क्या कृषि कानूनों के खिलाफ सिर्फ पंजाब के किसान आंदोलन कर रहे हैं?

तीन कृषि क़ानूनों के खिलाफ किसान दिल्ली की सड़कों पर हैं. इसी बीच यह सवाल उठाया जा रहा है कि इस आंदोलन में सिर्फ पंजाब के किसान शामिल है. पर क्या यह सच है?

क्या कृषि कानूनों के खिलाफ सिर्फ पंजाब के किसान आंदोलन कर रहे हैं?
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गुरुवार को किसान नेताओं और कृषि मंत्रियों को बीच हुई बैठक सात घंटे से ज़्यादा चली लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचे बगैर ही खत्म हो गई. किसान नेता तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने की जिद्द पर अड़े हुए हैं वहीं सरकार उन्हें मनाने की कोशिश कर रही है.

मीटिंग में शामिल रहे किसान नेता राकेश टिकैत ने बताया, ‘‘सरकार कानून की कुछ ख़ामियों को दूर करने का आश्वासन दे रही है लेकिन सिर्फ आश्वासन पर किसान नहीं मानने वाले हैं, जब तक कानून वापस नहीं हो जाता तब तक हम सड़कों पर जमे रहेंगे.’’

लाखों की संख्या में दिल्ली पहुंचे किसान इसे चारों तरफ से घेर चुके हैं. दिल्ली के कई बॉर्डर से यातायात बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है. इन सबके बीच एक सवाल जो लगातार उठाया जा रहा कि यह आंदोलन सिर्फ पंजाब के किसानों का है.

‘‘यह आंदोलन पंजाब के किसानों की ओर से खड़ा किया गया है. वो भी किसानों की बजाय वहां की कुछ राजनीतिक पार्टियों का स्पॉन्सर्ड है, संस्थाओं का स्पॉन्सर्ड, इस तरह के किसान वहां से आ रहे हैं. हरियाणा के किसानों ने उसमें भागीदारी नहीं की है. मैं इसके लिए हरियाणा के किसानों का भी बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं.’’ एक दिसंबर को यह बयान हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिया.

सिर्फ पंजाब के किसान ही आंदोलन कर रहे हैं, ऐसा कहने वाले सिर्फ मनोहर लाल खट्टर ही नहीं है. जब कॉमेडियन कपिल शर्मा ने किसानों को अपना समर्थन देते हुए कहा कि बातचीत के जरिए इस मामले को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए तो उसपर कई कमेंट आए कि कानून जब देशभर के लिए बना है तो परेशानी सिर्फ पंजाब के किसानों को ही क्यों है. बाकी देश के किसान क्यों नहीं बोल रहे हैं.

सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं, समर्थकों और आईटी सेल द्वारा यह सवाल बार-बार उठाया जा रहा है कि तीनों कृषि क़ानूनों से सिर्फ पंजाब के ही किसानों को क्यों परेशानी है? बाकी राज्य के किसान क्यों नहीं प्रदर्शन कर रहे हैं?

इस दावे और आरोप की हकीक़त जानने की हमने कोशिश की है.

अब शाम ढलने लगी है. दिल्ली हरियाणा के सिंधु बॉर्डर पर किसान नेता और उनके समर्थन में आए लोग भाषण दे रहे होते हैं. ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के बीच में जगह-जगह किसान ईट का चूल्हा बनाकर उसपर हलवा, रोटी और दूसरी कई खाने की चीजें बना रहे हैं. चलते-चलते कई जगह हमें भी खाने के लिए पूछा जाता है. हम आगे बढ़ते हैं तो एक जगह हमें कुछ बुजुर्ग हुक्का पीते नज़र आते हैं. जहां बुजुर्ग बैठे हुए हैं उसके बगल में ही एक पोस्टर भी लगा है जिसपर लिखा है, ‘सर्व दहिया खाप’. ये लोग हरियाणा के सोनीपत से आए हुए है.

