विश्वविद्यालय परिसरों में ये कौन लोग हैं जिनका नाम हिंसक घटनाओं से जोड़ा जा रहा है
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विश्वविद्यालय परिसरों में ये कौन लोग हैं जिनका नाम हिंसक घटनाओं से जोड़ा जा रहा है

क्या अपने छात्रों को अकादमिक अध्ययन के साथ समाज से संवाद करने को तैयार करते शिक्षक का समाज के साथ विमर्श करना अनिवार्य नहीं?

By श्वेता त्रिपाठी

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वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के शुरुआती दिनों की बात है. तब विश्वविद्यालय का कैम्पस दिल्ली और वर्धा के बीच बंटा हुआ था. वर्धा कैम्पस में पहला बैच शुरू हुये अभी कुछ सवा-डेढ़ साल ही हुये थे. तब विश्वविद्यालय के उप-वित्त अधिकारी जी एल उप्पल दिल्ली में ही बैठते थे. विश्वविद्यालय के पहले कुलपति अशोक वाजपेयी के जाने और नए कुलपति के आने के बीच के समय में वर्धा स्थित कैम्पस के लिए राशि देने से संबन्धित मामला फंसा हुआ था. वित्त विभाग कुछ कतिपय कारणों से वर्धा कैम्पस को राशि नहीं दे रहा था. उन्हीं दिनों में जी एल उप्पल को कुछ कारणों से वर्धा आना पड़ा. ऐसे में अपने भविष्य के प्रति चिंतित विश्वविद्यालय के छात्रों ने तय किया कि जब तक वित्त प्रमुख कैम्पस के लिए राशि की बात को सुनिश्चित नहीं कर देते, उन्हें कैम्पस छोड़ने नहीं दिया जाएगा. योजना के अनुसार उप-वित्त अधिकारी के साथ-साथ अकादमिक समन्वयक को कैम्पस में रोक कर रखना था क्योंकि

उस बातचीत के दौरान उनका रहना भी ज़रूरी था. बहरहाल छात्रों ने अपनी योजना के मुताबिक उप-वित्त अधिकारी और अकादमिक समन्वयक को पूरे दिन रोककर रखा और तब तक जाने नहीं दिया जब तक वित्त प्रमुख ने कैम्पस के लिए अनुदान का वायदा नहीं कर दिया. कैम्पस से निकलते ही उप-वित्त अधिकारी ने नागपुर पुलिस को फोन कर दिया.

नागपुर से पुलिस जब कैम्पस पहुंची, तब छात्रों के बचाव में अकादमिक समन्वयक जिन्हें भी छात्रों ने पूरे दिन रोककर रखा था आगे आए. उन्होंने पुलिस को कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के कैम्पस में बिना विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति के पुलिस अंदर नहीं घुस सकती. थोड़ी देर तीखी बहस हुई और फिर पुलिस को वापस लौटना पड़ा.

इस छोटी सी घटना ने छात्रों को जो हौसला और अपने विश्वविद्यालय के प्रति जिस तरह की ज़िम्मेदारी का भाव दिया, वो अभूतपूर्व था. ज़ाहिर तौर पर इसके पीछे उन अकादमिक समन्वयक की एक महती भूमिका थी, जो छात्रों द्वारा प्रतिरोध झेलने के बावजूद उन्हीं छात्रों के साथ गलत होते देख उनके साथ खड़े हो गए थे. तो क्या मान लिया जाए कि अकादमिक समन्वयक छात्रों के प्रतिरोध की उस कार्रवाई के मूक समर्थक थे? या फिर प्रतिरोध की धुरी बनाए जाने के बावजूद वो साथ-ही साथ बतौर शिक्षक छात्रों को ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ की व्यावहारिक सीख दे रहे थे. कहना न होगा कि एक आम समझ के अनुसार ऐसी घटनाओं का विश्लेषण नितांत एकतरफा ढंग से किया जा सकता है. शिक्षक या तो छात्रों के साथ हैं या फिर विरोध में. यह समझ समाज में आम इसीलिए हो सकी क्योंकि छात्रों और सामाजिक आंदोलनों के बीच के व्यावहारिक सम्बन्धों की समझ देने वाले शिक्षक और शिक्षा विश्वविद्यालय परिसरों से लगभग गायब होती जा रही है. फिर क्या इस आम समझ के बीच जो कुछ खास है, उसे बचाना और प्रसारित किया जाना मौजूदा दौर में ज़्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण नहीं?

पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय परिसरों से शिक्षकों-छात्रों की गिरफ्तारियों की ख़बर दिल्ली, अलीगढ़, इलाहाबाद जैसे शहरों से आ रही है. विश्वविद्यालय परिसरों से जुड़े ये कौन लोग हैं जिनका नाम हिंसक घटनाओं से जोड़ा जा रहा है. प्रोफेसर हैनी बाबू दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं. उनकी गिरफ़्तारी भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में हुई है. गिरफ़्तारी के बाद उनके 250 छात्रों ने उनके नाम पत्र लिखा. छात्रों के शब्दों में ‘ऐसे शिक्षकों को हटाने का मतलब है कि आप कक्षा से बहस को दूर ले जा रहे हैं’, ‘शब्द और भाषा पर उनकी कक्षाओं ने मुझे अपनी पहचान के प्रति आत्मविश्वास दिया’, ‘सवाल करने का जो अवसर मिला था, उसका दायरा काफी सिकुड़ता जा रहा है’. हैनी बाबू के छात्रों की चिट्ठियों के अंश तमाम वेब पोर्टल पर देखे जा सकते हैं. शिक्षा का सीधा संबंध जागरूकता से है. और क्या यह जागरूकता बिना सवाल पूछने के अवसरों के संभव है? फिर इन सवालों को बिना सामाजिक संदर्भों के मात्र किताबी ज्ञान तक ही सीमित कर शिक्षा के मूल ध्येय को प्राप्त कर पाना संभव हो सकेगा?

संस्कृत में एक श्लोक है – पुस्तकस्या तु या विद्या, परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले समुत्पन्ने, न सा विद्या न तद्धनम् ॥

यानि पुस्तक में लिखी हुई विद्या और दूसरे के हाथ में गया हुआ धन, दोनों ज़रूरत पड़ने पर काम नहीं आते हैं. ज़ाहिर तौर पर भाषा में जाति और धर्म पर सवालों को प्रोत्साहित करने वाले हैनी बाबू की कक्षा का दायरा मात्र पाठ्य-पुस्तकों तक नहीं सिमटा था. तो क्या अपने छात्रों को अकादमिक अध्ययन के साथ समाज से संवाद करने को तैयार करते शिक्षक का भी समाज के साथ विमर्श करना अनिवार्य नहीं? हैनी बाबू और भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार दूसरे शिक्षकों – नागपूर विश्वविद्यालय की शिक्षिका शोमा सेन, गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के शिक्षक आनंद तेलतुंबड़े, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध सुधा भारद्वाज पर आरोप है कि इनके कंप्यूटर से कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज़ मिले हैं या इनका संबंध माओवादी विचारधारा से है. साथ ही पुणे में भीमा कोरेगांव हिंसा के एक दिन पहले के कुछ भाषणों को भी हिंसा भड़कने का एक कारण माना गया है.

भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार शिक्षकों की पृष्ठभूमि को देखा जाना महत्वपूर्ण है. शोमा सेन, आनंद तेलतुंबड़े, सुधा भारद्वाज, हैनी बाबू लंबे समय से मानवअधिकारों और आदिवासी-दलित-शोषित तबकों के हक़-हकूकों पर काम करते रहे हैं. ज़ाहिर है शोषितों-वंचितों के हकों की आवाज़ सत्ता के परोक्ष ही उठाई जाती है – कभी संवाद के माध्यम से तो कभी सवालों के साथ. लोकतन्त्र का विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से अटूट संबंध है. भारतीय संविधान के मूल में लोकतन्त्र बिना प्रतिरोध की आज़ादी (राइट टू डिस्सेंट) के संभव नहीं. एक ऐसे दौर में जबकि जनता प्रजा में विलोपित होती दिख रही हो, लोकतन्त्र के चौखंभों की बुनियाद में ही सीलन लग गयी हो. सत्ता से प्रत्यक्ष सवाल करते ये शिक्षक किसे बर्दाश्त होंगे? वैसे भी एक शिक्षक अपने साथ अपनी पीढ़ी ही नहीं, अपने छात्रों के माध्यम से अगली पीढ़ी का भी मार्गदर्शक बनता है. ऐसी दशा में शिक्षक जनता को प्रजा बनाती सत्ता के लिए संकट का सबब ही माना जाएगा.

भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तारियों के साथ-साथ दिल्ली हिंसा में भी छात्रों- शिक्षकों के नाम खबरों में हैं. इनमें कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, और कई के साथ पुलिस की पूछताछ जारी है. इस क्रम में नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, आसिफ तन्हा, सफूरा ज़रगर, मीरान हैदर, शरजील इमाम, उमर खालिद, गुलफिशा जैसे तमाम छात्रों-पूर्व छात्रों के नाम हैं. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इन छात्रों में जो एक कड़ी सबके नामों के साथ जुड़ती है, वो है– नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में जनता के साथ इनका संयुक्त संघर्ष. दिल्ली हिंसा के ही सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जयति घोष का नाम भी खबरों में है. ऐसे में नागरिकता क़ानून के बरक्स आंदोलन में शामिल नागरिकों को प्रोफेसर अपूर्वानंद के ही शब्दों में समझना ज़रूरी होगा – हर व्यक्ति नागरिक होता है लेकिन हरेक दूसरे के सापेक्ष होगा ही और हरेक की दूसरे में साझेदारी होगी ही. इसलिए अगर कोई एक अन्य का अनुभव कर रहा हो और वह दूसरे को महसूस न हो तो नागरिकता खंडित और अधूरी रहती है. शामिल होने की यह कार्रवाई नागरिकता की बुनियाद है.

सापेक्षता और साझेदारी के उसूल की जो बात प्रोफेसर अपूर्वानंद कर रहे हैं, उसे समझना क्या इतना कठिन हो चुका है? भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘हम भारत के लोग’ अपने मूल अधिकारों और कर्तव्यों के साथ नागरिक बनते हैं। समानता, समता, न्याय, एकता, बंधुत्व, मानवता, अखंडता, सामंजस्य, संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता जैसी संवैधानिक अवधारणाएं सापेक्षिक ही तो हैं. क्या बिना साथ खड़े हुये नागरिकता को सुनिश्चित करती इनमें से किसी भी अवधारणा को पाया जा सकता है? संविधान प्रदत्त मूल कर्तव्यों में ही एक है- वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, जांच और सुधार की भावना का विकास करने का कर्तव्य.

प्रश्न यह भी तो है कि जो इन अवधारणाओं के साथ अपने नागरिक अधिकारों-कर्तव्यों में शामिल नहीं हो रहा, उसे क्या कहा जाएगा. इस दौर में आज़ादी के ऐतिहासिक आंदोलन को लेकर बयानबाज़ी आम है. कभी अंग्रेज़ों से माफी मांगने वाले ऐतिहासिक क्रम पर भटकाव भरे लतीफ़े सुनने को मिल रहे हैं, तो कभी स्वतन्त्रता सेनानियों को लेकर नए बयान आ रहे हैं. स्वतन्त्रता-सेनानी किसके ज़्यादा अपने थे. इसे लेकर इतिहास उलट-पुलट करने का ताना-बाना ज़ारी है. लेकिन इन सबके बीच वो लोग भी तो थे ही, जिनका तब भी साझेदारी के उसूल से कोई सरोकार नहीं था. किसी किताब की छपाई में कुछ पन्नों पर थोड़ी स्याही इधर-उधर लग जाने जितनी प्रासंगिक इनकी नागरिक उपस्थिति को किताब के शब्दों की तारतम्यता में जगह पाने की कोई दरकार नहीं दिखती. रघुवीर सहाय ने अपनी कविता सभी लुजलुजे हैं को ऐसे अनुपस्थित वैयक्तिकों को ही समर्पित किया है.

