सिकुड़ते न्यूजरूम में सिकुड़ता लोकतंत्र

आश्चर्य नहीं कि ज्यादातर मीडिया संस्थानों/समूहों के लगातार सिकुड़ते न्यूजरूम्स के बीच देश में खोजी पत्रकारिता का कोई नामलेवा नहीं रह गया है. याद कीजिए, आपने आखिरी बार कब कोई बड़ी और धमाकेदार खोजी रिपोर्ट पढ़ी थी?

सिकुड़ते न्यूजरूम में सिकुड़ता लोकतंत्र
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मुनाफे पर दबाव के बीच सरकार पर बढ़ती निर्भरता

लेकिन इससे कोई सबक लेने के बजाय संकट में फंसा कॉरपोरेट न्यूज मीडिया एक और दुष्चक्र में फंसता जा रहा है. कॉरपोरेट क्षेत्र से घटते विज्ञापन राजस्व की भरपाई के लिए उसकी सरकार पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. ध्यान रहे कि केंद्र और राज्य सरकारें पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ी विज्ञापनदाता के रूप में उभरी हैं. कॉरपोरेट विज्ञापनों के घटने और उसके नए डिजिटल माध्यमों की ओर शिफ्ट होने के कारण सरकारी विज्ञापन पारम्परिक न्यूज मीडिया कंपनियों और उनके अखबारों/न्यूज चैनलों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि यह बात सरकारों को भी पता है. आश्चर्य नहीं कि केंद्र और राज्य सरकारें कॉरपोरेट क्षेत्र की तरह ही विज्ञापन के भारी-भरकम बजट को न्यूज मीडिया कंपनियों से ‘अनुकूल और ‘पाजिटिव’ कवरेज’ के लिए मोलभाव के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं. कॉरपोरेट न्यूज मीडिया कम्पनियां भी विज्ञापनों, दूसरी सरकारी सहायताओं और अन्य कारोबारी हितों को पूरा करने के लिए सरकारों के ज्यादा से ज्यादा करीब होने की कोशिश कर रही हैं. इस प्रक्रिया में वे न सिर्फ सरकार के साथ नत्थी (एम्बेड) हो रही हैं बल्कि “हिज मास्टर्स वायस” बनती जा रही हैं.

इसकी स्वाभाविक परिणति ‘गोदी मीडिया’ की परिघटना के रूप में सामने आई है जहां मुख्यधारा के कॉरपोरेट न्यूज मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता का भोंपू और उसका वैचारिक प्रोपेगंडा मशीन बन गया है. यह ठीक है कि ‘गोदी मीडिया’ की परिघटना के पीछे राजनीतिक- वैचारिक कारणों से लेकर मीडिया कंपनियों के मालिकों/प्रोमोटर्स के निजी और दूसरे कारोबारी हित भी जुड़े हैं. सत्ता की नाराजगी का भय भी है जो उनके कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन इन सबके साथ एक बड़ा कारण कॉरपोरेट न्यूज मीडिया कंपनियों का सरकारी विज्ञापनों का लालच भी है. यही कारण है कि कई राज्य सरकारें भी क्षेत्रीय मीडिया को काबू में रखने और उसे अपने भोंपू की तरह इस्तेमाल करने में कामयाब हैं.

इसका नतीजा भी सबके सामने हैं. कॉरपोरेट न्यूज मीडिया कम्पनियां भले ही तमाम अनैतिक समझौते और अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखकर तात्कालिक तौर पर अपने गिरते मुनाफे को बनाए रखने और आर्थिक- वित्तीय संकट को टालने में कामयाब दिख रही हैं लेकिन यह आत्महंता रणनीति उनकी बची-खुची साख को ख़त्म कर रही है. इसके अनेकों उदाहरण सामने हैं. साल के इन आखिरी महीनों में कड़ाके की ठण्ड में दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हजारों किसान आन्दोलनकारी खुलेआम ‘गोदी मीडिया’ के बहिष्कार के नारे लगा रहे हैं. वे केंद्र सरकार ही नहीं, कॉरपोरेट ‘गोदी मीडिया’ से भी उतने ही नाराज हैं.

यह एक चेतावनी है. कॉरपोरेट न्यूज मीडिया अपने विज्ञापन आधारित कारोबारी माडल के बढ़ते संकट से निपटने के लिए पत्रकारों की छंटनी से लेकर कॉर्पोरेट्स और सरकार के भोंपू बनने जैसे आत्मघाती और अनैतिक समझौते कर रहा है, वह न सिर्फ उसकी साख को खत्म कर रहा है बल्कि उसके संकट को भी गहरा कर रहा है. लेकिन क्या वह इस चेतावनी को सुन पा रहा है?

न्यूज़रूम में कत्लेआम के बीच श्रमजीवी पत्रकार कानून की विदाई

इस साल की एक त्रासद विडम्बना यह भी रही कि जब न्यूजरूम में पत्रकारों की छंटनी, वेतन-भत्तों में कटौती अपने चरम पर था उसी समय केंद्र सरकार ने श्रम सुधारों के तहत एक झटके में 29 श्रम कानूनों को समाप्त करके उन्हें चार नए लेबर कोड में समाहित कर दिया. इनमें से एक श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 (संक्षेप में- श्रमजीवी पत्रकार कानून) भी था. यह कानून वर्ष 1955 में बना था, जब स्वतंत्रता आन्दोलन के कुछ आदर्श सरकार और संसद में बचे थे.

