी है. जिससे ये आंकड़ा एक लाख करोड़ के पार जा सका है.

कुछ राज्यों से तो 200 दिन के रोजगार की जोर- शोर से मांग उठाई जा रही है. इसमे राजस्थान सबसे मुखर है. विभिन्न राज्य सरकारें ढोल पिट रही हैं कि उन्होंने मनरेगा कार्यों के जरिये लोगों की समस्याओं का समाधान कर दिया है. ये बात सही है कि कोविड 19 के समय मनरेगा के जरिये लोगों के हाथ मे कुछ रुपया आ सका जिससे उनको कुछ सहुलियत मिली लेकिन ये कहना कि इससे सभी समस्याओं का समाधान हो गया है ये सही नहीं हैं. सवाल यहां ये है की क्या केवल रुपये देना ही मनरेगा का उद्देश्य है? क्या समस्या मात्र इतनी ही थी? यदि ऐसा था तो फिर इसका सबसे सरल और भरोसेमन्द तरीका तो कैश ट्रांसफर हैं. किन्तु सरकार ने ऐसा तो नहीं किया. उसने तो रुपये सीधे ट्रांसफर नहीं किये.

मतलब समस्या कुछ और थी, दावा कुछ ओर है. विभिन्न राज्य सरकारों का दावा है कि उन्होंने मनरेगा कार्यों के जरिये न केवल लोगों को रोजगार दिया बल्कि ग्रामीण जीवन का उत्थान किया है. इसके साथ महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय, पारिस्थितिकी प्रबन्धन, अवसंरचना विकास और कौशल निर्माण के जरिये मानव संसाधन का प्रबन्धन किया है. दूसरी तरफ पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकताओं, लोक संस्कृति के संरक्षकों ओर नीति निर्माताओं के एक धड़े का कहना है कि मनरेगा ने समाज मे इतने गड्ढे कर दिए हैं जिनको भरने में हमारी न जाने कितनी पीढियां खप जायेंगी. मनरेगा ने हमारी पारिस्थितिकी, लोक कला एवं संस्कृति, सामुहिकता के दर्शन को समाप्त किया है और भृष्टाचार के नये- नये रूपों को हमारे आचरण का हिस्सा बनाया है.

हम राज्य सरकारों के एक- एक दावे की पड़ताल करते हैं ओर देखते हैं कि ये दावे किस हद तक सही हैं? क्या वाक्य में ही मनरेगा ने ग्रामीण जीवन को बदला है? क्या मनरेगा ने सामाजिक न्याय और शसक्तीकरण के सपने को बल दिया है? क्या मनरेगा ने पारिस्थितिकी प्रबन्धन और मानव संसाधन का विकास किया है?

मनरेगा के जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रेदेश राज्य ने 78 लाख परिवारों के 95 लाख व्यक्तियों को मनरेगा में कार्य दिया है. राजस्थान सरकार का दावा है कि कोरोना के दौरान उन्होंने 64.8 लाख परिवारों के 89.91 लाख व्यक्तियों को रोजगार दिया है. गुजरात सरकार की रिपोर्ट बताती है कि उन्होंने 9.43 लाख परिवार के 16 लाख लोगों को रोजगार दिया है जबकि हरियाणा सरकार के जारी आंकड़ों के अनुसार उन्होंने 3.25 लाख परिवारों के 4.59 लाख व्यक्तियों को काम दिया है.

मनरेगा का जहां पर कार्य चलता है उसे मनरेगा साइट कहा जाता है. एक मनरेगा साइट पर करीब 60-70 या 80 लोग काम करते हैं. इन लोगों को मनरेगा श्रमिक कहा जाता है. प्रत्येक 40 मनरेगा श्रमिक पर एक मनरेगा 'मेट' नियुक्त किया जाता है. मनरेगा मेट का काम मनरेगा साइट पर छायां ओर पीने के पानी की व्यवस्था देखना. सभी मजदूरों को दिए गए कार्य का बराबर बंटवारा करना मान लो की जोहड़/तालाब की छंटाई करनी है तो सभी मनरेगा श्रमिकों को बराबर गड्ढे नांपकर देना और मस्ट रोल (मनरेगा कार्य की पुस्तक) में उनकी हाजिरी लगाना.