यहां हमारी मुलाकात संतोष दहिया से हुई. पेशे से किसान और खाप से जुड़े संतोष बताते हैं, ‘‘इस आंदोलन में हम लोग शुरू से लगे हुए हैं. यहां खाने पीने की जो भी ज़रूरत पड़ रही है हम लेकर पहुंच रहे हैं. खाप पंचायत लगातार गांवों में पंचायत कर लोगों को आंदोलन से जुड़ने और इसके समर्थकों का विरोध करने के लिए कह रहा है. हमने फैसला लिया है कि जो भी इस कानून के समर्थन में होगा उसे हम अपने गांव में प्रवेश नहीं करने देंगे.’’

मनोहर लाल खट्टर के बयान पर संतोष कहते हैं, ‘‘उन्हें कुछ दिख नहीं रहा है. आधा हरियाणा तो सड़कों पर है.’’

कुरुक्षेत्र से लेकर दिल्ली तक ज़्यादातर बैरिकैड तोड़ने का काम भारतीय किसान यूनियन चढूनी ग्रुप ने किया. चढूनी और उनके किसान यूनियन से जुड़े ज़्यादातर लोग हरियाणा के ही रहने वाले हैं. सिर्फ ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन के दौरान ही हरियाणा के किसानों ने इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया बल्कि जब से भारत सरकार इस कानून को लोकसभा में लेकर आई तब से यहां के किसान इसका विरोध कर रहे हैं. जब कानून पास हो गया तो आंदोलन यहां तेज हो गया. कई जगहों पर बैठकर, सड़क जाम कर लगातार अपना विरोध दर्ज करा रहे थे.

अभी की स्थिति की बात करें तो खाप पंचायतों ने खुलकर किसान आंदोलन को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया है. वे गांव-गांव के लोगों से इस किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए कह रहे हैं. जनप्रतिनधियों पर दबाव बना रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि सबकुछ जानते हुए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने यह बयान दिया या उन्हें सच में कुछ पता नहीं है.

यहां बैठे एक नौजवान ने कहा, ‘‘हम हरियाणा से नहीं आए तो क्या पाकिस्तान से आए हैं? यह हुक्का आप देख रहे हैं यह हरियाणा की शान है. हरियाणा के किसान इसमें बढ़ चढ़कर ही हिस्सा ले रहे हैं. सरकार बरगलाना बंद करे.’’

करनाल जिले से आए भारतीय किसान यूनियन चढूनी ग्रुप से जुड़े नौजवान बहादुर सिंह कहते हैं, ‘‘यह आंदोलन सिर्फ पंजाब का नहीं रह गया है. इसमें हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत देश के अलग-अलग हिस्सों के किसान हिस्सा ले रहे हैं. कोई दिल्ली आकर इसे समर्थन दे रहा है तो कोई जहां है वहीं से अपनी नाराज़गी दर्ज कर रहा है. मोदी जी जो सुबह-सुबह ब्रेड जैम खाते हैं वो हम ही तैयार करते हैं. आज उन्होंने हमारे ऊपर जो तीन काले कानून थोप दिए हैं जिसका पूरा देश विरोध कर रहा है. या तो ये काले कानून सरकार वापस ले या एक नया कानून बनाए जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर ख़रीददारी करने पर उसे अपराध घोषित करे.’’

हरियाणा में लगे बैरिकेड तोड़ने के सवाल पर बहादुर कहते कहते हैं, ‘‘पंजाब हमारा बड़ा भाई है. हमने उनसे आग्रह किया था कि आप हमारे पीछे रहें हम आगे जाकर नाके तोड़ेंगे. मोड़ा मंडी से लेकर सिंधु बॉर्डर तक छह नाके गुरुनाम चढूनी ग्रुप ने तोड़ दिए. मनोहर लाल खट्टर आंदोलन को कमजोर करने की साजिश कर रहे हैं लेकिन उनके बहकावे में अब कोई आने वाला नहीं है. यह उनका बिल्कुल झूठा बयान है.’’

