मीडिया, सोशल मीडिया और सामूहिक चेतना का उपनिवेशवाद

खबर के नाम पर ‘ब्रेकिंग समाचार’ में ‘समाचार’ का विशेषण ‘ब्रेकिंग’ शब्द है. यदि ‘ब्रेकिंग’ न लिखा जाए तब भी वह ‘समाचार’ ही रहेगा, लेकिन संप्रेषण के आधुनिक आग्रहों में बिना ‘ब्रेकिंग’ जुड़े समाचार में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती.

Byभद्रसेन
मीडिया, सोशल मीडिया और सामूहिक चेतना का उपनिवेशवाद
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स्मृति-गमन (नॉस्टेल्जिया) के लिए नहीं बल्कि अनुभूति के तुलनात्मक बोध के लिए यह ज़रूरी है कि कुछ क्षण के लिए 90 के दशक के उस पूर्वार्ध में जाया जाए जहां हमें संचार माध्यमों के सीमित विकल्प उपलब्ध थे. उस छत पर, जिस पर दूरदर्शन के सिग्नल पकड़ने के लिए और बंदरों के बारंबार हमले के बाद भी संघर्ष करता हुआ दूरदर्शन का एंटीना लगा होता था, मच्छरदानी लगी चारपाई या फिर सादा चटाई पर रात भर सोने के उपरांत होने वाले सूर्योदय में हमारा साझेदार कौन-कौन होता था?

प्रात: बेला की अंगड़ाई के साथ निहारे जाने वाले उस सूर्योदय की क्या हम तस्वीर उतारते थे? यदि सौभाग्य से कोडेक या किसी अन्य कैमरा के मालिक हुए भी, तो मुमकिन है कि उस सूर्योदय की तस्वीरें लेते लेकिन तब हम उगते हुए सूरज की वह तस्वीर कितने लोगों को दिखा सकते थे अथवा साझा कर सकते थे? आज स्मार्ट फ़ोन में मौजूद ‘सेंड’, ‘फ़ॉर्वर्ड’ या ‘शेयर’ जैसे विकल्पों का इस्तेमाल करते हुए ‘गुड मॉर्निंग’ अथवा ऐसे ही दैनिक मीम के संग्रह में से निकाली गई बेतहाशा उबाऊ (और कभी-कभी भयानक भड़काऊ) भाव-बोधक संज्ञाओं को हम दूसरों के प्रातःकाल में पल भर में ठेल देते हैं.

क्या मोबाइल-पूर्व युग में आप किसी को केवल ‘गुड मॉर्निंग’ कहने के लिए ख़त लिखते? शायद नहीं. एक अच्छे सूर्योदय के दर्शन बाद भी इतनी सी बात के लिए हम ख़त नहीं लिखते. ख़त लिखना एक पूरी प्रक्रिया थी. उसमें संक्षिप्त होना भी पूरा होना था. सुबह तब भी हो रही थी और कम से कम आज की सुबहों से कम प्रदूषित और सौर-लालिमा से लैस थी.

यदि हम तब केवल ‘गुड मॉर्निंग’ कहने के लिए संप्रेषण के एक उपलब्ध माध्यम का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, तो फिर आज वही व्हाटसऐप ‘गुड मॉर्निंग’ का ऑब्सेशन क्यों है? ‘गुड मॉर्निंग’ का यह दृष्टांत केवल एक उदाहरण भर है. मेरा प्रश्न बस इतना है कि क्या वह घड़ी आ गयी है जब हम यह मान लें कि सूचना माध्यमों ने हमें बदल डाला है? हम सापेक्षिक रूप से एक बदली हुई चेतना के साथ जीवित हैं? अपने परिवेश पर रोज़ाना की जाने वाली प्रतिक्रियाओं के स्तर पर हम अब वह नहीं हैं जैसे कुछ बरस पहले हुआ करते थे? क्या परिवर्तन की टकसाल ने मीडिया के मौजूदा माध्यमों की मार्फ़त संवेदनाओं के ग्रहण और संप्रेषण को तात्विक रूप से एक दूसरी शक्ल दे दी है? यह नयी शक्ल कैसी है? क्या सूचनाओं के नेटवर्क ने हमें किसी क़िस्म की जड़ता से मुक्त किया है या फिर हमारी ही चेतना के नियंत्रण और नियमन की चाबी उसके हाथ में चली गई है. हम एक डरावनी नव-दासता के चंगुल में फंस चुके हैं?

