एनएल चर्चा 142: कोरोना वायरस का बढ़ता दायरा और कोरोना वैक्सीन के दावे

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एनएल चर्चा 142: कोरोना वायरस का बढ़ता दायरा और कोरोना वैक्सीन के दावे
एनएल चर्चा
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एनएल चर्चा का 142वां एपिसोड कोरोना वायरस के बढ़ते केस और कोरोना वैक्सीन को लेकर आ रही खबरों पर पर केंद्रित रहा. दिल्ली में बढ़ती कोरोना मरीजों की संख्या, बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद भाजपा के दो नए उपमुख्यमंत्री और सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पत्रकार की गिरफ्तारी मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजने के मसलों पर बातचीत हुई.

इस बार चर्चा में पीजीआईएमईआर की प्रोफेसर और वैक्सीनोलॉजिस्ट डॉ मधु गुप्ता, शार्दूल कात्यायन, और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया.

मेघनाद ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कोरोना की वैक्सीन पर मधु गुप्ता से ओवरव्यू मांगते हुए पूछा, "कौन सा वैक्सीन कब तक हमारे पास पहुंच पाएंगा?"

इसके जवाब देते हुए मधु कहती हैं, "ऐसे तो बहुत सारे वैक्सीन बनाए जा रहे हैं लेकिन मोटे तौर पर देखे तो चार तरह के वैक्सीन बन रहे हैं. पहला वैक्सीन जो आरएनए को लेकर बनाया जा रहा है. ये मोडरना और फाइज़र जैसी कंपनी मिलकर बना रही हैं. इन कंपनियों ने वैक्सीन के शुरुआती दो चरणों को पार कर लिया हैं और अब वह तीसरे चरण में आ चुके हैं. इसके बाद उन वैक्सीन को लाइसेंस मिल जाता है, मार्केट में लाने का. अपनी जांच के दौरान इन कंपनियों ने पाया कि उनकी वैक्सीन 95 प्रतिशत तक प्रभावी है.”

मधु आगे कहती है, ''जो दूसरी तरह के वैक्सीन बन रहे हैं, उनमें वायरस को मार दिया जाता है. ताकि यह शरीर में वायरस पैदा ना हो सके और एंटीबॉडी प्रतिरक्षा शरीर में विकसित हो जाय. भारत बायोटेक का वैक्सीन इनएक्टिवेटेड है. यह भी तीसरे चरण में पहुंच चुका है. जिसमें 26 हजार लोगों पर इसका परीक्षण किया जाएगा.”

मधु आगे कहती है, ''तीसरे तरह का वैक्सीन वायरल वेक्टर वैक्सीन है इसमें कोरोना वायरस के जीन्स को लेकर दूसरे वायरस में डाल दिया जाता है. ऑक्सफोर्ड वैक्सीन जिसे एक्स्ट्रा जैनिका, रूसी वैक्सीन स्पुतनिक वी या वुहान में भी जो वैक्सीन बन रहा है वह सब इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर बना रहे हैं. वहीं इंडिया में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जो कोविड शील्ड के नाम से वैक्सीन बना रहे हैं. वह भी इसी पद्धति पर आधारित है.”

मधु कहती हैं, “मैं जो अभी स्टडी कर रही हूं वह कोविड शील्ड वैक्सीन ही है. इस वैक्सीन को बनाने के लिए जो टेक्नोलॉजी है वह ऑक्सफोर्ड और एक्स्ट्रा जैनिका से लिया है और बनाने का काम सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में चल रहा है. इस वैक्सीन का भी तीसरा चरण पूरा हो चुका है और इंडिया में हम इसको कोविड शील्ड और ऑक्सफोर्ड वैक्सीन से तौल रहे है. वहीं ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के अमेरिका और ब्राज़ील जैसे देशों में तीसरे चरण पूरे होने वाले हैं.”

मधु आगे कहती है, ''वैक्सीन का चौथा प्रकार है लाइव अटैंयूएटेड वैक्सीन. इसमें कोरोना वायरस को कई बार पैदा किया जाता है. इसमें वायरस को इतनी बार पैदा किया जाता है जिससे वायरस जिंदा तो रहता पर बहुत कमज़ोर हो जाता है. इस दौरान वह बीमारी नहीं पैदा करता, बल्कि वो एंटीबॉडी पैदा कर पाता है.”

डॉ वर्मा कहती है, “इस समय फाइजर और माडरना वैक्सीन के प्रभाव को लेकर जो बात हम कर रहे है, वह पूरी तरह से सही नहीं है. क्योंकि इन कंपनियों ने तीसरे चरण में 100 से भी कम लोगों पर जो परीक्षण किए उनके यह आंकडे़ हैं, यह पूरे आंकड़े नहीं है. वहीं अगर वैक्सीन के दाम की बात करें तो सीरम ने पहले ही बता दिया था कि उसके वैक्सीन की कीमत 200 रुपए होगी. वहीं भारत बायोटेक वैक्सीन की भी कीमत ज्यादा नहीं होगी.”

आंनद को चर्चा में शामिल करते हुए मेघनाद सवाल करते हैं, "हमारा जो पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम है, वो अर्बन एरिया में तो इफेक्टिव है लेकिन रूरल एरिया में प्रभावी नहीं है. ऐसे में वैक्सीन पहुंचाने के समय हमें किन दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है और हम इसका समाधान कैसे निकाल सकते हैं?''

इस पर आनंद कहते हैं, "वैक्सीन पहुंचाने के लिए एडमिनिस्ट्रेशन टीम, स्टोरेज की टीम, या विशेषज्ञों की टीम होगी. लेकिन लोगों तक लाना और पहुंचना, उसके लिए जो लॉजिस्टिक्स है इसके लिए उसी तरह मैन पावर का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जैसे इलेक्शन के समय किया जाता है. जिस तरह चुनाव के समय स्कूली शिक्षकों तथा तमाम सरकारी कर्मचारियों को लगा दिया जाता है या जब सरकारी परीक्षा में पूरी मशीनरी को भेजा जाता है, कुछ इसी तरह व्यापक व्यवस्था वैक्सीन वितरण के समय करना होगा.”

यहां शार्दुल से सवाल करते हुए मेधनाथ कहते हैं,"हमारा पब्लिक हेल्थ सिस्टम इसको संभालने के लिए कितना समर्थ हैं और दूसरा इसका हमारे अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?''

शार्दुल कहते है, "जैसे आनंद ने बताया कि यह आकस्मिक संकट है लेकिन ऐसा नहीं है. हम सबको यह बात समझने कि ज़रूरत है. इसका कारण है कि हमेशा इस वायरस से बचने के लिए पहला स्टेप रहेगा दूरी बनाना. ऐसा नहीं की वैक्सीन आने से यह खत्म हो जाएगा. भारत में हर साल ढाई करोड़ टीकाकरण होता है. यहां बात 133 करोड़ लोगों की हो रही है.”

शार्दूल आगे बताते हैं, “यहां एक और बात समझने की है यह वैक्सीन पोलियो जैसी नहीं कि आपको लग गई और छुट्टी. अभी तक जो परिणाम आए है उसके मुताबिक़ ये थोड़े समय के लिए हमे इम्यून करेगी. जिसके बाद साल में एक बार या दो बार इसके टीके लगवाने पड़ सकते हैं. रही बात हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर की तो, हमारे पास वैक्सीन को स्टोर करने के लिए जो जरूरी संसाधन चाहिए, वह भी अभी नहीं है, ऐसे में अभी थोड़ा समय लग सकता है.”

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