मध्य प्रदेश से आए किसान

यहां हम हरियाणा से आए किसानों से बातचीत कर ही रहे होते हैं तभी तीन लोग हमारी तरफ आते हैं और उसमें से एक कहते हैं, ‘‘यह आंदोलन सिर्फ पंजाब के लोगों का कैसे है. ये भाई लोग हरियाणा से हम लोग तो मध्य प्रदेश से यहां आए हैं. हम लोग मध्य प्रदेश के हर जिले में लगातार प्रदर्शन कर रहे थे. जब पंजाब के किसान भाइयों ने दिल्ली चलो का नारा दिया तो हम लोग भी दिल्ली के लिए निकल गए. हमारे कई लोगों को वहीं रोक लिया गया लेकिन सात सौ के करीब हम यहां पहुंच गए. जिस रोज यहां पहुंचे उसी दिन हममें से कुछ लोगों को हिरासत में ले लिया गया. दूसरे दिन छोड़ा गया.’’

मध्य प्रदेश से आए तीन किसानों में से दो राजेश सोलंकी और धनसिंह ठाकुर शिवनी जिले के रहने वाले हैं वहीं मनमोहन सिंह रघुवंशी रायसेन जिले से हैं. ये तमाम लोग शिव कुमार शर्मा कक्काजी की टीम से हैं. किसानों का जो दल सरकार से लगातार बातचीत कर रहा है उसमें कक्काजी भी शामिल हैं.

मनमोहन सिंह रघुवंशी आंदोलन को सिर्फ पंजाब का बताए जाने पर नाराज़ होकर कहते हैं, ‘‘ऐसा जो कह रहे हैं वो चोर हैं, झूठ बोल रहे है. पंजाब के किसान अगर धान उगाते हैं, हरियाणा के किसान अगर गेहूं उगाते हैं तो मध्य प्रदेश का किसान मक्का उगाता हैं. हम भाई-भाई हैं. हमें 26 तारीख रात आठ बजे जंतर-मंतर से हिरासत में ले लिया गया था. 29 नवंबर तक पुलिस ने हमारे 70 लोगों को एक स्कूल में बंद कर दिया. हम 27 लोग अर्धनग्न होकर संसद भवन जा रहे थे हमें वहां से भी पुलिस उठा ली और रात पांच बजे छोड़ी. फिर हम कपड़े मंगाए और पहनकर आंदोलन में पहुंचे हैं.’’

आप लोग क्यों आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं. यह कानून आपको कैसे प्रभावित कर रहा है, इस सवाल पर मनमोहन सिंह कहते हैं, ‘‘यह कानून क्या सिर्फ पंजाब के किसानों के लिए है, पूरे देश के लिए है न. ट्रेन चल नहीं रही और बसें सरकार रोक दे रही है नहीं तो मध्य प्रदेश से लाखों किसान इसमें शामिल होते. जहां तक रही प्रभावित करने की बात तो अभी मंडी में एक भाई व्यापारी है और मैं किसान हूं. मैं वहां अपना अनाज लेकर गया तो वह हमें एक रशीद देता था कि हमने व्यापारी को इतना अनाज दिया. अब कौन गवाह बनेगा? क्या कोई पत्रकार गवाह बनेगा? व्यापारी अनाज लेकर भाग जाएगा तो कौन जिम्मेदारी लेगा? दूसरी बात कानून में सरकार एक बात क्यों नहीं लिख रही कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे कोई भी अनाज नहीं खरीदा जाएगा. भारत में अनाज का दाना समर्थन मूल्य से कम पर नहीं खरीदा जाना चाहिए हमारी मांग यहीं है.’’