 पिछली शताब्दी का उपनिवेशवाद भौमिक था जिसमें एक देश, दूसरे की भूमि पर प्रत्यक्ष और संप्रभु नियंत्रण करता था. इस नियंत्रण में वह सामान्यतः लोगों को अधीन करने के बड़े स्थूल तरीक़ों का इस्तेमाल करता था. कारागार, शारीरिक दमन, फ़ौज-पुलिस की प्रवर्तनकारी एजेंसियां औपनिवेशिक संरचना की मददगार थीं. संचार माध्यमों के विकास के साथ ही पिछली सदी के इस ओल्ड फ़ैशंड उपनिवेशवाद की जगह इस सदी में समाज की सामूहिक चेतना नए क़िस्म के उपभोगिक उपनिवेशवाद का लक्ष्य बन गयी है. मनुष्यों के शरीर और दूसरे मुल्कों की ज़मीन पर कब्ज़ा करना यदि पुरानी शताब्दी की विशिष्टता थी तो लोगों के दिमाग़ों पर उन्हीं की सहमति से कब्ज़ा कर लेना इस शताब्दी का सबसे ख़ौफ़नाक नियोजन हो गया है.

अब इस बात पर मोटी मोटा सहमति है कि सूचना माध्यमों में होने वाले बदलाव पूरे समाज को बदलने का माद्दा रखते हैं. लेकिन यह परिवर्तन होते कैसे हैं, इस बात पर चिंतन का श्रेय 1964 में आयी रचना ‘अंडरस्टैंडिंग मीडिया’ के लेखक और उत्तर-आधुनिकतावाद के दार्शनिक मार्शल मैक्लुहान को है. मैक्लुहान की सभी दलीलों का सार था- ‘मीडियम इज़ द मैसेज’. इस बात का सीधा सा मतलब यह था कि माध्यम और संदेश (जो उस माध्यम के मार्फ़त दर्शकों तक पहुंचाया जाता है)  दरअसल अलग-अलग और स्वतंत्र न होकर एक ही हैं.

इस धारणा का कोई औचित्य नहीं है कि माध्यम तटस्थ होता है. उलट, सच्चाई तो यह है कि मीडिया/मीडियम मनुष्य के जीवन-मूल्यों और जीवन-शैली, व्यवहार को यानी पूरे जीवन को ही सम्पूर्णता में प्रभावित करता है. मैक्लुहान द्वारा यह किताब लिखे जाने तक मोबाइल फ़ोन नहीं आए थे. सोशल मीडिया का तो प्रश्न ही नहीं था. उनके सामने वह टेलिविज़न ज़रूर था जिसे वह ‘संक्रमण’ फैला सकने की अभूतपूर्व क्षमताओं के कारण ‘रेडियोएक्टिव’ कहते थे.

एक मीडियम के तौर पर उसके हो सकने वाले असर को वह किस रूप में ले रहे थे, इसकी जानकारी 7 मार्च, 1977 को लिखे उनके एक ख़त में मिलती है. वह लिखते हैं- “द टीवी थिंग इट्सेल्फ़ इज़ वेरी-वेरी पोल्यूटिंग. द प्रॉब्लम इज़ हाउ लिटरेट इज़ योर सॉसायटी, योर फ़ैमिली सर्कल, योर इमीडिएट सर्कल.”