मनरेगा मेट बनने के लिए यदि कोई महिला दलित या आदिवासी है तो उसे पांचवीं पास, सामान्य और अन्य पिछड़े वर्ग की महिला को आठवीं पास होना अनिवार्य है जबकि पुरुष के लिए 10वीं पास होना आवश्यक है. राजस्थान सरकार के आंकड़ों के अनुसार 89.91 लाख लोगों ने मनरेगा में कार्य किया. हमें ये पता है कि 40 लोगों पर एक मनरेगा मेट नियुक्त होता है. इस लिहाज से अकेले राजस्थान में करीब 2.20 लाख मेट नियुक्त हुए. उत्तर प्रेदेश के जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार 95 लाख लोगों ने मनरेगा श्रमिक के रूप में कार्य किया. इस लिहाज से वहां करीब 2.37 लाख मनरेगा मेट बने. गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार वहां 16 लाख मजदूरों में करीब 40 हज़ार मेट बने और हरियाणा सरकार के आंकड़ों के अनुसार 4.59 लाख मनरेगा मजदूरों में करीब 11 हज़ार मेट नियुक्त हुए.

सरकारों ने कहा कि मनरेगा से महिला सशक्तिकरण हुआ है किन्तु किसी भी राज्य सरकार ने अपने आंकड़ों में ये नहीं बताया कि आखिर उनके यहां कितनी महिलाओं को मनरेगा मेट के रूप में कार्य करने दिया? सरकारों ने ये तो कहा कि महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मनरेगा में कार्य किया है. लेकिन वे ये नहीं बताते की उस कंधे से कंधा मिलाने में क्या मजदूर ही बनाकर रखा या मेट के रूप में नेतृत्व करने का मौका भी दिया? राजस्थान सरकार ये नहीं बताती की उसके यहां 2.20 लाख मनरेगा मेट में कितनी महिलाएं मेट बन सकी? क्या 30 फीसदी महिलाओं को भी मेट बनाया गया? 30 फीसदी छोड़िये. क्या 10 फ़ीसदी महिलाओं को भी मनरेगा मेट के रूप में नियुक्त किया? उत्तर प्रेदेश में नियुक्त 2.30 लाख मनरेगा मेट में कितनी महिलाओं को मेट की भूमिका दी? क्या 10 हज़ार महिलाओं को भी मेट बनाया? ऐसे हो गुजरात और हरियाणा में 40 हज़ार और 11 हज़ार मेट में कितनी महिलाओं को मेट की भूमिका मिली?

यहां एक बात ध्यान रखने की है. हम महिला को महिला ही मान रहे हैं. उसे दलित, आदिवासी या अन्य पिछड़े वर्ग में नहीं जोड़ रहे हैं. यदि दलित महिला, आदिवासी महिला, अन्य पिछड़े वर्ग की महिला के मनरेगा मेट के रूप में भूमिका को देखना हो तो शायद ये आंकड़ा महज 2-4 महिलाों तक सीमित होकर रह जाये. राजस्थान समग्र सेवा संघ के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गोस्वामी इस विषय पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हम महिला को क्या मानते हैं? जो महिला चिलचिलाती धूप में मनरेगा में गड्ढे खोद सकती है. दिसम्बर और जनवरी के महीनों में खेत मे पानी दे सकती है. क्या वो महिला गड्ढे नापकर नहीं दे सकती? जो महिला घर- परिवार, पशुधन और खेत-खलिहान को संभाल सकती हैं. क्या वो मनरेगा साइट पर पानी और छायां की व्यवस्था नहीं कर सकतीं?