शिवनी जिला से आए धनसिंह ठाकुर कहते हैं, ‘‘वैसे तो सरकार एमएसपी पर सिर्फ गेहूं और धान खरीदती है. मध्य प्रदेश में तो इस बार धान भी नहीं खरीदा जा रहा है. मक्के की समर्थन मूल्य पर खरीदारी हो इसकी मांग शिवनी जिले के किसान मार्च महीने से कर रहे हैं लेकिन कोई भी सुनने वाला नहीं है. सरकार द्वारा तय समर्थन मूल्य 1860 रुपए है, लेकिन किसान मज़बूर में 800 से 900 रुपए में बेचने को मज़बूर है. सरकार खरीद नहीं रही तो इस स्थिति में किसान क्या करे. उसे दूसरी फसल भी तो लगानी है.’’

धन सिंह ठाकुर आगे कहते हैं, ‘‘कृषि कानून के खिलाफ हम आज से नहीं जब से कानून आया है तब से आंदोलन कर रहे हैं. वहां यात्रा निकाली थी. कृषि अध्यादेश का पुतला जलाया था. सितंबर में भी दिल्ली आए थे उसके बाद तीन नवंबर को फिर दिल्ली आए इसी का विरोध करने के लिए. इस बार जब पंजाब के भाइयों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया तो भी हम यहां आए हैं. कानून देशभर में लागू होगा तो समस्या तो सबको ही होगी. जब तक यह कानून वापस नहीं हो जाता तब तक हम आंदोलन में डटे रहेंगे.’’

तीन दिसंबर को केंद्रीय मंत्रियों के साथ हुई बैठक के बाद शिव कुमार कक्काजी विज्ञान भवन से बाहर निकले तो उन्होंने बताया, ‘‘सरकार से हो रही बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचती नज़र नहीं आ रही है. सरकार जहां इन तीनों कानूनों के कुछ कमियों को सही करने का आश्वासन दे रही है वहीं हमारी मांग है कि इसे पूरी तरह से हटाया जाए.’’

आंदोलन जारी रखने के सवाल पर उन्होंने कहा कि तीनों क़ानूनों को वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रहेगा. मध्य प्रदेश से 700 बसों में किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के किसानों ने रोका बॉर्डर

सिंधु और टिकरी बॉर्डर के अलावा किसानों ने दिल्ली-गाज़ियाबाद का गाजीपुर बार्डर और दिल्ली-नोएडा बॉर्डर रोक रखा है. यहां किसान धरने पर बैठे हुए हैं. यहां जो किसान आंदोलन कर रहे हैं वे उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके के रहने वाले हैं.

एक दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान आंदोलनों का गढ़ रहा. पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और महेन्द्र सिंह टिकैत जैसे बड़े किसान नेता इसी इलाके से ताल्लुक रखते थे. इससे पहले दिल्ली में किसानों का सबसे बढ़ा आंदोलन महेंद्र टिकैत के ही नेतृत्व में हुआ था. तब किसानों ने दिल्ली के वोट क्लब को घेर लिया था.

इसबार शुरू में यहां के किसान नेताओं ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लिया लेकिन जब पंजाब और हरियाणा के किसानों ने दिल्ली को घेर लिया तो राकेश टिकैत अपने समर्थकों के साथ दिल्ली-गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे और उसे जाम कर दिया. किसान आंदोलन को लेकर सवाल पर राकेश टिकैत कहते हैं, ‘‘सरकार भले ही हमें समझाने की कोशिश कर रही है लेकिन कानून जब तक वापस नहीं होता तब तक हम वापस नहीं लौटने वाले है.’’

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चौधरी दिवाकर सिंह आंदोलन में देरी से शामिल होने के सवाल पर न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, ‘‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय सबसे ज्यादा खेती का काम चल रहा है. वहां पर गन्ना कटाई और गेहूं बुवाई का काम जोरों पर है. यह दोनों ही काम 15 दिसंबर तक होने हैं. यह काम निपटने के बाद किसान फ्री हो जाएंगे. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि किसान बंट रहा है. इस समय प्रत्येक अन्नदाता एक प्लेटफॉर्म पर आ चुका है.’’