यह कानून अखबारों/पत्रिकाओं/न्यूज़ एजेंसी में काम करने वाले पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को स्थाई नौकरी, बेहतर सेवा शर्तों, वेतन आयोग द्वारा निश्चित वेतन और भत्ते, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार और उनकी स्वतंत्रता को एक हद तक कानूनी संरक्षण देने के लिए बना था. इसका उद्देश्य प्रेस की आज़ादी को प्रेस के मालिकों की आज़ादी बनने से रोकना और पत्रकारों/संपादकों को उनकी नौकरी और सेवा शर्तों को एक हद तक सुरक्षा देना था ताकि वे अपना काम बिना डर-भय के कर सकें.

हालांकि व्यावहारिक अर्थों में केंद्र और राज्य सरकारों के परोक्ष सहयोग और ताकतवर कॉरपोरेट न्यूज़ मीडिया (अखबार) कंपनियों के खुलेआम उल्लंघन के कारण इस कानून की मौत बहुत पहले ही हो चुकी थी लेकिन त्रासद संयोग देखिए कि इस साल जब न्यूजरूम में कत्लेआम चल रहा था, इस कानून को भी चुपचाप दफना दिया गया. यह ऐतिहासिक कानून अब इतिहास का हिस्सा हो चुका है.

निश्चय ही, बड़ी कॉरपोरेट अखबार कंपनियों ने राहत की सांस ली होगी. इस कानून के प्रति उनका खुला विरोध किसी से छुपा नहीं था. इन कम्पनियों ने पिछले सालों में इस कानून को खत्म करने के लिए राजनीतिक लॉबीइंग करने, उसके खिलाफ प्रचार अभियान चलाने से लेकर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने तक हर कोशिश की. एक दर्जन से ज्यादा बड़ी अखबार कंपनियों ने इस कानून की संवैधानिकता को वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन कोर्ट ने लम्बी सुनवाई के बाद 2014 में न सिर्फ उनकी अपील ख़ारिज कर दी बल्कि इन कंपनियों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने और वर्ष 2011 से एरियर देने का आदेश दिया.

लेकिन इन कंपनियों ने मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं करने के लिए हर तिकड़म की. इन बड़ी अखबार कंपनियों ने इस कानून को हर तरह से नाकाम करने के लिए अपने अखबारों में ट्रेड यूनियनों को ख़रीदने और तोड़ने से लेकर पत्रकारों को इस कानून यानी वेज बोर्ड के तहत स्थाई नियुक्ति देने के बजाय जबरन निश्चित अवधि के अनुबंध पर बहाल करने की परिपाटी और पत्रकारों के वेज बोर्ड की सिफारिशों को खुलेआम ठेंगा दिखाने में कोई शर्म नहीं महसूस की. आश्चर्य नहीं कि पिछले डेढ़-दो दशक में सभी मीडिया कंपनियों में पत्रकारों की निश्चित अवधि के अनुबंध और ठेके पर नियुक्तियां होने लगीं जिसमें नौकरी की कोई गारंटी नहीं है और सेवा शर्तों का कोई मतलब नहीं रह गया है.

इसका नतीजा सामने है. आज 95 फीसदी कॉरपोरेट न्यूज़ मीडिया कंपनियों में पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों की कोई ट्रेड यूनियन नहीं है. पत्रकारों की संगठित आवाज़ और कंपनियों से वेतन/सेवा शर्तों के बारे में संगठित बारगेनिंग की कोई गुंजाइश नहीं है. बिना अपवाद के सभी नियुक्तियां निश्चित अवधि के अनुबंध पर होती हैं. कई कंपनियों ने तो अब पत्रकारों को सीधे हायर करने के बजाय परोक्ष रूप से एक ठेकेदार के जरिये नियुक्त करना शुरू कर दिया है. सेवा शर्तों का आलम यह है कि किसी भी पत्रकार या पत्रकारों के समूह को कभी भी निकाला जा सकता है. कामकाजी घंटे 8 के बजाय 10-12 घंटे हैं, साप्ताहिक छुट्टियों का कोई तय नहीं है, मेडिकल छुट्टी तो दूर की बात है. कोई सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान नहीं है.

सच यह है कि आर्थिक-समाज विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली में जिसे “अनिश्चित और जोखिम भरा पेशा” (प्रीकेरियस जॉब) कहा जाता है और जिसकी पहचान नौकरी का अनिश्चितता, कम वेतन और बदतर सेवा शर्तें होती हैं, क्या पत्रकारिता का पेशा भी अब उसी श्रेणी में नहीं गिना जाना चाहिए? मानिए या मत मानिए लेकिन श्रमजीवी पत्रकार कानून के अंत और कोरोना महामारी में 50 से ज्यादा पत्रकारों की मौत ने इस साल पत्रकारों की नौकरियों को, सचमुच में “प्रीकेरियस जॉब” की श्रेणी में ला खड़ा किया है.

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