एक पैग़म्बरी अंतर्दृष्टि के साथ मैक्लुहान यह समझ रहे थे कि उस दौर में जब सूचनाएं प्रकाश की गति से भी तेज़ इधर-उधर भेजी जाएंगी, उस स्थिति में समाज का ‘लिटरेट’ होना कितना ज़रूरी होगा. ऐसा नहीं है कि 20वीं सदी कोई पहली सदी थी जिसमें पहली बार आदमी का ‘गति’ से पाला पड़ा हो. अनुभव के स्तर पर पुरानी दुनिया भी गति के अनुभव से वाक़िफ़ थी.

‘गति’ वाला आदमी एक बेहतर स्थिति का नैसर्गिक दावेदार होता था. पैदल चलने वाले पर रथी और रथी के ऊपर हल्का कवचधारी घुड़सवार हमेशा वरीयता पाता था. सामरिक कौशल में गति असंदिग्ध रूप से महत्वपूर्ण थी. गति को हमेशा से महत्व मिलता रहा है किंतु उसकी ज़रूरत ठहराव की समवर्ती मौजूदगी में थी. यूनानी इतिहास में अपने शहरवासियों को मैराथन की जंग की ख़ुशख़बरी देने वाले फिडीपिडीज़ को सूचनाएं लाने-ले जाने के लिए इस तरह दौड़ाया गया कि वह अपनी अंतिम ख़बर के साथ ही शहीद हो गया. सूचना के लिए फिडीपिडीज की गति-केंद्रित मृत्यु एक भयानक त्रासदी का रूपक है.

गति कोई परहेज़ करने वाली चीज़ नहीं है. बात बस इतनी है कि ‘स्पीड’ के साथ चौबीसों घंटे नहीं जिया जा सकता. अनुभूति और अंतर्निर्भरता के संसार में ‘स्पीड’ एक विलेन भी हो सकती है. यह बड़ी दिलचस्प बात है कि शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ में उसका मानवीय सम्बन्धों से मोहभंग उस ‘स्पीड’ के कारण होता है जो त्वरित, अनुचित और असांवेदिक है.

पूर्व-आधुनिक युग के मनुष्य की चेतना में किसी चीज़ का ‘धीरे होना’ अभिशाप नहीं था. वह गति से अधिक प्राप्तव्य के लिए चिंतित थी. कबीर की कविता ‘धीरे- धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय’ में प्रक्रिया को सम्मान देने की पैरवी है. पेड़ से फल पाने की एक समयगत प्रक्रिया है. कबीर की इस कविता की रोशनी में किसी पेड़ को जल्द फल न दे सकने के कारण आलसी नहीं कहा जा सकता. कबीर का यह पद एक समुचित और नैसर्गिक अंतराल का तर्क था.

यह अंतराल की बात थी लेकिन आलस्य की दलील नहीं थी. जब आधुनिक कवि के रूप में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ‘धीरे होने’ के विरुद्ध होते हैं: ‘धीरे धीरे मुझे सख़्त नफ़रत है इस शब्द से, मेरे दोस्तों, धीरे धीरे कुछ नहीं होता, सिर्फ़ मौत होती है, धीरे धीरे कुछ नहीं आता, सिर्फ़ मौत आती है’, तब उनकी कविता ‘धीरे-धीरे’ के विरुद्ध होते हुए भी निर्मम गति की पैरवी नहीं है. वह ‘धीरे धीरे’ के उसी रूप से विकल हैं (जो पूर्णतः उचित भी है) जो ‘जड़ता’ में बदल गया है.

आज के सूचना माध्यमों के लिए जड़ता की जगह अंतराल दुश्मन है जबकि दोनों बुनियादी तौर पर अलग हैं. खबर के नाम पर ‘ब्रेकिंग समाचार’ में ‘समाचार’ का विशेषण ‘ब्रेकिंग’ शब्द से होता है. यदि ‘ब्रेकिंग’ न लिखा जाए तब भी वह ‘समाचार’ ही रहेगा (सही या ग़लत यह अलग बात है). लेकिन संप्रेषण के आधुनिक आग्रहों में बिना ‘ब्रेकिंग’ या ‘जस्ट इन’ जुड़े उस समाचार में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती. वह निर्जीव नज़र आता है.