अनिल आगे कहते हैं कि हम कितने खोखले लोग हैं. हमारे अधिकांश दावे फर्जी रहते हैं. हम लोग संसद में महिलाओं की 33 फ़ीसदी आरक्षण की मांग करते हैं वहीं दूसरी तरफ हम उनको इतना छोटा सा भी नेतृत्व नहीं देना चाहते. हम उनसे देश चलाने की उम्मीद करते हैं और यहां उनसे मनरेगा में हाजिरी लगवाने और काम बांटने का अधिकार भी नहीं दे रहे. हमने इस सवाल का उत्तर जानने के लिए राजस्थान में मनरेगा के कमिश्नर पीसी किशन से सम्पर्क किया. उन्होंने कुछ समय का हवाला दिया. उसके कुछ समय बाद फिर फ़ोन किया किन्तु उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. उनको व्हाट्सएप मैसेज भी किया लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया.

राजस्थान में आदिवासियों के जीवन को संहिताबद्ध करने में लगी फोटोग्राफर और कार्टूनिस्ट अंजली का कहना है कि हमने बहुत बड़ा मौका गवां दिया. मनरेगा मेट वो कड़ी है जहां महिला को नेतृत्व करने का मौका दिया जा सकता था. उसके साहस को उभारा जा सकता था. इससे समाज में सहज तरीके से उसकी भूमिका में बदलाव आता. अंजली आगे कहती हैं कि सशक्तिकरण अचानक से नहीं आ जायेगा. इसकी प्रक्रिया इसी तरीके से चलेगी. राजस्थान राज्य में इस प्रक्रिया की ज्यादा आवश्यकता है. अब हमें ये तय करना होगा कि हमें केवल खाली पुलाव ही पकाने हैं या कोई ठोस कार्य करना है?

विभिन्न राज्य सरकारों का दावा है कि मनरेगा ने सामाजिक न्याय व उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसके जरिये सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े व गरीब लोगों के उत्थान में मदद मिली है. सुनने में तो ये दावा भी पहले वाले दावे जैसा ही लगता है. शायद उस दावे से ज्यादा गहराई को समेटे हुए है. जब इस दावे की पड़ताल करते हैं तो कुछ और ही दिखलाई पड़ता है. निसंदेह उत्थान तो हुआ है, किंतु किसका हुआ है? क्या पेंशनधारियों, सरकारी मुलाजिमो, हॉलसेल के कारोबारी और बड़े - बड़े खेतों के मालिकों को उत्थान की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय व उत्थान के नाम पर चल तो यही रहा है. इस विषय को कुछ उदाहरणों के जरिये समझने का प्रयास करते हैं. राजस्थान के बूंदी ज़िलें में पेंच की बावड़ी ग्राम पंचायत के अंतर्गत मनरेगा का कार्य सम्पन्न हुआ है. इस पंचायत के अंतर्गत दलित, आदिवासी, घुमन्तू , गुर्जर व ब्राह्मण समाज के लोग रहते हैं.

इस पंचायत में कलन्दर/मदारी समुदाय के करीब 50 लोग रहते हैं. जो पहले बन्दर- भालू का खेल तमाशा दिखाकर अपना घर परिवार चलाते थे. इनके पास कोई जोतने की जमीन नहीं हैं और न ही कोई सरकारी नौकरी. इसमें मात्र तीन लोगों को मनरेगा के अंतर्गत रोजगार दिया गया वो भी मात्र एक मस्ट रोल का (13 दिन). कलन्दर/मदारी बस्ती में रहने वाले नियाज मदारी का कहना है कि हम ठहरे गरीब और कमजोर लोग ऊपर से हम मुसलमान हैं. यदि जरा भी कुछ बोलते हैं जो गांव वाले हमें यहां से बाहर निकाल देंगे. हमारे टोलें में केवल तीन लोगों का काम दिया है. उसमे भी एक व्यक्ति को दो मस्ट रोल जबकि दो लोगों को मात्र एक मस्ट रोल (13 दिन) का काम मिला है.