ऐसे में छात्रों को केवल पाठ्य-पुस्तकों से मतलब होना चाहिए. कहने वाले लोग क्या छात्र को साझेदारी की मूल भावना से विमुख करते हुये उनकी नागरिकता से दूर नहीं कर रहे? वैज्ञानिक सोच और जांच-सुधार की भावना के साथ सवाल करने वाले ये छात्र और समाज के साथ उनके संवाद को आगे बढ़ाते इन शिक्षकों से आख़िर किसको ख़तरा है. आत्महत्या के विरुद्ध कविता में रघुवीर सहाय लिखते हैं –

शून्य में घोषणा करता है विचारक

पढे लिखों के बीच सिद्ध होता है

कि संवाद मर गया

कर्महीन लोकतन्त्र की मदद करता है विध्वंसक लोकतन्त्र

दोनों मिलकर विचारधारा चलाते हैं

कि कोई विचार नहीं हत्या ही सत्य है

हम भी भयभीत असहाय भी भयभीत है

यों कह कर भीड़ में समर्थ छिप जाते हैं.

सत्ता के पीछे खड़ी भीड़ के अनुमोदन को ही अभीष्ट मानने वालों से सुसज्जित इस दौर में भीड़ को देखने की होड़ से अलग खड़े होकर भीड़ में ही अपना प्रतिबिंब देखने का सामाजिक संघर्ष करने वाली आवाज़ों ने ही लोकतन्त्र के प्रति आश्वस्ति बनाई हुई है. ज़ाहिर ही है कि लोकतन्त्र को राजतंत्र की ओर धकेलती सत्ता के लिए ये मुखर-सचेत आवाज़ें ही तो सबसे बड़ा ख़तरा हैं. ऐसे में गांधी के शब्दों में, मैं यदि सिर्फ अकेला रह जाऊं तो भी मेरा मार्ग

स्पष्ट है, कि मूल भावना के साथ आधुनिक दौर के इन सबसे सचेत छात्रों-शिक्षकों से बेहतर नागरिक भला और कौन होगा. यह सवाल उठ सकता है कि किताबों के साथ और उनसे परे जाकर छात्रों के साथ संवाद करने वाले ये शिक्षक ख़ुद अपने लिए सवाल उठाया जाना शायद नाबर्दाश्त करते हों. ऊपर

वर्धा की जिस घटना का ज़िक्र किया गया है, उसमें अकादमिक समन्वयक जो कि छात्रों के प्रतिरोध का सामना करते हुये भी छात्रों (लेखिका समेत) के साथ खड़े होकर उनसे ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का सबसे व्यावहारिक संवाद कर रहे थे, वे प्रोफेसर अपूर्वानंद ही थे.

वही अपूर्वानंद जी जो आजकल प्रेमचंद के शब्दों में ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे’ की तर्ज़ पर समानता-न्याय-अमन जैसी सापेक्षिक शब्दावलियों के साथ भीड़ के किसी अनुमोदन में सत्य देखने के बजाय ईमान की बात पर टिके रहने के लिए सत्ता की निशानदेही पर हैं. धीरज, विवेक, साहस, संदेह, निष्पक्षता जैसे मूल भावों के साथ ज्ञान की समझ का निर्माण करते ये शिक्षक ही तो ‘विश्वजनीन दृष्टि के साथ सांस्कृतिक समझ के विकास’ की विश्वविद्यालय की अवधारणा के सबसे बड़े वाहक हैं. लेकिन लोकतन्त्र के प्रति आश्वस्त करते ये सबसे बेहतर नागरिक छात्र-शिक्षक और शिक्षा के प्रति ऐसी स्वस्थ लोकतान्त्रिक परंपरा को प्रोत्साहित करने वाले विश्वविद्यालय परिसर ही आज सत्ता और अनुमोदित भीड़ के निशाने पर हैं.