दूरदर्शन युग में यही समाचार ‘ताज़ा’ समाचार था. ‘ताज़ा’ ब्रेकिंग की तुलना में कम दबाव मुक्त संज्ञा थी. समाचार एक मियाद और एक निर्धारित अवधि पर अवतरित होता था. टीवी से उत्पन्न एंज़ायटी ड्रॉइंग रूम तक थी किंतु मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया के दाम्पत्य ने बाध्य कर दिया कि हम खबरों को उनकी तत्क्षणता में जिएं. इस तत्क्षणता का दोहन करने में लिए ज़रूरी था कि इसको दर्ज करने वाले ऐप्लिकेशन भी बनाए जाएं. आज के सूचना संप्रेषण के माध्यम आपको विवश कर देते हैं कि आप जैसे ही कोई खबर पाएं, उस पर फ़ौरन अपनी प्रतिक्रिया दें. फ़ौरन प्रतिक्रिया देने का दबाव टीवी और सोशल मीडिया को अख़बार की विलंबित छपाई वाली दुनिया से अलग कर देता है.

प्रतिक्रिया न देना ‘पीछे’ रह जाना है जबकि चैनल आपको आगे रखने और सबसे तेज होने का आश्वासन दे चुके हैं. ये वही लोग हैं जिन्हें अपने सोशल मीडिया के खाते भी गतिशील रखने होते हैं. लाखों ‘फ़ॉलोअर्स’ उनका इंतज़ार करते हैं कि अमुक अमुक खबर पर उनका ‘रिएक्शन’ क्या होगा? क्या पता कि मूल ख़बर पर दी गयी उनकी प्रतिक्रिया ही एक नयी ख़बर हो जाए और मूल ख़बर निर्मूल बन जाए. दरअसल हर ख़बर पर अविलंब प्रतिक्रिया वह क़ीमत है जो सोशल मीडिया की दुनिया में खाता-धारक अपने ‘फ़ालोअर्स’ को अनुगामी होने के एवज़ में अदा करता है.

सही और ग़लत का दोहरा बोध दुनिया का सबसे आदिम बोध है. स्पीड के सामने इस बोध का दुर्बल पड़ जाना इस समय की सबसे भयानक विसंगति है. जो प्रासंगिक बचा है वह गति है और गति एक ऐसी शै है जो हर चीज़ की शक्ल बदल देती है. कनाडा के प्रधानमंत्री पियरे इलियट ट्रूडो को लिखे एक पत्र में मैक्लुहान हार्डवेयर मीडियम और इलेक्ट्रिक मीडियम के बीच अंतर करते हैं. हार्डवेयर कम्युनिकेशन (उदाहरण के लिए एक ख़त) में प्रत्येक स्तर पर एक ढांचागत संरचना अंतर्निहित थी लेकिन इलेक्ट्रिक कम्युनिकेशन ने ढांचे के प्रत्येक स्तर को विकेंद्रित किया है. मनोविज्ञान के स्तर पर यह एक ऐसी स्थिति थी जिसमें हम अपने ही शरीर से अलग होना शुरू हुए.

 ‘माइनस अवर बॉडीज़’ का मतलब था कि संवाद के आधुनिक माध्यमों ने हमारे निजी और पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया था. हिंदी फ़िल्म उद्योग के एक अभिनेता की कथित ‘हत्या’ की रिपोर्टिंग को भारतीय घरों में अनवरत देखा जाना इस असर का शिखर है. समाचार माध्यमों को पता है कि आपके स्नायु-तंत्र से खेल सकना बहुत आसान है. सोशल मीडिया की दुनिया में ट्रोल की मौजूदगी को इसी अवधारण से समझा जा सकता है. गुमनाम ख़त लिखकर किसी को गाली देने में भी किसी के हाथ की

लिखाई होनी ज़रूरी थी. इस अनुशासनहीनता में हाथ की लिखाई देह का अवशेष होती थी. लिखने वाला स्याही और लिखाई दोनों से बंधा होता था. आज ट्विटर या फ़ेसबुक पर अज्ञात प्रोफ़ाइल बनाकर जो कुछ भी अशिष्ट कहा सकता है उसके लिए ‘माइनस अवर बॉडीज़’ की स्थिति एक पूर्व शर्त है.