पेंच की बावड़ी के अंतर्गत ही मुख्य सड़क गांव के पास, इंस्टुला रोड़ किनारे 7-8 केलु की झोंपड़ी लगी हैं. यहां बैरागी समुदाय के करीब 60-70 लोग रहते हैं. जिनका मुख्य पेशा भिक्षाटन हैं. न घर- मकान और न ही कोई जमीन- जायदाद. यहां भी वही समस्या नजर आई. एक ऐसे ही केलु कि झोंपड़ी के बाहर बैठी महिला गीले कपड़े सूखा रही थी. रात में बारिश आई थी. उसी में सब कपड़े भींग गए. महिला गीता बैरागी, उम्र करीब 55 से 60 वर्ष रही होगी. हमें बताती हैं कि हम तो पीढ़ियों से ही आटा मांगने का काम करते आ रहे हैं. इस बीमारी के बाद बाहर गांवों में आटा मांगने नहीं जा सकते. हम तो घर-घर जाते हैं लेकिन अब गांव में लोग घूमने नहीं देते.

गीता आगे कहती हैं कि हमारे पास सब कागज पत्र हैं. हम तो सदियों से यही रह रहे हैं. हमारे एक जॉब कार्ड पर केवल एक व्यक्ति को काम दिया गया है वो भी मात्र एक मिस्ट रोल (13 दिन). हमारे पास जो कुछ है वो आपके सामने है. इंस्टुला रोड़ के करीब 600 मीटर दूर लक्ष्मी विलास है जहां भोपा समुदाय की बस्ती है. बस्ती में करीब 10-15 फटे पुराने तम्बू लगे हुए हैं. ये छह परिवार की बस्ती है. जहां करीब 80-90 लोग रहते हैं. भोपा लोग स्टोरी टेलिंग का काम करते रहे हैं. एक तम्बू के बाहर एक अधेड़ उम्र की महिला तम्बू की सिलाई कर रही है. उसका नाम रत्नी देवी है, उम्र करीब 60 वर्ष होगी. उसका सभी सामान बारिश में भीग गया है. बात करने पर वो बिखर पड़ती है.

रत्नी देवी कहती हैं कि गिन्डकों (कुत्तों) की इज्जत हो तो हमारी इज्जत हो. बारिश में सब कुछ भींग गया. एक भी ऐसा गुदड़ा ( सोने/बिछाने का कपड़ा) नहीं हैं जिसे हम उपयोग में ले सकें. तिरपाल उड़- उड़कर चला गया. कब तक उसे पकड़कर बैठें. हमारे टोलें से केवल एक व्यक्ति को रोजगार दिया है. वो भी मात्र 13 दिन का. गरीब की कोई सुनवाई नहीं होती. हमसे अंगूठा लगवा लेते हैं लेकिन कुछ मिलता नहीं हैं. लक्ष्मी विलास से करीब 600 मीटर की दूरी पर रोड किनारे 15-20 तम्बू लगे हुए हैं. ये कालबेलिया समुदाय की बस्ती हैं. इस बस्ती में करीब 90-100 लोग रहते हैं. दूर छोर पर, एक तम्बू के पास चूल्हा जल रहा है. चूल्हे पर मिट्टी की हंडिया में एक बुजर्ग व्यक्ति खाना पका रहे है. नजदीक फाइटर मुर्गा घूम रहा है.

उस बुजर्ग व्यक्ति ने अपना नाम अमरनाथ बताया, उसकी उम्र करीब 65-70 वर्ष रही होगी. अमरनाथ ने बताया कि रात में बारिश आई थी तो सब कुछ भीग गया. ये चूल्हा भी भीग गया था. बड़ी मुश्किल से इसे जलाया है. जल्दी से खाना बना लेते हैं. यदि फिर बारिश का गई तो भूखे ही सोना पड़ेगा. हमारे पास लाइट नहीं है. दिन के उजाले में ही सब काम करना पड़ता है. चिमनी से क्या- क्या काम करें? अमरनाथ आगे कहते हैं कि हमारे बस्ती से मनरेगा में केवल तीन लोगों को काम दिया है. वो भी केवल 13 दिन का. हमारे पास तो सब कागजपत्र हैं लेकिन हमें काम नहीं मिलता जो अमीर हैं. जिनके पास बड़े- बड़े मकान हैं उनको तो काम मिलता है लेकिन हमें नहीं मिलता.