शेक्सपियर के नाटक किंग लेयर में अर्ल का राजा कहता है कि मैं मतभेदों पर आपका ज्ञानवर्धन करूंगा (आई विल टीच यू डिफरेन्सेज़). वैचारिक मतभेद-असहमतियां समाज की विविधता का पर्याय हैं. किसी भी समाज में सिर्फ एक ही सोच के साथ आगे बढ़ने की कोशिश ही उसके पीछे जाने का सबसे बड़ा कारण बनती है. और जिस समाज में शिक्षक ऐसी सोच का वाहक बनता है, वहां आइन्सटाइन के अपने अनुभव-जन्य कथन के मुताबिक शिक्षा और शिक्षक पर भरोसा सबसे पहले खत्म हो जाता है. ऐसे में किसी शिक्षक का दूसरी विचारधाराओं के प्रति सम्मान-अवकाश-संवाद के साथ किसी एक विचारधारा पर भरोसा करना मात्र ही क्या उसके प्रति किसी कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है? भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में हुई शिक्षकों की गिरफ्तारियां तो इसी ओर इशारा करती हैं. या फिर जाम करो मिलकर शोषण का पहिया जैसे सामाजिक- अहिंसक उद्बोधनों के साथ अपने नागरिक कर्तव्यों को सुनिश्चित करते इन सजग छात्रों की गिरफ्तारियां क्या इनके नागरिक अधिकारों का हनन नहीं. फिर लोकतन्त्र की सिकुड़न के मौजूदा दौर में सत्ता से सवाल करती इन आवाज़ों के विरुद्ध पुलिसिया कार्रवाई के पीछे सत्ता-परक पूर्वाग्रह को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.

क़ानून की नज़र में प्राकृतिक न्याय (नेचरल जस्टिस) एक बेहद महत्वपूर्ण अवधारणा है. बिना निष्पक्ष सुनवाई को सुनिश्चित किए न्याय पूरा नहीं माना जा सकता. दूसरे शब्दों में न्याय केवल किया नहीं जाना चाहिए, बल्कि होते हुये भी दिखना चाहिए. 1976 के लखनऊ विश्वविद्यालय बनाम जी सारना और अन्य के एक मामले में न्यायालय ने निर्धारित किया था कि कोई भी वास्तविक पूर्वाग्रह किसी भी जांच को रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार देता है. ऐसी सूरत में प्राकृतिक न्याय की अवधारणा के अंतर्गत सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय इन छात्रों-शिक्षकों की गिरफ्तारियाँ क्या न्यायोचित हैं? यह सवाल समाज में बार-बार पूछा जाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही यह भी कि सवाल पूछने का हौसला करते इन छात्रों और ज्ञान की समझ का निर्माण करने में सफल इनके शिक्षकों के विरुद्ध पुलिसिया कार्रवाइयों के न्याय की नज़र में विफल होने की सूरत में इनके बेहद महत्वपूर्ण समय को ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?

सत्ता और भीड़ के सत्तापरक संबंध से बहुत बेहतर और स्थायी संबंध सत्य का होता है. ब्रेख्त के शब्दों में सच हमें जोड़ता है. दमन की कार्रवाइयों के बीच साझेदारी और सापेक्षता के उसूलों के साथ खड़े इन छात्रों-शिक्षकों की नागरिक अभिव्यक्ति अपने सत्य के साथ अडिग है और समाज के साथ सार्थक संवाद में प्रयासरत है. लोकतन्त्र को बचाए रखने की ये कवायद ही आने वाले समय में भीड़ में प्रतिबिम्बित होगी. विश्वविद्यालय की अवधारणा को मजबूत करते इन सचेत-सजग-साहसी नागरिकों को सलाम!

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