जब मैक्लुहान यह कह रहे थे कि प्रकाश की गति से दौड़ती सूचनाओं के आगे कोई भी इंस्टीट्यूशन नहीं बचेगा- “नथिंग विल होल्ड एट द स्पीड ऑफ़ लाइट’ तब इसका आशय यही था कि आगे आने वाले वक़्त मानव चेतना के ठहराव के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण पल होंगे क्योंकि तब मीडिया पूरे समाज की ऐंद्रिक संरचना को बदल रहा होगा.

‘गुटेनबर्ग गैलेक्सी’ में मैक्लुहान ने सूचनाओं और उनकी मनुष्य की इंद्रियों से भिड़ंत के आधार पर विश्व सभ्यता के इतिहास को संचार माध्यमों के हिसाब से चार भागों में बांटा, पहला वह दौर था जब आदमी का मुंह ही संवाद का ज़रिया था. यह सूचना के मौखिक संप्रेषण का चरण था. प्राचीन भारत में वेदों का युग (जो लंबे समय तक सुने जाने की परंपरा के कारण ही अगली पीढ़ियों को अग्रसारित हुए और इस वजह से श्रुति कहे गए) और प्राचीन यूनान में होमर के महाकाव्यों की दुनिया इस दौर की प्रतिनिधि दुनिया थी. फिर शब्दों, अक्षरों और वर्णमाला का दौर आया जो लगभग दो हज़ार साल तक रहा. तीसरा दौर एक लुहार के कमाल ने पैदा किया जब उसने शब्दों को प्रिंटिंग प्रेस की मदद से पन्नों पर छापने के कौशल का आविष्कार करके सर्वत्र किताबों की मौजूदगी वाली दुनिया की शुरुआत कर दी और गुटेनबर्ग की इस खोज का फ़ायदा कैथोलिक चर्च के विरुद्ध एक विद्रोही पादरी मार्टिन लूथर ने एक किताब ‘95 थीसिस’ लिखकर उठाया जो किताबों की दुनिया की पहली बेस्टसेलर किताब थी.

शब्दों की यांत्रिक रूप से छपाई वाली यह दुनिया 1900 तक क़ायम रही. 1900 के बाद से मैक्लुहान के मुताबिक़ उस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर शुरू हुआ जिसमें बात मुंह, कान, आंख, से आगे निकलकर हमारे ‘नर्वस-सिस्टम’ तक पहुंच गयी. अब सूचनाएं केवल आपके कानों और आंखों के लिए न होकर आपके नर्वस-सिस्टम पर आक्रमण के लिए तैयार की जाने लगीं. संवाद माध्यमों के विकास का यह चरण सबसे ख़तरनाक इसलिए भी था कि इसमें आपकी चेतना के साथ खेलने वाले व्यावसायिक खिलाड़ियों की तादाद में बेतहाशा इज़ाफ़ा हुआ.

दुनिया के बाज़ार की सफलता इस बात पर थी कि आप घर में एक अच्छा जीवन जीने के लिए ज़रूरी वस्तुओं की मौजूदगी के बाद भी अपने घर को ख़ाली-ख़ाली समझें. आक्रामक विज्ञापनों का निर्माण शुरू हुआ ताकि चीज़ की ज़रूरत न होते हुए भी एक उपभोक्ता के रूप में किसी ग़ैर-ज़रूरी या कम ज़रूरी चीज़ की तलब को सामूहिक रूप से उत्पन्न किया जाए. सूचना माध्यमों की यह निपुणता केवल भौतिक उपभोग की तलब पैदा करने तक रहती तो ग़नीमत थी लेकिन असली ख़तरा कहीं और था. मैक्लुहान इस कल्पना से डरे हुए थे कि कहीं हम अपनी आंखें और अपने कान दूसरों के मुनाफ़े के लिए पट्टे पर न दे दें. उन्होंने लिखा- "once we have surrendered our senses and nervous system to the private manipulation of those who would try benefit from taking a lease on our eyes and ears and nerves to commercial interests is like handing over the common speech to a private corporation"