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अब जरा उसी ग्राम पंचायत में काम की स्थिति को देखते हैं. अमर सिंह (सुरक्षा कारणों से नाम बदल दिया) हमें बताते हैं कि ये किस तरह का न्याय है? हमारे यहां एक डॉक्टर हैं. जिनका नाम है विपुल बंगाली. इनका क्लीनिक भी हैं. विपुल बंगाली की पत्नी को मनरेगा का काम दिया है. प्रहलाद बैरवा मिलिट्री से रिटायर हैं. उनको पेंशन मिलती हैं. उनके पास कई ट्रक भी हैं. उनकी पत्नी को रोजगार दिया है. यहां पर हॉलसेल का बड़ा कारोबारी है. उसके बच्चों को मनरेगा का काम मिल रहा है. जो यहां का जागीदार (बड़ी भूमि का मालिक) है. उसे काम मिल रहा है. वो भी तीन- तीन मिस्ट रोल. क्या इनको काम की जरूरत थी?

पेंच की बावड़ी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले गांव भीमगंज में अलग ही खेल चल रहा है. यहां के निवासी राजू जो मिलिट्री में हैं उनकी पत्नी सम्पत को मनरेगा में काम मिला है. रिटायर्ड फौजी की पत्नी अंजना को काम मिला है. बंशी मीणा की पत्नी काली को काम मिला है जो एक तरफ आंगनबाड़ी में कार्यरत हैं तो दूसरी तरफ मनरेगा में हाजिरी चल रही हैं. ऐसे कितने ही और नाम इस सूची में हैं. ये सब उदाहरण महज एक ग्राम पंचायत में उपलब्ध हैं. राजस्थान के किसी भी तहसील, ब्लॉक में चले जाएं हर स्थान पर यही स्थिति है. इन उदाहरणों को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सामाजिक न्याय तो मिला है किन्तु किसको मिला।

कलन्दर नियाज बताते हैं कि ऐसा नहीं हैं कि स्थानीय प्रशासन को इसकी खबर नहीं है. इसकी लिखित शिकायत की जा चुकी है. कलेक्टर तक जाकर आ गए. जब ग्राम सचिव से लेकर बीडीओ और एसडीएम सब मिले रहते हैं. शिकायत करके हम लोग बेवकूफ ही बनते हैं. शिकायत पर कुछ होता ही नहीं हैं. ये ऑनलाइन शिकायत प्रणाली सब खोखली बातें हैं. कहीं भी शिकायत कर लो जांच तो उन्हीं के पास आती है जिनके खिलाफ शिकायत करी है. मनरेगा की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में मनरेगा के अंतर्गत 2720.14 लाख व्यक्तिगत कार्य दिवस सम्पन्न हुए हैं. जिसका 20.72% हिस्सा अनुसूचित जाति व 23.46% हिस्सा अनुसूचित जनजाति के लोगों के कार्य दिवस के रूप में रहा है. उत्तर प्रेदेश में 2318.05 लाख कार्य दिवस बने हैं. इनका 31.23% हिस्सा अनुसूचित जाति व 0.95% हिस्सा अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों के कार्य दिवस के रूप में रहा हैं.