न्यूजलॉन्ड्री ने एक रिपोर्ट में पाया कि पश्चिमी यूपी के कई किसानों को यह खबर ही नहीं की दिल्ली में किसानों का कोई बड़ा आंदोलन चल रहा है.

क्या कहते है जानकार

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलनों में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के किसान मिले. इसके कोई दो राय नहीं कि प्रदर्शनकारी किसानों में पंजाब और हरियाणा के किसानों की संख्या ज़्यादा है. पंजाब इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है इसकी झलक सरकार से बातचीत कर रहे किसान नेताओं में पंजाब के नेताओं की बहुलता से देखी जा रही है.

इसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण है कि सरकार समान्यत एमएसपी पर गेहूं और धान की ही खरीदारी करती है और जो खरीदारी करती है उसमें ज़्यादा ही इन्हीं दो राज्यों से होती है. दूसरी बात मंडी सिस्टम (एपीएमसी) के बर्बाद होने का डर किसानों को है वो पंजाब और हरियाणा में मज़बूत स्थिति में हैं वहीं कई राज्यों में लम्बे समय से काम ही नहीं कर रहा है. जैसे बिहार में यह साल 2006 में खत्म कर दिया गया है.

पंजाब से ज़्यादा खरीदारी की तस्दीक खाद्य मंत्रालय की तरफ से 4 दिसंबर को जारी एक प्रेस रिलीज से भी होती है. प्रेस रिलीज में सरकार ने खरीफ सीजन 2020-21 में हुई धान की खरीदारी का अब तक आंकड़ा जारी किया है. आकड़ों के मुताबिक अब तक कुल 329.86 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदारी हुई है जिसमें से 202.77 लाख मीट्रिक टन यानी कुल का लगभग 61 प्रतिशत सिर्फ पंजाब से. उसके बाद 17 प्रतिशत खरीदारी हरियाणा से हुई है. जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है तो वहां से महज सात फीसद की खरीदारी हुई है. यानी एमएसपी पर हुई कुल खरीदारी का 78 प्रतिशत खरीदारी सिर्फ हरियाणा-पंजाब से हुई है. बचे 22 प्रतिशत में बाकी के राज्य है.

गांव कनेक्शन से जुड़े और किसान आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकार अरविन्द शुक्ला क्या यह आंदोलन सिर्फ पंजाब के लोगों का है, सवाल के जवाब में कहते हैं, ‘‘खाद्य मंत्रालय की तरफ से 3 दिसंबर तक के जारी आंकड़ों को देख लें तो साफ़ पता चल जाएगा कि पंजाब के किसान इस आंदोलन में आगे-आगे क्यों दिख रहे हैं. कुछ खरीदारी का 61 प्रतिशत सिर्फ पंजाब से हुई है. कई राज्यों का इस खरीदारी में नाम तक नहीं दिख रहा तो वहां के किसानों को एमएसपी और मंडी से क्या लेना देना होगा. इस कानून से किसानों को इसी बात का डर लग रहा है न कि मंडियां खत्म हो जाएंगी और एमएसपी पर खरीदारी नहीं होगी. ऐसे में वे ही आगे बढ़कर लड़ेंगे. एमएसपी ने सबसे ज़्यादा फायदा उन्हें ही है.’’

इस आंदोलन के सबसे बुजुर्ग नेता बलवीर सिंह राजेवाल से जब हमने पूछा कि यह आंदोलन क्या सिर्फ पंजाब के लोगों का है तो वे कहते हैं, ‘‘पंजाब में आंदोलन को सबसे पहले मैंने शुरू किया. उसके बाद वहां कई संगठन साथ आए. फिर हरियाणा साथ आया. अब तो यह देशभर के किसानों का आंदोलन है. एमएसपी को लेकर कानून बनाने की मांग हम कर रहे हैं. अगर कानून बन जाता है तो इससे देशभर के किसानों को फायदा होगा. जहां तक रही इस कानून की बात तो ये तीनों कानून असंवैधानिक है और सरकार को इसे वापस लेना ही होगा.’’

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