यह एक बड़ी चिंता थी लेकिन सच पूछा जाए तो इससे भी ख़तरनाक थी चेतना की कंडीशनिंग. सूचनाओं से मनुष्य की चेतना की सायास और इच्छित कंडीशनिंग किया जाना संभवतः इस शताब्दी का सबसे बड़ा ख़तरा है. पिछले सालों में सूचना उद्योग के कई नामी ग़िरामी बहुराष्ट्रीय निगमों पर ऐसे आक्षेप लगने से विमर्श की दुनिया स्तब्ध रही. सैंकड़ों वर्षों पुराने लोकतांत्रिक समाजों के बारे में यह चिंता व्यक्त की गयी कि सूचना डाटा के दुष्टतापूर्ण इस्तेमाल से मतदाताओं के मतदान पैटर्न को बदला जा सकता है. चेतना की ऐसी सचेष्ट और नियोजित कंडीशनिंग की तरफ़ साफ़ इशारा एलडस हक्सले (1894-1964) के 1932 में आए उपन्यास ‘ब्रेव न्यू वर्ड’ में था.

हक़्सले के ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में बाक़ायदा एक पद है जिसका नाम ही है- डायरेक्टर ऑफ़ हैचरी एंड कंडीशनिंग. हैचरी में पैदा किए गए बच्चों की कंडीशनिंग सबकी सामूहिक सहमति से होती है जबकि जॉर्ज ओर्वेल के ओशीनिया में इसे शारीरिक यातनाओं से हासिल किया जाता है. ब्रेव न्यू वर्ड में मानसिक अनुकूलन के प्रभारी निदेशक कहते हैं- "what man has joined, nature is powerless to put asunder. They will grow up with what the psychologists used to call an instinctive hatred of books and flowers."

ब्रेव न्यू वर्ल्ड के नियंताओं का उद्देश्य है अनुकूलित पीढ़ियों का निर्माण करना. जिन बच्चों की कंडीशनिंग होती है वो ‘डेल्टा’ श्रेणी के बच्चे हैं. वह किताबें न छुएं इसलिए हैचरी का निदेशक उन्हें किताबों का स्पर्श कराकर विद्युत करंट देता है. उसका लक्ष्य है- ‘reflexes unalterably conditioned’. किताबें कंडीशनिंग की पूरी मेहनत को ख़तरे में डाल सकती हैं. ब्रेव न्यू वर्ल्ड का तंत्र किताबों से डरता है.

हक्सले की इस दुष्कल्पित दुनिया में ज्ञान का वितरण छलावे, सम्मोहन और विज्ञान के मिले जुले तरीक़ों से किया जाता है. वह इसे  ‘hypnopaedic wisdom’ कहता है अर्थात वह जिसे किसी ने अपने यत्न से हासिल नहीं किया. यह वह ज्ञान है जो आपको आपकी तंद्रावस्था में अलग अलग तरीक़ों से प्रदान दिया जाता है. हमारे समकालीन समय में हमारे परिवेश के ज्ञान का बहुत बड़ा और सक्रिय हिस्सा ‘मीम’ नाम की व्हाट्सएपीय ‘कला’ के ज़रिए इसी ‘हिप्नोपीडिक विज़्डम’ से बनकर तैयार हो रहा है. ज्ञान के परिक्षेत्र में घटने वाली यह हमारे समय की सबसे बड़ी दुर्घटना है.

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