गुजरात राज्य में व्यक्तिगत कार्य दिवस हुए 319.51 लाख जिनका 5.73% हिस्सा अनुसूचित जाति व 37.66% हिस्सा अनुसूचित जनजाति के लोगों का रहा है. हरियाणा में 81.85 लाख व्यक्तिगत कार्य दिवस बने हैं जिनमे अनुसूचित जाति का 41.51% जबकि अनुसूचित जनजाति के 0.02% लोगों के ही कार्यदिवस बने। ये रिपोर्ट यह तो बता रही है कि कुल कार्य दिवस में अनुसूचित जनजाति के लोगों को कितने दिन कार्य मिला है लेकिन ये रिपोर्ट ये नहीं बताती की अनुसूचित जनजाति में किस जाति को अधिकांश दिन ये काम मिला है? राजस्थान में आदिवासी के नाम पर मीणा जाति ने अधिकांश काम किया है जबकि अन्य आदिवासी जतियां जो ज्यादा पिछड़ी हुई हैं जैसे कि भील, सहरिया और डामोर इत्यादि वे पांच फ़ीसदी भी नहीं हैं? ऐसे ही अनुसूचित जाति में किसको लाभ मिला है? घुमन्तू समुदाय इसी वर्ग में आते हैं. ये लोग आदिवासियों से भी ज्यादा पिछड़े हुए हैं. इनको नाममात्र का रोजगार मिला है. राजस्थान सरकार ने बड़ा गजब का खेला किया है.

राजस्थान सरकार के मनरेगा कमिश्नर पीसी किशन ने एक प्रावधान लागू किया था कि घुमन्तू समुदाय सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं इसलिए मनरेगा के कार्यों के मूल्यांकन में ये अलग से देखा जाएगा कि घुमन्तू लोगों को कितना काम मिला है मनरेगा के कार्यों के दौरान इस बिंदु को छुपा दिया गया क्योंकि इससे हकीकत सामने आ जाती. इसलिए सरकार ने बड़ी ही चालाकी से उस बिंदु को रिपोर्ट से छुपा दिया. इन तथ्यों को जांचने हेतु, उन सवालों के जवाब हेतु हमने मनरेगा कमिश्नर पीसी किशन को फ़ोन किया. उनको व्हाट्सअप मैसेज भी किया लेकिन उन्होंने कहा कि वह व्यस्त हैं . उसके बाद मनरेगा के प्रिंसिपल सेक्रेटरी राजेश्वर सिंह से बात हुई, उन्होंने कहा कि इन सवालों के जवाब पीसी किशन देंगे. हमने पीसी किशन को फ़ोन किया किन्तु पीसी किशन ने सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

केवल यही नहीं, ये रिपोर्ट ये तो बताती है कि एक परिवार को एवरेज कितने दिनों का काम मिला है किन्तु ये रिपोर्ट ये नहीं बताती की कितने लोगों को मात्र एक ही मिस्ट रोल का काम मिला? राजस्थान सरकार की मनरेगा रिपोर्ट के अनुसार 41.88 दिन/प्रति हॉउस होल्ड काम मिला. मतलब मनरेगा के अंतर्गत कार्यरत परिवार को औसतन 41.88 दिन का काम मिला है. हम ये भी जानते हैं की अधिकांश लोग वो हैं जिनको 15 दिन का भी काम नहीं मिला. किन्तु इस

रिपोर्ट से ये आंकड़ा गायब है. उत्तर प्रेदेश सरकार के अनुसार वहां पर प्रति परिवार 29.47 दिन काम किया है. किन्तु यहां भी ये नहीं बताया कि कितने परिवार ऐसे हैं जिनको 15 दिन से भी कम काम मिला है.

मनरेगा में हक़ीक़त कुछ और है जबकि अधिकारी और नेता उसका फ़साना कुछ और बना रहे हैं. आज जरूरत है तो अपनी आंखें और कान खुले रखने की. मनरेगा के भाग-3 में हम आंकड़ों की बाजीगरी, उन असीम सम्भवनाओं के मरने, भ्रष्टाचार के रंग- बिरंगे रूपों तथा अधिकारियों की भूमिका को रेखांकित करेंगे.

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